रविवार, 30 नवंबर 2025

प्रभु यीशु के जन्म से जुड़ी आध्यात्मिक तैयारी का समय माना जाता है

 पटना. ईसाई जगत में प्रतीक्षा, तैयारी और आशा का पवित्र मौसम—आगमनकाल —रविवार से आरंभ हो गया है. क्रिसमस से चार सप्ताह पूर्व मनाया जाने वाला यह काल केवल उत्सवों की शुरुआत नहीं, बल्कि


प्रभु यीशु के जन्म से जुड़ी आध्यात्मिक तैयारी का समय माना जाता है.

इस वर्ष आगमनकाल के प्रथम रविवार 30 नवंबर का मुख्य विषय ‘आशा का संदेश’ रहा.परंपरा के अनुसार दूसरा सप्ताह विश्वास, तीसरा सप्ताह आनंद, और चौथा सप्ताह शांति व प्रेम का संदेश लेकर आता है—वही प्रेम जो क्रिसमस की रात प्रभु यीशु के आगमन के रूप में जगत पर बरसा था.

आगमनकाल को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने वाली कैंडल्स का रंग भी गहरा धार्मिक अर्थ समेटे रहता है. प्रथम, द्वितीय और चौथे सप्ताह में बैंगनी रंग की कैंडल जलाई जाती है, जो प्रार्थना, प्रायश्चित और आध्यात्मिक गंभीरता का प्रतीक है.यह पछतावे से आत्मशुद्धि और तैयारी की ओर बढ़ने का रंग है. जबकि तीसरे सप्ताह में जलने वाली गुलाबी या गुलाबी रंग की कैंडल आनंद, उमंग और आशा के उजाले का उद्घोष करती है—यह बताती है कि अब मन पश्चाताप से उत्सव की ओर बढ़ रहा है.

आगमनकाल के आरंभ के साथ ही देशभर के चर्चों और आराधना स्थलों में विशेष मिस्सा, प्रार्थना और धर्म विधियां संपन्न हुईं. पटना शहर के 11 प्रमुख गिरजाघरों में भी आगमनकाल के प्रथम रविवार को विशेष मिस्सा अनुष्ठान आयोजित किए गए। इसी के साथ क्रिसमस गैदरिंग, मिलन समारोह, मेले और कार्निवल की भी शुरुआत हो गई है.

    समुदाय की तैयारियाँ घर-घर तक फैलने लगती हैं—कहीं कैरोल के स्वर गूंजते हैं, वहीं नए कपड़ों की खरीदारी होती है, तो कहीं रिश्तेदारों और मित्रों के लिए उपहार चुने जाते हैं. केक और बेकरी ऑर्डरों की भागदौड़ भी इसी दिन से शुरू हो जाती है.

इन सबके बीच आगमनकाल हमें याद दिलाता है कि क्रिसमस केवल बाहरी उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक रोशनी को जगाने का अवसर है—आशा, विश्वास, आनंद और प्रेम के मार्ग पर चलने का निमंत्रण.

आलोक कुमार

शनिवार, 29 नवंबर 2025

मानव जीवन विकास समिति की रजत जयंती

 मानव जीवन विकास समिति की रजत जयंती

कटनी . सामाजिक परिवर्तन की ढाई दशकों की गूंज मानव जीवन विकास समिति (MJVS) ने अपने 25 वर्ष पूरे कर लिए—यह सिर्फ एक संस्था का उत्सव नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों की जिजीविषा, श्रम और विश्वास का उत्सव है, जिनके जीवन में इस समिति ने उम्मीद की रोशनी जगाई है. रजत जयंती समारोह का यह भव्य आयोजन प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक श्री राजगोपाल पी. वी. की अध्यक्षता में संपन्न हुआ, जिसने इस ऐतिहासिक क्षण को और भी गरिमामय बना दिया।समिति के सचिव निर्भय सिंह ने जब 250 से अधिक गाँवों में 25,000 परिवारों के साथ आजीविका निर्माण के निरंतर प्रयासों का विवरण साझा किया, तो यह स्पष्ट हो गया कि MJVS का सफर सिर्फ सामाजिक सेवा का नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का रहा है.

   समिति के अध्यक्ष श्री बद्रीनारायण नरडिया ने गर्व के साथ कहा कि इन 25 वर्षों में संगठन ने आजीविका और जल संरक्षण के क्षेत्र में स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपनी सार्थक पहचान स्थापित की है. यह यात्रा कठिन जरूर थी, लेकिन साथियों की प्रतिबद्धता और मार्गदर्शकों के स्नेह ने इसे संभव बनाया.समारोह के दौरान समिति के 25 वर्षों की समर्पित यात्रा का दस्तावेज—प्रगति रिपोर्ट—का विमोचन भी हुआ. गांधीवादी चिंतक राजगोपाल पी. वी. ने बापू के विचारों को स्मरण करते हुए कहा कि समाज के अंतिम व्यक्ति की गरिमा और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना ही सच अर्थों में विकास है.उन्होंने MJVS के सफल 25 वर्ष पूरे होने पर सभी सहयोगियों को बधाई देते हुए भविष्य में और व्यापक सामाजिक हस्तक्षेप का संकल्प व्यक्त किया.कार्यक्रम में पूर्व डीजीपी अनुराधा शंकर ने समिति के प्रयासों की सराहना की और बापू के बताए हुए मार्ग—सादगी, सेवा और सत्य—को आधुनिक समाज की आवश्यक दिशा बताते हुए प्रेरक वक्तव्य दिया.

      कृषि विभाग कटनी के उपसंचालक श्री रामनाथ पटेल ने समिति के कार्य को जनहितकारी बताते हुए विभागीय सहयोग जारी रखने का आश्वासन दिया.राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के श्री रामसुजान द्विवेदी ने MJVS की टीम का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि संस्था ने सरकारी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण साझेदारी निभाई है.

     पूर्व विधायक ध्रुव प्रताप सिंह ने इसे “दिखावे से दूर, जमीनी स्तर पर ईमानदारी से काम करने वाली संस्था” बताते हुए सराहना की.बड़वारा विधायक धीरेंद्र बहादुर सिंह ने समिति के सचिव निर्भय सिंह के नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा कि समिति ने सामाजिक सेवा और जल संरक्षण के अभियानों में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.

       सर्वोदय प्रेस सर्विस के संपादक श्री राकेश दीवान ने समिति के कार्य को ‘निरंतरता और निष्ठा की मिसाल’ बताते हुए इसे व्यापक सामाजिक परिवर्तन का भरोसेमंद मंच कहा.कटनी एसपी अभिनव विश्वकर्मा ने भी उपस्थिति दर्ज कराते हुए कहा कि जहाँ भी समाज हित का काम होगा, पुलिस प्रशासन उसकी मदद करने के लिए तैयार है.समिति ने इस अवसर पर अपने उन सभी कार्यकर्ताओं का सम्मान किया, उन्होंने बिना किसी प्रसिद्धि की चाह के, समाज सेवा की असली भावना को जीवित रखा है. केरल, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मुंबई, भोपाल और डिंडोरी से आए 20 समाजसेवियों, कटनी प्रशासन के 29 अधिकारियों और लगभग 500 ग्रामीणों की उपस्थिति ने इस समारोह को वास्तव में जन-उत्सव का रूप दे दिया.MJVS की रजत जयंती सिर्फ अतीत का उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य की राह का प्रकाश है.

    इन 25 वर्षों में बोए गए भरोसे, परिश्रम और परिवर्तन के बीज आने वाले वर्षों में और घने, और फलदार होकर समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का साया पहुँचाएँ—यही इस समारोह की वास्तविक उपलब्धि है.


आलोक कुमार

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना'

 

पटना . मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी ने आज 1, अणे मार्ग स्थित 'संकल्प' से 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' की 10 लाख लाभुक महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये प्रति लाभुक की दर से 1000 करोड़ रुपये की राशि अंतरण किया. इसके पूर्व 1 करोड़ 46 लाख लाभुक महिलाओं के खाते में 14 हजार 600 करोड़ रुपये की राशि अंतरित की जा चुकी है.

    मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज 'महिला रोजगार योजना' के तहत अपनी पसंद का रोजगार करने के लिए 10 लाख महिलाओं को दस-दस हजार रुपये की सहायता राशि भेजी जा रही है. कुल मिलाकर 1 करोड़ 56 लाख महिलाओं को इसका फायदा मिल जायेगा. इस योजना में दी गयी सहायता से काफी संख्या में महिलाओं ने अपनी पसंद का रोजगार शुरू किया है. जो महिलाएं अपना रोजगार अच्छे से करेंगी, उन्हें आगे 2 लाख रुपये तक की सहायता दी जायेगी.

    मुख्यमंत्री जी ने कहा कि मुझे विश्वास है कि आप सभी महिलाओं को इस 10 हजार रुपये की राशि से अपना काम शुरू करने में काफी मदद मिलेगी. इससे आपका परिवार खुशहाल होगा तथा बिहार का और तेजी से विकास होगा. आज के कार्यक्रम में तीनों लाभार्थियों ने अपने-अपने अनुभव साझा किये हैं. महिलाओं में आत्मविश्वास देखकर मुझे खुशी होती है.हम लोग सभी लोगों के विकास के लिये लगातार काम कर रहे हैं. केन्द्र सरकार का भी राज्य के विकास में पूरा सहयोग मिल रहा है.


आलोक कुमार

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

नागरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर

 


पटना. 26 नवंबर—भारतीय लोकतंत्र का वह दिन, जब देश ने अपने भविष्य की दिशा स्वयं तय की.1949 में इसी तारीख को संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकार किया था, और एक दशक पहले सरकार ने इसे संविधान दिवस के रूप में स्थापित कर नई पीढ़ी को संविधान की आत्मा से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया.यह दिन केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि नागरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है.

      हमारा संविधान केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक आकांक्षाओं का जीवंत ग्रंथ है. यही वह शक्ति है जिसने सामाजिक पृष्ठभूमि को पार करते हुए एक साधारण परिवार के व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का अवसर दिया.लोकतंत्र की यह समावेशी क्षमता तब और भी स्पष्ट होती है जब देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाला व्यक्ति संसद की सीढ़ियों पर नतमस्तक होकर संस्थाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करता है—यह दृश्य संविधान की आत्मा का ही विस्तार है.

     संविधान दिवस पर देश उन महान विभूतियों को नमन करता है, जिन्होंने संविधान के निर्माण में अपनी बुद्धि, दूरदृष्टि और तपस्या समर्पित की.डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर और संविधान सभा की प्रतिष्ठित महिला सदस्यों ने इस दस्तावेज को न केवल कानूनी ढांचा दिया, बल्कि इसे मानवीय संवेदनाओं से भी आलोकित किया.संविधान के 60 वर्ष पूरे होने पर गुजरात में निकाली गई ‘संविधान गौरव यात्रा’ और संविधान के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित विशेष सत्र—ये सभी पहले दर्शाती हैं कि राष्ट्र अपने मूल्यों के प्रति जागरूक और कृतज्ञ है.

     इस वर्ष का संविधान दिवस इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह सरदार पटेल और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती का साक्षी है. देश का एकीकरण सरदार पटेल की अद्भुत राजनीतिक दूरदृष्टि का परिणाम था, जिसने बाद में जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने जैसे साहसिक निर्णयों को भी प्रेरित किया. वहीं भगवान बिरसा मुंडा का संघर्ष आज भी न्याय, गरिमा और जनजातीय सशक्तिकरण की दिशा में प्रकाशस्तंभ बना हुआ है. वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ और गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत वर्षगांठ हमें हमारी सांस्कृतिक दृढ़ता और आध्यात्मिक विरासत की याद दिलाती है.

     संविधान केवल अधिकारों का संग्रह नहीं; यह कर्तव्यों का भी आग्रह करता है. आर्टिकल 51 A में उल्लिखित मौलिक कर्तव्य नागरिकों को यह स्मरण कराते हैं कि अधिकार तभी सार्थक बनते हैं जब कर्तव्य भावनात्मक और व्यवहारिक रूप से अंगीकृत किए जाएं। महात्मा गांधी भी यही कहते थे—कर्तव्य का ईमानदार निर्वहन ही अधिकारों की सबसे सशक्त गारंटी है।

   सदी के 25 वर्ष बीत चुके हैं। अब 2047 के अमृत काल और 2049 के संविधान शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए कर्तव्यनिष्ठ नागरिक ही परिवर्तन के वाहक बन सकते हैं. आने वाले देशों की नीतियों और निर्णय ही नई पीढ़ियों के भाग्य का निर्माण करेंगे। विकसित भारत का सपना केवल सरकार से नहीं, नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और जिम्मेदारी से ही पूर्ण होगा.

    मतदान का अधिकार भी इसी सहभागिता का सबसे बड़ा उपकरण है। हर 26 नवंबर को फर्स्ट-टाइम वोटर्स का सम्मान—यह विचार न केवल अभिनव है, बल्कि लोकतंत्र को नई ऊर्जा देने वाला कदम भी है. यदि हर स्कूल और कॉलेज इसे परंपरा बना लें तो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति युवा पीढ़ी में गर्व और जिम्मेदारी का भाव स्वाभाविक रूप से विकसित होगा.

     अंततः, संविधान दिवस केवल रस्म का दिन नहीं—यह आत्मावलोकन का क्षण है। यह दिन हमें स्मरण करता है कि राष्ट्रनिर्माण कोई दूरस्थ लक्ष्य नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है. जब हम कर्तव्य को प्रधानता देंगे, तब ही हमारा हर कार्य संविधान की शक्ति बढ़ेगी और भारत को एक सशक्त, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बनाने में हमारा योगदान सार्थक साबित होगा.


आलोक कुमार


बुधवार, 26 नवंबर 2025

गुवाहाटी टेस्ट में बुमराह ने अपने टेस्ट करियर की 10,000वीं गेंद .....

 


पटना.भारतीय क्रिकेट में जसप्रीत बुमराह का नाम अब सिर्फ रफ्तार और सटीकता का पर्याय नहीं रहा, बल्कि निरंतरता और कसावट भरे प्रदर्शन का मानदंड भी बन चुका है. गुवाहाटी टेस्ट में बुमराह ने अपने टेस्ट करियर की 10,000वीं गेंद फेंक कर एक ऐसा मुकाम हासिल किया, जो किसी भी तेज गेंदबाज के लिए धैर्य, फिटनेस और उच्च स्तर की निरंतरता का प्रमाण होता है.

दिलचस्प बात यह है कि बुमराह की पहली टेस्ट गेंद एबी डिविलियर्स को थी और 10,000वीं गेंद एडन मार्क्रम को—दोनों ही दक्षिण अफ्रीका के दिग्गज बल्लेबाज। यह संयोग भी उनके करियर के उस दायरे को रेखांकित करता है, जिसमें उन्होंने अपना सबसे बेहतरीन क्रिकेट उन्हीं टीमों के खिलाफ खेला, जो तकनीकी रूप से विश्व क्रिकेट की सबसे मजबूत इकाइयों में रहती हैं.

भारत की ओर से तेज गेंदबाजी में यह मुकाम हासिल करने वाले बुमराह छठे भारतीय तेज गेंदबाज हैं, जबकि कुल मिलाकर वे 17वें भारतीय गेंदबाज और दुनिया के 130वें गेंदबाज बने हैं जिन्होंने टेस्ट में 10,000 से अधिक गेंदें फेंकी हैं. तेज गेंदबाजों की वैश्विक सूची में वे 75 वें नंबर पर हैं—एक उपलब्धि जो उनके अपेक्षाकृत छोटे टेस्ट करियर को देखते हुए और भी बड़ी दिखती है.

कपिल देव से लेकर बुमराह तक—एक सफर की निरंतरता

भारत के टेस्ट इतिहास में सबसे अधिक गेंदें फेंकने का रिकॉर्ड कपिल देव के नाम है—27,740 गेंदें, जो 227 पारियों में फेंकी गईं। इशांत शर्मा (19,160) और जहीर खान (18,785) जैसे बड़े नाम इस सूची के शीर्ष पर हैं. इनके बाद जवागल श्रीनाथ (15,104) और मोहम्मद सिराज (11,515) आते हैं.

इन दिग्गजों की पांत में अब बुमराह का नाम भी मजबूती से जुड़ चुका है—10,013 गेंदों के साथ। यह संख्या सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है, जिसके दम पर टीम इंडिया ने अक्सर कठिन परिस्थितियों में उन्हें आक्रमण का नेतृत्व सौंपा.

विश्व रिकॉर्ड और वैश्विक परिप्रेक्ष्य

टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक गेंदें फेंकने का विश्व रिकॉर्ड मुथैया मुरलीधरन के नाम है—44,039 गेंदें.उनके बाद अनिल कुंबले (40,850) और शेन वॉर्न (40,705) का नाम आता है.तेज गेंदबाजों में यह रिकॉर्ड इंग्लैंड के जेम्स एंडरसन के पास है, जिन्होंने 40,037 गेंदें फेंकी हैं—यह आंकड़ा अपने आप में तेज गेंदबाजी की कठिनाइयों पर प्रकाश डालता है.

बुमराह की उपलब्धि का असल महत्व

आंकड़ों से परे इस उपलब्धि का असली अर्थ यह है कि बुमराह अपनी अनोखी एक्शन, सीम-अप नियंत्रित स्विंग और लगातार विकेट लेने की क्षमता के बावजूद अपनी फिटनेस और वर्कलोड को संभालने में कितने परिपक्व हो चुके हैं.

उनका खेल अब सिर्फ ‘स्पेल’ नहीं, बल्कि ‘स्टेटमेंट’ बन गया है—कि आधुनिक क्रिकेट में भी क्लासिकल टेस्ट गेंदबाज अपनी जगह मजबूती से बनाए रख सकता है.

जसप्रीत बुमराह का यह मील का पत्थर भारतीय क्रिकेट के लिए एक और प्रमाण है कि तेज गेंदबाजी की परंपरा, जो कपिल देव ने शुरू की थी और जहीर-इशांत ने आगे बढ़ाई, वह अब बुमराह और सिराज की पीढ़ी के हाथों सुनहरे दौर में प्रवेश कर रही है.


आलोक कुमार)

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

विज्ञापन हटाने के निर्देश दिए


 
गोवा.गोवा में प्रस्तावित ‘टेल्स ऑफ कामसूत्र एंड क्रिसमस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम पर उठा विवाद केवल एक आयोजन का विरोध नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक चेतना का संकेत है जो धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक गरिमा और सार्वजनिक मर्यादा से जुड़े प्रश्नों पर बेहद सजग है.सोशल मीडिया पर जैसे ही इस कार्यक्रम का प्रचार सामने आया, समाज के विभिन्न वर्गों—सामाजिक संस्थाओं से लेकर धार्मिक संगठनों तक—ने इसकी तीखी प्रतिक्रिया दी.सार्वजनिक दबाव और शिकायतों के बाद गोवा पुलिस ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए आयोजन पर रोक लगा दी. विज्ञापन हटाने के निर्देश दिए गए और पूरे राज्य में सतर्कता बढ़ा दी गई.

    इस विवाद की जड़ केवल ‘कामसूत्र’ शब्द का प्रयोग नहीं है, बल्कि इसे क्रिसमस जैसे पवित्र पर्व के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना है. शिकायतकर्ताओं को आपत्ति इसी बात से है कि धार्मिक उत्सव की आस्था और आध्यात्मिकता को बाजारू आकर्षण के साथ मिलाकर पेश किया गया. एनजीओ संस्थापक अरुण पांडे का तर्क है कि यह गोवा का सेक्स टूरिज्म के अड्डे की तरह प्रचारित करने की चाल है. वहीं, कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा ने इसे न सिर्फ अनुचित बताया बल्कि समाज में यौन अपराधों को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्ति करार दिया.

         सबसे प्रखर आवाज गोवा के आर्चबिशप व भारतीय कैथोलिक बिशप सम्मेलन के अध्यक्ष फिलिप नेरी कार्डिनल फेराओ की ओर से आई.उन्होंने इसे ईसा मसीह के जन्मोत्सव को अश्लीलता से जोड़ने की “गंभीर चूक” बताया और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कदम कहा.उनकी प्रतिक्रिया, व्यापक कैथोलिक समाज की बेचैनी को अभिव्यक्त करती है.

    यह भी उल्लेखनीय है कि विरोध केवल धार्मिक संगठनों तक सीमित नहीं रहा. स्थानीय राजनीतिक इकाइयों और सामाजिक समूहों ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी. कांग्रेस की सांता क्रूज़ यूनिट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के आयोजन गोवा की सांस्कृतिक छवि को धूमिल करते हैं. पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस राज्य में संस्कृति और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है.ऐसे में किसी भी आयोजन का प्रचार यदि सामाजिक मानदंडों से टकराए, तो स्वाभाविक है कि विरोध तेज हो.

कार्यक्रम के पीछे ओशो से जुड़ा प्रचार ढांचा और ‘ध्यान’ तथा ‘वेलनेस’ के नाम पर विविध गतिविधियों का दावा था। लेकिन आयोजनकर्ताओं ने जिस तरह क्रिसमस को जोड़कर यह पैकेज तैयार किया, वह समाज को मंजूर नहीं हुआ। उनके मौन ने संदेह और बढ़ा दिया है.

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि त्योहारों का व्यवसायीकरण अभी तक स्वीकार्य है जब वह सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं के दायरे का सम्मान करें. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक पहचान और सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी की जाए. गोवा पुलिस का हस्तक्षेप इसलिए समयोचित माना जाना चाहिए क्योंकि इससे संभावित तनाव और सामाजिक असंतोष को बढ़ने से रोका गया.

अंततः, यह घटना गोवा और देश दोनों के लिए एक संदेश छोड़ती है—कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच किसी भी प्रकार की अवांछित संगति समाज में असंतोष पैदा कर सकती है. सांस्कृतिक संवेदना को समझे बिना आकर्षक शीर्षक गढ़ना रचनात्मकता नहीं, बल्कि लापरवाही है। त्योहार, आस्था और सामाजिक मूल्य—ये किसी भी मनोरंजन या व्यावसायिक महत्वाकांक्षा से कहीं ऊपर है.


आलोक कुमार

सोमवार, 24 नवंबर 2025

फादर किनले शेरिंग, भूटान के पहले और अब तक के एकमात्र मूल-निवासी कैथोलिक पादरी

 


भूटान .भूटान, जहाँ सदियों से बौद्ध धर्म सांस्कृतिक आत्मा की तरह समाज को संचालित करता आया है, वहाँ कैथोलिक समुदाय की उपस्थिति भले ही अल्पसंख्या में हो—लेकिन इसकी आध्यात्मिक गूंज अत्यंत गहरी है.रोम में पोप के आध्यात्मिक नेतृत्व से जुड़ा यह समुदाय दार्जिलिंग (भारत) के धर्मप्रांत के अधिकार क्षेत्र में आता है, और 2015 के अनुमान के अनुसार भूटान में कुल कैथोलिकों की संख्या मात्र 1,200 है. लेकिन इस छोटे से समुदाय की धड़कन एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ी है, जिसकी कहानी भूटान के धार्मिक-सामाजिक इतिहास में अपूर्व स्थान रखती है—फादर किनले शेरिंग, भूटान के पहले और अब तक के एकमात्र मूल-निवासी कैथोलिक पादरी.

     फादर शेरिंग की यात्रा एक साधारण धार्मिक कथा नहीं, बल्कि अंतरात्मा में उठी पुकार, सामाजिक दबावों से जूझते विश्वास, और आध्यात्मिक साहस की एक असाधारण दास्तान है। एक धर्मनिष्ठ बौद्ध परिवार में जन्मे और युवावस्था में उद्यमिता की राह पर बढ़ते हुए उन्होंने गुप्त रूप से ईसा मसीह की शिक्षाओं का अध्ययन शुरू किया—वह अध्ययन जो धीरे-धीरे उनके भीतर एक बेचैनी, एक अज्ञात खिंचाव और अंततः एक गहरी प्रतिबद्धता में बदल गया.

    स्वयं फादर शेरिंग बताते है-“मुझे अपने भीतर एक अथाह बेचैनी महसूस होती थी. लगता था कि कोई मुझे पुकार रहा है—कि मेरा जीवन एक पुरोहित के रूप में ईसा मसीह को समर्पित होना चाहिए.लेकिन पारिवारिक और व्यावसायिक दबावों के बीच अंतिम निर्णय लेना आसान नहीं था.”

     उनके जीवन का निर्णायक मोड़ 1986 में आया—और वह भी किसी धार्मिक सम्मेलन, किसी चर्च या किसी तीर्थ स्थल पर नहीं, बल्कि एक हवाई जहाज में. वहाँ उनकी मुलाकात हुई मदर टेरेसा से.वह क्षण केवल संयोग नहीं, बल्कि नियति की तरह था.मदर टेरेसा ने उन्हें देखा, सुना—और एक वाक्य में उनके भीतर की दबी पुकार को शब्द दे दिए:

“तुम्हारा एक आह्वान है.ईश्वभूटान, जहाँ सदियों से बौद्ध धर्म सांस्कृतिक आत्मा की तरह समाज को संचालित करता आया है, वहाँ कैथोलिक समुदाय की उपस्थिति भले ही अल्पसंख्या में हो—लेकिन इसकी आध्यात्मिक गूंज अत्यंत गहरी है. रोम में पोप के आध्यात्मिक नेतृत्व से जुड़ा यह समुदाय दार्जिलिंग (भारत) के धर्मप्रांत के अधिकार क्षेत्र में आता है, और 2015 के अनुमान के अनुसार भूटान में कुल कैथोलिकों की संख्या मात्र 1,200 है. लेकिन इस छोटे से समुदाय की धड़कन एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ी है, जिसकी कहानी भूटान के धार्मिक-सामाजिक इतिहास में अपूर्व स्थान रखती है—फादर किनले शेरिंग, भूटान के पहले और अब तक के एकमात्र मूल-निवासी कैथोलिक पादरी.

फादर शेरिंग की यात्रा एक साधारण धार्मिक कथा नहीं, बल्कि अंतरात्मा में उठी पुकार, सामाजिक दबावों से जूझते विश्वास, और आध्यात्मिक साहस की एक असाधारण दास्तान है. एक धर्मनिष्ठ बौद्ध परिवार में जन्मे और युवावस्था में उद्यमिता की राह पर बढ़ते हुए उन्होंने गुप्त रूप से ईसा मसीह की शिक्षाओं का अध्ययन शुरू किया—वह अध्ययन जो धीरे-धीरे उनके भीतर एक बेचैनी, एक अज्ञात खिंचाव और अंततः एक गहरी प्रतिबद्धता में बदल गया.

स्वयं फादर शेरिंग बताते हैं—“मुझे अपने भीतर एक अथाह बेचैनी महसूस होती थी. लगता था कि कोई मुझे पुकार रहा है—कि मेरा जीवन एक पुरोहित के रूप में ईसा मसीह को समर्पित होना चाहिए. लेकिन पारिवारिक और व्यावसायिक दबावों के बीच अंतिम निर्णय लेना आसान नहीं था.”

उनके जीवन का निर्णायक मोड़ 1986 में आया—और वह भी किसी धार्मिक सम्मेलन, किसी चर्च या किसी तीर्थ स्थल पर नहीं, बल्कि एक हवाई जहाज में. वहाँ उनकी मुलाकात हुई मदर टेरेसा से. क्षण केवल संयोग नहीं, बल्कि नियति की तरह था. मदर टेरेसा ने उन्हें देखा, सुना—और एक वाक्य में उनके भीतर की दबी पुकार को शब्द दे दिए:

“तुम्हारा एक आह्वान है. ईश्वर के प्रति उदार बनो—वह तुम्हारे प्रति उदार होगा.”

यही वह क्षण था जिसने किनले शेरिंग को अंतिम निर्णय लेने का संबल दिया.

1995 में वे जेसुइट पादरी के रूप में अभिषिक्त हुए. वर्षों बाद वे दार्जिलिंग जेसुइट प्रांत के प्रांतीय सुपीरियर भी बने—ऐसा पद जिसे संभालना भूटान जैसे धार्मिक रूप से परंपरावादी देश के एक नव-धर्मांतरित व्यक्ति के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि ही नहीं, बल्कि साहस का प्रमाण भी है.

भूटान के लिए यह क्षण महज धार्मिक इतिहास की एक पंक्ति नहीं, बल्कि बहुलता, सहिष्णुता और व्यक्तिगत आस्था की स्वतंत्रता के सम्मान का प्रतीक है. एक बौद्ध राष्ट्र में एक कैथोलिक पादरी—वह भी मूल निवासी—का स्वागत एक नए सौहार्दपूर्ण अध्याय की शुरुआत था.

फादर किनले शेरिंग की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि आस्था की हर यात्रा व्यक्तिगत होती है, जोखिमों से भरी होती है, लेकिन जब कोई सत्य हृदय से पुकारता है—तो उसकी प्रतिध्वनि दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकतों से भी गहरी होती है.

भूटान की शांत घाटियों में, हिमालय की ऊंचाइयों के बीच, कैथोलिक समुदाय भले ही छोटा हो—लेकिन उसे दिशा देने वाला उसका पुरोहित असाधारण रूप से विराट है.


आलोक कुमार


रविवार, 23 नवंबर 2025

बिहार का राजनीतिक तापमान कितना उबलने वाला है

 

पटना.बिहार की सियासी जमीन पर इन दिनों जो हलचल है, वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन की नहीं, शासन-तरीकों की दिशा बदलने की चेतावनी भी है.भाकपा-माले की हाजीपुर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने जिस स्पष्टता और कड़वाहट से बातें रखीं, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि आने वाले समय में बिहार का राजनीतिक तापमान कितना उबलने वाला है.

    चुनाव के ठीक पहले 70 लाख नाम मतदाता सूची से गायब होना और 20–25 लाख नए नाम जोड़े जाना खुद में लोकतांत्रिक ढांचे की गंभीर विसंगति को उजागर करता है. दीपंकर का आरोप है कि यह सब एक संगठित साजिश की तरह हुआ—हर बूथ का संतुलन बदला गया, और इसके बाद जनता पर रुपये बिखेरकर चुनावी हवा को मोड़ा गया. यह आरोप चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल के साथ-साथ लोकतांत्रिक विश्वास को भी चोट पहुंचाता है.

   सबसे बड़ा संकेत यह है कि बिहार अब “नीतीश मॉडल” नहीं, बल्कि “यूपी मॉडल” के रास्ते पर धकेला जा रहा है. मुख्यमंत्री तो नीतीश हैं, पर गृह मंत्रालय किसी और के पास है—और उसके पीछे बुलडोजर की छाया स्पष्ट दिखती है.जिस तरह उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कानून का प्रतीक बन गया, उसी की छाया बिहार पर डालने की चेतावनी दी जा रही है.सवाल यह है कि क्या यह बुलडोजर अपराधियों पर चलेगा, या फिर वही पुराना पैटर्न दोहराया जाएगा—जहां दलित, पिछड़े, और अल्पसंख्यक ही सबसे आसान निशाना बनते हैं?

    दुलारचंद यादव की हत्या और उपमुख्यमंत्री का “छाती पर बुलडोजर” वाला बयान यह संकेत देता है कि राजनीति फिर से भय और दमन की भाषा अपनाने की ओर लौट रही है। चुनावी मंचों पर किसानों से लेकर बेरोजगारों तक को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए—उद्योग खोलने से लेकर बाढ़ समाधान तक—अब जनता हिसाब मांग रही है.

    मोदी के ‘गंगा’ वाले बयान पर दीपंकर का तंज भी राजनीतिक संदेश से भरा है। उन्होंने कहा—यह गंगा आस्था की नहीं, सत्ता की गंगा है, जिसे बंगाल की राजनीति में मोड़ने की तैयारी है. इसके समानांतर, श्रम कानूनों में बड़े बदलाव मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला माने जा रहे हैं. आठ घंटे की जगह 12 घंटे काम, हड़ताल लगभग असंभव, नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं—और इसे ‘सुधार’ के नाम पर परोसा जा रहा है.

     हिडमा की हत्या का मुद्दा भी सभा में राजनीतिक रंग से भरा.दीपंकर के अनुसार यह केवल माओवादी नेता की मौत नहीं, बल्कि आदिवासी इलाकों में कॉर्पोरेट विस्तार—खासकर अडानी समूह—को रास्ता साफ करने की प्रक्रिया का हिस्सा है.उनकी बूढ़ी मां का इस्तेमाल कर ‘सरेंडर’ का दबाव बनाने का आरोप और फिर हत्या—ये बातें बस्तर की वेदना और अविश्वास को और गहरा करती हैं.

   साथ ही, गैर-भाजपा राज्यों के साथ केंद्र का टकराव, तमिलनाडु में बिलों को रोके रखने की प्रवृत्ति, और सुप्रीम कोर्ट के बदलते रुख को दीपंकर लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला बताते हैं। उनका स्वर साफ था—जब अंग्रेजों को भगाया जा सकता है, तो आज की किसी भी तरह की तानाशाही का मुकाबला भी संभव है.

चुनाव में महिलाओं के इस्तेमाल का आरोप, दलित-पिछड़ों पर बढ़ते अत्याचारों की चेतावनी, और बुलडोजर-राज के उभार को रोकने का आह्वान इस सभा का मूल संदेश बनकर सामने आया। कामरेड विशेश्वर प्रसाद यादव को दी गई श्रद्धांजलि सिर्फ भावनात्मक क्षण नहीं थी—वह आने वाले संघर्षों की प्रस्तावना भी थी.

   बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है.अब सवाल यह नहीं कि सरकार किसकी है—सवाल यह है कि शासन कैसा होगा: कानून का, या बुलडोजर का? और इस सवाल का उत्तर आने वाले दिनों की राजनीति तय करेगी.


आलोक कुमार

शनिवार, 22 नवंबर 2025

महाबलीपुरम से चंपारण की ऐतिहासिक यात्रा शुरू

 

विश्व का सबसे विशाल शिवलिंग—महाबलीपुरम से चंपारण की ऐतिहासिक यात्रा शुरू

यह शिवलिंग तमिलनाडु के महाबलीपुरम स्थित पट्टिकाडू गांव में पिछले 10 वर्षों में तैयार किया गया है. इसे शनिवार को 96 पहियों वाले विशेष ट्रक पर कड़ी सुरक्षा के बीच सड़क मार्ग से रवाना किया गया है। रास्ते में कई राज्यों और प्रमुख शहरों में श्रद्धालु इस शिवलिंग के दर्शन भी कर सकेंगे.

चंपारण . तमिलनाडु के समुद्री तट पर बसे महाबलीपुरम से जब 33 फीट ऊँचा और 210 मीट्रिक टन वजनी शिवलिंग 96-चक्का ट्रेलर पर धीरे-धीरे आगे बढ़ा, तो यह सिर्फ पत्थर का कोई ढांचा नहीं था—यह भारतीय आस्था, शिल्पकला और धैर्य का विराट प्रतीक था. दस वर्षों की सतत साधना, अनगिनत हथौड़ों की गूंज और शिल्पकार लोकनाथ की टीम की अनथक मेहनत आखिरकार उस क्षण में फलित हुई, जब पूजा-अर्चना के बाद शिवलिंग को पूर्वी चंपारण के लिए रवाना किया गया.यह सिर्फ एक शिवलिंग नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक यात्रा है—भारत की मिट्टी, मार्ग, लोग और विश्वास, सब इसमें सम्मिलित हैं.

  बन रहा है दुनिया का सबसे बड़ा रामायण मंदिर — और अब पहुँच रहा है उसका ‘हृदय’.पूर्वी चंपारण के चकिया (जानकीनगर) में निर्माणाधीन विराट रामायण मंदिर अपने आप में एक अद्भुत संरचना बनकर उभर रहा है.1080 फीट लंबा, 540 फीट चौड़ा परिसर,18 शिखर, जिनमें मुख्य शिखर की ऊँचाई 270 फीट,कुल 22 मंदिरों का समुच्चय,चार विशाल आश्रम और अब — दुनिया का सबसे विशाल 33 फीट का शिवलिंग.

          महावीर मंदिर न्यास समिति के इस प्रोजेक्ट का सपना आचार्य किशोर कुणाल ने देखा था। आज उनके पुत्र सायण कुणाल उसी स्वप्न को जमीन दे रहे हैं, और इस परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए दिन-रात पेचीदा तकनीकी और प्रशासनिक कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं.33 फीट शिवलिंग—भारतीय शिल्प का अद्भुत प्रतिमान,एक ही विशाल ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित,वजन 210 मीट्रिक टन,निर्माण समय 10 वर्ष,लागत लगभग 3 करोड़ रुपये.

   निर्माण स्थल: महाबलीपुरम के पट्टीकाडु गाँव.शिवलिंग को भक्तों और गांव वालों की उपस्थिति में परंपरागत पूजन के बाद रवाना किया गया। यह यात्रा महज भौगोलिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक है—जिन राज्यों से शिवलिंग गुजरेगा, वहाँ स्वागत-पूजन की विशेष व्यवस्थाएँ होंगी।

अंदेशा है कि 25 दिनों में यह शिवलिंग चंपारण पहुँचेगा.शिवलिंग यात्रा—दक्षिण से उत्तर की आध्यात्मिक सेतु यात्रा मार्ग:

विशाल शिवलिंग को एक विशेष 96 चक्के वाले ट्रक पर लादकर महाबलीपुरम से बिहार के लिए रवाना किया गया. ये ट्रक कई राज्यों से होकर गुजरेगा. इस दौरान, श्रद्धालु कई शहरों में शिवलिंग के दर्शन कर सकेंगे. शिवलिंग का यात्रा मार्ग भी पहले से तया किया गया है. होसुर, होसाकोट, देवनाहाली, कुरनूल, हैदराबाद, निजामाबाद, अदिलाबाद, नागपुर, सीवनी, जबलपुर, मैहर, सतना, रीवा, मिर्जापुर, आरा, छपरा, मसरख, मोहम्मदपुर, केसरिया होते हुए ये अंत में चकिया स्थित विराट रामायण मंदिर परिसर पहुंचेगा।यह मार्ग एक तरह से भारत की सांस्कृतिक रेखा-चित्र जैसा है—दक्षिण की द्रविड़ शिल्प परंपरा से लेकर उत्तर भारत की श्री राम और शिव भक्ति तक.

   नए वर्ष में स्थापना—बिहार के लिए ऐतिहासिक क्षण.मंदिर प्रशासन के अनुसार, जनवरी–फरवरी 2026 में इस शिवलिंग की स्थापना हो सकती है। भारी उत्साह और राज्यव्यापी प्रतीक्षा पहले ही दिखने लगी है.यह सिर्फ बिहार का गर्व नहीं होगा, यह भारत का विश्व-मंच पर सांस्कृतिक परिचय बनेगा। जब कोई पूछेगा कि दुनिया का सबसे.विशाल मंदिर कौन-सा है—तो उत्तर होगा बिहार का विराट रामायण मंदिर.

    जब देश में मंदिर निर्माण और आध्यात्मिकता की चर्चा होती है, तो अक्सर उत्तर भारत ही विमर्श का केंद्र रहता रहा है। लेकिन इस शिवलिंग की यात्रा एक गहरा संदेश देती है—भारत की असली आत्मा उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम का भेद नहीं करती.यह शिवलिंग दक्षिण की शिल्प परंपरा और उत्तर की आस्था को जोड़ता हुआ एक सांस्कृतिक पुल है. और जब यह चकिया पहुँचेगा, तो संभव है कि यह केवल एक धार्मिक प्रतीक न रह जाए—यह बिहार के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधारस्तंभ बन जाए.


आलोक कुमार

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

परिवारवाद सिर्फ किसी एक दल की समस्या नहीं है, यह भारतीय राजनीति की संरचनात्मक बीमारी है


पटना, (आलोक कुमार).बिहार की राजनीति में “परिवारवाद” पर उठती बहस कोई नई नहीं है, लेकिन ताज़ा घटनाक्रम ने इस पुराने विवाद को एक बार फिर से केंद्र में ला दिया है.विशेष रूप से इसलिए कि जिस एनडीए ने वर्षों तक कांग्रेस और राजद पर परिवारवाद का आरोप लगाकर राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश की, आज उसी गठबंधन के भीतर सत्ता और संगठन—दोनों जगह—विरासत की राजनीति का प्रभाव तेजी से उभर कर सामने आ रहा है.

     टीवी बहसों में एनडीए के प्रवक्ता लंबे समय तक कांग्रेस–राजद पर परिवारवादी राजनीति को लेकर तंज कसते रहे। न्यूज़ स्टूडियो में बैठे एंकर भी विज्ञापन-चालित TRP की दौड़ में इसी एजेंडे को हवा देते रहे. लेकिन आज जब परिदृश्य पलटा है, तो वही प्रश्न अब एनडीए के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है—और उतनी ही तीव्रता से, जितनी तीव्रता से कभी विपक्ष पर उठाया गया था.

      मीडिया बहस का केंद्र बिंदु अब एनडीए के भीतर मौजूद उन्हीं नेताओं के आसपास घूम रहा है जिनकी राजनीतिक पहचान पारिवारिक विरासत से ही उपजी है: एनडीए के ‘परिवारवाद’ का जीवंत दस्तावेज़

संतोष सुमन मांझी – पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के पुत्र, वर्तमान विधायक दीपांजलि मांझी के पति और ज्योति मांझी के दामाद.

सम्राट चौधरी – पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी और पूर्व विधायक पार्वती देवी के पुत्र; आज बिहार के उपमुख्यमंत्री.

दीपक प्रकाश – उपेंद्र कुशवाहा और विधायक स्नेहलता के पुत्र.

श्रेयसी सिंह – दिग्विजय सिंह और पुतुल कुमारी की पुत्री.

रमा निषाद – पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जय नारायण निषाद की पुत्रवधू और पूर्व सांसद अजय निषाद की पत्नी.

विजय चौधरी – पूर्व विधायक जगदीश प्रसाद चौधरी के पुत्र.

अशोक चौधरी – पूर्व मंत्री महावीर चौधरी के पुत्र तथा वर्तमान सांसद शांभवी चौधरी के पिता.

नितिन नवीन – पूर्व विधायक नवीन किशोर सिन्हा के पुत्र.

सुनील कुमार – पूर्व मंत्री चंद्रिका राम के पुत्र और पूर्व विधायक अनिल कुमार के भाई.

लेसी सिंह – समता पार्टी के पूर्व जिला अध्यक्ष भूटन सिंह की पत्नी.

मीडिया का प्रश्न — परिवारवाद का विरोध या परिवारवाद का पुनर संस्करण?

सबसे अधिक चर्चा उस कथन की हो रही है जिसमें नेताओं की नई पीढ़ी “ईश्वर की शपथ” लेकर यह दावा करती है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के “स्नेह व आशीर्वाद” से बिहार को परिवारवाद से मुक्त करेंगे.

लेकिन यही वह क्षण है जो मीडिया को कटाक्ष का अवसर देता है:

“परिवारवाद के विरोध का इतना बड़ा दावा, और राजनीतिक विरासत की नींव पर खड़ी पूरी फेहरिस्त—क्या यह विरोध वचन है या व्यंग्य?”

टेलीविज़न स्टूडियो में अब बहस का केंद्र यही द्वैधता है.

एंकर जो कभी विपक्ष के परिवारवाद पर लंबे मोनोलॉग पढ़ते थे, आज असहज होकर वही प्रश्न सत्ता पक्ष से पूछने को मजबूर हैं.

प्रवक्ता जो दूसरों के परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए ‘घातक’ बताते थे, अब या तो रक्षात्मक मुद्रा में हैं या विषय से भटकाने की कोशिश में.

राजनीतिक संदेश का उल्टा असर

नारा था—“परिवारवाद मुक्त राजनीति.”

लेकिन दृश्य है—“परिवारवाद में लिपटी राजनीतिक व्यवस्था.”

यह विरोधाभास ही मीडिया की सबसे बड़ी कहानी बन गया है.

समापन—बड़ी बहस का निष्कर्ष

परिवारवाद सिर्फ किसी एक दल की समस्या नहीं है, यह भारतीय राजनीति की संरचनात्मक बीमारी है.

लेकिन जब वही दल, जो इस बीमारी के सबसे बड़े आलोचक थे, अपने भीतर उसी प्रवृत्ति को आश्रय देते हैं, तो राजनीतिक नैतिकता का प्रश्न और तीखा होकर उठता है.

बिहार की राजनीति में यह बहस आने वाले दिनों में सिर्फ और तीव्र होगी—क्योंकि जनता अब केवल नारे नहीं, बल्कि नैरेटिव और वास्तविकताओं के बीच का अंतर देखने लगी है.

आलोक कुमार

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

जेडीयू, बीजेपी और सहयोगी दलों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा

 

पटना .बिहार की राजनीतिक दिशा एक बार फिर स्पष्ट होती दिखाई दे रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नए मंत्रिमंडल ने आकार ले लिया है और विभागों का ब्योरा यह संकेत देता है कि सत्ता-साझेदारी का संतुलन, अनुभव का उपयोग और राजनीतिक संदेश—तीनों को केंद्र में रखा गया है.जेडीयू, बीजेपी और सहयोगी दलों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा आने वाले दिनों की प्रशासनिक प्राथमिकताओं को भी रेखांकित करता है.

      सबसे पहले स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सामान्य प्रशासन, गृह, कैबिनेट सचिवालय और निगरानी जैसे अहम विभाग अपने पास रखकर यह साफ कर दिया है कि शासन की धुरी अभी भी उन्हीं के हाथ में है. इसके साथ ही निर्वाचन और वे सभी विभाग जो किसी अन्य को आवंटित नहीं हैं, यह दिखाता है कि वे प्रशासनिक नियंत्रण को केंद्रीकृत रखना चाहते हैं.

    दो उपमुख्यमंत्रियों—सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा—को सौंपे गए विभाग स्पष्ट रूप से बीजेपी की प्राथमिकता और ताकत दोनों को इंगित करते हैं.सम्राट चौधरी को वित्त और वाणिज्य-कर जैसे निर्णायक आर्थिक विभाग सौंपे गए हैं, जो राजकोषीय अनुशासन और आर्थिक प्रबंधन पर उनकी भूमिका को मजबूत बनाएंगे. वहीं विजय कुमार सिन्हा को कृषि और खान-भूतत्व दिए जाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नब्ज पर बीजेपी की पकड़ बढ़ाने की कोशिश साफ दिखती है.

     जेडीयू के वरिष्ठ नेताओं में विजय कुमार चौधरी को जल संसाधन और संसदीय कार्य सौंपा गया है—दो ऐसे विभाग, जो नीति निर्माण और क्रियान्वयन के बीच पुल का काम करते हैं.बिजेंद्र प्रसाद यादव को ऊर्जा और योजना जैसे विभाग देकर पार्टी ने उन्हें विकास-ढांचे का चेहरा बनाने की कोशिश की है. श्रवण कुमार और अशोक चौधरी को ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े विभाग देने से नीतीश मॉडल की मूल भूमि—ग्रामीण विकास—को मजबूती मिलती है.

    भाजपा के मंगल पांडेय को स्वास्थ्य और विधि की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपकर केंद्र और राज्य के तालमेल को सुदृढ़ करने की कोशिश झलकती है. नितिन नवीन को पथ निर्माण और नगर विकास जैसे भारी-भरकम विभाग दिए जाने से शहरी बुनियादी ढांचे पर अधिक फोकस का संकेत मिलता है.

           वहीं उद्योग, पंचायती राज जैसे विभाग रामकृपाल यादव को देकर बीजेपी ने जमीनी राजनीतिक अनुभव को प्रशासनिक जिम्मेदारी से जोड़ने का प्रयास किया है. सुशील कुमार सुमन के पास लघु जल संसाधन और मो. जामा खान के पास अल्पसंख्यक कल्याण का विभाग—ये दोनों क्षेत्र सामाजिक संतुलन की राजनीति को रेखांकित करते हैं.

         सहयोगी दलों को भी बराबर की भूमिका देने की कोशिश साफ दिखती है. लोजपा (रामविलास) के संजय कुमार को श्रम संसाधन और विज्ञान-प्रौद्योगिकी, जबकि संजय कुमार सिंह को पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन जैसे संवेदनशील विभाग सौंपे गए हैं.

       सुरक्षा, सेवा और संवर्धन के व्यापक दायरे में भाजपा की श्रेयसी सिंह (पर्यटन व खेल), डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल (आपदा प्रबंधन) और दीपक प्रकाश (सहकारिता) जैसे नाम यह बताते हैं कि पार्टी नई पीढ़ी और अनुभवी टीम को साथ लेकर चलना चाहती है.

     कुल मिलाकर यह मंत्रिमंडल न केवल राजनीतिक समीकरणों का संतुलन प्रस्तुत करता है, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं की रोडमैप भी स्पष्ट करता है.आने वाले दिनों में वास्तविक परीक्षा इस बात की होगी कि ये विभागीय वितरण बिहार की जमीन पर कितने असरदार परिणाम दे पाते हैं.

आलोक कुमार

बिहार का सत्ता-चक्र: नीतीश कुमार का दसवां अवतार

 बिहार का सत्ता-चक्र: नीतीश कुमार का दसवां अवतार


पटना. लोक नायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की धुंधली छाया में जन्मे बिहार के राजनीतिक परिदृश्य ने एक बार फिर अपनी चक्रीयता का प्रमाण दिया है. वह दौर जब लालू प्रसाद यादव अधिवक्ता की वकालत छोड़कर जननायक बने, नीतीश कुमार इंजीनियरिंग की डिग्री को सत्ता की कुर्सी पर चढ़ने का हुनर सीख चुके थे. आज, पटना इंजीनियरिंग कॉलेज के उत्तीर्ण छात्र नीतीश कुमार न केवल 'कुर्सी बचाने के इंजीनियर' सिद्ध हुए हैं, बल्कि बिहार के इतिहास में सबसे अधिक दफा शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री के रूप में अमर हो चुके हैं.

     2025 विधानसभा चुनावों के बाद राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जीत के साथ ही नीतीश कुमार 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं—एक ऐसा क्षण जो बिहार की राजनीति की अस्थिरता और स्थिरता के द्वंद्व को उजागर करता है.बिहार में मुख्यमंत्री पद की शुरुआत स्वतंत्र भारत के नवजात लोकतंत्र के साथ ही हुई. 1947 में, जब भारत गणराज्य बना, तो बिहार का पहला मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा बने. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिग्गज नेता थे और 20 जुलाई 1947 से 31 जनवरी 1961 तक—करीब 13 वर्षों की लंबी अवधि—इस पद पर आसीन रहे. यह बिहार का स्वर्णिम दौर था, जब राज्य की नींव पड़ी और विकास की आधारशिला रखी गई.

     श्री कृष्ण सिन्हा के बाद द्वीप नारायण ज्हा ने 1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961 तक संक्षिप्त कार्यकाल संभाला, लेकिन जल्द ही अनुचंद्र प्रसाद हेगड़े (18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963) और फिर श्री कृष्ण सिन्हा का दूसरा कार्यकाल (2 अक्टूबर 1963 से 31 जनवरी 1968) आया.इन शुरुआती वर्षों में बिहार की सत्ता कांग्रेस के एकछत्र वर्चस्व में रही, जो स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को आगे बढ़ा रही थी.1960 के दशक के अंत तक राजनीतिक अस्थिरता ने दस्तक दे दी.

     1968 में सतीश प्रसाद सिंह ने मात्र 5 दिनों (28 जनवरी से 1 फरवरी) का सबसे छोटा कार्यकाल संभाला, जो बिहार की नाजुक सत्ता-गतिशीलता का प्रतीक था. इसके बाद हरिहर सिंह (22 फरवरी 1967 से 28 जनवरी 1968), भोला पासवान शास्त्री (29 जनवरी 1968 से 26 फरवरी 1969; और फिर 4 अप्रैल 1969 से 22 जून 1969), राम लखन सिंह यादव (22 जून 1969 से 29 जून 1969), दरोगा प्रसाद राय (29 जून 1969 से 22 दिसंबर 1970), भोला पासवान शास्त्री का दूसरा कार्यकाल (29 दिसंबर 1970 से 4 जून 1971), और बिंदेश्वरी दूबे (4 जून 1971 से 24 जनवरी 1972) जैसे नाम आए. यह दौर था जब राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन आठ बार चला—सबसे अधिक अस्थिरता का प्रमाण.

    1970 के दशक में जनता पार्टी के उदय के साथ राजनीति में परिवर्तन आया. कर्पूरी ठाकुर (20 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 और फिर 24 जून 1977 से 1 अप्रैल 1979) ने पिछड़े वर्गों के उत्थान की नींव रखी. अब्दुल गफूर (2 जून 1971 से 11 जनवरी 1972), राम लखन सिंह यादव का दूसरा कार्यकाल (2 जून 1977 से 24 जून 1977), और जगन्नाथ मिश्र (11 फरवरी 1972 से 19 मार्च 1975; 14 अप्रैल 1980 से 14 अगस्त 1983; और 14 मार्च 1989 से 10 मार्च 1990) जैसे नेताओं ने सत्ता संभाली. इंदिरा गांधी के आपातकाल के बाद 1977 का जनता पार्टी सरकार बिहार में भी आई, लेकिन जल्द ही विघटित हो गई.

     1980 के दशक में कांग्रेस की वापसी हुई, लेकिन लालू प्रसाद यादव के उदय ने सब बदल दिया. जगन्नाथ मिश्र के बाद चंद्रशेखर सिंह (8 मार्च 1985 से 12 मार्च 1985), बिंदेश्वरी दुबे का दूसरा कार्यकाल (12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988), और जगन्नाथ मिश्र का तीसरा कार्यकाल आया.

     फिर 10 मार्च 1990 को लालू प्रसाद यादव बने—वह चाणक्य जैसे रणनीतिकार जो जनता दल के बैनर तले बिहार को 1997 तक हांकते रहे.लालू के कार्यकाल (10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995; 4 अप्रैल 1995 से 25 जुलाई 1997) में सामाजिक न्याय की लहर चली, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि धूमिल की. इसके बाद राबड़ी देवी (25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 2000; 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005) बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, जो लालू की अनुपस्थिति में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की सरकार चला रही थी.

    21वीं सदी में नीतीश कुमार का युग शुरू हुआ.जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश ने पहली बार 3 मार्च 2000 से 11 अप्रैल 2000 तक संक्षिप्त कार्यकाल संभाला.फिर 24 नवंबर 2005 से 20 मई 2014 तक लंबा शासन किया, जिसमें विकास की गति पकड़ी. 22 फरवरी 2015 से 26 जुलाई 2017, 27 जुलाई 2017 से 2 मई 2018 (महागठबंधन के साथ), 19 मई 2018 से 16 नवंबर 2020, 20 फरवरी 2021 से 9 अगस्त 2022, 12 अगस्त 2022 से 28 जनवरी 2024, और 28 जनवरी 2024 से नवंबर 2025 तक—ये उनके नौ कार्यकाल हैं.

     अब 2025 चुनावों के बाद 10वां शपथ ग्रहण. कुल मिलाकर, नीतीश के 18 वर्षों से अधिक का कार्यकाल बिहार को सड़कों, पुलों और शिक्षा से जोड़ता है, लेकिन गठबंधन-धोखे की राजनीति ने उनकी छवि को 'पलटू राम' का रूप दे दिया।बिहार की यह सत्ता-यात्रा—1947 से शुरू होकर आज के 10वें मुख्यमंत्री तक—एक सबक है: लोकतंत्र में स्थिरता दुर्लभ है, लेकिन परिवर्तन अपरिहार्य। जयप्रकाश नारायण का सपना आज भी अधूरा है, क्योंकि कुर्सी की होड़ में विकास की गति कभी तेज, कभी सुस्त। नीतीश कुमार का दसवां अवतार क्या बिहार को नई दिशा देगा, या फिर वही पुराना चक्र? समय ही उत्तर देगा.

आलोक कुमार

बुधवार, 19 नवंबर 2025

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी दृढ़ इच्छाशक्ति की विश्व की नेता थी: राजेश राम

 *कांग्रेस ने मनाया पूर्व प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी की 108 वीं जयंती


*पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी दृढ़ इच्छाशक्ति की विश्व की नेता थी: राजेश राम

 पटना .देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. इंदिरा गांधी की 108वीं जयंती  आज प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में मनाई गई.कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने की.

  इस अवसर पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने कहा कि स्व. इंदिरा गांधी देश की ही नहीं विश्व की नेता थी और उनके मनोबल ने देश को वैश्विक स्तर पर मजबूत देशों की श्रेणी में खड़ा कर दिया था. 1971 के युद्ध में उन्होंने विश्व का भूगोल बदल दिया और पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों को आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया. इतिहास में इससे बड़ा कोई सैन्य आत्मसमर्पण नहीं दर्ज है. 1971 के बाद स्व. गांधी ने भारतीय सैन्य ताकत को विश्व स्तर का बना दी. देश के नवनिर्माण में आयरन लेडी के नाम से प्रसिद्ध देश की इकलौते महिला प्रधानमंत्री स्व. गांधी की अहम भूमिका रही है.आज लोग आतंकवाद और राष्ट्र के अखंडता के लिए लड़ने की बात करते हैं जबकि स्व. इंदिरा गांधी ने उसे करके दिखाया.

      प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने कहा कि अपने कार्यकाल में  इन्दिरा गाँधी ने देश से गरीबी हटाने,  बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजा-महाराजाओं के प्रीवी पर्स हटाने जैसे बड़े एवं महत्वपूर्ण कार्य किए और उन्होंने देश की एकता एवं अखण्डता की रक्षा के लिए आतंकवाद से लड़ते हुए अपनी कुर्बानी तक दे दी। कृतज्ञ राष्ट्र अनन्त काल तक उनके त्याग और बलिदान को याद रखेगा.इस मौके पर उपस्थित नेताओं व कार्यकर्ताओं ने सदाकत आश्रम के उद्यान में स्थित स्व. इंदिरा गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किए.

           जयंती कार्यक्रम में कांग्रेस विधान परिषद दल के नेता डा0 मदन मोहन झा, पूर्व मंत्री अवधेश कुमार सिंह, अनुशासन समिति के अध्यक्ष कपिलदेव प्रसाद यादव, जमाल अहमद भल्लू, मीडिया चेयरमैन राजेश राठौड़, सौरभ सिन्हा, चन्द्र प्रकाश सिंह, रौशन कुमार सिंह, कुमार आशीष, अरविन्द लाल रजक, मनोज शर्मा, वैद्यनाथ शर्मा, कमलदेव नारायण शुक्ला,शशिकांत तिवारी, संतोष श्रीवास्तव,,सुनील कुमार सिंह, रंजीत कुमार बाल्मीकी,  मृणाल अनामय, ई0 विश्वनाथ बैठा, संजय कुमार श्रीवास्तव, रामाशंकर पाण्डेय,  विमलेश तिवारी, राजीव कुमार, रोहित कुमार पासवान, मनु मानव मुकेश, मनोज कुमार यादव, विनोद कुमार यादव, किशोर कुमार, जावेद इकवाल, नदीम अंसारी ने भी इन्दिरा गाँधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया .

 

आलोक कुमार

मंगलवार, 18 नवंबर 2025

सत्ता सिर्फ जीत का नाम नहीं

 

पटना .बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का परिवार सिर्फ एक राजनीतिक घराना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की उस लंबी लड़ाई का प्रतीक रहा है जिसने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया. परंतु हालिया चुनावी झटका इस विशाल परिवार में गहरी दरारें उभारता दिख रहा है—ऐसी दरारें, जिनके संकेत वर्षों से भीतर ही भीतर पनप रहे थे.

लालू प्रसाद और राबड़ी देवी—यह जोड़ी बिहार की राजनीति में ‘कठोर निर्णय’ और ‘मां-की ममता’ का असाधारण संगम मानी जाती है. एक ओर लालू की जन-नेतृत्व क्षमता, दूसरी ओर राबड़ी देवी की सादगी पर आधारित राजनीतिक उपस्थिति—इन दोनों ने मिलकर बिहार में एक वैकल्पिक राजनीति धारा तैयार की.परंतु नेतृत्व जब अगली पीढ़ी की ओर बढ़ा, तो परिवार की विविधता एकता पर भारी पड़ने लगीं.

पुत्रियाँ: त्याग, मौन और विद्रोह की तीन छवियाँ

मीसा भारती हमेशा पार्टी की वैचारिक धुरी के रूप में सामने आईं, लेकिन लोकसभा में दो लगातार हारों ने उनके राजनीतिक ग्राफ को धूमिल किया.रोहिणी आचार्य—वही बेटी जिन्होंने पिता को किडनी देकर देशभर में मिसाल कायम की—अब राजनीति से दूर जाने का फैसला कर चुकी हैं। यह निर्णय सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि परिवार की राजनीतिक थकान और अंदरूनी संघर्षों की ओर भी संकेत करता है.रागिनी, चंदा और हेमा—ये तीनों राजनीति से अलग, लेकिन परिवार की परिधि में स्थिर हैं; परंतु इनका मौन भी परिवार की खामोश बेचैनी का ही एक हिस्सा है.

पुत्र: महत्वाकांक्षाओं का टकराव

तेज प्रताप यादव—भावनात्मक, उग्र और अक्सर अप्रत्याशित. उनका राजनीतिक सफर किनारों से टकराता हुआ आगे बढ़ रहा है. वे परिवार की राजनीति में रंग तो भरते हैं, पर दिशा नहीं.

इसके विपरीत, तेजस्वी यादव—संगठित, संयमित और अपनी रणनीति में स्पष्ट। वे लालू के वास्तविक राजनीतिक उत्तराधिकारी बने और आज बिहार की विपक्षी राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ माने जाते हैं.

दोनों भाइयों के बीच टकराव और व्यक्तित्व का अंतर राजद के भीतर चल रहे अनकहे संघर्ष का आईना है. यह संघर्ष सत्ता के लिए नहीं, बल्कि विरासत की उस परिभाषा को लेकर है जो लालू प्रसाद की राजनीति ने दशकों में गढ़ी.

क्या परिवार और पार्टी साथ-साथ चल पाएंगे?

चुनावों में मिली करारी हार न केवल पार्टी की कमजोरी का परिणाम है, बल्कि परिवार के भीतर संवादहीनता की एक बड़ी कीमत भी. रोहिणी का राजनीति से दूरी बनाना, मीसा का संघर्ष, तेजप्रताप का असंतुलन, और तेजस्वी का एकाकी नेतृत्व—ये सभी संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि राजद अब एक सामूहिक परिवारवाद से आगे बढ़कर ‘एकल नेतृत्व’ की ओर जा रहा है.

समापन: राजनीति का नया मोड़

लालू परिवार की यह यात्रा उस दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां इतिहास की चमक और वर्तमान की चुनौतियों आमने-सामने खड़े हैं.तेजस्वी यादव इस परिवार की राजनीति का भविष्य हैं—लेकिन यह भविष्य तभी मजबूती से खड़ा होगा जब परिवार के भीतर की दरारें संवाद और विश्वास से भर सकें.क्योंकि बिहार की राजनीति में लालू परिवार सिर्फ एक घराना नहीं, बल्कि वह कथा है—जो बताती है कि सत्ता सिर्फ जीत का नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग और निरंतर आत्ममंथन का परिणाम है.

आलोक कुमार

रविवार, 16 नवंबर 2025

रोमन कैथोलिक चर्च चुहड़ी पल्ली में सालाना यूखरिस्तिय यात्रा निकाली गई


रोमन कैथोलिक चर्च चुहड़ी पल्ली में सालाना यूखरिस्तिय  यात्रा निकाली गई

चुहड़ी .चुहड़ी की शांत धरती आज प्रभु-भक्ति के स्वर से गूंज उठी. बेतिया धर्मप्रांत के अंतर्गत स्थित आवर लेडी असम्प्शन चर्च से निकली वार्षिक यूखरिस्तिय यात्रा ने पूरे क्रिश्चियन क्वार्टर को आस्था के उजाले से आलोकित कर दिया। येसु ख्रीस्त के सम्मान में उठते स्वर— “राजा तेरा राज्य आवे”—मानो आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँच रहे थे और हर सुनने वाले हृदय में आध्यात्मिक अनुराग जगाते जा रहे थे.

इस पवित्र यात्रा की गरिमा उस समय और बढ़ गई जब बेतिया धर्मप्रांत के बिशप पीटर सेबेस्टियन गोबियस तथा विकार जनरल फादर फिनटन ने श्रद्धालुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कदम बढ़ाए। उनके साथ अनेक पुरोहितों, सिस्टरों तथा बेतिया, दुसैया, चखनी, चनपटिया, रामनगर, सिरिसिया बगहा, सिवान, छपरा, गोपालगंज और नरकटियागंज से आए ईसाई समुदाय के सैकड़ों बच्चे, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे.

पल्ली पुरोहित फादर हरमन ने यात्रा में शामिल प्रत्येक श्रद्धालु के प्रति आभार व्यक्त किया और ईश्वर के प्रेम, एकता एवं त्याग के संदेश को जीवन में आत्मसात करने का आग्रह किया। उन्होंने याद दिलाया कि ईश्वर का राज्य सभी के लिए खुला है—इसलिए उसके उपकारों के प्रति कृतज्ञ रहना और मानवता को प्रेमपूर्वक अपनाना हम सभी की जिम्मेदारी है.

    यात्रा पारंपरिक मार्ग से होकर क्रिश्चियन क्वार्टर की गलियों से गुजरी. संत आग्नेस स्कूल में निर्मित बेदी तथा मां मरियम के ग्रोटो में सजाई गई बेदी पर पवित्र सैक्रामेंट के साथ विशेष प्रार्थनाएं अर्पित की गईं.छोटे-छोटे फ्लावर गर्ल्स और युवा बालिकाओं ने साक्रमेंट के सम्मान में फूल वर्षा की और संगीत मंडली ने भक्ति गीतों से वातावरण को और अधिक पवित्र बना दिया.

गिरजाघर हो या ग्रोटो, ईसाई मोहल्ला हो या गलियां—हर स्थान केले के पेड़ों, रंग-बिरंगी झंडियों और फूलों से सजा हुआ था. यूखरिस्तिय यात्रा सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि समुदाय को जोड़ने वाली उस अदृश्य डोर का प्रतीक बनी, जो प्रेम, सेवा और कृतज्ञता से समाज को अधिक मानवीय और शांतिमय बनाती है. आज चुहड़ी ने आस्था की इस सामूहिक अनुभूति के माध्यम से एक बार फिर संदेश दिया—ईश्वर प्रेम है, और वह प्रेम में एक-दूसरे से जोड़ता है.


आलोक कुमार

 

शनिवार, 15 नवंबर 2025

कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण संस्था

 


पटना. कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण संस्था — कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) — अब अपने लाखों पेंशनभोगियों के लिए एक राहत भरी खबर लाने की तैयारी में है. नवंबर में प्रस्तावित सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) की बैठक में पेंशन बढ़ोतरी पर अंतिम फैसला होने की संभावना जताई जा रही है.वर्तमान में EPFO के लगभग 75 लाख पेंशनभोगी हैं, जिनमें अधिकांश को न्यूनतम ₹1000 मासिक पेंशन मिल रही है — एक ऐसी राशि जो मौजूदा महंगाई दर और जीवन-यापन की लागत के सामने लगभग प्रतीकात्मक ही है। सरकार और संगठन अब इस रकम को ₹2000 या ₹2500 तक बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। यह सुधार यदि स्वीकृत होता है, तो इसे 1 जनवरी 2026 या 1 अप्रैल 2026 से लागू किया जा सकता है.

वित्तीय ढांचा और सरकार की भूमिका

EPFO की पेंशन योजना का ढांचा इस तरह बनाया गया है कि कर्मचारी और नियोक्ता — दोनों अपनी ओर से 12-12 प्रतिशत योगदान करते हैं। इसमें से 8.33 प्रतिशत हिस्सा कर्मचारी पेंशन स्कीम (EPS) में जाता है, जिससे पेंशन फंड बनता है. सरकार इस फंड के संचालन में सहयोगी भूमिका निभाती है और समय-समय पर अनुदान (subsidy) के माध्यम से इसका वित्तीय बोझ हल्का करती है.

बढ़ोतरी क्यों ज़रूरी है

₹1000 की न्यूनतम पेंशन, आज के दौर में किसी भी बुजुर्ग की आवश्यक जरूरतें पूरी करने में सक्षम नहीं है.चिकित्सा, किराया, दवा और महंगाई के बीच यह रकम महज़ औपचारिक सहायता बनकर रह गई है.इसीलिए पेंशन बढ़ोतरी न केवल आर्थिक राहत है बल्कि सम्मानजनक जीवन का अधिकार भी है.

चुनौतियाँ

बढ़ी हुई पेंशन का सीधा असर EPFO के फंड पर पड़ेगा. वित्तीय गणनाओं के अनुसार, अगर न्यूनतम पेंशन को ₹2000 किया जाता है, तो वार्षिक बोझ हजारों करोड़ रुपये तक जा सकता है. ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस अतिरिक्त खर्च का संतुलन कैसे बनाएगी — क्या वह अतिरिक्त अनुदान देगी, या योगदान के अनुपात में कुछ बदलाव होंगे.

निष्कर्ष

यदि यह प्रस्ताव पास होता है, तो यह उन करोड़ों श्रमिकों के लिए नई उम्मीद होगी जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे वर्ष मेहनत में खपा दिए। EPFO और सरकार को चाहिए कि इस बार का निर्णय महंगाई से मेल खाता हुआ, दीर्घकालिक और न्यायसंगत हो — ताकि पेंशन शब्द का अर्थ सिर्फ औपचारिक सहायता नहीं, बल्कि सुरक्षित वृद्धावस्था का भरोसा बन सके.


आलोक कुमार

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

देश के पहले प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू की 136 वीं जयंती

 बिहार कांग्रेस ने मनाया पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की 136 वीं जयंती

 


पटना.आधुनिक भारत के निर्माता और देश के पहले प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू की 136  वीं जयंती प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में उनके आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण कर मनाई गई.

     जयंती कार्यक्रम में माल्यार्पण के पश्चात प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रो रामजतन सिन्हा  ने कहा कि आधुनिक भारत के निर्माणकर्ता देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने देश को प्रगति पथ पर अग्रसर होने की आधारभूत संरचना के अर्जन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। पंडित नेहरू ने देश की एकता, अखंडता और सम्प्रभुता को मजबूती और स्थिरता प्रदान की.उन्होंने देश में समता और संवैधानिक प्रतिबद्धता का सृजन किया.

     जयंती कार्यक्रम में ब्रजेश प्रसाद मुनन,राजेश राठौड़,  संजीव सिंह,नागेन्द्र कुमार विकल, डा0 संजय यादव, अफरोज खान, कुमार आशीष,आशुतोष शर्मा, संतोष कुमार श्रीवास्तव, वैद्यनाथ शर्मा, रौशन कुमार सिंह,चन्द्रभूषण राजपूत, अरविन्द लाल रजक,निधि पाण्डेय, राजीव मेहता, प्रदुम्न कुमार, उदय शंकर पटेल, मृणाल अनामय,मनोज शर्मा, वसी अख्तर, विमलेश तिवारी, अभिषेक कुमार, रामाशंकर पाण्डे सहित अन्य कांग्रेसजन मौजूद थे.

आलोक कुमार

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

लोकतंत्र की जीत, अनुशासन की परीक्षा

 


लोकतंत्र की जीत, अनुशासन की परीक्षा — पटना प्रशासन की सख़्त निगरानी में मतगणना दिवस

पटना.बिहार विधान सभा चुनाव 2025 अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है. 14 नवम्बर को ए.एन. कॉलेज, पटना में होने वाली मतगणना केवल नतीजों का दिन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा भी है. जिस तरह से पटना जिला प्रशासन ने मतगणना की तैयारियों को लेकर सतर्कता बरती है, वह यह संदेश देता है कि लोकतंत्र का उत्सव तभी सार्थक है जब उसमें अनुशासन की भावना जुड़ी हो.

    जिलाधिकारी और वरीय पुलिस अधीक्षक द्वारा संयुक्त रूप से की गई ब्रीफिंग में स्पष्ट कर दिया गया कि कानून-व्यवस्था से किसी भी तरह का समझौता नहीं होगा.निषेधाज्ञा लागू रहेगी, विजय जुलूसों पर रोक रहेगी और मतगणना स्थल के आसपास किसी भी प्रकार का राजनीतिक प्रदर्शन, नारेबाजी या भीड़ जुटाने की अनुमति नहीं होगी. यह कठोरता केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि नागरिक उत्तरदायित्व की याद दिलाती है — कि लोकतंत्र में उत्सव भी अनुशासन से ही खिलता है.

प्रशासन का यह निर्णय न केवल चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को सुरक्षित करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि किसी भी प्रकार की अफवाह या उत्तेजना से जन-शांति प्रभावित न हो. सीसीटीवी निगरानी, नियंत्रित यातायात व्यवस्था और नियंत्रण कक्ष की 24 घंटे सक्रियता इस बात का प्रमाण है कि पटना जिला प्रशासन इस बार कोई ढिलाई नहीं बताना चाहता.

सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा या कौन हारेगा; असली सवाल यह है कि क्या हम परिणाम आने तक संयम बनाए रखें. लोकतंत्र की असली पहचान केवल मतदान नहीं, बल्कि मतगणना के समय की शांति और मर्यादा से भी होती है.

ऐसे में यह प्रशासनिक पहल सराहनीय है — क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि नागरिक सजगता से भी होती है। परिणाम का इंतजार घर बैठे कीजिए, और मतगणना स्थल को अनुशासन और मर्यादा का प्रतीक बनने दीजिए.यही एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है.

आलोक कुमार

बुधवार, 12 नवंबर 2025

भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की 137वीं जयंती

 पटना.भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की 137वीं जयंती आज प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में मनाई गई.इस अवसर पर बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मदन मोहन झा ने कहा कि स्वतंत्रता आन्दोलन में मौलाना अबुल कलाम आजाद ने पंडित नेहरू के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया. मौलाना अबुल कलाम आजाद स्वतंत्रता के बाद 12 वर्षों तक देश के शिक्षा मंत्री रहे। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने देश में नई शिक्षा नीति की आधारशिला रखी. वे देश में साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रबल समर्थक थे. आज कृतज्ञ राष्ट्र मौलाना अबुल कलाम आजाद के योगदान को स्मरण कर उनकी स्मृति को बार-बार नमन करती है.इसके पूर्व पार्टी के नेताओं के द्वारा मौलाना अबुल कलाम आजाद के तैल चित्र पर माल्यार्पण किया गया.

    इस अवसर पर कोषाध्यक्ष जितेन्द्र गुप्ता, जमाल अहमद भल्लू, ,अम्बुज किशोर झा, अरविन्द लाल रजक, चन्द्रभूषण राजपूत, संजय कुमार पाण्डेय, वैद्यनाथ शर्मा, रौशन कुमार सिंह, सुधीर शर्मा, फिरोज हसन, सत्येन्द्र प्रसाद, किशोर कुमार, मो0 शाहनवाज, अभिषेक कुमार, राकेश कुमार, पं0 अनोखे लाल तिवारी ने भी मौलाना अबुल कलाम आजाद के चित्र पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित किये.


आलोक कुमार

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

बिहार विधान सभा आम निर्वाचन, 2025 के दृष्टिगत ए एन कॉलेज, पटना में


 मतगणना की तैयारियों की समीक्षा

पटना.जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह-जिलाधिकारी, पटना द्वारा बिहार विधान सभा आम निर्वाचन, 2025 के दृष्टिगत ए एन कॉलेज, पटना में पोल्ड ईवीएम वज्रगृह-सह-मतगणना केन्द्र का निरीक्षण कर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया गया एवं मतगणना की तैयारियों की समीक्षा की गई.

पदाधिकारियों को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए निर्देशों का अक्षरशः

अनुपालन सुनिश्चित करने तथा मतगणना के दिन सुगम यातायात-प्रबंधन, अचूक विधि-व्यवस्था संधारण एवं उत्कृष्ट भीड़-प्रबंधन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया.विदित हो कि सभी 14 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में 6 नवंबर को मतदान समाप्ति के पश्चात 5,677 मतदान केन्द्रों के पोल्ड ईवीएम एवं वीवीपैट का संग्रहण ए एन कॉलेज, पटना में किया गया है.दिनांक 14 नवम्बर, 2025 को यहाँ मतगणना होना है.

वज्रगृह की सुरक्षा के लिए 24*7 थ्री-टियर:

केंद्रीय अर्धसैनिक (सीएपीएफ), बिहार विशेष सशस्त्र बल (बीएसएपी) तथा जिला सशस्त्र पुलिस (डीएपी): व्यवस्था की गई है. सीसीटीवी कैमरों से लगातार निगरानी की जा रही है. 03 अपर पुलिस अधीक्षकों-पुलिस उपाधीक्षकों तथा 13 पुलिस पदाधिकारियों की 24*7 तैनाती है। नियंत्रण कक्ष क्रियाशील है. सीसीटीवी कैमरा नियंत्रण कक्ष में 03 पुलिस पदाधिकारी एवं 12 मजिस्ट्रेट  मुस्तैद हैं. प्रत्येक प्रवेश द्वार पर डीएफएमडी/एचएचएमडी स्थापित किया गया है. परिसर में किसी के भी अनधिकृत प्रवेश की अनुमति नहीं है. विधिवत अनुमति एवं प्रक्रिया अनुसार जिनका भी प्रवेश हो रहा है.उनका नाम एवं विवरण पंजी में दर्ज किया जाना अनिवार्य है. इसका अक्षरशः अनुपालन किया जा रहा है. तीन पारियों में 15 दंड अधिकारियों तथा पुलिस पदाधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की गई है.

    प्रतिदिन निर्वाची पदाधिकारियों द्वारा दो बार एवं जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह- जिला पदाधिकारी, पटना द्वारा एक बार स्ट्रांग रूम का भ्रमण किया जा रहा है.अभ्यर्थियों/प्रतिनिधियों को भी एसओपी के अनुसार स्ट्रांग रूम का भ्रमण कराया जाता है.अभ्यर्थियों/प्रतिनिधियों द्वारा आयोग के निर्देशों के अनुरूप स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा व्यवस्था का सतत अवलोकन किया जा रहा है. जिलाधिकारी ने इन सभी से व्यवस्था के बारे में जानकारी ली. सभी सुरक्षा व्यवस्था एवं पारदर्शिता से संतुष्ट हैं. भारत निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश तथा प्रोटोकॉल के अनुरूप वज्रगृह की सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की गई है.


आलोक कुमार


सोमवार, 10 नवंबर 2025

विधानसभा चुनाव के लिए मतदान दलों को ई०वी० एम०/वीवी-पैट वितरण कार्य सम्पन्न


विधानसभा चुनाव  के लिए  मतदान दलों को ई०वी० एम०/वीवी-पैट वितरण कार्य सम्पन्न

बेतिया, (आलोक कुमार).मतदान दलों को ई०वी० एम० वितरण (Dispersal) का कार्य मतदान की तिथि से एक दिन पूर्व किया जाता है.ई०वी० एम० वितरण के लिए  स्ट्रांग रूम खोले जाने एवं वितरण कार्य के दौरान उपस्थित रहने  के लिए अभ्यर्थियों/निर्वाचन अभिकर्ताओं को पूर्व से लिखित रूप से सूचित किया जाता है.साथ ही इस दौरान मतदान दलों को रेण्डमाईजेशन के माध्यम से टैग किये गये मतदान केन्द्रों के लिए ई०वी० एम० एवं वी० वी० पेट उपलब्ध कराया जाता है.मतदान दलों द्वारा ई०वी०एम० प्राप्ति के समय जाँच पड़ताल कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि उपलब्ध कराये गये BU, CU, VVPAT उनके मतदान केन्द्र से संबंधित है.साथ ही सुरक्षित रखी गयी मशीनें आवश्यकतानुसार Replacement के लिए (यदि मतदान केन्द्र पर मशीनें खराब हो जाती है) सेक्टर पदाधिकारियों को उपलब्ध करा दिया जाता है. आयोग द्वारा प्रतिनियुक्त प्रेक्षक भी इस प्रक्रिया की निगरानी करते है. इससे संबंधित विस्तृत दिशा-निर्देश आयोग के Manual on Electronic Voting Machine में वर्णित है। जो आयोग के वेबसाईट https://www.eci.gov.in/evm-vvpat पर उपलब्ध है.

        बिहार विधानसभा आम निर्वाचन, 2025 के दौरान पश्चिम चम्पारण जिला में कल दिनांक 11.11. 2025 को होने वाले मतदान  के लिए  आज दिनांक 10.11.2025 को सभी मतदान दलों एवं सेक्टर पदाधिकारियों को अभ्यर्थियों/निर्वाचन अभिकर्ताओं एवं प्रेक्षक की उपस्थिति में निर्वाची पदाधिकारी द्वारा स्ट्रांग रूम खोलते हुए ई०वी० एम० एवं वी०वी०पैट का वितरण का कार्य किया गया. यह कार्य जिले के संबंधित विधानसभा क्षेत्रों के डिस्पैच सेंटर से किया गया है, जिसका विवरण निम्नवत है-

विधानसभा क्षेत्र सं० एवं नाम डिस्पैच सेंटर का पता

01- वाल्मीकिनगर- बाबा भूतनाथ महाविद्यालय, मंगलपुर, बगहा-2

02- रामनगर (ST)- राजकीय कृत उच्च माध्यमिक विद्यालय, हरिनगर

03- नरकटियागंज- कृषि बाजार समिति, नरकटियागंज

04- बगहा- बाबा भूतनाथ महाविद्यालय, मंगलपुर, बगहा-2

05- लौरिया- एम.जे.के. कॉलेज, बेतिया

06- नौतन- एम.जे.के. कॉलेज, बेतिया

07- चनपटिया- एम.जे. के. कॉलेज, बेतिया

08- बेतिया- एम.जे.के. कॉलेज, बेतिया

09-सिकटा- कृषि बाजार समिति, नरकटियागंज

मतदान दलों/सेक्टर पदाधिकारियों द्वारा जिन वाहनों के माध्यम से ई०वी० एम० एवं वी०वी०पैट का परिवहन किया जा रहा है, उनके वाहनों में लगाए गए GPS उपकरण अथवा Ele Traces मोबाइल ऐप के माध्यम से उनके मूवमेंट ट्रैकिंग की व्यवस्था की गयी है.मतदान के उपरांत उक्त ई०वी० एम० में से मतदान में उपयोग किये गये मशीनों को जिले के Polled EVM Strong Room में भंडारित किया जाएगा. साथ ही जो मशीनें खराब पायी जाएगी उन्हें Polled EVM Strong Room से अलग स्थित चिन्हित वेयर हाउस में भंडारित किया जाएगा.

रविवार, 9 नवंबर 2025

धन्य माता एलिस्वा वाकायिल: भारतीय नारी शक्ति और समर्पण का अमर प्रतीक

 

धन्य माता एलिस्वा वाकायिल: भारतीय नारी शक्ति और समर्पण का अमर प्रतीक

कोच्चि.कोच्चि के वल्लारपदम महागिरजाघर में आयोजित ऐतिहासिक समारोह में जब  पोप लियो XIV के विशेष प्रतिनिधि और मलेशिया के पेनांग के बिशप कार्डिनल सेबेस्टियन फ्रांसिस ने आधिकारिक तौर पर मदर एलिस्वा को धन्य घोषित किया. कार्डिनल ने पोप द्वारा जारी घोषणा पत्र लैटिन भाषा में पढ़ा. वेरापोली आर्चडायसिस के मेट्रोपॉलिटन जोसेफ कलाथिपरम्बिल ने अपने प्रार्थना-प्रार्थना में कहा, "मदर एलिस्वा का पवित्र, साहसी और अटूट विश्वास और प्रेम का जीवन अनेक लोगों के लिए प्रेरणादायक रहेगा.

              पेनांग के महाधर्माध्यक्ष कार्डिनल सेबेस्टियन फ्रांसिस ने ईशसेविका मदर एलिस्वा वाकायिल को “धन्य” घोषित किया, तो यह केवल कैथोलिक समुदाय के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के समग्र सामाजिक-शैक्षिक इतिहास के लिए भी एक गौरवपूर्ण क्षण बन गया। 1831 में जन्मी और 1913 में देह त्यागने वाली मदर एलिस्वा का जीवन सेवा, त्याग और महिला सशक्तिकरण की एक जीवंत मिसाल है।

               मदर एलिस्वा वाकायिल ने न केवल भारत में पहला आदिवासी धर्मबहनों का धर्मसमाज टीओसीडी (Teresian Carmelite Sisters of the Third Order Discalced) की स्थापना की, बल्कि केरल में लड़कियों के लिए पहला कॉन्वेंट स्कूल भी खोला — एक ऐसा कदम जिसने 19वीं सदी के केरल में शिक्षा की दिशा बदल दी। जब समाज में महिलाओं की शिक्षा को संकीर्ण दृष्टि से देखा जाता था, तब उन्होंने उस बंधन को तोड़ते हुए ज्ञान और आत्मनिर्भरता का दीप जलाया।

           उनकी पहल से शुरू हुआ यह आंदोलन आज भी “तेरेसियन कार्मेलाइट्स धर्मसमाज” के माध्यम से हजारों युवतियों के जीवन को दिशा दे रहा है। उनके दान और भक्तिमय जीवन की परिणति अब “धन्य” के रूप में हुई है — यह उस तप, समर्पण और करुणा का सम्मान है जो उन्होंने समाज के वंचितों के लिए दिखाया।

      इस ऐतिहासिक अवसर पर मुंबई आर्चडायसिस के एमेरिटस कार्डिनल ओसवाल्ड ग्रेसियस ने धन्य माता एलिस्वा की प्रतिमा का अनावरण किया और उनके अवशेषों को वेदी पर स्थापित किया गया। इस समारोह में भारतीय कैथोलिक बिशप सम्मेलन (CBCI) के अध्यक्ष मार एंड्रयूज थजाथ, केआरएलसीबीसी के अध्यक्ष आर्चडायसिस वर्गीज चक्कलकल और आर्चडायसिस जोसेफ कलाथिपरम्बिल सहित अनेक वरिष्ठ धर्मगुरुओं की उपस्थिति ने इस क्षण को ऐतिहासिक बना दिया।

      एलिस्वा के जीवन का हर अध्याय प्रेरणा देता है। 20 वर्ष की आयु में पति की असामयिक मृत्यु के बाद उन्होंने सांसारिक जीवन से विरक्त होकर प्रार्थना और सेवा को अपना जीवन-मार्ग बनाया। उन्होंने न केवल शिक्षा, बल्कि करुणा और समानता के मूल्य को समाज में स्थापित किया।

ईसाई परंपरा में संत घोषित किए जाने की प्रक्रिया चार चरणों से गुजरती है – ईश्वर की सेविका, आदरणीय, धन्य और अंततः संत। 2008 में उन्हें “ईश्वर की सेविका” घोषित किया गया, 2023 में “आदरणीय” और अब 2025 में “धन्य” का सम्मान प्राप्त हुआ है। अब यदि उनकी मध्यस्थता से एक और सत्यापित चमत्कार सिद्ध होता है, तो वह केरल की पांचवीं संत घोषित की जाएगी — एक ऐसी मील का पत्थर जो भारतीय नारी शक्ति की आध्यात्मिक ऊंचाई को विश्व के पटल पर और दृढ़ करेगा।

केरल में अब तक चार संत घोषित हो चुके हैं — सिस्टर अल्फोंसा, फादर कुरियाकोस चावरा, सिस्टर यूफ्रेसिया और मरियम थ्रेसिया। इस सूची में एलिस्वा वाकायिल का नाम जोड़ना, राज्य की धार्मिक विरासत और भारत की आध्यात्मिक चेतना दोनों के लिए सम्मान की बात है।

धन्य माता एलिस्वा वाकायिल का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्चा धर्म केवल प्रार्थना में नहीं, बल्कि सेवा, शिक्षा और समानता के प्रसार में निहित है। उनकी विरासत आज भी यह सिखाती है — “जहाँ प्रेम और सेवा है, वहीं ईश्वर का वास है।”

आलोक कुमार


शनिवार, 8 नवंबर 2025

भारतीय क्रिकेट का भविष्य अब नए और दृढ़ खिलाड़ियों के हाथों में

 ध्रुव जुरेल — भारतीय क्रिकेट का नया भरोसा

पटना.भारत ‘ए’ और दक्षिण अफ्रीका ‘ए’ के बीच जारी अनौपचारिक टेस्ट ने भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को मिश्रित भावनाओं का अनुभव कराया. जहां एक ओर ध्रुव जुरेल के बल्ले से लगातार दो शतक निकलने ने उम्मीदों को नई उड़ान दी, वहीं अभिमन्यु ईश्वरन का दोनों पारियों में शून्य पर आउट होना निराशाजनक रहा. मगर इस मुकाबले ने एक बात साफ कर दी — भारतीय क्रिकेट का भविष्य अब नए और दृढ़ खिलाड़ियों के हाथों में है, और उस सूची में सबसे ऊपर नाम है ध्रुव जुरेल का.   ध्रुव जुरेल का यह प्रदर्शन किसी संयोग का परिणाम नहीं है.यह एक युवा क्रिकेटर के धैर्य, अनुशासन और निरंतर परिश्रम का प्रमाण है.उन्होंने पहली पारी में नाबाद 132 रन और दूसरी पारी में नाबाद 127 रन बनाकर न सिर्फ मैच को भारत ‘ए’ के पक्ष में मोड़ा, बल्कि यह भी साबित किया कि वह लंबे प्रारूप के लिए बने हैं. नमन ओझा के बाद वह भारत ‘ए’ के लिए दोनों पारियों में शतक जमाने वाले सिर्फ दूसरे खिलाड़ी बने हैं — यह उपलब्धि अपने आप में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है.

    साल 2001 में आगरा में जन्मे इस युवा विकेटकीपर-बल्लेबाज ने अंडर-19 वर्ल्ड कप 2020 में उप-कप्तान के रूप में अपनी नेतृत्व क्षमता दिखाई थी. घरेलू क्रिकेट में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने जल्द ही खुद को एक भरोसेमंद खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया.2022 में रणजी ट्रॉफी डेब्यू और नागालैंड के खिलाफ 249 रनों की पारी उनके प्रतिभा के शुरुआती संकेत थे.आज, उनके नाम 30 प्रथम श्रेणी मैचों में 51 से अधिक के औसत से लगभग 1,900 रन दर्ज हैं — एक शानदार उपलब्धि.

     इंडियन प्रीमियर लीग में राजस्थान रॉयल्स के लिए खेलते हुए भी उन्होंने सीमित ओवरों के खेल में अपनी उपयोगिता सिद्ध की. 2023 में आईपीएल डेब्यू के साथ ही 172.73 के स्ट्राइक रेट ने उन्हें चर्चा में ला दिया. इसके बाद 2024 में टेस्ट डेब्यू करते हुए इंग्लैंड के खिलाफ राजकोट और रांची में शानदार पारियां खेलीं. रांची टेस्ट में 90 और 39 रनों की पारी ने भारत को जीत दिलाई और उन्हें प्लेयर ऑफ द मैच का सम्मान भी मिला.जुरेल की बल्लेबाजी में सबसे उल्लेखनीय पहलू है उनकी परिस्थिति को समझने की परिपक्वता। वह न तो जल्दबाजी करते हैं और न ही रक्षात्मक रवैया अपनाते हैं — बल्कि ज़रूरत के अनुसार खेल की गति तय करते हैं.

     यह गुण उन्हें आने वाले समय में भारतीय टेस्ट टीम का स्थायी हिस्सा बना सकता है.आज जब भारतीय क्रिकेट टीम में बदलाव की नई लहर चल रही है, ध्रुव जुरेल जैसे खिलाड़ी ही उस स्थिरता और संतुलन के प्रतीक बन सकते हैं, जिसकी टेस्ट टीम को आवश्यकता है. उनकी ताज़ा उपलब्धि सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत के पास ऋषभ पंत के बाद भी विकेटकीपिंग विभाग में भविष्य सुरक्षित है.ध्रुव जुरेल की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता — निरंतरता ही असली पूंजी है.आगरा से शुरू हुई यह यात्रा अब भारतीय क्रिकेट के भविष्य की रेखाओं को आकार दे रही है। और शायद यही वह क्षण है जब हम निश्चिंत होकर कह सकते हैं — भारतीय टेस्ट क्रिकेट को उसका अगला ध्रुव मिल गया है.


आलोक कुमार


<span style="background-color: #e9eef6; color: #1f1f1f; font-family: &quot;Google Sans&quot;, Roboto, Arial, sans-serif; font-size: 14px;">&gt;AdSense&lt;https://chingariprimenews.blogspot.com/&lt;</span>




<span style="background-color: #e9eef6; color: #1f1f1f; font-family: &quot;Google Sans&quot;, Roboto, Arial, sans-serif; font-size: 14px;">&gt;AdSense&lt;https://chingariprimenews.blogspot.com/&lt;</span>


शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

इतिहास का वह स्वर्ण क्षण

 

पटना.वर्ष 2025 भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज होने जा रहा है. यह वह वर्ष है जब भारत का राष्ट्रगीत “वंदे मातरम” अपनी 150वीं वर्षगांठ मना रहा है — एक ऐसा गीत जिसने न केवल भारत की स्वतंत्रता की ललकार दी, बल्कि देशभक्ति की भावना को भी अमर बना दिया.बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत आज भी भारत की आत्मा में उसी तीव्रता से गूंजता है, जैसे आजादी के रण में गूंजा था.

इतिहास का वह स्वर्ण क्षण

अक्षय नवमी, 7 नवंबर 1875 — बंगाल के साहित्यिक आकाश पर यह दिन सदा-सदा के लिए अमर हो गया. इसी दिन बंकिम चंद्र चटर्जी ने “वंदे मातरम” की रचना की. यह गीत पहली बार उनकी साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ और बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना.इस उपन्यास के माध्यम से बंकिम चंद्र ने भारत माता की आराधना को राष्ट्रवाद की भावना से जोड़ा, जिससे यह गीत मात्र शब्द न रहकर क्रांति का प्रतीक बन गया.

“वंदे मातरम” शब्दों का शाब्दिक अर्थ है — “मैं मातृभूमि को नमन करता हूँ”.

संस्कृत का “वंदे” यानी नमन करना और “मातरम” यानी माता.यह मातृभूमि के प्रति भक्ति, सम्मान और समर्पण का ऐसा गीत है जिसने हर भारतीय को अपनी मिट्टी से जोड़ दिया.

पहली सार्वजनिक गूंज

1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार “वंदे मातरम” सार्वजनिक रूप से गाया गया.65 सेकंड (1 मिनट 5 सेकंड) के इस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों के दिलों में जोश भर दिया. यह केवल गीत नहीं, बल्कि एक नारा बन गया — “वंदे मातरम” की गूंज सुनते ही स्वतंत्रता सेनानियों की नसों में रक्त नहीं, बिजली दौड़ जाती थी.

2025: 150 वर्षों का गौरव

अब, जब इसकी रचना के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं, पूरा देश “वंदे मातरम स्मरणोत्सव” मना रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्षव्यापी कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि “यह गीत भारत की आत्मा का स्वर है, जो हर पीढ़ी को राष्ट्र सेवा की प्रेरणा देता रहेगा.”इस अवसर पर सरकार ने एक विशेष डाक टिकट जारी किया है.देशभर के स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों में सामूहिक गायन, विचार गोष्ठियों और प्रदर्शनी कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है.

गीत का भावार्थ और सांस्कृतिक अर्थ

“वंदे मातरम” की हर पंक्ति भारत के प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक गौरव और आध्यात्मिक एकता का बखान करती है—

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,

शस्यश्यामलां मातरम्.

यह भारत माता की उस धरती का वर्णन है जो जल से समृद्ध है, अन्न से परिपूर्ण है, और जिसकी हवाएँ शीतल मलय बयार सी हैं.बंकिम चंद्र ने भारत को एक जीवंत देवी स्वरूपा के रूप में चित्रित किया — जो करुणा, शक्ति और सौंदर्य की मूर्ति है.

स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणास्रोत

ब्रिटिश शासन के समय “वंदे मातरम” ने देशभक्ति की ऐसी लहर जगाई कि इसे क्रांतिकारियों का युद्ध नाद कहा जाने लगा.लाठी, गोली और जेल के बीच भी “वंदे मातरम” की आवाज दबाई नहीं जा सकी। इसे गाने मात्र से हजारों युवाओं ने आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए.

आज के भारत में ‘वंदे मातरम’ का अर्थ

आज जब भारत विश्व मंच पर अपनी पहचान नए आत्मविश्वास के साथ बना रहा है, “वंदे मातरम” हमें याद दिलाता है कि यह मिट्टी केवल भूगोल नहीं, बल्कि आस्था और पहचान का प्रतीक है.स्कूलों की असेंबली में, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोहों में, या खेल के मैदानों में जब यह गीत गूंजता है — तो हर भारतीय की रगों में गर्व की लहर दौड़ जाती है.

समान विचार

150 वर्षों के बाद भी “वंदे मातरम” उतना ही जीवंत, उतना ही प्रभावशाली है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि सच्ची देशभक्ति नारे में नहीं, बल्कि मातृभूमि की सेवा में है.“वंदे मातरम” केवल एक राष्ट्रगान नहीं, यह भारत की आत्मा का अनंत स्वर है — जो हमें बार-बार झुकने, नमन करने और अपनी मिट्टी को प्रणाम करने की प्रेरणा देता है. वंदे मातरम — यह भारत का शाश्वत प्रणाम है.

आलोक कुमार


https://adsense.google.com/adsense/u/0/pub-4394035046473735/myads/sites/preview?url=chingariprimenews.blogspot.com

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

पहले फेज में कुल 1,314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई


 पटना.बिहार विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण में कुल 18 जिलों की 121 विधानसभा सीटों पर 6 नवंबर को वोट डाले गए. बिहार विधानसभा चुनाव के पहले फेज में कुल 1,314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई. पहले चरण में 121 सीटों पर 64.66 फीसदी मतदान दर्ज किया गया.

       राजधानी पटना (14 सीटें), भोजपुर (7 सीटें), बक्सर (4 सीटें) , गोपालगंज (6 सीटें) ,सिवान (8 सीटें) ,सारण (10 सीटें) ,मुजफ्फरपुर (11 सीटें) ,वैशाली (8 सीटें) ,दरभंगा (10 सीटें) ,समस्तीपुर (10 सीटें) ,मधेपुरा (4 सीटें) ,सहरसा (4 सीटें) ,खगड़िया (4 सीटें) ,बेगूसराय (7 सीटें) ,मुंगेर (3 सीटें) ,लखीसराय (2 सीटें) ,शेखपुरा (2 सीटें) और नालंदा (7 सीटें) पर शांतिपूर्ण मतदान हुआ.

  यहां के विधानभा में चुनाव आलमनगर, बिहारीगंज, सिंघेश्वर, मधेपुरा, सोनबरसा, सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महिशी, कुशेश्वर स्थान, गौड़ाबौराम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, दरभंगा, हायाघाट, बहादुरपुर, केवटी, जाले, गायघाट , औराई, मीनापुर, बोचहां, सकरा, कुढ़नी, मुजफ्फरपुर, कांटी, बरुराज, पारू, साहेबगंज, बैकुंठपुर, बरौली, गोपालगंज, कुचायकोट, भोरे, हथुआ, सिवान, जीरादेई, दरौली, रघुनाथपुर, दरौंदा, बड़हरिया, गोरेयाकोठी, महाराजगंज, एकमा, मांझी, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, गरखा, अमनौर, परसा, सोनपुर, हाजीपुर, लालगंज, वैशाली, महुआ, राजा पाकार, राघोपुर, महनार, पातेपुर, कल्याणपुर, वारिसनगर, समस्तीपुर, उजियारपुर, मोरवा, सरायरंजन, मोहिउद्दीननगर, विभूतिपुर, रोसड़ा, हसनपुर, चेरिया बरियारपुर, बछवाड़ा, तेघड़ा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय, बखरी, अलौली, खगड़िया, बेलदौर,परबत्ता, तारापुर, मुंगेर, जमालपुर, सूर्यगढ़ा, लखीसराय, शेखपुरा, बरबीघा, अस्थावां, बिहार शरीफ, राजगीर, इस्लामपुर, हिलसा, नालंदा, हरनौत, मोकामा, बाढ़, बख्तियारपुर, दीघा, बांकीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब, फतुहा, दानापुर, मनेर, फुलवारी, मसौढ़ी, पालीगंज, बिक्रम, संदेश, बड़हरा, आरा, अगिआंव, तरारी, जगदीशपुर, शाहपुर, ब्रह्मपुर, बक्सर, डुमरांव और राजपुर.हुआ.

  पटना जिला (औसतन 55.02 फीसदी वोटिंग).मोकामा-62.16%, बाढ़-59.56%, बख्तियारपुर-62.55%, दीघा-39.10%,बांकीपुर-40.00%,कुम्हरार-39.52%.,साहिब-58.51%,फतुहा-59.32%,दानापुर-55.27%,मनेर-58.12%, फुलवारीशरीफ-62.14%,मसौढ़ी-59.91%, पालीगंज-63.20% और बिक्रम-66.95% मतदान दर्ज किया गया.

  जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह-जिलाधिकारी, पटना एवं वरीय पुलिस अधीक्षक, पटना द्वारा बिहार विधान सभा आम निर्वाचन, 2025 के आलोक में 6 नवम्बर को मतदान की समाप्ति के पश्चात प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को संबोधित किया गया.मतदान की पूर्णतः शांतिपूर्ण समाप्ति एवं विगत चुनावों की तुलना में मतदान प्रतिशत में अच्छी वृद्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए पटना जिला के सभी निर्वाचकों-निवासियों, अधिकारियों, मीडिया बंधुओं, सिविल सोसाइटी के सदस्यों सहित सभी स्टेकहोल्डर्स के प्रति आभार व्यक्त किया गया.


आलोक कुमार


<p>&nbsp;<a href="https://support.google.com/adsense/answer/9274516" rel="noopener" style="background-color: white; color: #0b57d0; font-family: &quot;Google Sans Text&quot;, Roboto, &quot;Helvetica Neue&quot;, Helvetica, sans-serif, &quot;Noto Color Emoji&quot;; font-size: 16px; letter-spacing: 0.08px; text-decoration-line: none;">&nbsp;AdSense ad code</a></p>

The Configure Featured Post option in Blogger allows you to highlight a selected post prominently on

How to Configure Popular Posts in Blogger The Popular Posts widget highlights your most viewed post