शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

साल के समापन पर वर्ष में राजनीति

 साल के समापन पर वर्ष में राजनीति

पटना.साल 2025 भारतीय राजनीति के लिए उथल-पुथल, बड़े फैसलों और निरंतर चुनावी गतिविधियों का वर्ष रहा। राष्ट्रीय राजनीति से लेकर राज्यों तक, सत्ता और विपक्ष के बीच तीखे टकराव, गठबंधनों की नई परिभाषाएं और जन मुद्दों को लेकर संघर्ष लगातार देखने को मिला. वर्ष के समापन पर यह जरूरी हो जाता है कि पूरे साल की राजनीतिक घटनाओं और रुझानों का समग्र विश्लेषण किया जाए.

राष्ट्रीय राजनीति: बड़े फैसलों का साल

केंद्र की राजनीति में वर्ष 2025 कई अहम नीतिगत निर्णयों के लिए याद किया जाएगा.सरकार ने आर्थिक सुधारों, बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं को प्राथमिकता देते हुए कई फैसले लिए.संसद में बहसों का स्तर तीखा रहा। कई विधेयकों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लंबी बहस हुई, वहीं कुछ मामलों में विपक्ष ने सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी का आरोप लगाया.विदेश नीति के मोर्चे पर भी सरकार सक्रिय दिखी. पड़ोसी देशों से संबंध, वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका और रणनीतिक साझेदारियों को लेकर सालभर राजनीतिक बयानबाजी होती रही.

विपक्ष की भूमिका: एकजुटता की कोशिश

वर्ष 2025 में विपक्ष ने कई मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास किया। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता जैसे मुद्दे संसद से लेकर सड़क तक उठाए गए.हालांकि, विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती आपसी एकजुटता रही. कुछ राज्यों में विपक्षी दलों ने साझा मोर्चा बनाकर सरकार को कड़ी टक्कर दी, तो कहीं आंतरिक मतभेद सामने आए। इसके बावजूद, साल के अंत तक विपक्ष ने यह संकेत जरूर दिया कि आगामी चुनावों को देखते हुए साझा रणनीति पर काम किया जाएगा.

राज्य राजनीति: चुनावी गर्मी चरम पर

राज्यों की राजनीति में यह साल चुनावी सरगर्मी से भरा रहा। कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, जहां सत्ता परिवर्तन, गठबंधन सरकारों का गठन और मजबूत जनादेश जैसी तस्वीरें उभरीं.राज्य सरकारों के प्रदर्शन पर जनता की नजर रही। कहीं विकास कार्यों को लेकर सरकारों की सराहना हुई, तो कहीं कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं पर तीखा जन असंतोष दिखा.बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में राजनीतिक घटनाक्रम राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बने रहे.

चुनावी संकेत और जनमत

वर्ष 2025 में हुए उपचुनावों और विधानसभा चुनावों ने आने वाले बड़े चुनावों के संकेत दे दिए. मतदाताओं का रुझान साफ तौर पर मुद्दा आधारित राजनीति की ओर जाता दिखा। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई जैसे सवालों पर जनता ने राजनीतिक दलों से स्पष्ट जवाब मांगे.सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म राजनीति के अहम हथियार बनकर उभरे.चुनाव प्रचार से लेकर जनमत निर्माण तक, डिजिटल राजनीति का प्रभाव पहले से कहीं अधिक दिखाई दिया.

सत्ता बनाम विपक्ष: लोकतंत्र की कसौटी

पूरे साल सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव लोकतंत्र की कसौटी साबित हुआ। संसद के भीतर हंगामे, कार्यवाही का बाधित होना और बहिष्कार जैसी घटनाएं बार-बार सामने आईं। वहीं, सरकार का तर्क रहा कि वह जनादेश के आधार पर फैसले ले रही है.इस खींचतान के बीच न्यायपालिका, चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका भी चर्चा में रही। कई फैसलों और टिप्पणियों ने राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दी.

जन आंदोलनों और सामाजिक राजनीति

साल 2025 में सामाजिक मुद्दों पर आधारित आंदोलनों ने भी राजनीति को प्रभावित किया। किसानों, युवाओं, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों की मांगें राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनीं.इन आंदोलनों ने यह स्पष्ट किया कि राजनीति केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि जनसरोकारों से सीधा जुड़ाव उसकी सबसे बड़ी कसौटी है.

निष्कर्ष: बदलाव के संकेतों वाला वर्ष

कुल मिलाकर, वर्ष 2025 की राजनीति बदलाव के संकेतों से भरी रही. सत्ता ने अपनी नीतियों और फैसलों के जरिए मजबूत पकड़ बनाए रखने की कोशिश की, जबकि विपक्ष ने जन मुद्दों के सहारे खुद को पुनर्गठित करने का प्रयास किया.साल के समापन पर यह स्पष्ट है कि आने वाला समय राजनीति के लिए और भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। जन अपेक्षाएं बढ़ रही हैं और राजनीतिक दलों के सामने विश्वास बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी है.26 दिसंबर को वर्ष में राजनीति की यह समीक्षा न केवल बीते साल की तस्वीर पेश करती है, बल्कि भविष्य की राजनीतिक दिशा की झलक भी देती है.

आलोक कुमार

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