सोमवार, 22 अगस्त 2022

मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने सेना द्वारा 20 वर्षों के लिए प्रस्तावित रूटीन तोपाभ्यास के अवधि विस्तार पर रोक लगाई

 


रांची: अभी नहीं हुआ हैं नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज रद्द! माननीय मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन ने सेना द्वारा 20 वर्षों के लिए प्रस्तावित रूटीन तोपाभ्यास के अवधि विस्तार पर रोक लगाई है. इसके लिए केन्द्रीय जन संघर्ष समिति माननीय मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त करती है. साथ ही माननीय मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज को रद्द करने के लिए  विधिवत अधिसूचना जारी करने के लिए माननीय प्रधानमंत्री व केंद्रीय रक्षा मंत्रालय को लिखा जाए.

नेतरहाट फील्ड फायरिंग रद्द नहीं हुआ है. अवधि विस्तार पर रोक लगाना निश्चय ही हमारे संघर्ष की जीत की एक और कदम है. पहली जीत हमने तब हासिल की थी जब 22 मार्च 1994 को तोप अभ्यास के लिए आई सेना को वापस किया था.  जिसके लिए अभी हमें और संघर्ष करना है. जब तक सरकार द्वारा नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज को रद्द करने की अधिसूचना जारी नहीं करती.

नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज से प्रभावित लोगों द्वारा पिछले लगभग 30 वर्षों से लगातार नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अधिसूचना को रद्द करने के लिए विरोध प्रदर्शन किया जा रहा था. वर्तमान में भी प्रत्येक वर्ष की भांति नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के विरोध में 22-23 मार्च को विरोध प्रदर्शन किया गया था. अब ऐसे में अधिसूचना को आगे और विस्तार नहीं होने से आदिवासियों के 30 वर्षों का संघर्ष भी समाप्त होगा और इलाके के लोगों को गोलियों की तड़तड़ाहट नहीं सुनाई देगी.

नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के विरोध में लातेहार जिला के करीब 39 राजस्व ग्रामों द्वारा आम सभा के माध्यम से झारखंड के राज्यपाल को भी ज्ञापन सौंपा गया था, जिसमें नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज से प्रभावित जनता द्वारा बताया गया था कि लातेहार व गुमला जिला पांचवी अनुसूची के अन्तर्गत आता है. यहां पेसा एक्ट 1996 लागू है, जिसके तहत ग्राम सभा को संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. इसी के तहत नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के प्रभावित इलाके के ग्राम प्रधानों ने प्रभावित जनता की मांग पर ग्राम सभा का आयोजन कर नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के लिए गांव की सीमा के अन्दर की जमीन सेना के फायरिंग अभ्यास के लिए उपलब्ध नहीं कराने का निर्णय लिया था. साथ ही नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अधिसूचना को आगे और विस्तार न कर विधिवत अधिसूचना प्रकाशित कर परियोजना को रद्द करने का अनुरोध किया था.

बता दें, 1964 में शुरू हुए नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज का तत्कालीन बिहार सरकार द्वारा 1999 में अवधि विस्तार किया गया था. मुख्यमंत्री ने जनहित को ध्यान में रखते हुए नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज को पुनः अधिसूचित नहीं करने  के प्रस्ताव पर सहमति प्रदान की है.फायरिंग रेंज के होने के चलते एक-दूसरे से सटे दोनों जिलों के दर्जनों गांव के आदिवासी आज तक विस्थापन के भय से उबर नहीं पाए हैं. फायरिंग रेंज के होने के चलते एक-दूसरे से सटे दोनों जिलों के दर्जनों गांव के आदिवासी आज तक विस्थापन के भय से उबर नहीं पाए हैं. इनके भीतर यह डर 1991-92 के समय से है जब अविभाजित बिहार सरकार ने गजट जारी कर नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के नाम से पहचानी जाने वाली सैन्य छावनी के लिए लातेहार और गुमला के 157 मौजों  के मातहत 245 गांव की 1471 वर्ग किलोमीटर भूमि को अधिसूचित किया था.8 जनवरी 2022 को नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन संघर्ष समिति की जारी मासिक बैठक.  

समिति की स्थापना 1993 में हुई थी. हर साल 22 और 23 मार्च को फायरिंग रेंज को रद्द किए जाने का सांकेतिक विरोध प्रदर्शन करने के लिए अधिसूचित गांव के हजारों आदिवासी जमा होते हैं.झारखंड के सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) विधायक विनोद सिंह ने 20 दिसंबर 2021 को जारी विधानसभा सत्र में राज्य सरकार से पूछा था कि बिहार सरकार की अधिसूचना संख्या-1862, दिनांक-20.08.1999 के अनुसार, “नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज का उक्त क्षेत्र के ग्रामीण व्यापक विरोध कर रहे हैं? क्या यह एक ईको सेंसिटिव क्षेत्र है?”सरकर ने प्रश्न में कही बात को स्वीकारा लेकिन विधायक द्वारा पूछे गए एक अन्य सवाल, कि “क्या सरकार 11 मई 2022 को समाप्त हो रही फायरिंग रेंज की समयावधि विस्तार पर रोक लगाने का विचार रखती है? अगर हां तो कब तक और अगर नहीं, तो क्यों?” के जवाब में सरकार ने बताया कि इस संबंध में विभाग को अब तक कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है.

झारखंड के गुमला और लातेहार जिले के आदिवासी गांवों के लोगों के लिए सरकार के इस जवाब का सीधा और स्पष्ट मतलब है कि सरकारी कागजों में उनका गांव फायरिंग रेंज के तौर पर अभी भी चिन्हित है.इस फायरिंग रेंज के विरोध में बीते तीन दशक से यहां के ग्रामीण आंदोलनरत हैं. इन जिलों के ग्रामीणों के मुताबिक उसने फायरिंग रेंज को रद्द किए जाने का वादा और भरोसा भाषणों में तो सभी नेताओं ने किया है लेकिन अपने वादों पर कभी अमल नहीं किया. उनके दावे की तस्दीक क्षेत्र के दर्जनों अखबार और पत्रिका में प्रकाशित खबरों से की जा सकती है.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से अनुरोध है अनुसूचित जनजातियां समाप्त होती जा रही है. आदिवासी संकट में हैं, उन्हें बचाना परम धर्म है. केंद्र सरकार नेतरहाट फील्ड रेंज को हमेशा के लिए रद्द करना होगा. अन्यथा सिदो कान्हू के समय से आज तक जिस तरह आंदोलन चला उस तरह का आंदोलन जारी रहेगा. अनिल पन्ना, प्रफुल्ल लिंडा, नदीम खान, दीपा मिंज, सुषमा बिरुली समेत अन्य ने भी संबोधित किया. कार्यक्रम का आयोजन महेंद्र पीटर तिग्गा ने किया.

आलोक कुमार


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