सोमवार, 26 मई 2025

आमदनी अठन्नी और खर्च रूपया होने से बचत करने की कोई संभावना नहीं

आमदनी अठन्नी और खर्च रूपया होने से बचत करने की कोई संभावना नहीं 

                                  आमदनी से ज़्यादा खर्च होने से आर्थिक परेशानी हो रही है

                               कर्ज लेकर जीवन व्यापन करने को मजबूर हैं  ईपीएस 95 पेंशनर


पटना. "आमदनी अठन्नी और खर्च रूपया" एक हिंदी मुहावरा है.यह मुहावरा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन पर सटिक बैठता है.उसने 19 नवंबर 1995 को कर्मचारी पेंशन योजना 1995 (ईपीएस 95) को लागू किया.ईपीएस 95 के तहत बहुत ही कम पेंशन देकर सामाजिक सुरक्षा करना शुरू किया.इस सामाजिक सुरक्षा योजना को 9 वर्षों के बाद मोदी सरकार ने 2014 में न्यूनतम पेंशन एक हजार रूपए कर दी.जो 2014 से 2025 मई माह तक न्यूनतम पेंशन एक हजार रूपए ब्रह्म लकीर साबित हो रही है.

"आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया" — यह मुहावरा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और इसकी पेंशन योजना पर बिल्कुल सटीक बैठता है।

EPFO ने 19 नवंबर 1995 को कर्मचारी पेंशन योजना 1995 (EPS-95) को लागू किया, जिसका उद्देश्य था निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा देना. लेकिन इस योजना की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि इसके तहत मिलने वाली पेंशन की राशि इतनी कम थी कि वह व्यक्ति की बुनियादी जरूरतों को भी पूरा करने में सक्षम नहीं थी.

    एक ओर कर्मचारियों के जीवन भर की गाढ़ी कमाई से फंड में पैसा जमा होता रहा, वहीं दूसरी ओर उन्हें वृद्धावस्था में केवल कुछ सौ रूपए की पेंशन देकर “सामाजिक सुरक्षा” का नाम दे दिया गया.यही कारण है कि EPS-95 की स्थिति पर यह मुहावरा बिल्कुल सटीक बैठता है — आमदनी बहुत सीमित, और ज़रूरतें कहीं अधिक.

     साल 2014 में जब केंद्र में मोदी सरकार आई, तो इस योजना की विसंगतियों को समझते हुए उन्होंने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया — न्यूनतम पेंशन को बढ़ाकर ₹1,000 प्रति माह कर दिया। यह फैसला उस समय राहत की एक किरण जरूर बना, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ.

      दुर्भाग्यवश, यह "न्यूनतम ₹1,000 पेंशन" वर्ष 2014 से लेकर मई 2025 तक ज्यों का त्यों बनी रही.महंगाई, जीवन यापन की बढ़ती लागत, दवाइयों और स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च में भारी बढ़ोतरी के बावजूद, पेंशन की यह राशि "ब्रह्म लकीर" बन गई — जिसे कोई तोड़ नहीं पाया।

    इससे यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक सुरक्षा की यह योजना आज भी केवल औपचारिकता तक सीमित है.कर्मचारी पेंशन योजना के लाखों पेंशनर्स आज भी संघर्ष कर रहे हैं, और यह सवाल ज़रूरी हो गया है —

क्या यह पेंशन वास्तव में सम्मानजनक जीवन के योग्य है? या फिर यह व्यवस्था खुद "आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया" की मिसाल बन चुकी है?


आलोक कुमार

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