बुधवार, 3 दिसंबर 2025

अनुशासित और अधिक मसीह-केंद्रित बनाता है

 

पटना .सिरो-मालाबार कलीसिया अपने पांच-वर्षीय पादरी अभियान के चौथे पड़ाव पर पहुंच चुकी है—कलीसियाई अनुशासन का वर्ष. यह संयोग नहीं, बल्कि आवश्यकता की मांग है. वैश्वीकरण के प्रवाह में जब पहचान धुंधली पड़ने लगती है, जब परंपरा केवल स्मृतियों में सिमटने लगती हैं, और जब विश्वास की जड़ें प्रवासी जीवन की भागदौड़ में खोने लगती हैं—तब अनुशासन ही वह आधार बनता है जो कलीसिया को स्थिर रखता है.

लेकिन ‘अनुशासन’ शब्द को समझने की आवश्यकता है. अनुशासन किसी दंड की छाया नहीं, बल्कि प्रशिक्षण है; किसी बंधन की जंजीर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक परिपक्वता का मार्ग है. लैटिन शब्द disciplina यही सिखाता है—निर्देशन, शिक्षा और गठन.इसी शिक्षा के द्वार से होकर हम मसीह को गहराई से जानने, उनके साथ एकाकार होने और ईसाई जीवन को सच्चाई से जीने के योग्य बनते हैं.

कैनन विधि: व्यवस्था नहीं, सहभागिता का सेतु

कैथोलिक कलीसिया केवल एक संस्था नहीं—यह सहभागिता का जीवित शरीर है.

ईश्वर त्रिएक के साथ हमारा संबंध तभी संभव है जब हम कलीसिया, उसके शिक्षण, उसकी परंपराओं और उसके अनुशासन के भीतर जीते हैं.

संत पौलुस तिमोथियुस को बताते हैं:

“यह जानने के लिए कि ईश्वर के घर में कैसे आचरण करना चाहिए.”

यह आचरण हमें कलीसिया के कानून—CIC, CCEO, और सिरो-मालाबार के विशेष नियम—सिखाते हैं.

इन विधियों का उद्देश्य नियंत्रण नहीं, बल्कि संरक्षण है—

हमारे विश्वास का संरक्षण

हमारी परंपरा का संरक्षण

कलीसिया की एकता का संरक्षण

और आज यह संरक्षण पहले से कहीं अधिक आवश्यक है.

प्रवासी जीवन में पहचान की चुनौती

ग्रेट ब्रिटेन की सिरो-मालाबार एपरकी, जिसे पोप फ्रांसिस ने स्थापित किया, केवल प्रशासनिक ढांचा नहीं—यह हमारी विरासत का रक्षक है.

यह एपरकी इसलिए बनी कि प्रयास में भी हमारा मर्थोमा नस्रानी चरित्र जीवित रहे—

हमारी लिटुर्जी,

हमारी आध्यात्मिकता,

हमारी भाषा,

हमारा अनुशासन,

और हमारी संस्कृति.

आज की दुनिया एकरूपता की ओर बढ़ रही है—सब समान दिखें, समान बोलें, समान सोचें। ऐसे समय में अपनी परंपरा को सुरक्षित रखना विद्रोह नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान है.

यही कारण है कि कलीसिया विशेष रूप से कहती है—

जहाँ भी विश्वासियों के समूह हों, वहाँ उनकी मूल परंपरा जीवित रहनी चाहिए.

क्योंकि बिना परंपरा के, पहचान खो जाती है;

और बिना पहचान के, विश्वास खोखला हो जाता है.

अनुशासन का वर्ष: आत्म-परिवर्तन का निमंत्रण

बिशप यावसेप स्रम्पिक्कल का यह आह्वान अत्यंत समयोचित है—

“यह वर्ष सीखने, समझने और जीने का वर्ष बने.”

अनुशासन केवल पुरोहितों या धर्मबहनों का दायित्व नहीं—

यह हर नस्रानी विश्वासी के जीवन का हिस्सा है.

क्योंकि अनुशासन हमारी आस्था को व्यवस्थित करता है,

हमारी लिटुर्जी को गरिमा देता है,

और हमारे समुदाय को एकत्व में बांधता है.

जब पल्लियोगम जीवित होता है—तो कलीसिया जनभागीदारी से मजबूत होती है.

जब पेरिश प्रशासन पारदर्शी होता है—तो विश्वास बढ़ता है.

जब विवाह के नियम, संस्कारों की समझ, और CCEO की शिक्षा लोगों तक पहुँचती है—तो कलीसिया का जीवन संतुलित होता है.

अनुशासन बाहरी परिवर्तन नहीं, भीतर से होने वाला पुनर्जागरण है.

लक्ष्य और कार्य—एक दिशा, एक संकल्प

इस वर्ष के पाँच लक्ष्य और नौ कार्य योजनाएँ केवल औपचारिक सूची नहीं;

ये हमारी कलीसिया के भविष्य का रोडमैप हैं—

शिक्षा

जागरूकता

परंपरा संरक्षण

प्रशासनिक सुधार

सहभागिता और सहयोग


इनके पूरा होने पर हमारी कलीसिया न केवल संगठित होगी, बल्कि “साक्ष्य देने वाली कलीसिया” बनेगी—

एक ऐसी कलीसिया जो अपने अनुशासन से, अपने जीवन से, और अपने आचरण से सुसमाचार का उजाला फैलाती है.

अंतिम संदेश: अनुशासन—अनन्त जीवन की तैयारी

कलीसियाई अनुशासन का अंतिम उद्देश्य यही है—

हमें अनन्त जीवन के लिए तैयार करना.

हमारा दैनिक जीवन, हमारा आचरण, हमारी आस्था—सब उसी दिशा की यात्रा हैं.

यदि यह वर्ष हमें अधिक समर्पित, अधिक अनुशासित और अधिक मसीह-केंद्रित बनाता है—

तो यह केवल योजना का एक चरण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पुनर्जन्म होगा.

और यही कलीसिया की सच्ची आशा है.

मरन ईसा मसीह की कृपा, आल्हा का प्रेम, और रुहा द’कुद्शा की सहभागिता हम सबके साथ रहे—आज, कल और सदैव.


आलोक कुमार

AdSense pub-4394035046473735
Alok Kumar

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

कैथोलिक रहस्यवाद में डूबे इन इलाकों की एक विशिष्ट पहचान

 कोट्टायम ,केरल के कोट्टायम जिले की धार्मिक-सांस्कृतिक बनावट जितनी प्राचीन है, उतनी ही बहुरंगी भी। 2011 की जनगणना के अनुसार केरल में 64 लाख से अधिक ईसाई बसते हैं, जिनमें से लगभग 70 प्रतिशत सेंट थॉमस परंपरा से आने वाले हैं—एक ऐसी परंपरा, जो भारतीय ईसाईयत की सबसे पुरानी धारा मानी जाती है.इनके अतिरिक्त लैटिन कैथोलिक, पेंटेकोस्टल, सीएसआई और अन्य प्रोटेस्टेंट समुदाय राज्य की धार्मिक संरचना को और विविधता देते हैं.

इसी सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत के हृदय में स्थित है कोट्टायम जिले का मनमट्टम, जो कंजिरापल्ली तालुका का शांत, लेकिन आध्यात्मिक रूप से समृद्ध इलाका है. यहां का सेंट जॉर्ज चर्च (सिरो-मालाबार) केवल एक पूजा का स्थान नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय की पहचान का स्तंभ है. यह चर्च पलाई डायोसिस के अंतर्गत आता है, जो रोमन विजयपुरम डायोसीस के क्षेत्राधिकार में स्थित एक महत्त्वपूर्ण कैथोलिक केंद्र है.

कैथोलिक रहस्यवाद में डूबे इन इलाकों की एक विशिष्ट पहचान है—सिरो-मालाबार और सिरो-मलंकरा कैथोलिक चर्चों की दोहरी परंपरा.दोनों चर्च वेटिकन से संबद्ध हैं और अपने-अपने मेजर आर्कबिशप के नेतृत्व में चलते हैं. 1930 में गीवर्गीस इवानियोज द्वारा स्थापित सिरो-मलंकरा चर्च और 1932 में पोप पायस XI द्वारा स्वीकृत इसकी हायरार्की इस बात का प्रमाण है कि केरल में ईसाई परंपराएं कितनी गहराई और अनुशासन से विकसित हुए हैं

लेकिन धर्म और परंपरा के इस समृद्ध कैनवास के बीच जीवन अपनी कठिन वास्तविकताओं के साथ खड़ा रहता है.

मनमट्टम के इस प्रतिष्ठित चर्च से जुड़े स्वर्गीय माइकल एन.एम. का परिवार हाल के दिनों में इसी जीवन-द्वंद्व का साक्षी बना.27 नवंबर 2025 को उनके पुत्र जोसेफ नजारक्कटिल की पुत्री का विवाह हुआ—एक ऐसा अवसर, जो किसी भी परिवार में उल्लास और एकजुटता का क्षण होता है.

लेकिन इसी खुशी पर कुछ ही दिनों बाद, 1 दिसंबर 2025 को, एक गहरा साया पड़ गया—माइकल एन.एम. के बड़े पुत्र जेवियर एन.एम. की पुत्रवधू शर्मी जोमोन का निधन हो गया.45 वर्ष की इस महिला ने कैंसर जैसे कठिन रोग से लंबी लड़ाई लड़ी थी.अपने पीछे वह एक पुत्र, एक पुत्री और एक विरल रिक्तता छोड़ गई, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है.

कहते हैं—“विधि का विधान किसी के साथ पक्षपात नहीं करता.”

इस परिवार पर कुछ ही दिनों में खुशी और शोक दोनों आ खड़े हुए—एक ओर विवाह की मधुर ध्वनियां, दूसरी ओर असमय मृत्यु का क्रूर मौन.

जहां एक क्षण में घर आशीर्वादों से भर उठा, वहीं अगले ही क्षण दुख का पहाड़ टूट पड़ा.यह स्थिति उस अनिवार्य जीवनचक्र की याद दिलाती है, जिससे कोई भी परिवार, कोई भी समुदाय अछूता नहीं.

फिर भी ऐसी क्षणभंगुर परिस्थितियां अक्सर समाज और परिवार की संवेदनशीलता, एकजुटता और आध्यात्मिक मजबूती की परीक्षा लेती हैं—और कोट्टायम का यह पारिवारिक संस्मरण यह बताता है कि चाहे व्यक्तिगत जीवन हो या सामुदायिक, विश्वास और मानवीय सहानुभूति ही वह आधार हैं, जिन पर कठिन दिनों की छाया भी अंततः टिक नहीं पाती.


आलोक कुमार


AdSense pub-4394035046473735
Alok Kumar

रविवार, 30 नवंबर 2025

प्रभु यीशु के जन्म से जुड़ी आध्यात्मिक तैयारी का समय माना जाता है

 पटना. ईसाई जगत में प्रतीक्षा, तैयारी और आशा का पवित्र मौसम—आगमनकाल —रविवार से आरंभ हो गया है. क्रिसमस से चार सप्ताह पूर्व मनाया जाने वाला यह काल केवल उत्सवों की शुरुआत नहीं, बल्कि


प्रभु यीशु के जन्म से जुड़ी आध्यात्मिक तैयारी का समय माना जाता है.

इस वर्ष आगमनकाल के प्रथम रविवार 30 नवंबर का मुख्य विषय ‘आशा का संदेश’ रहा.परंपरा के अनुसार दूसरा सप्ताह विश्वास, तीसरा सप्ताह आनंद, और चौथा सप्ताह शांति व प्रेम का संदेश लेकर आता है—वही प्रेम जो क्रिसमस की रात प्रभु यीशु के आगमन के रूप में जगत पर बरसा था.

आगमनकाल को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने वाली कैंडल्स का रंग भी गहरा धार्मिक अर्थ समेटे रहता है. प्रथम, द्वितीय और चौथे सप्ताह में बैंगनी रंग की कैंडल जलाई जाती है, जो प्रार्थना, प्रायश्चित और आध्यात्मिक गंभीरता का प्रतीक है.यह पछतावे से आत्मशुद्धि और तैयारी की ओर बढ़ने का रंग है. जबकि तीसरे सप्ताह में जलने वाली गुलाबी या गुलाबी रंग की कैंडल आनंद, उमंग और आशा के उजाले का उद्घोष करती है—यह बताती है कि अब मन पश्चाताप से उत्सव की ओर बढ़ रहा है.

आगमनकाल के आरंभ के साथ ही देशभर के चर्चों और आराधना स्थलों में विशेष मिस्सा, प्रार्थना और धर्म विधियां संपन्न हुईं. पटना शहर के 11 प्रमुख गिरजाघरों में भी आगमनकाल के प्रथम रविवार को विशेष मिस्सा अनुष्ठान आयोजित किए गए। इसी के साथ क्रिसमस गैदरिंग, मिलन समारोह, मेले और कार्निवल की भी शुरुआत हो गई है.

    समुदाय की तैयारियाँ घर-घर तक फैलने लगती हैं—कहीं कैरोल के स्वर गूंजते हैं, वहीं नए कपड़ों की खरीदारी होती है, तो कहीं रिश्तेदारों और मित्रों के लिए उपहार चुने जाते हैं. केक और बेकरी ऑर्डरों की भागदौड़ भी इसी दिन से शुरू हो जाती है.

इन सबके बीच आगमनकाल हमें याद दिलाता है कि क्रिसमस केवल बाहरी उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक रोशनी को जगाने का अवसर है—आशा, विश्वास, आनंद और प्रेम के मार्ग पर चलने का निमंत्रण.

आलोक कुमार

शनिवार, 29 नवंबर 2025

मानव जीवन विकास समिति की रजत जयंती

 मानव जीवन विकास समिति की रजत जयंती

कटनी . सामाजिक परिवर्तन की ढाई दशकों की गूंज मानव जीवन विकास समिति (MJVS) ने अपने 25 वर्ष पूरे कर लिए—यह सिर्फ एक संस्था का उत्सव नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की जिजीविषा, श्रम और विश्वास का उत्सव है, जिनके जीवन में इस समिति ने उम्मीद की रोशनी जगाई है. रजत जयंती समारोह का यह भव्य आयोजन प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक श्री राजगोपाल पी. वी. की अध्यक्षता में संपन्न हुआ, जिसने इस ऐतिहासिक क्षण को और भी गरिमामय बना दिया।समिति के सचिव निर्भय सिंह ने जब 250 से अधिक गाँवों में 25,000 परिवारों के साथ आजीविका निर्माण के निरंतर प्रयासों का विवरण साझा किया, तो यह स्पष्ट हो गया कि MJVS का सफर सिर्फ सामाजिक सेवा का नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का रहा है.

   समिति के अध्यक्ष श्री बद्रीनारायण नरडिया ने गर्व के साथ कहा कि इन 25 वर्षों में संगठन ने आजीविका और जल संरक्षण के क्षेत्र में स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपनी सार्थक पहचान स्थापित की है. यह यात्रा कठिन जरूर थी, लेकिन साथियों की प्रतिबद्धता और मार्गदर्शकों के स्नेह ने इसे संभव बनाया.समारोह के दौरान समिति के 25 वर्षों की समर्पित यात्रा का दस्तावेज—प्रगति रिपोर्ट—का विमोचन भी हुआ. गांधीवादी चिंतक राजगोपाल पी. वी. ने बापू के विचारों को स्मरण करते हुए कहा कि समाज के अंतिम व्यक्ति की गरिमा और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना ही सच अर्थों में विकास है.उन्होंने MJVS के सफल 25 वर्ष पूरे होने पर सभी सहयोगियों को बधाई देते हुए भविष्य में और व्यापक सामाजिक हस्तक्षेप का संकल्प व्यक्त किया.कार्यक्रम में पूर्व डीजीपी अनुराधा शंकर ने समिति के प्रयासों की सराहना की और बापू के बताए हुए मार्ग—सादगी, सेवा और सत्य—को आधुनिक समाज की आवश्यक दिशा बताते हुए प्रेरक वक्तव्य दिया.

      कृषि विभाग कटनी के उपसंचालक श्री रामनाथ पटेल ने समिति के कार्य को जनहितकारी बताते हुए विभागीय सहयोग जारी रखने का आश्वासन दिया.राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के श्री रामसुजान द्विवेदी ने MJVS की टीम का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि संस्था ने सरकारी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण साझेदारी निभाई है.

     पूर्व विधायक ध्रुव प्रताप सिंह ने इसे “दिखावे से दूर, जमीनी स्तर पर ईमानदारी से काम करने वाली संस्था” बताते हुए सराहना की.बड़वारा विधायक धीरेंद्र बहादुर सिंह ने समिति के सचिव निर्भय सिंह के नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा कि समिति ने सामाजिक सेवा और जल संरक्षण के अभियानों में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.

       सर्वोदय प्रेस सर्विस के संपादक श्री राकेश दीवान ने समिति के कार्य को ‘निरंतरता और निष्ठा की मिसाल’ बताते हुए इसे व्यापक सामाजिक परिवर्तन का भरोसेमंद मंच कहा.कटनी एसपी अभिनव विश्वकर्मा ने भी उपस्थिति दर्ज कराते हुए कहा कि जहाँ भी समाज हित का काम होगा, पुलिस प्रशासन उसकी मदद करने के लिए तैयार है.समिति ने इस अवसर पर अपने उन सभी कार्यकर्ताओं का सम्मान किया, उन्होंने बिना किसी प्रसिद्धि की चाह के, समाज सेवा की असली भावना को जीवित रखा है. केरल, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मुंबई, भोपाल और डिंडोरी से आए 20 समाजसेवियों, कटनी प्रशासन के 29 अधिकारियों और लगभग 500 ग्रामीणों की उपस्थिति ने इस समारोह को वास्तव में जन-उत्सव का रूप दे दिया.MJVS की रजत जयंती सिर्फ अतीत का उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य की राह का प्रकाश है.

    इन 25 वर्षों में बोए गए भरोसे, परिश्रम और परिवर्तन के बीज आने वाले वर्षों में और घने, और फलदार होकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का साया पहुँचाएँ—यही इस समारोह की वास्तविक उपलब्धि है.


आलोक कुमार

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना'

 

पटना . मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी ने आज 1, अणे मार्ग स्थित 'संकल्प' से 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' की 10 लाख लाभुक महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये प्रति लाभुक की दर से 1000 करोड़ रुपये की राशि अंतरण किया. इसके पूर्व 1 करोड़ 46 लाख लाभुक महिलाओं के खाते में 14 हजार 600 करोड़ रुपये की राशि अंतरित की जा चुकी है.

    मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज 'महिला रोजगार योजना' के तहत अपनी पसंद का रोजगार करने के लिए 10 लाख महिलाओं को दस-दस हजार रुपये की सहायता राशि भेजी जा रही है. कुल मिलाकर 1 करोड़ 56 लाख महिलाओं को इसका फायदा मिल जायेगा. इस योजना में दी गयी सहायता से काफी संख्या में महिलाओं ने अपनी पसंद का रोजगार शुरू किया है. जो महिलाएं अपना रोजगार अच्छे से करेंगी, उन्हें आगे 2 लाख रुपये तक की सहायता दी जायेगी.

    मुख्यमंत्री जी ने कहा कि मुझे विश्वास है कि आप सभी महिलाओं को इस 10 हजार रुपये की राशि से अपना काम शुरू करने में काफी मदद मिलेगी. इससे आपका परिवार खुशहाल होगा तथा बिहार का और तेजी से विकास होगा. आज के कार्यक्रम में तीनों लाभार्थियों ने अपने-अपने अनुभव साझा किये हैं. महिलाओं में आत्मविश्वास देखकर मुझे खुशी होती है.हम लोग सभी लोगों के विकास के लिये लगातार काम कर रहे हैं. केन्द्र सरकार का भी राज्य के विकास में पूरा सहयोग मिल रहा है.


आलोक कुमार

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

नागरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर

 


पटना. 26 नवंबर—भारतीय लोकतंत्र का वह दिन, जब देश ने अपने भविष्य की दिशा स्वयं तय की.1949 में इसी तारीख को संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकार किया था, और एक दशक पहले सरकार ने इसे संविधान दिवस के रूप में स्थापित कर नई पीढ़ी को संविधान की आत्मा से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया.यह दिन केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि नागरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है.

      हमारा संविधान केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक आकांक्षाओं का जीवंत ग्रंथ है. यही वह शक्ति है जिसने सामाजिक पृष्ठभूमि को पार करते हुए एक साधारण परिवार के व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का अवसर दिया.लोकतंत्र की यह समावेशी क्षमता तब और भी स्पष्ट होती है जब देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाला व्यक्ति संसद की सीढ़ियों पर नतमस्तक होकर संस्थाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करता है—यह दृश्य संविधान की आत्मा का ही विस्तार है.

     संविधान दिवस पर देश उन महान विभूतियों को नमन करता है, जिन्होंने संविधान के निर्माण में अपनी बुद्धि, दूरदृष्टि और तपस्या समर्पित की.डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर और संविधान सभा की प्रतिष्ठित महिला सदस्यों ने इस दस्तावेज को न केवल कानूनी ढांचा दिया, बल्कि इसे मानवीय संवेदनाओं से भी आलोकित किया.संविधान के 60 वर्ष पूरे होने पर गुजरात में निकाली गई ‘संविधान गौरव यात्रा’ और संविधान के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित विशेष सत्र—ये सभी पहले दर्शाती हैं कि राष्ट्र अपने मूल्यों के प्रति जागरूक और कृतज्ञ है.

     इस वर्ष का संविधान दिवस इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह सरदार पटेल और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती का साक्षी है. देश का एकीकरण सरदार पटेल की अद्भुत राजनीतिक दूरदृष्टि का परिणाम था, जिसने बाद में जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने जैसे साहसिक निर्णयों को भी प्रेरित किया. वहीं भगवान बिरसा मुंडा का संघर्ष आज भी न्याय, गरिमा और जनजातीय सशक्तिकरण की दिशा में प्रकाशस्तंभ बना हुआ है. वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ और गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत वर्षगांठ हमें हमारी सांस्कृतिक दृढ़ता और आध्यात्मिक विरासत की याद दिलाती है.

     संविधान केवल अधिकारों का संग्रह नहीं; यह कर्तव्यों का भी आग्रह करता है. आर्टिकल 51 A में उल्लिखित मौलिक कर्तव्य नागरिकों को यह स्मरण कराते हैं कि अधिकार तभी सार्थक बनते हैं जब कर्तव्य भावनात्मक और व्यवहारिक रूप से अंगीकृत किए जाएं। महात्मा गांधी भी यही कहते थे—कर्तव्य का ईमानदार निर्वहन ही अधिकारों की सबसे सशक्त गारंटी है।

   सदी के 25 वर्ष बीत चुके हैं। अब 2047 के अमृत काल और 2049 के संविधान शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए कर्तव्यनिष्ठ नागरिक ही परिवर्तन के वाहक बन सकते हैं. आने वाले देशों की नीतियों और निर्णय ही नई पीढ़ियों के भाग्य का निर्माण करेंगे। विकसित भारत का सपना केवल सरकार से नहीं, नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और जिम्मेदारी से ही पूर्ण होगा.

    मतदान का अधिकार भी इसी सहभागिता का सबसे बड़ा उपकरण है। हर 26 नवंबर को फर्स्ट-टाइम वोटर्स का सम्मान—यह विचार न केवल अभिनव है, बल्कि लोकतंत्र को नई ऊर्जा देने वाला कदम भी है. यदि हर स्कूल और कॉलेज इसे परंपरा बना लें तो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति युवा पीढ़ी में गर्व और जिम्मेदारी का भाव स्वाभाविक रूप से विकसित होगा.

     अंततः, संविधान दिवस केवल रस्म का दिन नहीं—यह आत्मावलोकन का क्षण है। यह दिन हमें स्मरण करता है कि राष्ट्रनिर्माण कोई दूरस्थ लक्ष्य नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है. जब हम कर्तव्य को प्रधानता देंगे, तब ही हमारा हर कार्य संविधान की शक्ति बढ़ेगी और भारत को एक सशक्त, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बनाने में हमारा योगदान सार्थक साबित होगा.


आलोक कुमार


बुधवार, 26 नवंबर 2025

गुवाहाटी टेस्ट में बुमराह ने अपने टेस्ट करियर की 10,000वीं गेंद .....

 


पटना.भारतीय क्रिकेट में जसप्रीत बुमराह का नाम अब सिर्फ रफ्तार और सटीकता का पर्याय नहीं रहा, बल्कि निरंतरता और कसावट भरे प्रदर्शन का मानदंड भी बन चुका है. गुवाहाटी टेस्ट में बुमराह ने अपने टेस्ट करियर की 10,000वीं गेंद फेंक कर एक ऐसा मुकाम हासिल किया, जो किसी भी तेज गेंदबाज के लिए धैर्य, फिटनेस और उच्च स्तर की निरंतरता का प्रमाण होता है.

दिलचस्प बात यह है कि बुमराह की पहली टेस्ट गेंद एबी डिविलियर्स को थी और 10,000वीं गेंद एडन मार्क्रम को—दोनों ही दक्षिण अफ्रीका के दिग्गज बल्लेबाज। यह संयोग भी उनके करियर के उस दायरे को रेखांकित करता है, जिसमें उन्होंने अपना सबसे बेहतरीन क्रिकेट उन्हीं टीमों के खिलाफ खेला, जो तकनीकी रूप से विश्व क्रिकेट की सबसे मजबूत इकाइयों में रहती हैं.

भारत की ओर से तेज गेंदबाजी में यह मुकाम हासिल करने वाले बुमराह छठे भारतीय तेज गेंदबाज हैं, जबकि कुल मिलाकर वे 17वें भारतीय गेंदबाज और दुनिया के 130वें गेंदबाज बने हैं जिन्होंने टेस्ट में 10,000 से अधिक गेंदें फेंकी हैं. तेज गेंदबाजों की वैश्विक सूची में वे 75 वें नंबर पर हैं—एक उपलब्धि जो उनके अपेक्षाकृत छोटे टेस्ट करियर को देखते हुए और भी बड़ी दिखती है.

कपिल देव से लेकर बुमराह तक—एक सफर की निरंतरता

भारत के टेस्ट इतिहास में सबसे अधिक गेंदें फेंकने का रिकॉर्ड कपिल देव के नाम है—27,740 गेंदें, जो 227 पारियों में फेंकी गईं। इशांत शर्मा (19,160) और जहीर खान (18,785) जैसे बड़े नाम इस सूची के शीर्ष पर हैं. इनके बाद जवागल श्रीनाथ (15,104) और मोहम्मद सिराज (11,515) आते हैं.

इन दिग्गजों की पांत में अब बुमराह का नाम भी मजबूती से जुड़ चुका है—10,013 गेंदों के साथ। यह संख्या सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है, जिसके दम पर टीम इंडिया ने अक्सर कठिन परिस्थितियों में उन्हें आक्रमण का नेतृत्व सौंपा.

विश्व रिकॉर्ड और वैश्विक परिप्रेक्ष्य

टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक गेंदें फेंकने का विश्व रिकॉर्ड मुथैया मुरलीधरन के नाम है—44,039 गेंदें.उनके बाद अनिल कुंबले (40,850) और शेन वॉर्न (40,705) का नाम आता है.तेज गेंदबाजों में यह रिकॉर्ड इंग्लैंड के जेम्स एंडरसन के पास है, जिन्होंने 40,037 गेंदें फेंकी हैं—यह आंकड़ा अपने आप में तेज गेंदबाजी की कठिनाइयों पर प्रकाश डालता है.

बुमराह की उपलब्धि का असल महत्व

आंकड़ों से परे इस उपलब्धि का असली अर्थ यह है कि बुमराह अपनी अनोखी एक्शन, सीम-अप नियंत्रित स्विंग और लगातार विकेट लेने की क्षमता के बावजूद अपनी फिटनेस और वर्कलोड को संभालने में कितने परिपक्व हो चुके हैं.

उनका खेल अब सिर्फ ‘स्पेल’ नहीं, बल्कि ‘स्टेटमेंट’ बन गया है—कि आधुनिक क्रिकेट में भी क्लासिकल टेस्ट गेंदबाज अपनी जगह मजबूती से बनाए रख सकता है.

जसप्रीत बुमराह का यह मील का पत्थर भारतीय क्रिकेट के लिए एक और प्रमाण है कि तेज गेंदबाजी की परंपरा, जो कपिल देव ने शुरू की थी और जहीर-इशांत ने आगे बढ़ाई, वह अब बुमराह और सिराज की पीढ़ी के हाथों सुनहरे दौर में प्रवेश कर रही है.


आलोक कुमार)

The Configure Featured Post option in Blogger allows you to highlight a selected post prominently on

How to Configure Popular Posts in Blogger The Popular Posts widget highlights your most viewed post