डॉ. एस. एन. सुब्बा राव (भाई जी)
पटना.एक युगद्रष्टा समाजसेवी और युवा प्रेरक भारतीय समाज ने अनेक संत, समाज सुधारक और राष्ट्रसेवक देखे हैं, लेकिन डॉ. एस. एन. सुब्बा राव, जिन्हें देश “भाई जी” के नाम से जानता है, उनमें से सबसे विलक्षण रहे.उनका जीवन सेवा, साहस और समर्पण का जीवंत उदाहरण है. 7 फरवरी 1929 को कर्नाटक के सेलम (बैंगलोर के निकट) में जन्मे भाई जी आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी 96वीं जयंती हमें उनके कार्यों और विचारों को पुनः याद करने का अवसर देती है.
चंबल के डाकुओं को अहिंसा के मार्ग पर
सत्तर का दशक. चंबल घाटी डाकुओं के आतंक से कांप रही थी. खून-खराबा, लूटपाट और भय उस इलाके की पहचान बन चुके थे. ऐसे समय में भाई जी ने गांधीवादी तरीके से संवाद, धैर्य और मानवता का सहारा लिया. उन्होंने डाकुओं को न केवल आत्मसमर्पण के लिए तैयार किया, बल्कि उन्हें खेती-किसानी, कुटीर उद्योग और अहिंसक जीवन का प्रशिक्षण देकर मुख्यधारा में वापस लाए. चंबल का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि एक व्यक्ति की करुणा और दृढ़ता समाज की दिशा बदल सकती है.
युवाओं के लिए “भाई जी”
भाई जी का विश्वास था कि राष्ट्र की असली ताकत उसकी युवा पीढ़ी है.उन्होंने राष्ट्रीय सेवा योजना की भावना को आगे बढ़ाते हुए “राष्ट्रीय युवा योजना” की स्थापना की. यह योजना युवाओं के लिए केवल कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि जीवन का संदेश थी – “युवा ही राष्ट्र की धड़कन हैं, उन्हें सही दिशा मिले तो देश बदल सकता है.
”उनकी अपील सरल लेकिन गहरी थी –
एक घंटा देश को और एक घंटा देह को ”
युवाओं से अपेक्षा थी कि वे प्रतिदिन अपने देश की सेवा में एक घंटा दें और अपने स्वास्थ्य के लिए भी एक घंटा निकालें। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था.
सद्भावना की रेल यात्रा
भाई जी ने केवल युवाओं को संगठित नहीं किया, बल्कि उन्हें देशव्यापी आंदोलन का हिस्सा बनाया.1990 के दशक की सद्भावना रेल यात्रा इसका उदाहरण है. यह तीन चरणों में पूरे देश से होकर गुज़री और जहाँ-जहाँ पहुँची, वहाँ सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं और रैलियों के जरिए सामाजिक एकता का संदेश दिया.धर्म, जाति और भाषा के भेदभाव को मिटाकर भाईचारे की भावना जगाने में उनका योगदान अद्वितीय रहा.
राहत और पुनर्वास में सदैव अग्रणी
प्राकृतिक आपदाओं या दंगों से पीड़ित इलाकों में भाई जी और उनके युवा स्वयंसेवक सबसे पहले पहुँचते थे। चाहे बाढ़ हो, चक्रवात, भूकंप या दंगे – वे तुरंत राहत शिविर लगवाते और मानवता की सेवा में जुट जाते। यही कारण था कि वे केवल समाजसेवी नहीं, बल्कि युवा शक्ति के मार्गदर्शक माने गए.
संवाद और संगीत की ताकत
भाई जी की सबसे बड़ी शक्ति का संवाद था. वे देश की लगभग हर प्रमुख भाषा में संवाद कर सकते थे.उनकी मधुर आवाज़ में गाए गए भजन और सामूहिक गीत लोगों को झकझोर देते थे. बच्चे उन्हें “फुग्गावाले दादा जी” कहते थे क्योंकि वे हमेशा जेब में गुब्बारे रखते और मासूम चेहरों पर मुस्कान बिखेर देते. युवाओं के लिए वे “भाई जी” और चंबल के आत्मसमर्पित बागियों के लिए “सुब्बाराम” बन गए.
आज की प्रासंगिकता
आज का युवा बेरोजगारी, नशाखोरी, और आडंबर की दुनिया में उलझा है। ऐसे समय में भाई जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि सही दिशा, सेवा भाव और दृढ़ संकल्प से ही युवाओं की ऊर्जा राष्ट्र निर्माण में लगाई जा सकती है। उन्होंने दिखाया कि जब युवा अपने भीतर की शक्ति को पहचानता है, तो समाज की सबसे बड़ी समस्या भी हल हो सकती हैं.
निष्कर्ष
भाई जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि “सेवा ही सच्ची साधना है.” उनकी 96वीं जयंती पर यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारे, समाज सेवा के प्रति अपने संकल्प को मजबूत करें और राष्ट्र की एकता-अखंडता के लिए काम करें.
* भाई जी ने अपने जीवन से यह सिद्ध कर दिया कि दृढ़ संकल्प से असंभव संभव है.
* अहिंसा केवल विचार नहीं, बल्कि बदलाव की सबसे बड़ी ताकत है.
* और युवा शक्ति ही भारत की सबसे बड़ी पूंजी है.
डॉ. एस. एन. सुब्बा राव – एक नाम नहीं, बल्कि सेवा और प्रेरणा की जीवित विरासत हैं.
आलोक कुमार
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