पटना .सिरो-मालाबार कलीसिया अपने पांच-वर्षीय पादरी अभियान के चौथे पड़ाव पर पहुंच चुकी है—कलीसियाई अनुशासन का वर्ष. यह संयोग नहीं, बल्कि आवश्यकता की मांग है. वैश्वीकरण के प्रवाह में जब पहचान धुंधली पड़ने लगती है, जब परंपरा केवल स्मृतियों में सिमटने लगती हैं, और जब विश्वास की जड़ें प्रवासी जीवन की भागदौड़ में खोने लगती हैं—तब अनुशासन ही वह आधार बनता है जो कलीसिया को स्थिर रखता है.
लेकिन ‘अनुशासन’ शब्द को समझने की आवश्यकता है. अनुशासन किसी दंड की छाया नहीं, बल्कि प्रशिक्षण है; किसी बंधन की जंजीर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक परिपक्वता का मार्ग है. लैटिन शब्द disciplina यही सिखाता है—निर्देशन, शिक्षा और गठन.इसी शिक्षा के द्वार से होकर हम मसीह को गहराई से जानने, उनके साथ एकाकार होने और ईसाई जीवन को सच्चाई से जीने के योग्य बनते हैं.
कैनन विधि: व्यवस्था नहीं, सहभागिता का सेतु
कैथोलिक कलीसिया केवल एक संस्था नहीं—यह सहभागिता का जीवित शरीर है.
ईश्वर त्रिएक के साथ हमारा संबंध तभी संभव है जब हम कलीसिया, उसके शिक्षण, उसकी परंपराओं और उसके अनुशासन के भीतर जीते हैं.
संत पौलुस तिमोथियुस को बताते हैं:
“यह जानने के लिए कि ईश्वर के घर में कैसे आचरण करना चाहिए.”
यह आचरण हमें कलीसिया के कानून—CIC, CCEO, और सिरो-मालाबार के विशेष नियम—सिखाते हैं.
इन विधियों का उद्देश्य नियंत्रण नहीं, बल्कि संरक्षण है—
हमारे विश्वास का संरक्षण
हमारी परंपरा का संरक्षण
कलीसिया की एकता का संरक्षण
और आज यह संरक्षण पहले से कहीं अधिक आवश्यक है.
प्रवासी जीवन में पहचान की चुनौती
ग्रेट ब्रिटेन की सिरो-मालाबार एपरकी, जिसे पोप फ्रांसिस ने स्थापित किया, केवल प्रशासनिक ढांचा नहीं—यह हमारी विरासत का रक्षक है.
यह एपरकी इसलिए बनी कि प्रयास में भी हमारा मर्थोमा नस्रानी चरित्र जीवित रहे—
हमारी लिटुर्जी,
हमारी आध्यात्मिकता,
हमारी भाषा,
हमारा अनुशासन,
और हमारी संस्कृति.
आज की दुनिया एकरूपता की ओर बढ़ रही है—सब समान दिखें, समान बोलें, समान सोचें। ऐसे समय में अपनी परंपरा को सुरक्षित रखना विद्रोह नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान है.
यही कारण है कि कलीसिया विशेष रूप से कहती है—
जहाँ भी विश्वासियों के समूह हों, वहाँ उनकी मूल परंपरा जीवित रहनी चाहिए.
क्योंकि बिना परंपरा के, पहचान खो जाती है;
और बिना पहचान के, विश्वास खोखला हो जाता है.
अनुशासन का वर्ष: आत्म-परिवर्तन का निमंत्रण
बिशप यावसेप स्रम्पिक्कल का यह आह्वान अत्यंत समयोचित है—
“यह वर्ष सीखने, समझने और जीने का वर्ष बने.”
अनुशासन केवल पुरोहितों या धर्मबहनों का दायित्व नहीं—
यह हर नस्रानी विश्वासी के जीवन का हिस्सा है.
क्योंकि अनुशासन हमारी आस्था को व्यवस्थित करता है,
हमारी लिटुर्जी को गरिमा देता है,
और हमारे समुदाय को एकत्व में बांधता है.
जब पल्लियोगम जीवित होता है—तो कलीसिया जनभागीदारी से मजबूत होती है.
जब पेरिश प्रशासन पारदर्शी होता है—तो विश्वास बढ़ता है.
जब विवाह के नियम, संस्कारों की समझ, और CCEO की शिक्षा लोगों तक पहुँचती है—तो कलीसिया का जीवन संतुलित होता है.
अनुशासन बाहरी परिवर्तन नहीं, भीतर से होने वाला पुनर्जागरण है.
लक्ष्य और कार्य—एक दिशा, एक संकल्प
इस वर्ष के पाँच लक्ष्य और नौ कार्य योजनाएँ केवल औपचारिक सूची नहीं;
ये हमारी कलीसिया के भविष्य का रोडमैप हैं—
शिक्षा
जागरूकता
परंपरा संरक्षण
प्रशासनिक सुधार
सहभागिता और सहयोग
इनके पूरा होने पर हमारी कलीसिया न केवल संगठित होगी, बल्कि “साक्ष्य देने वाली कलीसिया” बनेगी—
एक ऐसी कलीसिया जो अपने अनुशासन से, अपने जीवन से, और अपने आचरण से सुसमाचार का उजाला फैलाती है.
अंतिम संदेश: अनुशासन—अनन्त जीवन की तैयारी
कलीसियाई अनुशासन का अंतिम उद्देश्य यही है—
हमें अनन्त जीवन के लिए तैयार करना.
हमारा दैनिक जीवन, हमारा आचरण, हमारी आस्था—सब उसी दिशा की यात्रा हैं.
यदि यह वर्ष हमें अधिक समर्पित, अधिक अनुशासित और अधिक मसीह-केंद्रित बनाता है—
तो यह केवल योजना का एक चरण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पुनर्जन्म होगा.
और यही कलीसिया की सच्ची आशा है.
मरन ईसा मसीह की कृपा, आल्हा का प्रेम, और रुहा द’कुद्शा की सहभागिता हम सबके साथ रहे—आज, कल और सदैव.
आलोक कुमार

