शनिवार, 13 दिसंबर 2025

सड़क चौड़ीकरण के नाम पर शिक्षा का वह एकमात्र ठिकाना मिट्टी में मिला दिया

 


पटना. पटना नगर निगम का वार्ड संख्या–1, जो राजधानी के विकास की चमक के बीच स्थित है, आज भी सामाजिक हाशिए पर खड़े समुदायों की उपेक्षा का जीवंत उदाहरण बन गया है.इस वार्ड की निर्वाचित प्रतिनिधि छठिया देवी स्वयं महादलित मुसहर समुदाय से आती हैं, लेकिन विडंबना यह है कि उन्हीं की बिरादरी आज सबसे अधिक उपेक्षा और अव्यवस्था का दंश झेल रही है.दीघा मुसहरी के लोग समस्याओं के ऐसे मकड़जाल में उलझे हैं, वहां से निकलने का कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई नहीं देता.

     दीघा मुसहरी में कभी सरकारी स्कूल की व्यवस्था थी. भवन के अभाव में शिक्षक केदार मांझी की झोपड़ी में पढ़ाने को विवश थे, जहां पास ही सूअरों का बखौर था. यह दृश्य ही बताता है कि शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत को किस हद तक नजरअंदाज किया गया. वर्षों बाद सड़क किनारे स्कूल भवन बना, जिसने बच्चों और अभिभावकों में उम्मीद जगाई. लेकिन जैसे ही दीघा–पटना रेलखंड पर अटल पथ निर्माण की योजना आई, स्कूल भवन को विकास की भेंट चढ़ा दिया गया.सड़क चौड़ीकरण के नाम पर शिक्षा का वह एकमात्र ठिकाना मिट्टी में मिला दिया गया.

    इसी क्रम में वार्ड पार्षद द्वारा ‘हर घर नल-जल’ योजना के तहत जलापूर्ति केंद्र, शौचालय और स्नानघर का निर्माण कराया गया. कुछ समय के लिए ही सही, महादलित समुदाय को लगा कि सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधि उनकी बुनियादी जरूरतों को समझ रहे हैं.लेकिन यह खुशी भी ज्यादा दिन टिक नहीं सकी. सरकारी योजना से बने सामुदायिक भवन की परिधि में जलापूर्ति केंद्र और शौचालय को शामिल कर लिया गया और बाद में उस भवन पर ताला जड़ दिया गया.नतीजा यह हुआ कि जिन सुविधाओं के लिए योजनाएं बनी थीं, उन्हीं से महादलित मुसहर समुदाय को वंचित कर दिया गया.

   जल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं से कट जाने के बाद, समाज के सबसे कमजोर तबके के लोग महाजनों से कर्ज लेकर अपने घरों में शौचालय बनवाने और पानी की पाइप लाइन खुद गाड़ने को मजबूर हुए. यह केवल एक बस्ती की कहानी नहीं है, बल्कि ‘हर घर नल का जल’ जैसी महत्वाकांक्षी योजना के जमीनी क्रियान्वयन पर बड़ा सवाल है. बिहार के कई हिस्सों से यह शिकायत सामने आ रही है कि पाइप तो बिछा दिए गए, लेकिन पानी या तो अनियमित है या बिल्कुल नहीं है.

     दीघा मुसहरी के निवासियों की पहल—खुद पाइपलाइन बिछाना—उनके संघर्ष और जिजीविषा को दर्शाती है, लेकिन यह भी बताती है कि सरकारी व्यवस्था किस हद तक असफल रही है. विकास तब सार्थक माना जाएगा, जब योजनाओं का लाभ सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे. अन्यथा, सामुदायिक भवनों पर ताले और सूखी नल-टोटियां केवल सरकारी दावों की पोल खोलती रहेंगी.

इस गंभीर स्थानीय समस्या के समाधान के लिए जरूरी है कि जन स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) और पटना नगर निगम तत्काल हस्तक्षेप करें. दीघा मुसहरी के महादलित मुसहर समुदाय को जल और स्वच्छता की सुविधाओं से वंचित रखना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा पर भी गहरा आघात है.

आलोक कुमार

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