सोमवार, 21 नवंबर 2022

आगमन 27 नवंबर से शुरू होगा

                                * 34वें  रविवार को राजाओं का राजा का पर्व मनाया जाता है


पटना.ईसाई समुदाय का महान पर्व क्रिसमस है.इसे ख्रीस्त जयंती भी कहा जाता है.ईसाई समुदाय का मानना है कि 24 दिसंबर की अर्द्धरात्रि में संसार का सृष्टिकर्ता प्रभु येसु ख्रीस्त का जन्म मामूली गौशाला में हुआ था.प्रभु येसु ख्रीस्त का बालक के रूप में होने वाला है.इसे ईसाई समुदाय का आगमन कहते हैं.यह आगमन 27 नवंबर से शुरू होगा.समुदाय क्रिसमस से पहले पड़ने वाले चार रविवार को आगमन रविवार के रूप में मनाते है. आगमन का प्रथम रविवार 27 नवंबर को है. दूसरे आगमन रविवार की आराधना 4 दिसंबर, तीसरी 11 दिसंबर चौथे की आराधना 18 दिसंबर को होगी.

   
बताया गया कि धार्मिक कैलेंडर के अनुसार साल के अंतिम यानी 34वें रविवार को ख्रीस्त राजा का पर्व मनाया जाता है. इसके बाद नया कैलेंडर वर्ष शुरू होता है.धर्मसे भटके हुए लोगों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा विश्वास बढ़ाने के लिए पोप पाइस इलेवन ने रोम में ख्रीस्त राजा के पर्व की शुरुआत की थी. तभी से यह पर्व पूरे विश्व में नवंबर के तीसरे सप्ताह में मनाया जाता है.इस साल कोरोना के दो साल के बाद परंपरागत ढंग से 20 नवंबर को राजाओं का राजा का पर्व मनाया गया.मिली जानकारी के अनुसार के अनुसार बेतिया धर्मप्रांत के चनपटिया में , मुजफ्फरपुर धर्मप्रांत के मुजफ्फरपुर में, हजारीबाग धर्मप्रांत के बेरमो में,आसनसोल धर्मप्रांत के चेलीडांगा में,पटना महाधर्मप्रांत के कुर्जी आदि जगहों में शांतिपूर्ण ढंग से युखरिस्तीय यात्रा निकाली गयी.इस अवसर पर ईसाई समुदाय सड़क पर उतरकर येसु ख्रीस्त राजा, तेरा राज्य आवे का जयघोष किए .इसमें काफी संख्या में ईसाई समुदाय के विश्वासियों ने भाग लिया.       

पटना महाधर्मप्रांत के कुर्जी क्षेत्र में क्राइस्ट द किंग का पर्व मनाया गया.कुर्जी में युखरिस्तीय यात्रा दीघा थाना क्षेत्रांतर्गत पॉश एरिया फेयर फिल्ड कॉलोनी में स्थित आशादीप दिव्यांग पुनर्वास केंद्र (होली क्रॉस सोसायटी) के परिसर से 2ः 30 शुरू होकर कुर्जी पल्ली परिसर के परिसर में स्थित प्रेरितों की रानी ईश मंदिर में जाकर पवित्र मिस्सा में तब्दील हो गयी.   

   पवित्र मिस्सा पूजा के बाद बचा हुआ परम प्रसाद रखा जाता है उसे तबरनाकल कहते हैं. वह बेदी के पास रहता है. युखरिस्तीय यात्रा के दौरान पवित्र सक्रामेंट को तबरनाकल से निकालकर मॉनस्ट्रेंस  में रखा जाता है.इसके बाद भक्तिपूर्ण ढंग से पवित्र सक्रामेंट को लेकर युखरिस्तीय यात्रा में चला जाता है.पवित्र सक्रामेंट को कनोप्पी के अंदर ही रखा जाता है. बिशप अथवा उनके प्रतिनिधि ही अपने हाथो में मॉनस्ट्रेंस को लेकर चलते हैं.इस बार पटना महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष सेबस्टियन कल्लूपुरा,संजीवन निवास के सुपेरियर बेनी सेबस्टियन मूलन और कुर्जी पल्ली के पल्ली पुरोहित फादर पायस माइकल ओस्ता ने बारी बारी मॉनस्ट्रेंस लेकर चल रहे थे.

   


सफेद वस्त्र धारी परियों ने मॉनस्ट्रेंस के आगे फूलों की वर्षा करती रही.कुछ बच्चे मोमबत्तियों को जलाकर ले जा रहे थे.यह संदेश देने का प्रयास किया जाता है कि ख्रीस्त राजाओं के राजा हैं. प्रभु येसु ख्रीस्त अपने जीवन में कभी भी क्रोध एवं हिंसा नहीं किया.  प्रभु येसु  अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीते थे. प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1925 में बुराइयों को घटाने के लिए ख्रीस्त राजा पर्व शुरू किया गया था. येसु ख्रीस्त को एकमात्र राजा मानकर हम एकता और भाईचारा को बढ़ावा दे सकते हैं. बुराई के सामने हमें झुकना नहीं है. ईश्वर की मदद से आगे बढ़ना है. 


आलोक कुमार

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