शनिवार, 23 अगस्त 2025

तरीका चर्च में बार-बार विमर्श का विषय बनता रहा है

 


पटना. परमप्रसाद (पवित्र कम्युनियन) केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि यह वह क्षण है जब ईसाई अनुयायी स्वयं प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण करते हैं.यह संस्कार अनुयायियों को न केवल पवित्रता प्रदान करता है बल्कि उन्हें आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण करता है और परमेश्वर के निकट लाता है.इसी कारण, इसका महत्व और इसका तरीका चर्च में बार-बार विमर्श का विषय बनता रहा है.

       रोमन कैथोलिक परंपरा में पुरोहित “ख्रीस्त का शरीर और रक्त” कहकर लोकधर्मियों की जीभ पर कम्युनियन रखते थे.यह पद्धति पीढ़ियों से चली आ रही है और इसे प्रभु के प्रति गहरी श्रद्धा का प्रतीक माना गया.परंतु कोरोना महामारी के दौरान सुरक्षा कारणों से प्रीस्ट ने कम्युनियन लोकधर्मियों के हाथ में देना आरंभ किया.अब जब महामारी का दौर थम चुका है, बेतिया धर्मप्रांत के बिशप पीटर सेबेस्टियन गोबियस ने पुराने तरीके को फिर से अपनाने का आदेश जारी किया है.उनके अनुसार पुरोहितों को लोकधर्मियों की जीभ पर ही परमप्रसाद रखना चाहिए.

      प्रसिद्ध प्रीस्ट और लेखक फादर जॉर्ज मैरी क्लैरेट ने भी अपने वीडियो संदेश में इसी बात पर बल दिया कि प्रभुभोज को ग्रहण करने का तरीका केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि आस्था, श्रद्धा और अनुशासन का प्रश्न है.उन्होंने अनुयायियों से कहा कि यदि वे प्रभु भोज से अधिकतम आशीष प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें उचित तैयारी और सही तरीके से इसे ग्रहण करना चाहिए. उन्होंने बाइबिल के उस अंश की याद दिलाई जिसमें चेतावनी दी गई है कि यदि कोई प्रभु का शरीर और रक्त बिना पहचाने ग्रहण करता है, तो वह अपनी ही दण्डाज्ञा खाता और पीता है.

       यह सवाल आज भी प्रासंगिक है – कितनी बार हम लापरवाही में प्रभु को अपवित्र कर बैठते हैं? कितनी बार हमारे हाथों से परमप्रसाद गिरा और हम अनजाने में उसे पैरों तले रौंद देते हैं? यह केवल शारीरिक असावधानी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अपराध भी है.

          इसी संदर्भ में यह बहस जरूरी हो जाती है कि “पवित्र कम्युनियन” को ग्रहण करने का सही तरीका क्या है.परंपरा कहती है कि इसे जीभ पर ग्रहण किया जाए, ताकि प्रभु के शरीर और रक्त की पवित्रता अक्षुण्ण बनी रहे. आधुनिक परिस्थितियां हाथ में ग्रहण करने को सहज मानती हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सहजता के लिए पवित्रता से समझौता किया जा सकता है?

         अंततः, यह केवल किसी आदेश या नियम का पालन करने का विषय नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास की गहराई का प्रश्न है. परमप्रसाद तभी फलदायी होगा जब हम पूरे मन, आत्मा और विश्वास के साथ प्रभु को ग्रहण करें. यह संस्कार हमें यीशु के समान बनने और उनके जीवन-संदेश को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है.इसलिए आवश्यक है कि चर्च, पुरोहित और अनुयायी – तीनों इस संस्कार की पवित्रता और गरिमा की रक्षा करें.


आलोक कुमार


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