बुधवार, 5 नवंबर 2025

पश्चिम चम्पारण जिले के प्रत्येक मतदाता 11 नवंबर को अपने मताधिकार का प्रयोग करे : जिला निर्वाचन पदाधिकारी


 शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को लेकर पश्चिम चम्पारण में जागरूकता की नई लहर.जिला निर्वाचन पदाधिकारी के दिशा-निर्देश में लगातार आयोजित किए जा रहे हैं मतदाता जागरूकता कार्यक्रम.महिला और युवा मतदाताओं पर दिया जा रहा है विशेष ध्यान......

बेतिया.बिहार विधान सभा आम निर्वाचन-2025 के अवसर पर पश्चिम चम्पारण जिला प्रशासन द्वारा शत-प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मतदाता जागरूकता अभियान को व्यापक स्तर पर चलाया जा रहा है.इसके तहत स्वीप कोषांग द्वारा जिला मुख्यालय से लेकर पंचायत एवं ग्राम स्तर तक निरंतर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं.

       नोडल पदाधिकारी, जिला स्वीप कोषांग, श्रीमती नगमा तबस्सुम ने बताया कि ये सभी गतिविधियाँ जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह-जिला पदाधिकारी, श्री धर्मेन्द्र कुमार के दिशा-निर्देश एवं मार्गदर्शन में संचालित की जा रही हैं. उन्होंने कहा कि स्वीप अभियान के तहत जिले के विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों के सहयोग से रैलियाँ, जागरूकता मार्च, नुक्कड़ नाटक, पोस्टर प्रतियोगिता, वॉल पेंटिंग, साइकिल रैली, और हस्ताक्षर अभियान जैसे आयोजन लगातार किए जा रहे हैं.

           उन्होंने बताया कि जिले के सभी विभागों, कार्यालयों एवं कर्मियों का सक्रिय सहयोग इस अभियान की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. इसके साथ ही कई स्वयंसेवी संस्थाएँ, सामाजिक संगठन, एनएसएस, एनसीसी कैडेट्स, स्काउट एंड गाइड्स तथा स्थानीय कलाकार भी मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं.

       उन्होंने बताया कि मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों में विशेष रूप से महिला मतदाताओं, युवा मतदाताओं और प्रथम बार मतदान करने वाले मतदाताओं पर फोकस किया जा रहा है. इसके लिए स्कूल-कॉलेजों और ग्राम पंचायत स्तर पर विशेष संवाद एवं जनसंपर्क कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं.

           जिला निर्वाचन पदाधिकारी श्री धर्मेन्द्र कुमार ने कहा कि मतदान लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है. हमारा लक्ष्य है कि पश्चिम चम्पारण जिले का प्रत्येक मतदाता 11 नवंबर को अपने मताधिकार का प्रयोग करे और शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को प्राप्त किया जाए.

आलोक कुमार

<p>&nbsp;<a href="https://support.google.com/adsense/answer/9274516" rel="noopener" style="background-color: white; color: #0b57d0; font-family: &quot;Google Sans Text&quot;, Roboto, &quot;Helvetica Neue&quot;, Helvetica, sans-serif, &quot;Noto Color Emoji&quot;; font-size: 16px; letter-spacing: 0.08px; text-decoration-line: none;">&nbsp;AdSense ad code</a></p>

मंगलवार, 4 नवंबर 2025

“पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की अनुपलब्धता”

 


“पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की अनुपलब्धता”

पूर्णिया का अस्पताल, आईसीयू के बिना — वादों और उद्घाटनों के बीच दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था

पूर्णिया. बिहार के पूर्वोत्तर का प्रमुख जिला, जहाँ अब गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (GMCH) की स्थापना को विकास की दिशा में मील का पत्थर बताया गया था, आज भी सबसे बुनियादी सुविधा — आईसीयू (गहन चिकित्सा इकाई) — से वंचित है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलती है जो आंकड़ों और उद्घाटनों में तो आगे है, पर जमीन पर अब भी जर्जर है.

वादों की फेहरिस्त, हकीकत में सन्नाटा

पूर्णिया सदर अस्पताल में आईसीयू की नींव 2019 में रखी गई थी. मशीनें खरीदी गईं, बेड लगाए गए, लेकिन प्रशिक्षित स्टाफ की कमी ने पूरे प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया. अब, नवंबर 2025 तक, वही हालात हैं — मशीनें धूल खा रही हैं और मरीजों को रेफर करने का सिलसिला जारी है. हर दिन औसतन आठ गंभीर मरीजों को भागलपुर, सिलीगुड़ी या पटना भेजा जाता है, जिनमें से कई रास्ते में दम तोड़ देते हैं.नई बिल्डिंग में 30 बेड का अत्याधुनिक आईसीयू निर्माणाधीन है, पर यह निर्माण वर्षों से अधूरा है. विडंबना यह है कि इस बीच ट्रॉमा सेंटर का छह बार उद्घाटन हो चुका है — हर बार नई तारीख, नया नेता और नई घोषणा; लेकिन मरीजों के लिए अब भी कोई बदलाव नहीं.

ढांचा है, सिस्टम नहीं

अस्पताल में उपकरण हैं, जगह है, और अब तो मेडिकल कॉलेज का दर्जा भी है, लेकिन संचालन के लिए डॉक्टरों, नर्सों और तकनीशियनों की भारी कमी है.रिपोर्टों के अनुसार, बीएमएसआईसीएल और अस्पताल प्रशासन के बीच आईसीयू की लोकेशन को लेकर विवाद ने स्थिति और बिगाड़ दी.कहा गया कि प्रस्तावित जगह अस्पताल से थोड़ी दूरी पर है, इसलिए निर्माण एजेंसी ने हाथ खींच लिया. परिणामस्वरूप, न तो पुराना आईसीयू चला और न नया बन पाया. यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन और जवाबदेही की अनुपस्थिति का परिणाम है. जब स्वास्थ्य व्यवस्था “कागज़ी अस्पतालों” तक सिमट जाए, तो मरीजों के लिए अस्पताल का नाम सिर्फ एक रेफरल सेंटर बन जाता है.

सिस्टम का मौन और जनता की विवशता

पूर्णिया सदर अस्पताल का आईसीयू वर्षों से बंद है, लेकिन किसी स्तर पर कोई जवाबदेही तय नहीं हुई. प्रशासन की ओर से हर बार वही बयान — “स्टाफ की कमी है, जल्द समाधान होगा.” लेकिन “जल्द” का यह वादा अब छह साल पुराना हो चुका है. इस बीच न जाने कितनी जानें गईं, कितने परिवार उम्मीदों के साथ अस्पताल पहुंचे और निराश होकर लौट गए.स्वास्थ्य सेवा का अर्थ केवल भवन और उपकरण नहीं होता; उसका अर्थ होता है प्रशिक्षित हाथों में जीवन की सुरक्षा. जब सरकार और विभाग उस मूल उद्देश्य को भूल जाते हैं, तो परिणाम यही होता है — एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल, लेकिन आईसीयू के बिना.

आवश्यक है जवाबदेही और त्वरित कार्रवाई

अब समय आ गया है कि सरकार इस संकट को केवल “विकासाधीन” कहकर टालने की बजाय, इसे मानव जीवन से जुड़ा आपात मामला माने.

तुरंत प्रशिक्षित स्टाफ की नियुक्ति की जाए,

निर्माणाधीन आईसीयू को प्राथमिकता से पूरा किया जाए,

और यह सुनिश्चित किया जाए कि उपकरण और भवन केवल दिखावा न रहें, बल्कि वास्तव में काम करें.

पूर्णिया का अस्पताल अब “उद्घाटन” नहीं, “उपचार” चाहता है। यह वह समय है जब स्वास्थ्य व्यवस्था को राजनीतिक घोषणाओं से नहीं, मानवता और जिम्मेदारी से संचालित होने की आवश्यकता है.

आलोक कुमार

सोमवार, 3 नवंबर 2025

अमोल अनिल मजूमदार घरेलू क्रिकेट के पूर्व स्टार

 “अमोल अनिल मजूमदार: वह कोच जिसने अधूरी पारी को भारतीय महिला क्रिकेट के वर्ल्ड कप से पूरा किया”


पटना.भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने जब इतिहास रचते हुए अपना पहला वनडे विश्व कप खिताब जीता, तो इस जीत के पीछे एक शांत, संयमित और बेहद रणनीतिक सोच वाले कोच का हाथ था — अमोल 
अनिल मजूमदार. यह जीत सिर्फ देश के लिए नहीं, बल्कि खुद मजूमदार के लिए भी एक भावनात्मक क्षण थी, क्योंकि टीम ने यह सफलता उनके जन्मदिन (11 नवंबर) से ठीक पहले हासिल कर उन्हें अब तक का सबसे बड़ा तोहफा दिया.

अमोल अनिल मजूमदार घरेलू क्रिकेट के पूर्व स्टार हैं. उन्होंने भारतीय क्रिकेट इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी है.वह भारतीय क्रिकेट के उन चुनिंदा दिग्गजों में हैं, जो बिना इंटरनेशनल डेब्यू किए भी लीजेंड बने. वह मुंबई और बाद में असम के लिए दाएं हाथ के बल्लेबाज रहे. उन्होंने रणजी ट्रॉफी में अमरजीत कायपी को पीछे छोड़ते हुए सर्वाधिक रनों का रिकॉर्ड बनाया और 1993-94 सीजन में बॉम्बे के लिए हरियाणा के खिलाफ अपने प्रथम श्रेणी पदार्पण मैच में विश्व रिकॉर्ड 260 रन बनाकर सुर्खियां बटोरीं.

 अमोल मजूमदार क्रिकेट की उस दुर्लभ श्रेणी में आते हैं जिन्हें प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी, पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कभी खेलने का अवसर नहीं मिला. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि कोचिंग के ज़रिए अपनी अधूरी पारी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.

घरेलू क्रिकेट का दिग्गज सितारा

11 नवंबर 1974 को मुंबई में जन्मे मजूमदार घरेलू क्रिकेट के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाजों में से एक रहे हैं. उन्होंने 171 फर्स्ट क्लास मैचों में 11,167 रन बनाए, जिसमें 30 शतक और 60 अर्धशतक शामिल हैं। उनके बल्ले की गूंज रणजी ट्रॉफी में वर्षों तक सुनाई दी, लेकिन भारतीय टीम का ब्लू जर्सी उन्हें नसीब नहीं हुआ.

सचिन-आचरेकर की परंपरा से निकला एक नाम

मजूमदार ने क्रिकेट की बारीकियां शारदाश्रम विद्यामंदिर में सीखी, वही संस्था जिसने सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली जैसे दिग्गज दिए। कोच रामाकांत आचरेकर की शागिर्दी में उन्होंने अनुशासन, धैर्य और खेल के प्रति सम्मान सीखा—वही गुण जो बाद में उनकी कोचिंग की पहचान बने.

मैदान से डगआउट तक का सफर

2014 में क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद मजूमदार ने कोचिंग का रास्ता चुना. उन्होंने भारत की अंडर-19 और अंडर-23 टीमों के बल्लेबाजी कोच के रूप में काम किया, राजस्थान रॉयल्स (IPL) के साथ भी जुड़े, और दक्षिण अफ्रीका की राष्ट्रीय टीम तथा नीदरलैंड क्रिकेट टीम को भी अपने अनुभव से दिशा दी.

भारतीय महिला टीम की नई उड़ान

अक्टूबर 2023 में जब बीसीसीआई ने उन्हें भारतीय महिला टीम का हेड कोच नियुक्त किया, तो आलोचकों ने सवाल उठाए—"जिसे कभी भारत के लिए खेलने का मौका नहीं मिला, वह विश्व कप जिताएगा कैसे?" लेकिन मजूमदार ने अपने अनुभव, शांत स्वभाव और रणनीतिक सोच से टीम में अनुशासन, आत्मविश्वास और दृढ़ता का संचार किया.उनकी कोचिंग में टीम ने सिर्फ क्रिकेट नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती सीखी। खिलाड़ियों को "खेलो, डर के बिना" का मंत्र मिला। और परिणाम—भारत का पहला महिला वर्ल्ड कप.

जन्मदिन पर देश का तोहफा

भारत की इस ऐतिहासिक जीत के कुछ ही दिन बाद, जब अमोल मजूमदार 51 वर्ष के हुए, पूरा देश उन्हें एक नायक की तरह देख रहा था। यह उस खिलाड़ी की कहानी है, जिसे मैदान पर खेलने का मौका नहीं मिला, लेकिन उसने डगआउट से इतिहास लिख दिया.अमोल मजूमदार ने साबित कर दिया — “कभी-कभी अधूरी पारी ही सबसे प्रेरक कहानी बन जाती है.”

आलोक कुमार


रविवार, 2 नवंबर 2025

“सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस: आत्माओं के लिए प्रार्थना का दिन”

 “सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस: आत्माओं के लिए प्रार्थना का दिन”


पटना.  आज, 2 नवंबर, कैथोलिक समुदाय विश्व भर में ‘ऑल सोल्स डे’ (सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस) श्रद्धा और आस्था के साथ मनाता है.यह दिन उन सभी दिवंगत आत्माओं के लिए समर्पित होता है, जिन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया है, परंतु अब भी परमेश्वर की अनंत उपस्थिति में प्रवेश से पूर्व शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजर रही हैं.

     इस दिन का मूल भाव है — प्रार्थना, स्मरण और प्रेम का प्रदर्शन. कैथोलिक परंपरा के अनुसार, पृथ्वी पर जीवित विश्वासी अपने दिवंगत परिजनों के लिए मिस्सा (पवित्र बलिदान), प्रार्थना और दान के माध्यम से ईश्वर से कृपा की याचना करते हैं ताकि वे आत्माएं शीघ्र ही स्वर्ग में परम शांति प्राप्त कर सकें.

      सुबह से ही चर्चों में विशेष पवित्र मिस्सा आयोजित किए जाते हैं, जहां श्रद्धालु परिवारजन अपने मृत परिजनों के नाम लेकर उनके लिए प्रार्थना करते हैं. प्रार्थना के पश्चात, लोग कब्रिस्तान जाकर कब्रों को फूलों से सजाते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं, और मौन साधकर अपने प्रियजनों की स्मृतियों को नमन करते हैं. यह दृश्य एक आध्यात्मिक एकता का प्रतीक होता है, जहां मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि अनंत जीवन की ओर एक मार्ग बन जाती है.

        इस पर्व का धार्मिक और भावनात्मक संदेश गहरा है — यह हमें याद दिलाता है कि जीवन क्षणभंगुर है, परंतु प्रेम और विश्वास अमर हैं। मृतकों के लिए की गई प्रार्थनाएं केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आत्माओं के मोक्ष की दिशा में एक ईश्वरीय सहयोग हैं.

         प्रभु यीशु मसीह के वचन इस दिन विशेष रूप से स्मरण किए जाते हैं — “मैं ही पुनरुत्थान और जीवन हूँ; जो मुझ पर विश्वास करता है, वह यद्यपि मर भी जाए, तो भी जीवित रहेगा.”

          यह वचन ऑल सोल्स डे की आत्मा है — आशा, पुनरुत्थान और अनंत जीवन की गारंटी.इस पवित्र अवसर पर, जब मोमबत्तियों की लौ कब्रों के पास झिलमिलाती है, तो यह केवल मृतकों के स्मरण की नहीं, बल्कि जीवितों की जिम्मेदारी की भी याद दिलाती है — कि हम प्रेम, क्षमा और करुणा से भरा जीवन जिएं, ताकि जब हमारी बारी आए, तो कोई और हमारे लिए भी उसी श्रद्धा से दीप जलाए.सभी दिवंगत आत्माओं को परम शांति मिले.

आलोक कुमार

शनिवार, 1 नवंबर 2025

पवित्रता और मानवीयता का उत्सव 1 नवंबर

 सभी संतों को नमन

पटना.सभी संतों को नमन: पवित्रता और मानवीयता का उत्सव 1 नवंबर — यह तिथि केवल ईसाई कैलेंडर का एक दिन नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता और मानवता की महानता का उत्सव है.इस दिन विश्व भर का ईसाई समुदाय ऑल सेंट्स डे या सर्व संतों का पर्व मनाता है — एक ऐसा अवसर, जब वे उन सभी संतों को स्मरण करते हैं जिन्होंने अपने जीवन को ईश्वर और मानवता की सेवा में अर्पित किया.

    इतिहास की पवित्र गूंज इस परंपरा की जड़ें 609 ईस्वी में मिलते हैं, जब पोप बोनिफेस चतुर्थ ने रोम के प्रसिद्ध पैंथियन मंदिर को एक ईसाई चर्च में रूपांतरित कर दिया. इसे उन्होंने सेंट मैरी एंड द मार्टियर्स (सेंट मैरी और शहीदों का चर्च) के नाम से समर्पित किया.दो शताब्दियों बाद, 837 ईस्वी में पोप ग्रेगरी चतुर्थ ने इस पर्व को नवंबर में स्थानांतरित किया. तब से यह दिन न केवल पश्चिमी ईसाई जगत में, बल्कि विश्व के हर कोने में श्रद्धा और विनम्रता के साथ मनाया जाता है.

    संतत्व का अर्थ ईसाई परंपरा में “संत” वह नहीं जो केवल मठों में तपस्या करता है, बल्कि वह भी है जो जीवन की कठोर वास्तविकताओं में भी करुणा और सच्चाई का उदाहरण बनता है.भारतीय संस्कृति में भी यही भाव संत तुलसीदास, कबीर, नानक और बुद्ध की वाणी में प्रतिध्वनित होता है. जिस प्रकार भारत में ‘संत’ शब्द करुणा, समानता और प्रेम का प्रतीक है, उसी प्रकार पश्चिम में Saint ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले उन साधकों का प्रतीक है, जिन्होंने समाज को प्रकाश दिया.

  आध्यात्मिक निरंतरता 31 अक्टूबर की रात को ऑल हैलोज़ ईव यानी हैलोवीन मनाई जाती है — संतों की पूर्वसंध्या. इसके अगले दिन, 2 नवंबर को ऑल सोल्स डे आता है, जब ईसाई मृत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं.इस प्रकार अक्टूबर के अंत और नवंबर की शुरुआत आत्मचिंतन, स्मरण और आत्मा की पवित्रता के उत्सव के रूप में देखी जाती है.

     आज के समय का संदेश आज जब दुनिया भौतिकता की दौड़ में आत्मा को पीछे छोड़ चुकी है, ऑल सेंट्स डे हमें भीतर झाँकने का अवसर देता है. यह पर्व याद दिलाता है कि पवित्रता कोई चमत्कार नहीं, बल्कि जीवन जीने की सजग शैली है.संत हमें यही सिखाते हैं कि भलाई के लिए कोई मंच नहीं चाहिए — एक विनम्र कर्म, एक सच्चा शब्द, एक करुणामय दृष्टि भी संतत्व की राह है.जिस प्रकार भारत में दीपावली अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक है, उसी प्रकार ऑल सेंट्स डे अंधेरे मन से उजली आत्मा की ओर लौटने का आह्वान है.संतों को नमन — क्योंकि वे हमारे भीतर सोई हुई दिव्यता को जगाने की प्रेरणा हैं.


आलोक कुमार

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

"देश के गरीब और वंचित वर्गों को आत्मसम्मान और अधिकार की भावना दी"


 *स्व. इंदिरा गांधी और सरदार पटेल को कांग्रेस ने किया याद

 पटना .आज बिहार प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय, सदाकत आश्रम में भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी जी की 41वीं पुण्यतिथि पर उनकी प्रतिमा पर एवं भारत के लौह पुरुष, पूर्व गृह व रक्षा मंत्री स्व. सरदार वल्लभ भाई पटेल की 150वीं जयंती के अवसर पर उनके तैल चित्र पर माल्यार्पण किया गया.

     इस अवसर पर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत  ने इंदिरा गांधी जी के राष्ट्र निर्माण में योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने अदम्य साहस, निर्णायक नेतृत्व और भारत की एकता-अखंडता की रक्षा के लिए जो योगदान दिया, वह सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा. उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी जी ने गरीबी हटाओ का नारा देकर देश के गरीब और वंचित वर्गों को आत्मसम्मान और अधिकार की भावना दी.

     अशोक गहलोत  ने साथ ही सरदार वल्लभभाई पटेल जी की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए कहा कि लौह पुरुष पटेल ने अपने अद्भुत संगठन कौशल और दृढ़ संकल्प के बल पर 562 रियासतों का एकीकरण कर भारत की एकता की नींव रखी। उनके योगदान को सदैव स्वर्ण अक्षरों में याद किया जाएगा.

        कार्यक्रम में मुख्य रूप से राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, अ.भा.कां.कमेटी के महासचिव अविनाश पाण्डेय, अ.भा.कां.क. मीडिया विभाग के चेयरमैन पवन खेड़ा, बिहार चुनाव के पर्यवेक्षक अधीर रंजन चौधरी , सांसद डा0 अखिलेश प्रसाद सिंह, पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी, कोषाध्यक्ष जितेन्द्र गुप्ता, मोती लाल शर्मा,सुबोध कुमार, राजेश राठौड़, जमाल अहमद भल्लू, ब्रजेश प्रसाद मुनन, अजय चौधरी , शरवत जहां फातिमा, कमलदेव नारायण शुक्ला,रौशन कुमार सिंह, मंजीत आनन्द साहू, राज किशोर सिंह,वैद्यनाथ शर्मा, शशि कांत तिवारी,विमलेश तिवारी, शकीलुर रहमान, सत्येन्द्र कुमार सिंह, अरविन्द लाल रजक, आदित्य पासवान,सुनील कुमार सिंह, गुरूदयाल सिंह, शशि भूषण कुमार, प्रदुम्न कुमार, साधना रजक,मधुरेन्द्र कुमार, हसीब अनवर, वसीम अहमद,राजेन्द्र चौधरी , अर्जुन पासवान, सुदय शर्मा, किशोर कुमार, विवेक यादव सहित सैकड़ों कार्यकर्ता मौजूद रहें.


आलोक कुमार

मोकामा सीट अपनी ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि

 पटना.मोकामा सीट अपनी ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ बाहुबलियों के प्रभाव के लिए जानी जाती है. बाहुबली नेता अनंत सिंह यहां से कई बार विधायक रह चुके हैं. गंगा नदी के दक्षिण में बसे इस क्षेत्र में घोसवरी, मोकामा और पंडारक प्रखंड के कुछ गांव शामिल हैं. आगामी 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में मोकामा सीट पर कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है, क्योंकि जातीय समीकरण और बाहुबली प्रभाव इस क्षेत्र की राजनीति को आकार देते हैं.

            बिहार में चुनाव हो रहा है.कुल 243 सीटों पर चुनाव होना है.चुनाव दो चरणों में होना है.पहला चरण 6 नवंबर और दूसरा 11 नवंबर हो है.चुनाव परिणाम 14 नवंबर को आएगा.बिहार के लोगों की नजर मोकामा विधानसभा पर जा ठीक गयी है.भूमिहार बहुल मोकामा विधानसभा सीट पर इस बार दो बाहुबलियों की भिड़ंत होने वाली है. मोकामा के छोटे सरकार जदयू से चुनाव लड़ रहे हैं, तो सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी ने राजद के टिकट पर परचा भर दिया है. चुनाव भले वीणा लड़ रहीं हों, लेकिन मुकाबला अनंत सिंह बनाम सूरजभान सिंह ही बताया जा रहा है.अब दोनों बाहुबलि पसंद नहीं करते हैं कि बाहुबलि  कहा जाए.अब जनता ही बाहुबली है.

        बिहार विधानसभा चुनाव में मोकामा विधानसभा क्षेत्र की अलग अहमियत होती है. मोकामा विधानसभा क्षेत्र और ‘बाहुबली’ अनंत सिंह राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं. इस बार ‘छोटे सरकार’ को उनके ही गढ़ में शिकस्त देने के लिए वीणा देवी मैदान में तर गयीं हैं. वीणा देवी ‘बाहुबली’ सूरजभान सिंह की पत्नी हैं. वह कहते हैं कि जनता ने एक बार मौका दिया, तो वह मोकामा की तस्वीर बदल देंगी. ठीक वैसे ही, जैसे अपने पति सूरजभान सिंह के व्यक्तित्व को बदल दिया.

  मोकामा विधानसभा क्षेत्र दिलीप सिंह का क्षेत्र रहा है.अनंत सिंह के भाई दिलीप सिंह 1990 से एकतरफा चुनाव जीतते थे.उनको बाहुबलि  सूरजभान सिंह ने 2000 में पराजित कर बिहार विधानसभा में पहुंचे.उसके बाद सूरजभान सिंह 2004 में उत्तर प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़े और लोकसभा में पहुंचे.बाहुबलि अनंत सिंह 2005 में बिहार विधानसभा का चुनाव लड़े और विधायक बन गए.तब से अनंत सिंह का सीट बनकर रह गया.लोकसभा चुनाव के एक साल बाद बिहार में हुए विधानसभा चुनाव 2020 में अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार ने राजद के टिकट पर मोकामा सीट पर जीत दर्ज की थी. वर्ष 2022 में एक आपराधिक मामले में सजा होने के बाद उनकी सदस्यता समाप्त हो गयी. इसके बाद उनकी पत्नी नीलम देवी ने उपचुनाव जीता और बाद में जदयू में शामिल हो गयी. इस बार अनंत सिंह जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. 2025 में खुद अनंत सिंह मैदान में हैं.उनके सामने सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी चुनौती दे रही हैं.


आलोक कुमार

बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

इस त्याग ने बेटी को यह सोचने पर विवश किया

 त्याग और अनुशासन का मौन स्तंभ

पटना.1909 में जब सोनोरा स्मार्ट डोड ने मदर्स डे पर एक उपदेश सुना, तो उनके मन में यह प्रश्न उठा कि पिताओं के लिए भी कोई दिन क्यों न हो? माँ के प्रेम की तरह पिता का समर्पण भी तो समान रूप से आदरणीय है। इसी भाव से उन्होंने फादर्स डे की नींव रखी।उनकी प्रेरणा के केंद्र में उनके अपने पिता विलियम जैक्सन स्मार्ट थे — गृह युद्ध के एक सैनिक, जिन्होंने पत्नी के निधन के बाद छह बच्चों का पालन-पोषण अकेले किया.

    इस त्याग ने बेटी को यह सोचने पर विवश किया कि पिता के मौन संघर्ष को भी समाज की मान्यता मिलनी चाहिए।उनके अथक प्रयासों का परिणाम था — 19 जून 1910, जब स्पोकेन, वाशिंगटन में पहला फादर्स डे मनाया गया. लेकिन इसे आधिकारिक मान्यता मिलने में लंबा समय लगा. अंततः 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इसे अमेरिका का राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया.आज भारत सहित अनेक देशों में यह पर्व जून के तीसरे रविवार को मनाया जाता है. 2025 में यह दिन 15 जून को पड़ा.वहीं, कुछ यूरोपीय देशों में इसे 19 मार्च को मनाने की परंपरा है.

     हाल में कलकत्ता महाधर्मप्रांत में भी इस दिवस का उत्साह देखा गया.सेंट पॉल चर्च, कमर चौकी में 28 अक्टूबर 2025 को फादर्स डे समारोह आयोजित हुआ. समुदाय ने अपने पिताओं के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट की.फिर भी, कुछ लोगों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या इस अवसर की व्यापकता पूरे महाधर्मप्रांत तक पहुंच पा रही है? शिवचरण हांसदा ने चिंता जताई कि कुछ चुनिंदा चर्चों तक ही गतिविधियां सीमित हैं.दरअसल, फादर्स डे केवल उत्सव नहीं, बल्कि उस मौन शक्ति का सम्मान है जो परिवार को थामे रखती है. पिता अक्सर भावनाएँ नहीं जताते, पर हर जिम्मेदारी को निभाने में वे उदाहरण बन जाते हैं. समय है कि हम उस मौन त्याग को भी मुखर सम्मान दें — क्योंकि पिता का प्रेम दिखता नहीं, पर हर सफलता के पीछे उसका हाथ होता है.

आलोक कुमार

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

ढोरी माता तीर्थालय में उमड़ी श्रद्धा की भीड़, प्रेम और एकता का संदेश

 



ढोरी माता तीर्थालय में उमड़ी श्रद्धा की भीड़, प्रेम और एकता का संदेश

जारंगडीह.झारखंड के जारंगडीह स्थित ढोरी माता तीर्थालय में 69वां वार्षिक समारोह बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ. रांची महाधर्मप्रांत के अंतर्गत आने वाले गुमला धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष बिशप लिनुस पिंगल एक्का इस आयोजन के मुख्य अतिथि थे. उनके साथ हजारीबाग धर्मप्रांत के बिशप आनंद जोजो भी उपस्थित रहे.
    समारोह की शुरुआत अतिथि धर्माध्यक्ष के पादुका छाजन और भक्ति गीतों के साथ हुई. प्रवेश गान, नृत्य, दया याचना, महिमा गान, बाइबल जुलूस, चढ़ावा और स्तुति गान जैसे भक्ति गीतों की मनमोहक प्रस्तुतियाँ संत एंथोनी और कार्मेल स्कूल, करगली की छात्राओं एवं धर्म बहनों द्वारा दी गईं.
   मुख्य याजक के रूप में बिशप लिनुस पिंगल एक्का तथा धर्माध्यक्ष आनंद जोजो के नेतृत्व में पवित्र मिस्सा समारोह का आयोजन किया गया. देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं ने इसमें भाग लिया और ढोरी माता के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त की.धर्माध्यक्षों ने अपने प्रवचन में प्रेम, सेवा और सामाजिक एकता पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि “ढोरी माता आस्था, दया और मानवता की प्रतीक हैं। ईश्वर प्रेम का यही संदेश हमें एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील और सहयोगी बनाता है.
    ”भक्ति गीतों, संगीत और प्रार्थनाओं से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा. श्रद्धालुओं ने विश्व शांति और मानवीय सद्भाव की कामना की. आयोजन की व्यवस्था ढोरी माता समिति और स्थानीय श्रद्धालुओं के सहयोग से की गई थी.
    अनुष्ठान में फादर सिरियक जोसेफ, फादर माइकल लकड़ा, फादर नोर्बर्ट लकड़ा, फादर सुरेन्द्र पॉल, फादर अल्बर्ट केरकेट्टा, फादर अनुरंजन टोप्पो, फादर मुक्ति मिंज, फादर प्रमोद कुजूर, फादर संतोष टोपनो और फादर एमानुएल टेटे सहित अनेक पुरोहित शामिल हुए.
     दो दिवसीय इस वार्षिक महोत्सव में झारखंड के विभिन्न जिलों बोकारो, रांची, धनबाद, गिरिडीह, हजारीबाग, चतरा, कोडरमा और पलामू  के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से ढोरी माता के चरणों में मन्नत मांगता है, उसकी कामना अवश्य पूरी होती है.ढोरी माता तीर्थ केवल आस्था का नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और मानवता के संगम का स्थल बन चुका है.

आलोक कुमार

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

राजनीति में बाहुबल और जनाधार

मोकामा विधानसभा :


बाहुबलियों की परंपरा, जनता की परीक्षा

पटना.बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा होते ही एक बार फिर मोकामा सीट सुर्खियों में है. 243 सीटों वाले इस राज्य में दो चरणों में चुनाव होने हैं — पहला चरण 6 नवंबर और दूसरा 11 नवंबर को, जबकि परिणाम 14 नवंबर को घोषित किए जाएंगे. लेकिन बिहार की निगाहें मोकामा पर टिकी हैं, जहाँ राजनीति, जातीय समीकरण और बाहुबल का अनोखा संगम देखने को मिलता है.गंगा नदी के दक्षिण तट पर स्थित मोकामा क्षेत्र में घोसवरी, मोकामा और पंडारक प्रखंड के कुछ गांव शामिल हैं. यह सीट अपने इतिहास और बाहुबली नेताओं के प्रभाव के लिए प्रसिद्ध रही है. यहाँ की राजनीति में बाहुबल और जनाधार का अद्भुत संतुलन हमेशा चर्चा में रहा है.

        बाहुबलियों की परंपरा और मुकाबले की विरासत मोकामा का नाम आते ही अनंत सिंह उर्फ "छोटे सरकार" की याद आती है. यह सीट लंबे समय से उनके नाम से जुड़ी रही है. लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में हालात पहले जैसे नहीं हैं.इस बार मैदान में दो बाहुबलियों का आमना-सामना होने जा रहा है — एक ओर जदयू के उम्मीदवार अनंत सिंह, तो दूसरी ओर राजद से सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी.दिलचस्प यह है कि अब दोनों ही पक्ष “बाहुबली” कहलाना पसंद नहीं करते.उनका कहना है कि असली शक्ति जनता के पास है, और वह आज की असली बाहुबली है.

           लेकिन इतिहास बताता है कि मोकामा की राजनीति में बाहुबली प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.इतिहास में झाँके तो...मोकामा विधानसभा सीट कभी दिलीप सिंह का गढ़ हुआ करती थी.1990 के दशक में वे लगातार चुनाव जीतते रहे. लेकिन वर्ष 2000 में सूरजभान सिंह ने उन्हें हराकर इस गढ़ में सेंध लगाई. सूरजभान सिंह बाद में 2004 में लोकसभा पहुंचे, जबकि 2005 में अनंत सिंह ने विधानसभा में दस्तक दी और तब से यह सीट उनके नाम से जानी जाने लगी.

            2020 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह ने राजद के टिकट पर जीत हासिल की, लेकिन 2022 में एक आपराधिक मामले में सजा होने के बाद उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गई.इसके बाद उनकी पत्नी नीलम देवी ने उपचुनाव में जीत दर्ज की और बाद में जदयू में शामिल हो गईं. अब 2025 में खुद अनंत सिंह जदयू से मैदान में हैं.नया मुकाबला, पुरानी रंजिश इस बार वीणा देवी मैदान में हैं, लेकिन मुकाबला अनंत सिंह बनाम सूरजभान सिंह ही माना जा रहा है. वीणा देवी कहती हैं — “जनता ने एक बार मौका दिया तो मोकामा की तस्वीर बदल देंगे, जैसे मैंने अपने पति सूरजभान सिंह का जीवन बदल दिया.”

     दूसरी ओर, अनंत सिंह का दावा है कि मोकामा की जनता “छोटे सरकार” के साथ है और विकास के मुद्दे पर उन्हें फिर से मौका देगी.जातीय समीकरण और जनता की भूमिका भूमिहार बहुल इस क्षेत्र में जातीय समीकरण हमेशा निर्णायक रहे हैं.लेकिन अब यह लड़ाई केवल जाति या बाहुबल की नहीं, बल्कि प्रभाव और छवि की हो गई है.जनता तय करेगी कि पुराने राजनीतिक प्रतीकों को आगे बढ़ाना है या नई दिशा देनी है.


आलोक कुमार

रविवार, 26 अक्टूबर 2025

“खरना” छठ महापर्व का दूसरा और अत्यंत पवित्र दिन

 पटना.“खरना” छठ महापर्व का दूसरा और अत्यंत पवित्र दिन आस्था का आलोक : जब घर-आंगन में उतरता है ‘खरना’ का उजासरविवार की सांझ है.आसमान पर हल्की केसरिया आभा फैली हुई है.दिनभर की भागदौड़, बाजार की रौनक, घाटों की तैयारियां और घरों में उत्साह की हलचल—सब कुछ एक अदृश्य आस्था की डोर से बंधा प्रतीत होता है. आज खरना है—छठ महापर्व का दूसरा दिन. वही दिन जब सूर्यास्त के साथ व्रती अपने निर्जला व्रत की शुरुआत करती हैं.

     मैं खड़ा हूँ पटना के दीघा घाट की ओर जाने वाली एक गली में. हर घर से धुएँ की


पतली लकीरें उठ रही हैं.धूप, कपूर, अरवा चावल और गुड़ की सुगंध से पूरा वातावरण आध्यात्मिक हो उठा है. लगता है जैसे पूरा शहर श्रद्धा में डूब गया हो—हर चेहरा, हर दीया, हर अर्घ्य पात्र सूर्यदेव की प्रतीक्षा में शांत और विनम्र है. खरना : आस्था का अनुशासन, शुद्धता का पर्वछठ महापर्व के चार दिन होते हैं—नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य.खरना इन चारों में सबसे संयमित और अनुशासित दिन है. यह दिन भक्ति की शुरुआत नहीं, बल्कि भक्ति के परिपक्व रूप का उद्घोष है. व्रती सुबह से जल भी ग्रहण नहीं करते.पूरे दिन बिना अन्न-जल के रहते हैं और संध्या बेला में शुद्ध प्रसाद—गुड़ की खीर, रोटी और केला—से पूजा करते हैं.

   लेकिन ‘खरना’ सिर्फ व्रत का नियम नहीं है; यह मन की शुद्धि का विधान है.यह वह क्षण है जब व्यक्ति अपने भीतर की अशुद्धियों को त्याग कर आत्मा के स्वच्छ जल में स्नान करता है. सूर्य अस्त होते हैं, पर भीतर एक नया सूरज उगता है—आत्मबल का, धैर्य का, समर्पण का.आंखों देखी दृश्यावली : एक संध्या का साक्षात्कारघड़ी में शाम के पाँच बजे हैं.व्रती महिलाएँ पीत वस्त्र धारण कर चुकी हैं. कुछ के माथे पर सिंदूर की लकीर मांग के पार तक खिंची हुई है.रसोई में तांबे की हांडी में दूध उबल रहा है.उस पर रखी है काठ की कलछी—जो हल्की भाप से चमक रही है.

रसोई में प्रवेश करने वाला कोई भी व्यक्ति जूता-चप्पल बाहर ही उतार देता है. यह रसोई अब पूजा स्थल है.एक ओर लकड़ी की आंच पर चावल पक रहा है—अरवा चावल, जो बिना नमक और बिना मसाले के.दूसरी ओर गुड़ की खीर बन रही है—कद्दू की मिठास और दूध की गाढ़ी लहरों से भरी.कहीं- कहीं केले के पत्तों पर प्रसाद रखा जा रहा है, तो कहीं मिट्टी के चूल्हे पर अंतिम आंच में चपाती सेंकी जा रही है—रोटी नहीं, “ठेकुआ” की तरह गोल, परंतु स्वाद में साधना से भरी.बाहर आंगन में बच्चे दीये सजा रहे हैं.एक बुजुर्ग महिला धूपबत्ती में आग लगाते हुए कहती हैं—“खरना के रात अइसन होखेला जइसे धरती पे सुरज के किरन उतर आइल हो.”

उनके शब्दों में जो चमक है, वह किसी ग्रंथ की पवित्रता से कम नहीं.सूर्यदेव की प्रतीक्षा : अस्त होते सूरज की ओर निहारती आंखेंसंध्या करीब आती है.घरों की छतों से लोग पश्चिम की ओर निहारने लगते हैं.गंगा किनारे व्रती अपने थाल सजाकर बैठी हैं.पीत वस्त्रों में, माथे पर हल्का चंदन और हाथों में दूध का अर्घ्य.अस्ताचलगामी सूर्य जैसे धरती से विदा नहीं ले रहा, बल्कि व्रती के आस्था के दीप में स्वयं समा रहा है.

   अर्घ्य देते वक्त वह दृश्य अवर्णनीय होता है—

जब व्रती के नेत्रों में गंगा का जल झिलमिलाता है और होंठों पर एक ही प्रार्थना होती है:

 “सूर्यदेव, हमारे घर-आंगन में शांति, सुख और स्वच्छता बनी रहे.”

   उस क्षण लगता है जैसे मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई संवाद पुनः स्थापित हो गया हो.

गंगा की लहरें धीमे-धीमे उस संवाद की लय पर नाच उठती हैं.प्रसाद : स्वाद से अधिक भावनाखरना का प्रसाद—गुड़ की खीर, रोटी और केला—साधारण दिखता है, पर इसका अर्थ असाधारण है.

इसमें स्वाद नहीं, तप है; मिठास नहीं, समर्पण है.

जब प्रसाद बनता है, तब घर का हर सदस्य अपनी सांस रोक लेता है कि कोई अशुद्धि न हो जाए.

इस दौरान बोलचाल भी धीमी हो जाती है, जैसे किसी मंदिर में मौन साधना चल रही हो.

   रात के आठ बजे व्रती पूजा संपन्न कर प्रसाद ग्रहण करती हैं.पहला निवाला सूर्यदेव को अर्पित होता है, दूसरा जल को, और तीसरा—वह स्वयं ग्रहण करती हैं.

यह पहला अन्न का कौर उस व्रत का आरंभ है जो अगले दो दिनों तक निरंतर चलेगा—बिना जल, बिना अन्न.

    इसके बाद यही प्रसाद परिवार और पड़ोस में बांटा जाता है.बच्चे दौड़ते हैं, महिलाएँ ‘जय छठी मइया’ का जयघोष करती हैं, और पूरा मोहल्ला प्रसाद की मिठास में डूब जाता है.यह बाँटने का भाव ही तो छठ की आत्मा है—अपने सुख को दूसरों के साथ साझा करने का अनुष्ठान.रात का उजास : जब दीपों में बहती है श्रद्धा की नदिया रात उतर आई है.दीघा, सोनपुर, आरा, समस्तीपुर—हर जगह से एक जैसी झिलमिलाहट उठती है.घरों की छतों पर दीपों की कतारें हैं.गंगा के घाट पर जलते दीप जैसे तारों की परछाई बन गए हों.

  हवा में लोबान की खुशबू है, और आसमान में चांदनी का कोमल प्रकाश.हर किसी के मन में संतोष है कि व्रत का सबसे कठिन दिन सफलतापूर्वक पूरा हुआ.कुछ महिलाएँ अपने बच्चों के माथे पर हाथ रखती हैं और कहती हैं—“छठी मइया सबके घर सुख-शांति देइथु।”इन शब्दों में न आडंबर है, न आग्रह—बस आस्था की सादगी है. सांस्कृतिक अर्थ : खरना का सामाजिक विज्ञानखरना केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अनुशासन का प्रतीक है.

यह दिन हमें सिखाता है कि शुद्धता केवल बाहरी नहीं, भीतर की भी होती है.

जब हम प्रसाद बनाते समय अपने विचारों को संयमित रखते हैं, तब वह क्रिया ध्यान बन जाती है.यह व्रत हमें सिखाता है—संतुलन: भूख और संयम का समन्वय.समानता: हर घर में एक जैसा प्रसाद, एक जैसी थाली, एक जैसी प्रार्थना.साझेदारी: प्रसाद का वितरण सामाजिक एकता की मिसाल है.खरना का प्रसाद हर जाति, वर्ग और धर्म के लोगों में बाँटा जाता है.यह वह क्षण होता है जब समाज के कृत्रिम विभाजन मिट जाते हैं.हर किसी के हाथ में वही खीर, वही रोटी—और वही आशीर्वाद. प्रकृति के साथ संवाद : छठ का पर्यावरणीय संदेशआज जब दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, छठ का खरना हमें बताता है कि प्रकृति की पूजा ही जीवन की रक्षा है.खरना में मिट्टी के चूल्हे, केले के पत्ते, पीतल या कांसे के बर्तन, और गंगाजल का उपयोग—सब पर्यावरण-संवेदनशील हैं.यह पर्व सिखाता है कि पूजा का अर्थ भव्यता नहीं, बल्कि सामंजस्य है.जब व्रती जल में खड़ी होकर सूर्य को नमन करती है, तब वह केवल देवता को नहीं, बल्कि प्रकृति को धन्यवाद देती है—उस सूर्य को जो ऊर्जा देता है, उस जल को जो जीवन देता है, और उस धरती को जो अन्न देती है.व्यक्तिगत अनुभूति : एक दर्शक की चेतनाखरना की रात में जब मैं घाट से लौट रहा था, गली के मोड़ पर एक बूढ़ी अम्मा मिलीं।

उन्होंने पूछा—“बाबू, अर्घ्य देखलु?”

मैंने कहा—“हां अम्मा, देख लिया।”

वह मुस्कुराईं और बोलीं—

 “देखा ना बाबू, छठी मइया सबके दिल में बसली हैं—करे वाला भी खुश, देखे वाला भी धन्य.”


उनके ये शब्द मुझे भीतर तक छू गए.वाकई, छठ का आकर्षण यही है कि यह केवल व्रती का पर्व नहीं, बल्कि समाज का उत्सव है.

हर व्यक्ति, चाहे वह श्रद्धालु हो या दर्शक, किसी न किसी रूप में इससे जुड़ जाता है.

 सूर्य के प्रतीक में जीवन का दर्शनछठ में सूर्य केवल देवता नहीं, बल्कि जीवन का तार्किक प्रतीक हैं.खरना की बेला में अस्त सूर्य को अर्घ्य देना हमें सिखाता है कि जीवन का हर अंत एक नई शुरुआत है.जैसे सूर्य डूबता है पर लौटता भी है, वैसे ही हर कठिनाई के बाद प्रकाश आता है.यह पर्व धैर्य की शिक्षा देता है—कि अंधेरा चाहे जितना गहरा हो, अगर मन में श्रद्धा का दीप जलता रहे, तो भोर निश्चित है.और खरना वही दीप है—जो रात की शुरुआत में उम्मीद की लौ जलाता है. अंतिम आलोक : जब भक्ति और विज्ञान मिलते हैंखरना में जो संयम है, वह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शरीर और मन के संतुलन का वैज्ञानिक रूप है.

दिनभर का उपवास शरीर को शुद्ध करता है, और सूर्यास्त के बाद शुद्ध अन्न से ऊर्जा मिलती है.

यह व्रत डिटॉक्सिफिकेशन और मेडिटेशन का पारंपरिक भारतीय संस्करण है.व्रती महिलाएँ जब गंगा में उतरती हैं, तो उनका ध्यान सूर्य पर नहीं, अपने भीतर के आलोक पर होता है.यह आत्म-चिंतन का क्षण है—जहां धर्म और विज्ञान, दोनों एक सूत्र में बंध जाते हैं उपसंहार : खरना की रात, आत्मा की शांतिरात गहराती जा रही है.दीघा घाट की लहरों पर दीप तैर रहे हैं.उनकी लौ कभी थरथराती है, कभी स्थिर हो जाती है.यह लौ, व्रती के हृदय में जलती उस अग्नि का प्रतीक है, जो अगले दो दिन तक अडिग रहेगी.खरना की रात के बाद जब सुबह होती है, तो सूर्य थोड़ा और उजला लगता है.मानो उसने भी व्रती की श्रद्धा से नया तेज पा लिया हो.छठ का खरना हमें याद दिलाता है—

कि आस्था केवल पूजा नहीं, जीवन जीने की शैली है.यह दिन हमें संयम, शुद्धता, अनुशासन और साझेदारी की उस परंपरा से जोड़ता है, जिसने सदियों से भारतीय संस्कृति को जीवित रखा है.आज जब आधुनिकता के शोर में आत्मा की आवाज़ दबने लगी है, तब भी खरना का यह मौन व्रत हमें भीतर झांकने की प्रेरणा देता है।

यह कहता है—“जहाँ शुद्धता है, वहीं देवत्व है; जहाँ संयम है, वहीं सूर्य का प्रकाश है.”

 समापन पंक्तिखरना की इस आंखों देखी रात ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि

आस्था केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि अनुभव है —

और जब अनुभव में प्रेम, अनुशासन और शुद्धता मिल जाती है,

तभी धरती पर सूर्य उतर आता है.


आलोक कुमार

बेहतर अवसर और संसाधन उपलब्ध कराने के लिए तत्पर

          शैक्षणिक सहयोग को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए  Patna Women’s College (स्वायत्त) ...