शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

इतिहास का वह स्वर्ण क्षण

 

पटना.वर्ष 2025 भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज होने जा रहा है. यह वह वर्ष है जब भारत का राष्ट्रगीत “वंदे मातरम” अपनी 150वीं वर्षगांठ मना रहा है — एक ऐसा गीत जिसने न केवल भारत की स्वतंत्रता की ललकार दी, बल्कि देशभक्ति की भावना को भी अमर बना दिया.बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत आज भी भारत की आत्मा में उसी तीव्रता से गूंजता है, जैसे आजादी के रण में गूंजा था.

इतिहास का वह स्वर्ण क्षण

अक्षय नवमी, 7 नवंबर 1875 — बंगाल के साहित्यिक आकाश पर यह दिन सदा-सदा के लिए अमर हो गया. इसी दिन बंकिम चंद्र चटर्जी ने “वंदे मातरम” की रचना की. यह गीत पहली बार उनकी साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ और बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना.इस उपन्यास के माध्यम से बंकिम चंद्र ने भारत माता की आराधना को राष्ट्रवाद की भावना से जोड़ा, जिससे यह गीत मात्र शब्द न रहकर क्रांति का प्रतीक बन गया.

“वंदे मातरम” शब्दों का शाब्दिक अर्थ है — “मैं मातृभूमि को नमन करता हूँ”.

संस्कृत का “वंदे” यानी नमन करना और “मातरम” यानी माता.यह मातृभूमि के प्रति भक्ति, सम्मान और समर्पण का ऐसा गीत है जिसने हर भारतीय को अपनी मिट्टी से जोड़ दिया.

पहली सार्वजनिक गूंज

1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार “वंदे मातरम” सार्वजनिक रूप से गाया गया.65 सेकंड (1 मिनट 5 सेकंड) के इस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों के दिलों में जोश भर दिया. यह केवल गीत नहीं, बल्कि एक नारा बन गया — “वंदे मातरम” की गूंज सुनते ही स्वतंत्रता सेनानियों की नसों में रक्त नहीं, बिजली दौड़ जाती थी.

2025: 150 वर्षों का गौरव

अब, जब इसकी रचना के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं, पूरा देश “वंदे मातरम स्मरणोत्सव” मना रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्षव्यापी कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि “यह गीत भारत की आत्मा का स्वर है, जो हर पीढ़ी को राष्ट्र सेवा की प्रेरणा देता रहेगा.”इस अवसर पर सरकार ने एक विशेष डाक टिकट जारी किया है.देशभर के स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों में सामूहिक गायन, विचार गोष्ठियों और प्रदर्शनी कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है.

गीत का भावार्थ और सांस्कृतिक अर्थ

“वंदे मातरम” की हर पंक्ति भारत के प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक गौरव और आध्यात्मिक एकता का बखान करती है—

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,

शस्यश्यामलां मातरम्.

यह भारत माता की उस धरती का वर्णन है जो जल से समृद्ध है, अन्न से परिपूर्ण है, और जिसकी हवाएँ शीतल मलय बयार सी हैं.बंकिम चंद्र ने भारत को एक जीवंत देवी स्वरूपा के रूप में चित्रित किया — जो करुणा, शक्ति और सौंदर्य की मूर्ति है.

स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणास्रोत

ब्रिटिश शासन के समय “वंदे मातरम” ने देशभक्ति की ऐसी लहर जगाई कि इसे क्रांतिकारियों का युद्ध नाद कहा जाने लगा.लाठी, गोली और जेल के बीच भी “वंदे मातरम” की आवाज दबाई नहीं जा सकी। इसे गाने मात्र से हजारों युवाओं ने आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए.

आज के भारत में ‘वंदे मातरम’ का अर्थ

आज जब भारत विश्व मंच पर अपनी पहचान नए आत्मविश्वास के साथ बना रहा है, “वंदे मातरम” हमें याद दिलाता है कि यह मिट्टी केवल भूगोल नहीं, बल्कि आस्था और पहचान का प्रतीक है.स्कूलों की असेंबली में, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोहों में, या खेल के मैदानों में जब यह गीत गूंजता है — तो हर भारतीय की रगों में गर्व की लहर दौड़ जाती है.

समान विचार

150 वर्षों के बाद भी “वंदे मातरम” उतना ही जीवंत, उतना ही प्रभावशाली है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि सच्ची देशभक्ति नारे में नहीं, बल्कि मातृभूमि की सेवा में है.“वंदे मातरम” केवल एक राष्ट्रगान नहीं, यह भारत की आत्मा का अनंत स्वर है — जो हमें बार-बार झुकने, नमन करने और अपनी मिट्टी को प्रणाम करने की प्रेरणा देता है. वंदे मातरम — यह भारत का शाश्वत प्रणाम है.

आलोक कुमार


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गुरुवार, 6 नवंबर 2025

पहले फेज में कुल 1,314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई


 पटना.बिहार विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण में कुल 18 जिलों की 121 विधानसभा सीटों पर 6 नवंबर को वोट डाले गए. बिहार विधानसभा चुनाव के पहले फेज में कुल 1,314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई. पहले चरण में 121 सीटों पर 64.66 फीसदी मतदान दर्ज किया गया.

       राजधानी पटना (14 सीटें), भोजपुर (7 सीटें), बक्सर (4 सीटें) , गोपालगंज (6 सीटें) ,सिवान (8 सीटें) ,सारण (10 सीटें) ,मुजफ्फरपुर (11 सीटें) ,वैशाली (8 सीटें) ,दरभंगा (10 सीटें) ,समस्तीपुर (10 सीटें) ,मधेपुरा (4 सीटें) ,सहरसा (4 सीटें) ,खगड़िया (4 सीटें) ,बेगूसराय (7 सीटें) ,मुंगेर (3 सीटें) ,लखीसराय (2 सीटें) ,शेखपुरा (2 सीटें) और नालंदा (7 सीटें) पर शांतिपूर्ण मतदान हुआ.

  यहां के विधानभा में चुनाव आलमनगर, बिहारीगंज, सिंघेश्वर, मधेपुरा, सोनबरसा, सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महिशी, कुशेश्वर स्थान, गौड़ाबौराम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, दरभंगा, हायाघाट, बहादुरपुर, केवटी, जाले, गायघाट , औराई, मीनापुर, बोचहां, सकरा, कुढ़नी, मुजफ्फरपुर, कांटी, बरुराज, पारू, साहेबगंज, बैकुंठपुर, बरौली, गोपालगंज, कुचायकोट, भोरे, हथुआ, सिवान, जीरादेई, दरौली, रघुनाथपुर, दरौंदा, बड़हरिया, गोरेयाकोठी, महाराजगंज, एकमा, मांझी, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, गरखा, अमनौर, परसा, सोनपुर, हाजीपुर, लालगंज, वैशाली, महुआ, राजा पाकार, राघोपुर, महनार, पातेपुर, कल्याणपुर, वारिसनगर, समस्तीपुर, उजियारपुर, मोरवा, सरायरंजन, मोहिउद्दीननगर, विभूतिपुर, रोसड़ा, हसनपुर, चेरिया बरियारपुर, बछवाड़ा, तेघड़ा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय, बखरी, अलौली, खगड़िया, बेलदौर,परबत्ता, तारापुर, मुंगेर, जमालपुर, सूर्यगढ़ा, लखीसराय, शेखपुरा, बरबीघा, अस्थावां, बिहार शरीफ, राजगीर, इस्लामपुर, हिलसा, नालंदा, हरनौत, मोकामा, बाढ़, बख्तियारपुर, दीघा, बांकीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब, फतुहा, दानापुर, मनेर, फुलवारी, मसौढ़ी, पालीगंज, बिक्रम, संदेश, बड़हरा, आरा, अगिआंव, तरारी, जगदीशपुर, शाहपुर, ब्रह्मपुर, बक्सर, डुमरांव और राजपुर.हुआ.

  पटना जिला (औसतन 55.02 फीसदी वोटिंग).मोकामा-62.16%, बाढ़-59.56%, बख्तियारपुर-62.55%, दीघा-39.10%,बांकीपुर-40.00%,कुम्हरार-39.52%.,साहिब-58.51%,फतुहा-59.32%,दानापुर-55.27%,मनेर-58.12%, फुलवारीशरीफ-62.14%,मसौढ़ी-59.91%, पालीगंज-63.20% और बिक्रम-66.95% मतदान दर्ज किया गया.

  जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह-जिलाधिकारी, पटना एवं वरीय पुलिस अधीक्षक, पटना द्वारा बिहार विधान सभा आम निर्वाचन, 2025 के आलोक में 6 नवम्बर को मतदान की समाप्ति के पश्चात प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को संबोधित किया गया.मतदान की पूर्णतः शांतिपूर्ण समाप्ति एवं विगत चुनावों की तुलना में मतदान प्रतिशत में अच्छी वृद्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए पटना जिला के सभी निर्वाचकों-निवासियों, अधिकारियों, मीडिया बंधुओं, सिविल सोसाइटी के सदस्यों सहित सभी स्टेकहोल्डर्स के प्रति आभार व्यक्त किया गया.


आलोक कुमार


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बुधवार, 5 नवंबर 2025

पश्चिम चम्पारण जिले के प्रत्येक मतदाता 11 नवंबर को अपने मताधिकार का प्रयोग करे : जिला निर्वाचन पदाधिकारी


 शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को लेकर पश्चिम चम्पारण में जागरूकता की नई लहर.जिला निर्वाचन पदाधिकारी के दिशा-निर्देश में लगातार आयोजित किए जा रहे हैं मतदाता जागरूकता कार्यक्रम.महिला और युवा मतदाताओं पर दिया जा रहा है विशेष ध्यान......

बेतिया.बिहार विधान सभा आम निर्वाचन-2025 के अवसर पर पश्चिम चम्पारण जिला प्रशासन द्वारा शत-प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मतदाता जागरूकता अभियान को व्यापक स्तर पर चलाया जा रहा है.इसके तहत स्वीप कोषांग द्वारा जिला मुख्यालय से लेकर पंचायत एवं ग्राम स्तर तक निरंतर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं.

       नोडल पदाधिकारी, जिला स्वीप कोषांग, श्रीमती नगमा तबस्सुम ने बताया कि ये सभी गतिविधियाँ जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह-जिला पदाधिकारी, श्री धर्मेन्द्र कुमार के दिशा-निर्देश एवं मार्गदर्शन में संचालित की जा रही हैं. उन्होंने कहा कि स्वीप अभियान के तहत जिले के विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों के सहयोग से रैलियाँ, जागरूकता मार्च, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर प्रतियोगिता, वॉल पेंटिंग, साइकिल रैली, और हस्ताक्षर अभियान जैसे आयोजन लगातार किए जा रहे हैं.

           उन्होंने बताया कि जिले के सभी विभागों, कार्यालयों एवं कर्मियों का सक्रिय सहयोग इस अभियान की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. इसके साथ ही कई स्वयंसेवी संस्थाएँ, सामाजिक संगठन, एनएसएस, एनसीसी कैडेट्स, स्काउट एंड गाइड्स तथा स्थानीय कलाकार भी मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं.

       उन्होंने बताया कि मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों में विशेष रूप से महिला मतदाताओं, युवा मतदाताओं और प्रथम बार मतदान करने वाले मतदाताओं पर फोकस किया जा रहा है. इसके लिए स्कूल-कॉलेजों और ग्राम पंचायत स्तर पर विशेष संवाद एवं जनसंपर्क कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं.

           जिला निर्वाचन पदाधिकारी श्री धर्मेन्द्र कुमार ने कहा कि मतदान लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है. हमारा लक्ष्य है कि पश्चिम चम्पारण जिले का प्रत्येक मतदाता 11 नवंबर को अपने मताधिकार का प्रयोग करे और शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को प्राप्त किया जाए.

आलोक कुमार

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मंगलवार, 4 नवंबर 2025

“पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की अनुपलब्धता”

 


“पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की अनुपलब्धता”

पूर्णिया का अस्पताल, आईसीयू के बिना — वादों और उद्घाटनों के बीच दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था

पूर्णिया. बिहार के पूर्वोत्तर का प्रमुख जिला, जहाँ अब गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (GMCH) की स्थापना को विकास की दिशा में मील का पत्थर बताया गया था, आज भी सबसे बुनियादी सुविधा — आईसीयू (गहन चिकित्सा इकाई) — से वंचित है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलती है जो आंकड़ों और उद्घाटनों में तो आगे है, पर जमीन पर अब भी जर्जर है.

वादों की फेहरिस्त, हकीकत में सन्नाटा

पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की नींव 2019 में रखी गई थी. मशीनें खरीदी गईं, बेड लगाए गए, लेकिन प्रशिक्षित स्टाफ की कमी ने पूरे प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया. अब, नवंबर 2025 तक, वही हालात हैं — मशीनें धूल खा रही हैं और मरीजों को रेफर करने का सिलसिला जारी है. हर दिन औसतन आठ गंभीर मरीजों को भागलपुर, सिलीगुड़ी या पटना भेजा जाता है, जिनमें से कई रास्ते में दम तोड़ देते हैं.नई बिल्डिंग में 30 बेड का अत्याधुनिक आईसीयू निर्माणाधीन है, पर यह निर्माण वर्षों से अधूरा है. विडंबना यह है कि इस बीच ट्रॉमा सेंटर का छह बार उद्घाटन हो चुका है — हर बार नई तारीख, नया नेता और नई घोषणा; लेकिन मरीजों के लिए अब भी कोई बदलाव नहीं.

ढांचा है, सिस्टम नहीं

अस्पताल में उपकरण हैं, जगह है, और अब तो मेडिकल कॉलेज का दर्जा भी है, लेकिन संचालन के लिए डॉक्टरों, नर्सों और तकनीशियनों की भारी कमी है.रिपोर्टों के अनुसार, बीएमएसआईसीएल और अस्पताल प्रशासन के बीच आईसीयू की लोकेशन को लेकर विवाद ने स्थिति और बिगाड़ दी.कहा गया कि प्रस्तावित जगह अस्पताल से थोड़ी दूरी पर है, इसलिए निर्माण एजेंसी ने हाथ खींच लिया. परिणामस्वरूप, न तो पुराना आईसीयू चला और न नया बन पाया. यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन और जवाबदेही की अनुपस्थिति का परिणाम है. जब स्वास्थ्य व्यवस्था “कागज़ी अस्पतालों” तक सिमट जाए, तो मरीजों के लिए अस्पताल का नाम सिर्फ एक रेफरल सेंटर बन जाता है.

सिस्टम का मौन और जनता की विवशता

पूर्णिया सदर अस्पताल का आईसीयू वर्षों से बंद है, लेकिन किसी स्तर पर कोई जवाबदेही तय नहीं हुई. प्रशासन की ओर से हर बार वही बयान — “स्टाफ की कमी है, जल्द समाधान होगा.” लेकिन “जल्द” का यह वादा अब छह साल पुराना हो चुका है. इस बीच न जाने कितनी जानें गईं, कितने परिवार उम्मीदों के साथ अस्पताल पहुंचे और निराश होकर लौट गए.स्वास्थ्य सेवा का अर्थ केवल भवन और उपकरण नहीं होता; उसका अर्थ होता है प्रशिक्षित हाथों में जीवन की सुरक्षा. जब सरकार और विभाग उस मूल उद्देश्य को भूल जाते हैं, तो परिणाम यही होता है — एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल, लेकिन आईसीयू के बिना.

आवश्यक है जवाबदेही और त्वरित कार्रवाई

अब समय आ गया है कि सरकार इस संकट को केवल “विकासाधीन” कहकर टालने की बजाय, इसे मानव जीवन से जुड़ा आपात मामला माने.

तुरंत प्रशिक्षित स्टाफ की नियुक्ति की जाए,

निर्माणाधीन आईसीयू को प्राथमिकता से पूरा किया जाए,

और यह सुनिश्चित किया जाए कि उपकरण और भवन केवल दिखावा न रहें, बल्कि वास्तव में काम करें.

पूर्णिया का अस्पताल अब “उद्घाटन” नहीं, “उपचार” चाहता है। यह वह समय है जब स्वास्थ्य व्यवस्था को राजनीतिक घोषणाओं से नहीं, मानवता और जिम्मेदारी से संचालित होने की आवश्यकता है.

आलोक कुमार

सोमवार, 3 नवंबर 2025

अमोल अनिल मजूमदार घरेलू क्रिकेट के पूर्व स्टार

 “अमोल अनिल मजूमदार: वह कोच जिसने अधूरी पारी को भारतीय महिला क्रिकेट के वर्ल्ड कप से पूरा किया”


पटना.भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने जब इतिहास रचते हुए अपना पहला वनडे विश्व कप खिताब जीता, तो इस जीत के पीछे एक शांत, संयमित और बेहद रणनीतिक सोच वाले कोच का हाथ था — अमोल 
अनिल मजूमदार. यह जीत सिर्फ देश के लिए नहीं, बल्कि खुद मजूमदार के लिए भी एक भावनात्मक क्षण थी, क्योंकि टीम ने यह सफलता उनके जन्मदिन (11 नवंबर) से ठीक पहले हासिल कर उन्हें अब तक का सबसे बड़ा तोहफा दिया.

अमोल अनिल मजूमदार घरेलू क्रिकेट के पूर्व स्टार हैं. उन्होंने भारतीय क्रिकेट इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी है.वह भारतीय क्रिकेट के उन चुनिंदा दिग्गजों में हैं, जो बिना इंटरनेशनल डेब्यू किए भी लीजेंड बने. वह मुंबई और बाद में असम के लिए दाएं हाथ के बल्लेबाज रहे. उन्होंने रणजी ट्रॉफी में अमरजीत कायपी को पीछे छोड़ते हुए सर्वाधिक रनों का रिकॉर्ड बनाया और 1993-94 सीजन में बॉम्बे के लिए हरियाणा के खिलाफ अपने प्रथम श्रेणी पदार्पण मैच में विश्व रिकॉर्ड 260 रन बनाकर सुर्खियां बटोरीं.

 अमोल मजूमदार क्रिकेट की उस दुर्लभ श्रेणी में आते हैं जिन्हें प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी, पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कभी खेलने का अवसर नहीं मिला. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि कोचिंग के ज़रिए अपनी अधूरी पारी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.

घरेलू क्रिकेट का दिग्गज सितारा

11 नवंबर 1974 को मुंबई में जन्मे मजूमदार घरेलू क्रिकेट के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाजों में से एक रहे हैं. उन्होंने 171 फर्स्ट क्लास मैचों में 11,167 रन बनाए, जिसमें 30 शतक और 60 अर्धशतक शामिल हैं। उनके बल्ले की गूंज रणजी ट्रॉफी में वर्षों तक सुनाई दी, लेकिन भारतीय टीम का ब्लू जर्सी उन्हें नसीब नहीं हुआ.

सचिन-आचरेकर की परंपरा से निकला एक नाम

मजूमदार ने क्रिकेट की बारीकियां शारदाश्रम विद्यामंदिर में सीखी, वही संस्था जिसने सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली जैसे दिग्गज दिए। कोच रामाकांत आचरेकर की शागिर्दी में उन्होंने अनुशासन, धैर्य और खेल के प्रति सम्मान सीखा—वही गुण जो बाद में उनकी कोचिंग की पहचान बने.

मैदान से डगआउट तक का सफर

2014 में क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद मजूमदार ने कोचिंग का रास्ता चुना. उन्होंने भारत की अंडर-19 और अंडर-23 टीमों के बल्लेबाजी कोच के रूप में काम किया, राजस्थान रॉयल्स (IPL) के साथ भी जुड़े, और दक्षिण अफ्रीका की राष्ट्रीय टीम तथा नीदरलैंड क्रिकेट टीम को भी अपने अनुभव से दिशा दी.

भारतीय महिला टीम की नई उड़ान

अक्टूबर 2023 में जब बीसीसीआई ने उन्हें भारतीय महिला टीम का हेड कोच नियुक्त किया, तो आलोचकों ने सवाल उठाए—"जिसे कभी भारत के लिए खेलने का मौका नहीं मिला, वह विश्व कप जिताएगा कैसे?" लेकिन मजूमदार ने अपने अनुभव, शांत स्वभाव और रणनीतिक सोच से टीम में अनुशासन, आत्मविश्वास और दृढ़ता का संचार किया.उनकी कोचिंग में टीम ने सिर्फ क्रिकेट नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती सीखी। खिलाड़ियों को "खेलो, डर के बिना" का मंत्र मिला। और परिणाम—भारत का पहला महिला वर्ल्ड कप.

जन्मदिन पर देश का तोहफा

भारत की इस ऐतिहासिक जीत के कुछ ही दिन बाद, जब अमोल मजूमदार 51 वर्ष के हुए, पूरा देश उन्हें एक नायक की तरह देख रहा था। यह उस खिलाड़ी की कहानी है, जिसे मैदान पर खेलने का मौका नहीं मिला, लेकिन उसने डगआउट से इतिहास लिख दिया.अमोल मजूमदार ने साबित कर दिया — “कभी-कभी अधूरी पारी ही सबसे प्रेरक कहानी बन जाती है.”

आलोक कुमार


रविवार, 2 नवंबर 2025

“सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस: आत्माओं के लिए प्रार्थना का दिन”

 “सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस: आत्माओं के लिए प्रार्थना का दिन”


पटना.  आज, 2 नवंबर, कैथोलिक समुदाय विश्व भर में ‘ऑल सोल्स डे’ (सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस) श्रद्धा और आस्था के साथ मनाता है.यह दिन उन सभी दिवंगत आत्माओं के लिए समर्पित होता है, जिन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया है, परंतु अब भी परमेश्वर की अनंत उपस्थिति में प्रवेश से पूर्व शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजर रही हैं.

     इस दिन का मूल भाव है — प्रार्थना, स्मरण और प्रेम का प्रदर्शन. कैथोलिक परंपरा के अनुसार, पृथ्वी पर जीवित विश्वासी अपने दिवंगत परिजनों के लिए मिस्सा (पवित्र बलिदान), प्रार्थना और दान के माध्यम से ईश्वर से कृपा की याचना करते हैं ताकि वे आत्माएं शीघ्र ही स्वर्ग में परम शांति प्राप्त कर सकें.

      सुबह से ही चर्चों में विशेष पवित्र मिस्सा आयोजित किए जाते हैं, जहां श्रद्धालु परिवारजन अपने मृत परिजनों के नाम लेकर उनके लिए प्रार्थना करते हैं. प्रार्थना के पश्चात, लोग कब्रिस्तान जाकर कब्रों को फूलों से सजाते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं, और मौन साधकर अपने प्रियजनों की स्मृतियों को नमन करते हैं. यह दृश्य एक आध्यात्मिक एकता का प्रतीक होता है, जहां मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि अनंत जीवन की ओर एक मार्ग बन जाती है.

        इस पर्व का धार्मिक और भावनात्मक संदेश गहरा है — यह हमें याद दिलाता है कि जीवन क्षणभंगुर है, परंतु प्रेम और विश्वास अमर हैं। मृतकों के लिए की गई प्रार्थनाएं केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आत्माओं के मोक्ष की दिशा में एक ईश्वरीय सहयोग हैं.

         प्रभु यीशु मसीह के वचन इस दिन विशेष रूप से स्मरण किए जाते हैं — “मैं ही पुनरुत्थान और जीवन हूँ; जो मुझ पर विश्वास करता है, वह यद्यपि मर भी जाए, तो भी जीवित रहेगा.”

          यह वचन ऑल सोल्स डे की आत्मा है — आशा, पुनरुत्थान और अनंत जीवन की गारंटी.इस पवित्र अवसर पर, जब मोमबत्तियों की लौ कब्रों के पास झिलमिलाती है, तो यह केवल मृतकों के स्मरण की नहीं, बल्कि जीवितों की जिम्मेदारी की भी याद दिलाती है — कि हम प्रेम, क्षमा और करुणा से भरा जीवन जिएं, ताकि जब हमारी बारी आए, तो कोई और हमारे लिए भी उसी श्रद्धा से दीप जलाए.सभी दिवंगत आत्माओं को परम शांति मिले.

आलोक कुमार

शनिवार, 1 नवंबर 2025

पवित्रता और मानवीयता का उत्सव 1 नवंबर

 सभी संतों को नमन

पटना.सभी संतों को नमन: पवित्रता और मानवीयता का उत्सव 1 नवंबर — यह तिथि केवल ईसाई कैलेंडर का एक दिन नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता और मानवता की महानता का उत्सव है.इस दिन विश्व भर का ईसाई समुदाय ऑल सेंट्स डे या सर्व संतों का पर्व मनाता है — एक ऐसा अवसर, जब वे उन सभी संतों को स्मरण करते हैं जिन्होंने अपने जीवन को ईश्वर और मानवता की सेवा में अर्पित किया.

    इतिहास की पवित्र गूंज इस परंपरा की जड़ें 609 ईस्वी में मिलते हैं, जब पोप बोनिफेस चतुर्थ ने रोम के प्रसिद्ध पैंथियन मंदिर को एक ईसाई चर्च में रूपांतरित कर दिया. इसे उन्होंने सेंट मैरी एंड द मार्टियर्स (सेंट मैरी और शहीदों का चर्च) के नाम से समर्पित किया.दो शताब्दियों बाद, 837 ईस्वी में पोप ग्रेगरी चतुर्थ ने इस पर्व को नवंबर में स्थानांतरित किया. तब से यह दिन न केवल पश्चिमी ईसाई जगत में, बल्कि विश्व के हर कोने में श्रद्धा और विनम्रता के साथ मनाया जाता है.

    संतत्व का अर्थ ईसाई परंपरा में “संत” वह नहीं जो केवल मठों में तपस्या करता है, बल्कि वह भी है जो जीवन की कठोर वास्तविकताओं में भी करुणा और सच्चाई का उदाहरण बनता है.भारतीय संस्कृति में भी यही भाव संत तुलसीदास, कबीर, नानक और बुद्ध की वाणी में प्रतिध्वनित होता है. जिस प्रकार भारत में ‘संत’ शब्द करुणा, समानता और प्रेम का प्रतीक है, उसी प्रकार पश्चिम में Saint ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले उन साधकों का प्रतीक है, जिन्होंने समाज को प्रकाश दिया.

  आध्यात्मिक निरंतरता 31 अक्टूबर की रात को ऑल हैलोज़ ईव यानी हैलोवीन मनाई जाती है — संतों की पूर्वसंध्या. इसके अगले दिन, 2 नवंबर को ऑल सोल्स डे आता है, जब ईसाई मृत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं.इस प्रकार अक्टूबर के अंत और नवंबर की शुरुआत आत्मचिंतन, स्मरण और आत्मा की पवित्रता के उत्सव के रूप में देखी जाती है.

     आज के समय का संदेश आज जब दुनिया भौतिकता की दौड़ में आत्मा को पीछे छोड़ चुकी है, ऑल सेंट्स डे हमें भीतर झाँकने का अवसर देता है. यह पर्व याद दिलाता है कि पवित्रता कोई चमत्कार नहीं, बल्कि जीवन जीने की सजग शैली है.संत हमें यही सिखाते हैं कि भलाई के लिए कोई मंच नहीं चाहिए — एक विनम्र कर्म, एक सच्चा शब्द, एक करुणामय दृष्टि भी संतत्व की राह है.जिस प्रकार भारत में दीपावली अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक है, उसी प्रकार ऑल सेंट्स डे अंधेरे मन से उजली आत्मा की ओर लौटने का आह्वान है.संतों को नमन — क्योंकि वे हमारे भीतर सोई हुई दिव्यता को जगाने की प्रेरणा हैं.


आलोक कुमार

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