बुधवार, 21 जनवरी 2026

डिजिटल शिक्षा: ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सीखने के नए अवसर

 डिजिटल शिक्षा: ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सीखने के नए अवसर


आज के डिजिटल युग में शिक्षा केवल कक्षा की चार दीवारों तक सीमित नहीं रही। डिजिटल शिक्षा ने सीखने के तरीके, पहुँच और गुणवत्ता—तीनों को पूरी तरह बदल दिया है। खास बात यह है कि इससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच शिक्षा की खाई धीरे-धीरे कम हो रही है।

डिजिटल शिक्षा क्या है?

डिजिटल शिक्षा का अर्थ है तकनीक के माध्यम से सीखना—जैसे ऑनलाइन क्लास, ई-लर्निंग ऐप्स, वीडियो लेक्चर, डिजिटल क्लासरूम और वर्चुअल लाइब्रेरी। इंटरनेट और स्मार्टफोन की मदद से छात्र अब कहीं से भी पढ़ाई कर सकते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा का प्रभाव

पहले ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे शिक्षकों, कोचिंग और संसाधनों की भारी कमी थी। डिजिटल शिक्षा ने इस स्थिति को बदल दिया है।.अब गांवों के छात्र भी:

देश के शीर्ष शिक्षकों के वीडियो लेक्चर देख सकते हैं

ऑनलाइन टेस्ट और स्टडी मटेरियल तक पहुँच बना सकते हैं

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी घर बैठे कर सकते हैं

सरकार की डिजिटल इंडिया, PM e-Vidya, और DIKSHA जैसे पोर्टल्स ने ग्रामीण छात्रों के लिए नई संभावनाएँ खोली हैं.

शहरी क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा के लाभ

शहरी क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा ने सीखने को और अधिक लचीला बनाया है.छात्र:

स्कूल या कॉलेज के साथ-साथ ऑनलाइन स्किल्स सीख सकते हैं

कोडिंग, डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल मार्केटिंग जैसे नए कोर्स कर सकते हैं

समय का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं

डिजिटल शिक्षा के प्रमुख लाभ

* शिक्षा तक समान और आसान पहुँच

*समय और दूरी की बाधा समाप्त

* पढ़ाई की गुणवत्ता और समझ में सुधार

* ग्रामीण और शहरी छात्रों के बीच शैक्षिक अंतर में कमी

* भविष्य की नौकरियों के लिए डिजिटल कौशल का विकास

चुनौतियाँ और समाधान

हालाँकि डिजिटल शिक्षा के सामने इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल उपकरणों की कमी जैसी चुनौतियाँ हैं, लेकिन सरकार और निजी संस्थानों के प्रयासों से इन समस्याओं पर लगातार काम हो रहा है.

निष्कर्ष

डिजिटल शिक्षा केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता बन चुकी है.यह ग्रामीण और शहरी—दोनों क्षेत्रों के छात्रों को समान अवसर प्रदान कर रही है और भारत को ज्ञान आधारित समाज की ओर ले जा रही है. सही नीतियों और संसाधनों के साथ डिजिटल शिक्षा शिक्षा में गुणवत्ता और समानता दोनों सुनिश्चित कर सकती है.


आलोक कुमार

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

यह नाम परंपरा और परिवर्तन—दोनों का संतुलित प्रतीक बनकर उभरता है


भारतीय जनसंघ से भाजपा तक: राष्ट्रीय अध्यक्षों की परंपरा और नितिन नबीन का उभार

इतिहास की तस्वीरें तब बदलती हैं, जब संगठन ज़मीन से उठे नेतृत्व पर भरोसा जताता है. भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक की यात्रा केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि एक सुदीर्घ संगठनात्मक परंपरा का विस्तार है. इस परंपरा में राष्ट्रीय अध्यक्षों की भूमिका केंद्रीय रही है—वे विचार, संगठन और अनुशासन के धुरी रहे हैं.

भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष

भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ जिन नेताओं ने संगठन की वैचारिक नींव रखी, वे आज भी राजनीतिक इतिहास में स्मरणीय हैं—

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1951–1952)                                                                                                              मौलि चन्द्र शर्मा (1954)                                                                                                                                    प्रेम नाथ डोगरा (1955)                                                                                                                                    आचार्य देवप्रसाद घोष (1956–1959)                                                                                                                  पीताम्बर दास (1960)                                                                                                                            अवसरला राम राव (1961)                                                                                                                        आचार्य देवप्रसाद घोष (1962, 1964)                                                                                                             टेव वीट (1963)                                                                                                                                            वाछराज व्यास (1965)                                                                                                                            बलराज मधोक (1966)                                                                                                                             पंडित दीनदयाल उपाध्याय (1967–1968)

इन नामों ने संगठन को वैचारिक दृढ़ता और अनुशासित ढांचा दिया, जिसने आगे चलकर भाजपा का स्वरूप गढ़ा.

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष (1980 से अब तक)

1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद नेतृत्व की यह परंपरा और मजबूत हुई—

अटल बिहारी वाजपेयी (1980–1986)

लालकृष्ण आडवाणी (1986–1991, 1993–1998, 2004–2005)

मुरली मनोहर जोशी (1991–1993)

कुशाभाऊ ठाकरे (1998–2000)

बंगारू लक्ष्मण (2000–2001)

के. जनाकृष्णमूर्ति (2001–2002)

वेंकैया नायडू (2002–2004)

राजनाथ सिंह (2005–2009, 2013–2014)

नितिन गडकरी (2009–2013)

अमित शाह (2014–2020)

जगत प्रकाश नड्डा (2020–2025/26)

यह क्रम बताता है कि भाजपा में अध्यक्ष पद केवल औपचारिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संगठन संचालन की सबसे अहम कड़ी है.

नितिन नबीन: परंपरा और परिवर्तन का संगम

अब इसी परंपरा में बिहार के नितिन नबीन का नाम जुड़ता दिखाई दे रहा है.भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर साफ संकेत दे दिया है कि नेतृत्व चयन में संगठनात्मक क्षमता, कार्यकर्ता-जुड़ाव और अनुशासन सर्वोपरि है.

नितिन नबीन बिहार सरकार में सड़क निर्माण मंत्री हैं और भाजपा के वरिष्ठ नेता नवीन किशोर सिन्हा के पुत्र हैं. वे पांच बार के विधायक रह चुके हैं और मात्र 45 वर्ष की आयु में यह बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले नेताओं में शामिल हो गए हैं. तुलना करें तो अमित शाह जब राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे, तब उनकी उम्र 50 वर्ष थी—इस दृष्टि से यह फैसला भाजपा की युवा नेतृत्व पर बढ़ती भरोसेमंद रणनीति को दर्शाता है.

बिहार से राष्ट्रीय क्षितिज तक

बिहार की पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री रेणु देवी ने नितिन नबीन को बधाई देते हुए कहा कि बिहार के बेटे को यह जिम्मेदारी मिलना पूरे राज्य के लिए गर्व की बात है.यह बयान केवल औपचारिक शुभकामना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संदेश का संकेत है कि क्षेत्रीय नेतृत्व अब राष्ट्रीय भूमिका में निर्णायक बन रहा है.

निष्कर्ष

नितिन नबीन का उभार केवल एक व्यक्ति का राजनीतिक विस्तार नहीं है, बल्कि उस संगठनात्मक संस्कृति की जीत है, जो कार्यकर्ता से नेतृत्व तक की यात्रा को संभव बनाती है। भारतीय जनसंघ से भाजपा तक की परंपरा में यह नया अध्याय बताता है कि भाजपा में नेतृत्व बदलाव अचानक नहीं, बल्कि लंबे संगठनात्मक अभ्यास का परिणाम होता है.

यह नाम परंपरा और परिवर्तन—दोनों का संतुलित प्रतीक बनकर उभरता है.

आलोक कुमार

सोमवार, 19 जनवरी 2026

जब अख़बार चुप होते हैं, तो लोकतंत्र की आवाज़ धीमी पड़ती है

जब अख़बार चुप होते हैं, तो लोकतंत्र की आवाज़ धीमी पड़ती है


किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों, सड़कों या बाजारों से नहीं होती, बल्कि वहां की वैचारिक चेतना से भी होती है. हिंदी पत्रकारिता के लंबे इतिहास वाले शहरों में जब अख़बार बंद होते हैं, तो यह केवल एक व्यवसाय का अंत नहीं होता—यह समाज की स्मृति और संवाद की क्षमता पर भी असर डालता है.

पटना जैसे शहर, जहां पाटलिपुत्र टाइम्स, सर्चलाइट, आर्यावर्त, प्रदीप और इंडियन नेशन जैसे अख़बारों ने दशकों तक जनमत को दिशा दी, वहां एक-एक कर प्रिंट संस्थानों का बंद होना चिंता का विषय है.हाल के वर्षों में राष्ट्रीय सहारा (पटना संस्करण) के बंद होने की खबर ने इस पीड़ा को और गहरा किया है. यह घटना सिर्फ कर्मचारियों के भविष्य से जुड़ा सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह भी पूछती है कि क्या हम स्थानीय पत्रकारिता के महत्व को भूलते जा रहे हैं.

प्रिंट मीडिया का संकट: कारण और संदर्भ

आज के डिजिटल युग में सूचना की गति तेज़ हुई है, लेकिन इसके साथ ही प्रिंट मीडिया पर दबाव भी बढ़ा है. विज्ञापन का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर चला गया है. कागज, छपाई और वितरण की लागत बढ़ी है, जबकि पाठकों की आदतें बदल रही हैं.कई छोटे और मध्यम अख़बार इस बदलाव के साथ खुद को ढाल नहीं पाए.

इसके अलावा, प्रबंधन संबंधी चुनौतियां, आर्थिक असंतुलन और समय पर संसाधनों की उपलब्धता न होना भी इस संकट को गहराता है.जब संस्थान कमजोर होते हैं, तो उसका सीधा असर पत्रकारों, कर्मचारियों और पाठकों पर पड़ता है.

पत्रकारिता और सामाजिक स्मृति

अख़बार केवल खबरें नहीं छापते; वे समय का दस्तावेज़ होते हैं.स्थानीय मुद्दे, जनआंदोलन, सांस्कृतिक बदलाव और आम लोगों की आवाज़—ये सब प्रिंट पत्रकारिता के माध्यम से ही स्थायी रूप से दर्ज होते हैं.जब कोई अख़बार बंद होता है, तो उसके साथ वर्षों की रिपोर्टिंग, अनुभव और सामाजिक संदर्भ भी धीरे-धीरे ओझल हो जाते हैं.

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स त्वरित सूचना तो देते हैं, लेकिन गहराई, संदर्भ और स्थानीय संवेदनशीलता अक्सर प्रिंट मीडिया से ही आती है.यही कारण है कि प्रिंट पत्रकारिता का कमजोर होना लोकतांत्रिक संवाद के लिए एक चुनौती बनता जा रहा है.

पत्रकारों की भूमिका और भविष्य

इस बदलाव के दौर में पत्रकारों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.उन्हें केवल माध्यम बदलने की नहीं, बल्कि भरोसे, सत्य और गुणवत्ता को बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ता है.कई अनुभवी पत्रकार आज संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं—जहां उन्हें नए प्लेटफॉर्म्स, नई तकनीक और नई कार्यसंस्कृति के साथ खुद को जोड़ना पड़ रहा है.

यह समय निराशा का नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण का भी हो सकता है—यदि नीति-निर्माता, पाठक और मीडिया संस्थान मिलकर गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के महत्व को समझें.

आगे का रास्ता

स्थानीय और क्षेत्रीय पत्रकारिता को बचाने के लिए केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं है। इसके लिए टिकाऊ व्यावसायिक मॉडल, डिजिटल-प्रिंट संतुलन, पाठकों की भागीदारी और संस्थागत पारदर्शिता जरूरी है। साथ ही, पाठकों को भी यह समझना होगा कि भरोसेमंद खबरें मुफ्त नहीं आतीं—उनके पीछे मेहनत, संसाधन और जिम्मेदारी होती है।

अख़बारों का चुप होना केवल एक माध्यम का मौन नहीं है; यह समाज के आत्मसंवाद का रुक जाना भी हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि हम पत्रकारिता को केवल खबरों का स्रोत नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद के रूप में देखें और उसे जीवित रखने का साझा प्रयास करें।


आलोक कुमार

रविवार, 18 जनवरी 2026

नागपुर की रात: जब चोरी नहीं, आस्था पर आघात हुआ

 नागपुर की रात: जब चोरी नहीं, आस्था पर आघात हुआ

नागपुर की धरती पर 14 जनवरी 2026 की वह रात केवल एक चोरी की घटना नहीं थी—वह सीधे आस्था के केंद्र पर किया गया आघात थी.बुट्टीबोरी स्थित सेंट क्लेरेट स्कूल के प्रार्थना कक्ष से परमपवित्र यूखारिस्त के टैबरनेकल का अवैध रूप से उठा लिया जाना न सिर्फ़ कानून-व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि समाज की नैतिक चेतना को भी कटघरे में खड़ा करता है.जब मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर की दीवारें असुरक्षित होने लगें, तब केवल ईंट-पत्थर नहीं टूटते—विश्वास की नींव हिलती है.

यह घटना इसलिए भी अत्यंत गंभीर है क्योंकि यहाँ केवल संपत्ति की चोरी नहीं हुई, बल्कि उस पवित्र उपस्थिति का अपमान हुआ, जिसे कैथोलिक विश्वास में ईश्वर की जीवित उपस्थिति माना जाता है.भले ही प्रत्यक्ष अपवित्रता के प्रमाण न मिले हों, किंतु परमपवित्र यूखारिस्त का जबरन हटाया जाना स्वयं में एक गंभीर धार्मिक अपराध है—ऐसा अपराध, जिसकी पीड़ा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती.

इस संदर्भ में महाधर्माध्यक्ष एलियास गोंसाल्वेस का तात्कालिक पास्तोरल संदेश घटना की गंभीरता को और गहराई देता है. उनका संदेश स्पष्ट है—प्रतिशोध नहीं, प्रायश्चित; आक्रोश नहीं, आत्ममंथन.23 जनवरी को ‘तपस्या और प्रायश्चित दिवस’ घोषित कर उन्होंने यह संकेत दिया कि आस्था पर हुए हमले का उत्तर शांति, प्रार्थना और नैतिक दृढ़ता से दिया जाना चाहिए.

आज प्रश्न यह नहीं है कि चोर कौन थे, बल्कि यह है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं. क्या धार्मिक स्थलों की सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी है, या समाज की सामूहिक चेतना भी इसके लिए उत्तरदायी है? यह घटना हमें याद दिलाती है कि आस्था की रक्षा तलवार से नहीं, सजगता, सम्मान और संवेदनशीलता से होती है.

नागपुर की यह पीड़ा केवल एक धर्मप्रांत की नहीं है. यह उस भारत की पीड़ा है, जो सदियों से धार्मिक सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान की मिसाल रहा है. ऐसे समय में प्रार्थना केवल ईश्वर से संवाद नहीं, बल्कि अपने भीतर के मनुष्य से प्रश्न करने की प्रक्रिया भी बन जानी चाहिए.


आलोक कुमार 

शनिवार, 17 जनवरी 2026

जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं

 जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं—याददाश्तें भी ताले में बंद हो जाती हैं

पटना जैसे शहर में, जहाँ हिंदी पत्रकारिता की एक मजबूत और संघर्षशील परंपरा रही है, वहाँ अख़बारों का बंद होना केवल एक कारोबारी घटना नहीं है—यह लोकतंत्र की आवाज़ के धीमे पड़ने जैसा है। पाटलिपुत्र टाइम्स, प्रदीप, सर्चलाइट, आर्यावर्त, इंडियन नेशन, नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अख़बारों का बंद होना पहले ही क्षेत्रीय मीडिया की ताक़त को कमजोर कर चुका था। अब राष्ट्रीय सहारा (पटना संस्करण) के बंद होने की खबर उस सिलसिले की एक और दुखद कड़ी बन गई है।

सहारा समूह की आर्थिक मुश्किलें—विशेषकर कानूनी मामलों और निवेश योजनाओं से जुड़े विवाद—अब उसके मीडिया संस्थानों पर भी साफ़ दिखने लगी हैं। 2024–25 के दौरान पटना यूनिट में वेतन न मिलने, कामकाज ठप होने और कर्मचारियों की हड़ताल की खबरें आती रहीं। अब जब पूर्ण बंदी की स्थिति सामने है, तो इसका सबसे बड़ा असर उन पत्रकारों पर पड़ा है, जिन्होंने वर्षों तक ज़मीनी सच्चाइयों को सामने लाने का काम किया।

दर्जनों अनुभवी पत्रकार एक झटके में बेरोज़गार हो गए, लेकिन इस पर न तो बड़ी बहस हुई और न ही डिजिटल मंचों पर कोई खास हलचल दिखी। आज की मीडिया दुनिया क्लिक, ट्रेंड और एल्गोरिदम के इर्द-गिर्द घूम रही है, जबकि स्थानीय और क्षेत्रीय प्रिंट पत्रकारिता की मौत चुपचाप हो रही है। शायद इसी कारण यह संकट “सामाजिक स्मृति से मिटते जाने” जैसा महसूस होता है।

यह हालात केवल पटना या बिहार तक सीमित नहीं हैं। देशभर में छोटे और मध्यम अख़बार डिजिटल विज्ञापन शिफ्ट, बढ़ती लागत और बदलती पाठक आदतों के दबाव में संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ जो ज़िम्मेदार, संदर्भयुक्त और ज़मीनी पत्रकारिता खत्म हो रही है, उसकी भरपाई कोई सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं कर सकता।

आज ज़रूरत है कि इस ख़ामोशी को तोड़ा जाए। प्रभावित पत्रकारों के लिए संवाद, सहयोग और सामूहिक प्रयास खड़े हों। क्योंकि अगर अख़बार यूँ ही बंद होते रहे, तो सवाल सिर्फ़ रोज़गार का नहीं रहेगा—लोकतंत्र की स्मृति बचाने का भी होगा

आलोक कुमार

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