रविवार, 21 मई 2023

नेवारी कुर्ता पहने हैं आकाश सेंसिल

चुहड़ी. तिब्बत में ल्हासा है.ल्हासा प्रान्त स्तर के ल्हासा शहर का शहरी केंद्र और दक्षिण पश्चिम चीन में तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की प्रशासनिक राजधानी है. ल्हासा शहर का आंतरिक शहरी क्षेत्र चेंगगुआन जिले की प्रशासनिक सीमाओं के बराबर है, जो व्यापक प्रीफेक्चुरल ल्हासा शहर का हिस्सा है.         

   कापुचिन्स की स्थापना 1528 में हुई थी और उन्होंने प्रार्थना और चिंतन, उपदेश और ज़रूरतमंदों की शारीरिक देखभाल पर ज़ोर दिया था.कापुचिन्स पुरोहित तिब्बत में भी कार्यरत थे.उनका कार्यक्षेत्र ल्हासा में था. ल्हासा की बात 278 वर्ष पुरानी है.वर्ष 1745 में ईसाई मिशनरियों को ल्हासा से भगा दिया गया था.तिब्बत मिशन बंद होने के बाद कापुचिन्स पुरोहितों ने नेपाल के काठमांडू में आकर आश्रय जमा लिए. मजबूरी में काठमांडू आने के बाद भी कापुचिन्स पुरोहितों ने अपना मिशन सुसमाचार का प्रचार करने को जारी रखा.इन मिशनरियों के द्वारा मरीजों की मुफ्त स्वास्थ्य जांच करने, बच्चों की मृत्यु के लिए अंतिम संस्कार करने और आवश्यकतानुसार लोगों के लिए अन्य सामाजिक सेवाएं करने की आवश्यकता थी.

   बताया जाता है कि कापुचिन्स पुरोहितों के कार्य से प्रभावित होकर काठमांडू घाटी में रहने वाले नेवार जाति के लोग मन परिवर्तन कर लिए.बहुत से लोगों ने येसु के नाम पर बपतिस्मा ग्रहण कर लिए.नेपाल में कापुचिन्स पुरोहितों के द्वारा दो दशक तक नेवार जाति के लोगों के बीच में मजबूत कदम होते देख काठमांडू के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने बढ़ते कदम को रोकने के लिए कापुचिन्स पुरोहितों और नेवार जाति के बने ईसाइयों को देश निकाला आदेश निर्गत कर दिया.                                        

  बताया गया कि जब राजा पृथ्वी नारायण शाह काठमांडू पर शासन करने आए थे.उन्होंने 24 साल के बाद नेवार जाति के ईसाई समुदाय के 14 परिवार को 1769 में नेपाल के राजा ने देश निकाला आदेश को अमल कर दिया. कुल मिलाकर 14 परिवार के 62 परिवार के लोग नेपाल की तराई में रहते थे.नेवार जाति के लोग नेपाल में उच्च जाति के श्रेणी में शामिल है.

    नेपाल की तराई से पलायन होकर 14 परिवार के 62 परिवार के लोग पश्चिमी चंपारण के चुहड़ी गांव में पहुंचे. यहीं पर बस गए.नेवारी क्रिश्चियन नेवारी संस्कृति को नहीं छोड़े.चुहड़ी में बस गए नेवारी क्रिश्चियन लोगों ने कुर्ता और धोती पहंने रहे. नेवारो का उपनाम भाजू है. बुर्जगों का कहना है कि 1970 के दशक तक चुहड़ी के नेवार क्रिश्चियन लोग नेवारी भाषा ही बोलते थे. सभी लोग कुर्ता प्योर खादी से बना पहनते थे.                           

  आकाश सेंसिल ने कहा कि दो नेपाली खोजकर्ता अपने दूसरी विजिट में चुहड़ी आए थे. तक 8 अप्रैल 2023 को कुर्ता उपहार स्वरूप दिए थे.ठीक इसी तरह का कुर्ता मेरे पर दादा स्वर्गीय सिमोन पीटर भाजू पहना करते थे.आकाश सेंसिल कहते हैं कि फादर हरमन रफायल, फादर मुक्ति क्लारेंस और स्व.फादर माइकल भाजू पुरोहित बने थे.


आलोक कुमार


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