सोमवार, 8 सितंबर 2025

धन्य कुँवारी मरियम के जन्मोत्सव

 


माता मरियम का जन्मोत्सव: विश्वास, भक्ति और आनंद का पर्व मरियम का जन्म: मुक्ति की शुरुआत

बेतिया.आज 8 सितंबर है—वह दिन जब कैथोलिक कलीसिया धन्य कुँवारी मरियम के जन्मोत्सव को पूरे आदर और श्रद्धा के साथ मनाती है. यह दिन केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि विश्वास और आस्था का जीवंत प्रतीक है. इसे “Nativity of Mary” अथवा मरियम का अवतरण दिवस भी कहा जाता है.यह अवसर हमें यह याद दिलाता है कि मुक्ति की योजना में माता मरियम की भूमिका कितनी अद्वितीय और अपरिहार्य है.

बेतिया: आस्था का आध्यात्मिक केंद्र

पश्चिमी चंपारण का मुख्यालय बेतिया ईसाई समाज का एक सशक्त गढ़ माना जाता है.यहां स्थित नैटिविटी ऑफ द ब्लेस्ड वर्जिन मेरी चर्च इस पर्व का केंद्र है. दूर-दराज़, यहाँ तक कि विदेशों में बस चुके विश्वासी भी इस चर्च से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं.इस दिन पल्ली दिवस के रूप में विशेष समारोह आयोजित होता है.

बच्चों का प्रथम परमप्रसाद 

मासूमियत और विश्वास का संगम इस पर्व की विशेषता है बच्चों का प्रथम परम प्रसाद ग्रहण करना.छोटे-छोटे बच्चे सफेद वस्त्र धारण कर altar तक आते हैं. बिशप या पुरोहित उन्हें ख्रीस्त का शरीर और रक्त अर्पित करते हैं. बच्चे पूरे विश्वास के साथ ‘आमेन’ कहकर प्रभु येसु को अपने जीवन में स्वीकार करते हैं. इस पवित्र क्षण में गीत मंडली गाती है—“येसु मेरे दिल में आया”—और पूरा वातावरण भक्ति और आनंद से गूंज उठता है.

श्रद्धा और परंपरा का उत्सव

यह पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहता.कई समुदाय अपने घरों और चर्चों को सजाते हैं.परंपरा के अनुसार ब्लूबेरी वाले व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जो मरियम के नीले वस्त्र का प्रतीक हैं. यह प्रतीक हमें यह याद दिलाता है कि मरियम विनम्रता, पवित्रता और मातृत्व की छाया में सबको अपने आंचल में समेट लेती हैं.

विश्वासियों की भावनाएं: प्रार्थना और आशीर्वाद

स्वाति श्वेता की आवाज़ इस अवसर की गहराई को छूती है—“हम माता मरियम का जन्मदिन श्रद्धापूर्वक मनाते हैं. इस दिन हमारे परिवार के छोटे बच्चे पवित्र यूखरिस्ट के द्वारा प्रभु येसु को अपने जीवन में स्वीकार करते हैं.यह दिन हमारे लिए सुनहरा स्मरण है, क्योंकि बचपन में हमने भी इसी दिन प्रभु को स्वीकार किया था. मैं प्रार्थना करती हूँ कि माता मरियम अपनी साड़ियों की छाया में हमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आशीष देती रहें.”एलेक्स लाजरस की कामना भी दिलों में गूंजती है—“यह दिन प्रेम, शांति और आनंद से भरा हो, जैसे माता मरियम ने अपने पुत्र येसु के द्वारा दुनिया में लाया.

”निष्कर्ष: मरियम—हमारी माता, हमारी संरक्षिका                                                                                        मरियम का जन्मोत्सव केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक निमंत्रण है—विश्वास में जीने का, शांति और प्रेम को साझा करने का, और उस मातृत्वमयी करुणा को अपनाने का, जो मरियम के माध्यम से संपूर्ण मानवता तक पहुँचती है.आज का दिन हमें यह याद दिलाता है कि मरियम केवल ईश्वर की माता नहीं, बल्कि हमारी भी माता हैं—जो हमारी प्रार्थनाओं को येसु तक पहुँचाती हैं और हमें हमेशा अपनी छत्रछाया में सुरक्षित रखती हैं.

आलोक कुमार



रविवार, 7 सितंबर 2025

धन्य कार्लो एक्यूटिस को संत घोषित

 

नई दिल्ली.ईश्वर की अद्भुत लीला है जब 15 वर्षीय भाई ने संत घोषणा में पढ़ा पहला पाठ. वेटिकन सिटी का सेंट पीटर स्क्वायर हमेशा से ईसाई धर्म की आस्था और आध्यात्मिकता का ध्रुव रहा है.वही चौक, जो सदियों से संत घोषणाओं, पापाओं के आशीर्वाद और विश्व-भर से आए श्रद्धालुओं की प्रार्थनाओं का साक्षी है, 2025 की इस ऐतिहासिक घड़ी में एक और भावुक अध्याय का हिस्सा बना.

     धन्य कार्लो एक्यूटिस को संत घोषित करने की इस विशेष रस्म में जब उनके छोटे भाई मिशेल एक्यूटिस ने सुसमाचार का पहला पाठ पढ़ा, तो मानो पूरा माहौल ईश्वरीय करुणा से भर उठा. यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि समय, जीवन और मृत्यु को जोड़ने वाली ईश्वर की गहनतम योजना का प्रत्यक्ष दर्शन था.

एक भाई, जिससे कभी मुलाकात नहीं हुई

कार्लो एक्यूटिस का जन्म 1991 में हुआ और उन्होंने 2006 में मात्र 15 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन त्याग दिया.मृत्यु के मात्र चार वर्ष बाद, 2010 में उनके छोटे भाई-बहन मिशेल और फ्रांसेस्का का जन्म हुआ.विडंबना यह रही कि मिशेल ने अपने बड़े भाई को कभी देखा तक नहीं, लेकिन नियति ने उसे ऐसा अवसर दिया, जिससे वह अपने भाई की संत घोषणा का सहभागी बना.

 आज जब मिशेल स्वयं 15 वर्ष का है—

उसकी आयु में जिस उम्र में उसका भाई स्वर्ग चला गया था—तो यह पल और भी रहस्यमय और मार्मिक हो गया.एक भाई जिसने अपने बड़े भाई को कभी जाना नहीं, वही भाई आज पूरे विश्व के सामने खड़ा होकर उसके नाम से जुड़े सुसमाचार का पाठ पढ़ रहा था.यह दृश्य श्रद्धालुओं की आँखें नम कर गया.

संतत्व की गवाही और ईश्वर का तोहफ़ा

संत घोषित किया जाना केवल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आध्यात्मिकता की पहचान नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत है.कार्लो एक्यूटिस, जिसने इंटरनेट और आधुनिक तकनीक को सुसमाचार प्रचार का साधन बनाया, आज डिजिटल युग के युवाओं के लिए आदर्श बन चुका है.

    परंतु सबसे गहरा संदेश इस समारोह में मिशेल की उपस्थिति ने दिया—संत कार्लो का जीवन केवल अतीत की स्मृति नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य में भी जीवित है.यह मानो ईश्वर का तोहफ़ा था, जिसने परिवार को दो पीढ़ियों के बीच एक अद्भुत सेतु में बदल दिया.

भावनाओं से भरा एक क्षण

जब मिशेल ने गहन भाव से पहला पाठ पढ़ा, तो वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुओं के हृदय में यह बात गूँज उठी कि संतत्व की राह केवल ईश्वर की कृपा से ही प्रशस्त होती है.एक 15 वर्षीय किशोर के मुख से निकले वे शब्द उस भाई की पवित्र स्मृति को साकार कर रहे थे, जिसने 15 की ही उम्र में अपने जीवन को ईश्वर को समर्पित कर दिया.

यह दृश्य केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक गवाही था—कि संतों का जीवन समय और मृत्यु से परे होता है.कार्लो एक्यूटिस आज संत बन गए, पर उनकी आत्मा, उनकी गवाही और उनका प्रेम उसी क्षण में सजीव हो उठा जब उनका छोटा भाई, उसी उम्र में खड़ा होकर, सुसमाचार पढ़ रहा था.

यह क्षण निश्चय ही ईश्वरीय योजना का दिव्य चमत्कार था—जो आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि ईश्वर का प्रेम और संतों की गवाही कभी समाप्त नहीं होती, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी और भी गहरी होती जाती है.


आलोक कुमार

शनिवार, 6 सितंबर 2025

सीपीआई (एमएल) लिबरेशन का चुनावी संदेश

 सीपीआई (एमएल) लिबरेशन का चुनावी संदेश


नई दिल्ली .बिहार से अखिल भारतीय राजनीति तकसीपीआई (एमएल) लिबरेशन महासचिव कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य ने शनिवार, 6 सितंबर 2025 को नई दिल्ली स्थित पार्टी संसदीय कार्यालय, 25 मीनाबाग में लोकतांत्रिक वाम बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं से बिहार चुनाव की दिशा पर संवाद किया.

      इस विचार-विमर्श में कई महत्वपूर्ण बिंदु उभरे—एसआईआर विरोधी आंदोलन की रिपोर्ट और उससे जुड़े जनप्रतिरोध का साझा आकलन.आगामी चुनाव में प्रमुख मुद्दों का परखना.बिहार चुनाव के दीर्घकालिक और अखिल भारतीय महत्व पर विमर्श.इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे, सामाजिक–राजनीतिक ध्रुवीकरण और रणनीतिक सहयोग पर सलाह-मशविरा.दीपंकर भट्टाचार्य ने साफ संकेत दिया कि इंडिया गठबंधन में सीटों का बंटवारा एनडीए की तुलना में कहीं अधिक सहज और सहयोगपूर्ण तरीके से संभव होगा. 

     माले इस बार पिछली 19 सीटों के मुकाबले लगभग 30 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है.राजनीतिक विश्लेषण यह कह रहा है कि इस बार फ्लोटिंग वोटरों की संख्या भले कम हो, लेकिन निर्णायक होगी. अधिकांश बड़े सामाजिक समुदायों का झुकाव स्थिर दिख रहा है, किंतु सबसे कठिन और निर्णायक जंग अति पिछड़ा उप-समुदायों के वोटों पर केंद्रित रहने वाली है.

                 सीपीआई (एमएल) की ऐतिहासिक और सामाजिक जड़ें दलितों व अति पिछड़े तबकों में गहराई से जुड़ी रही हैं। लिहाजा, अगर गठबंधन में माले की सीटों में वृद्धि होती है तो यह न केवल पार्टी के लिए बल्कि इंडिया गठबंधन के व्यापक प्रदर्शन के लिए भी शुभ संकेत होगा।क्या आप चाहेंगे कि मैं इसे थोड़ा और धारदार शीर्षकों और उपशीर्षकों के साथ संपादकीय कॉलम जैसा बना दूँ?


आलोक कुमार)

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

डा0 राधाकृष्णन के चित्र पर माल्यार्पण

 पटना .आज प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में पूर्व राष्ट्रपति डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन की 137वीं जयंती शिक्षक दिवस के रूप में मनाई गई .कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार प्रदेश कांग्रेस  कमेटी के अध्यक्ष राजेश राम   ने की.

इस अवसर पर डा0 राधाकृष्णन के चित्र पर माल्यार्पण करते हुए प्रदेश कांग्रेस  कमेटी के अध्यक्ष राजेश राम   ने कहा कि डॉ. राधाकृष्णन केवल एक विद्वान ही नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से समाज और राष्ट्र को नई दिशा देने वाले ,महापुरुष थे.उन्होंने अपने जीवन को शिक्षा, दर्शन और मानवता के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया. भारत में शिक्षक दिवस मनाना, उनके योगदान और आदर्शों के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक है.

       श्री राम ने कहा कि आज की पीढ़ी को डॉ. राधाकृष्णन के विचारों से प्रेरणा लेकर ज्ञान, नैतिकता और राष्ट्रभक्ति के पथ पर चलना चाहिए। शिक्षा केवल रोजगार का माध्यम न होकर, समाज को संस्कारित और राष्ट्र को सश
क्त बनाने का आधार होना चाहिए – यही डॉ. राधाकृष्णन का संदेश था.

     इस अवसर पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने सभी शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और समान अवसर उपलब्ध कराने के अपने वादे पर हमेशा प्रतिबद्ध है.भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही शिक्षक का समाज में बड़ा स्थान रहा है. शिक्षक राष्ट्र के निर्माता हैं तथा उनका सम्मान हमेशा होना चाहिए.इस अवसर पर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष डा0 मदन मोहन झा, पूर्व मंत्री कृपानाथ पाठक, पूर्व विधान पार्षद प्रेमचन्द्र मिश्रा,इजहारूल हुसैन, राजेश राठौड़,  ब्रजेश प्रसाद मुनन, जमाल अहमद भल्लू, कपिलदेव प्रसाद यादव, अजय  चौधरी  , डा0 अम्बुज किशोर झा, नागेन्द्र कुमार विकल, ज्ञान रंजन, राजीव मेहता, सुनीता देवी, शकीलुर रहमान शशि रंजन सत्येन्द्र कुमार सिंह, वैद्यनाथ शर्मा, संतोष श्रीवास्तव, शशिकांत तिवारी अश्विनी कुमार, अरविन्द लाल रजक, सुधा मिश्रा,प्रदुम्न यादव,मृणाल अनामय, चन्द्र भूषण, रवि गोल्डन, अखिलेश्वर सिंह , सुनील कुमार सिंह, संजय कुमार श्रीवास्तव, साधना रजक, यशवन्त कुमार चमन, रंजीत यादव, राजेन्द्र  चौधरी  , प्रमोद राय, निखिल कुमार,गुरूजीत सिंह, एवं अन्य कांग्रेसजनों ने भी डा0 राधाकृष्णन के चित्र पर माल्यापर्ण किया.


आलोक कुमार

   

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

पूर्व उप-राष्‍ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को अपना आधिकारिक बंगला खाली कर दिया

 

नई दिल्ली.पूर्व उप-राष्‍ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को अपना आधिकारिक बंगला खाली कर दिया. धनखड़ ने जुलाई में अपने पद से इस्‍तीफा दिया था. कुछ दिन पहले धनखड़ उस समय कई दिनों तक गायब रहने के बाद फिर खबरों में आए थे जब उन्‍होंने राजस्थान में पूर्व विधायक के तौर पर पेंशन के लिए आवेदन किया. धनखड़ की विधायक वाली पेंशन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.पूर्व उपराष्‍ट्रपति ने अपने कार्यकाल के दौरान विधायक से लेकर राज्‍यपाल तक रहे. अंत में वह उप-राष्‍ट्रपति के पद पर नियुक्‍त हुए. एक नजर डालिए कि बतौर पूर्व उप-राष्‍ट्रपति धनखड़ को कितनी पेंशन मिलेगी. साथ ही अब वह किन सुविधाओं के हकदार होंगे.

कितनी पेंशन के हकदार हैं धनखड़?
अधिकारियों के मुताबिक, धनखड़ तीन तरह की पेंशन के हकदार हैं—1. पूर्व उपराष्ट्रपति के तौर पर उन्‍हें करीब 2 लाख रुपये मासिक पेंशन, साथ ही टाइप-8 बंगला, एक निजी सचिव, अतिरिक्त निजी सचिव, निजी सहायक, चिकित्सक, नर्सिंग अधिकारी और चार निजी परिचारक की सुविधा.पूर्व सांसद के तौर पर 45,000 रुपये प्रतिमाह पेंशन और अन्य भत्ते. 3. पूर्व विधायक (राजस्थान) के तौर पर 42,000 रुपये प्रतिमाह पेंशन.  

नहीं मिलेगी यह एक सुविधा 
हालांकि, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहने के नाते उन्हें कोई पेंशन नहीं मिलेगी. लेकिन पूर्व राज्यपाल होने पर सचिव रखने के लिए 25,000 रुपये मासिक प्रतिपूर्ति का विकल्प उपलब्ध है. गौरतलब है कि पूर्व उपराष्ट्रपति के निधन की स्थिति में उनके जीवनसाथी को टाइप-7 श्रेणी का आवास उपलब्ध कराया जाता है. 

कितनी होगी विधायक की पेंशन 
राजस्थान में पूर्व विधायक की पेंशन एक कार्यकाल के लिए 35,000 रुपये प्रति माह से शुरू होती है तथा अतिरिक्त कार्यकाल और उम्र के साथ बढ़ती जाती है.  सत्तर वर्ष से अधिक आयु वालों को 20 प्रतिशत की वृद्धि का लाभ मिलता है. अधिकारियों के अनुसार, धनखड़ (74) पूर्व विधायक होने के नाते 42,000 रुपये प्रति माह के हकदार.



आलोक कुमार

बुधवार, 3 सितंबर 2025

प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष लहटन चौधरी की 22वीं पुण्यतिथि


पटना.  प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय, सदाकत आश्रम में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व0 दारोगा प्रसाद राय की 103वीं जयंती एवं प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष लहटन चौधरी की 22वीं पुण्यतिथि मनायी गयी. कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष राजेश राम  ने किया .इस अवसर पर राजेश राम  ने कहा कि दारोगा बाबू कांग्रेस के सम्मानित नेता थे और राज्य सरकार के लम्बे समय तक मंत्री एवं बाद में मुख्यमंत्री के रूप में राज्य में पिछड़ो दलितों एवं अल्पसंख्यक समुदाय के विकास के लिए कई योजनायें चलाई .


राजेश राम  ने कहा कि स्व0 लहटन चौधरी लम्बे समय तक राज्य सरकार में कृषि, राजस्व एवं स्वास्थ विभाग के मंत्री रहे.उन्होंने कहा कि वे जिस जिस विभाग के मंत्री रहे वहाँ उन्होंने अपनी गहरी छाप छोड़ी। लहटन चौधरी, प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे तथा सभी दायित्वों को उन्होंने ईमानदारी से निभाया.

इस अवसर पर श्रद्धाँजलि अर्पित करने वालों में कांग्रेस विधान मंडल दल के नेता डा0 शकील अहमद खान, विधान परिषद में कांग्रेस दल के नेता डा0 मदन मोहन झा, राष्ट्रीय सचिव सह बिहार प्रभारी सुशील पासी, पूनम पासवान, डा0 समीर कुमार सिंह, प्रेमचन्द्र मिश्रा, जितेन्द्र गुप्ता, कृपानाथ पाठक,, मोती लाल शर्मा,जमाल अहमद भल्लू, संजीव प्रसाद टोनी प्रतिमा कुमारी दास, इजहारूल हुसैन, अफाक आलम , अजय कुमार सिंह, संतोष मिश्रा, आनन्द शंकर, छत्रपति यादव, राजेश राठौड़, ब्रजेश प्रसाद मुनन, अजय चौधरी , अम्बुज किशोर झा, प्रवीण सिंह कुशवाहा, अमिता भूषण, आनन्द माधव, डा0 अजय कुमार सिंह, अनिल कुमार, उमेर खान, शशि रंजन, राजीव मेहता, मंजीत आनन्द साहू, असितनाथ तिवारी, ज्ञान रंजन, मुन्ना शाही, शिशिर कौंडिल्य, सत्येन्द्र कुमार सिंह, वैद्यनाथ शर्मा, गुंजन पटेल, कमलदेव नारायण शुक्ला, अशोक गगन, आशुतोष शर्मा, पंकज यादव,पूनम देवी, कमल कमलेश, मिन्नत रहमानी, शशि कुमार सिंह, सुनील कुमार सिंह,संतोष श्रीवास्तव,मो0 कामरान, सुदय शर्मा,शरीफ रंगरेज, वसी अख्तर, मृणाल अनामय, संजय पाण्डेय, कैसर खान, उमेश कुमार राम, रवि गोल्डन,रीता सिंह, मो0 शाहनवाज,विश्वनाथ बैठा, सहित अन्य कांग्रेसजन मौजूद थे.


आलोक कुमार

मंगलवार, 2 सितंबर 2025

अतीत की गहराइयों से — बेतिया से वर्तमान तक

                                                       अतीत की गहराइयों से — बेतिया से वर्तमान तक

बेतिया.भारत के इतिहास में ऐसे चरित्र कम ही मिलते हैं जिन्होंने अपनी आस्था, विद्वता और मानवता से किसी पूरे समुदाय की नियति बदल दी हो.फादर जोसेफ मैरी बर्निनी उन्हीं विरल हस्तियों में से एक थे। 1709 में लोम्बार्डी (गार्गनानो) में जन्मे बर्निनी ने बेतिया की भूमि पर न केवल मिशनरी कार्य किया, बल्कि एक ऐसा ईसाई समुदाय खड़ा किया जो आज भी जीवंत और सक्रिय है.

बेतिया राज के महाराजा धुरुप सिंह के साथ उनकी मित्रता और महारानी के स्वास्थ्य लाभ की चमत्कारिक घटना ने इस क्षेत्र में ईसाई मिशन की नींव रखी.1742 में पोप बेनेडिक्ट XIV से मिली अनुमति ने इसे वैधता दी और यही वह क्षण था जिसने उत्तर भारत के सबसे पुराने ईसाई समुदाय — बेतिया ईसाईयों को जन्म दिया.

बर्निनी केवल प्रचारक नहीं थे, वे संस्कृत और हिंदुस्तानी के गहरे ज्ञाता, चिकित्सक, अनुवादक और समाज-शास्त्री भी थे.उनकी पांडुलिपियाँ आज भी यूरोप के पुस्तकालयों और संग्रहालयों में सुरक्षित हैं, जो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की गवाही देती हैं.

वर्तमान संदर्भ में

आज बेतिया ईसाई समुदाय, बिहार और उत्तर भारत की सांस्कृतिक विविधता का अहम हिस्सा है.इस समुदाय ने शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है.बेतिया में स्थापित चर्च और मिशनरी संस्थाएँ आज भी स्थानीय समाज को जोड़ने का कार्य कर रही हैं.

बर्निनी का सपना केवल आस्था तक सीमित नहीं था—उन्होंने मानवता की सेवा और संस्कृतियों के संवाद को ही अपने मिशन का केंद्र बनाया.यही कारण है कि बेतिया का ईसाई समुदाय आज भी स्थानीय समाज के साथ गहराई से रचा-बसा है.उनकी परंपराओं में भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है—यह उनके "भारतीयकरण" के प्रयास का प्रमाण है.

समकालीन महत्व

आज जब दुनिया धर्म और संस्कृति के नाम पर बँटती जा रही है, बर्निनी का जीवन संदेश देता है कि संवाद, सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान ही समाज को स्थायी रूप से मजबूत कर सकते हैं. बेतिया ईसाई समुदाय की मौजूदगी, शिक्षा और सेवा की परंपरा उसी समर्पण की जीवित मिसाल है.

फादर बर्निनी की धरोहर केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी दिशा-सूचक है.

आलोक कुमार


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