“पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की अनुपलब्धता”
पूर्णिया का अस्पताल, आईसीयू के बिना — वादों और उद्घाटनों के बीच दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था
पूर्णिया. बिहार के पूर्वोत्तर का प्रमुख जिला, जहाँ अब गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (GMCH) की स्थापना को विकास की दिशा में मील का पत्थर बताया गया था, आज भी सबसे बुनियादी सुविधा — आईसीयू (गहन चिकित्सा इकाई) — से वंचित है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलती है जो आंकड़ों और उद्घाटनों में तो आगे है, पर जमीन पर अब भी जर्जर है.
वादों की फेहरिस्त, हकीकत में सन्नाटा
पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की नींव 2019 में रखी गई थी. मशीनें खरीदी गईं, बेड लगाए गए, लेकिन प्रशिक्षित स्टाफ की कमी ने पूरे प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया. अब, नवंबर 2025 तक, वही हालात हैं — मशीनें धूल खा रही हैं और मरीजों को रेफर करने का सिलसिला जारी है. हर दिन औसतन आठ गंभीर मरीजों को भागलपुर, सिलीगुड़ी या पटना भेजा जाता है, जिनमें से कई रास्ते में दम तोड़ देते हैं.नई बिल्डिंग में 30 बेड का अत्याधुनिक आईसीयू निर्माणाधीन है, पर यह निर्माण वर्षों से अधूरा है. विडंबना यह है कि इस बीच ट्रॉमा सेंटर का छह बार उद्घाटन हो चुका है — हर बार नई तारीख, नया नेता और नई घोषणा; लेकिन मरीजों के लिए अब भी कोई बदलाव नहीं.
ढांचा है, सिस्टम नहीं
अस्पताल में उपकरण हैं, जगह है, और अब तो मेडिकल कॉलेज का दर्जा भी है, लेकिन संचालन के लिए डॉक्टरों, नर्सों और तकनीशियनों की भारी कमी है.रिपोर्टों के अनुसार, बीएमएसआईसीएल और अस्पताल प्रशासन के बीच आईसीयू की लोकेशन को लेकर विवाद ने स्थिति और बिगाड़ दी.कहा गया कि प्रस्तावित जगह अस्पताल से थोड़ी दूरी पर है, इसलिए निर्माण एजेंसी ने हाथ खींच लिया. परिणामस्वरूप, न तो पुराना आईसीयू चला और न नया बन पाया. यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन और जवाबदेही की अनुपस्थिति का परिणाम है. जब स्वास्थ्य व्यवस्था “कागज़ी अस्पतालों” तक सिमट जाए, तो मरीजों के लिए अस्पताल का नाम सिर्फ एक रेफरल सेंटर बन जाता है.
सिस्टम का मौन और जनता की विवशता
पूर्णिया सदर अस्पताल का आईसीयू वर्षों से बंद है, लेकिन किसी स्तर पर कोई जवाबदेही तय नहीं हुई. प्रशासन की ओर से हर बार वही बयान — “स्टाफ की कमी है, जल्द समाधान होगा.” लेकिन “जल्द” का यह वादा अब छह साल पुराना हो चुका है. इस बीच न जाने कितनी जानें गईं, कितने परिवार उम्मीदों के साथ अस्पताल पहुंचे और निराश होकर लौट गए.स्वास्थ्य सेवा का अर्थ केवल भवन और उपकरण नहीं होता; उसका अर्थ होता है प्रशिक्षित हाथों में जीवन की सुरक्षा. जब सरकार और विभाग उस मूल उद्देश्य को भूल जाते हैं, तो परिणाम यही होता है — एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल, लेकिन आईसीयू के बिना.
आवश्यक है जवाबदेही और त्वरित कार्रवाई
अब समय आ गया है कि सरकार इस संकट को केवल “विकासाधीन” कहकर टालने की बजाय, इसे मानव जीवन से जुड़ा आपात मामला माने.
तुरंत प्रशिक्षित स्टाफ की नियुक्ति की जाए,
निर्माणाधीन आईसीयू को प्राथमिकता से पूरा किया जाए,
और यह सुनिश्चित किया जाए कि उपकरण और भवन केवल दिखावा न रहें, बल्कि वास्तव में काम करें.
पूर्णिया का अस्पताल अब “उद्घाटन” नहीं, “उपचार” चाहता है। यह वह समय है जब स्वास्थ्य व्यवस्था को राजनीतिक घोषणाओं से नहीं, मानवता और जिम्मेदारी से संचालित होने की आवश्यकता है.
आलोक कुमार
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