सोमवार, 26 जनवरी 2026

गुमनामी से गौरव तक: साकिबुल गनी के नेतृत्व में बिहार क्रिकेट का ऐतिहासिक उदय

 गुमनामी से गौरव तक: साकिबुल गनी के नेतृत्व में बिहार क्रिकेट का ऐतिहासिक उदय


बिहार क्रिकेट टीम के कप्तान साकिबुल गनी—आज यह नाम सिर्फ एक खिलाड़ी या कप्तान भर नहीं, बल्कि बिहार क्रिकेट के पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है.
उनके नेतृत्व में बिहार ने विजय हजारे ट्रॉफी प्लेट ग्रुप और रणजी ट्रॉफी प्लेट ग्रुप में मणिपुर को पराजित कर खिताब अपने नाम किए और अब प्लेट से निकलकर एलीट ग्रुप में ऐतिहासिक प्रवेश कर लिया है.

विजय हजारे ट्रॉफी में इतिहास रचने वाला शतक

विजय हजारे ट्रॉफी प्लेट ग्रुप में नंबर-5 पर बल्लेबाज़ी करते हुए साकिबुल गनी ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना तक मुश्किल थी.महज़ 32 गेंदों में शतक जड़कर उन्होंने इतिहास रच दिया.सिर्फ 40 गेंदों पर 128 रन की नाबाद पारी खेलते हुए साकिबुल गनी लिस्ट-ए क्रिकेट में सबसे तेज़ शतक लगाने वाले भारतीय बल्लेबाज़ बन गए.यह पारी सिर्फ रिकॉर्ड नहीं थी—यह बिहार क्रिकेट के बदले हुए मिज़ाज का ऐलान थी.

मोइनुल हक़ स्टेडियम: इतिहास का सजीव गवाह

रणजी ट्रॉफी प्लेट ग्रुप का फाइनल मुकाबला पटना के ऐतिहासिक मोइनुल हक़ स्टेडियम में खेला गया.जीर्णोद्धार की उम्मीद में खड़ी इसकी पुरानी दीवारें गवाह हैं कि बिहार क्रिकेट ने कितनी बेरुख़ी झेली, कितनी बार खुद को साबित करने का इंतज़ार किया.लेकिन इस बार फिज़ा बदली हुई थी.जब ख़िताबी मुक़ाबले में विरोधी टीम का आख़िरी विकेट गिरा, तो लगा मानो बिहार के सीने से वर्षों का बोझ उतर गया हो.यह सिर्फ एक जीत नहीं थी—यह उन तमाम सवालों का जवाब थी, जो वर्षों से बिहार क्रिकेट की क़ाबिलियत पर उठते रहे.

568 रनों की ऐतिहासिक जीत

बिहार ने मणिपुर को 568 रनों के विशाल अंतर से पराजित कर रणजी ट्रॉफी प्लेट ग्रुप का ताज अपने सिर सजाया।

पहली पारी: 522 रन, दूसरी पारी: 505 रन. ये आंकड़े नहीं, बल्कि उस ज़िद और आत्मविश्वास का प्रतीक थे, जो बिहार क्रिकेट ने वर्षों की उपेक्षा के बाद हासिल किया.

कप्तान की आंखों में संघर्ष की कहानी

जब ‘मैन ऑफ द मैच’ का खिताब साकिबुल गनी के हाथों में आया, तो उनकी चमकती आंखों में साफ़ झलक रहा था—गुमनामी से एलीट ग्रुप तक का लंबा, संघर्षपूर्ण सफर.इस रणजी ट्रॉफी प्लेट ग्रुप के प्रमुख प्रदर्शन.सर्वाधिक विकेट (18): हिमांशु सिंह (बिहार)

सर्वाधिक रन (540): आयुष लोहरूका

गौरतलब है कि हिमांशु सिंह अब 42 विकेट के साथ बिहार के लिए रणजी ट्रॉफी में सर्वाधिक विकेट लेने वालों की सूची में पांचवें स्थान पर पहुंच चुके हैं.

पर्दे के पीछे के नायक

इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे कई ऐसे चेहरे हैं, जो कैमरों से दूर रहकर बिहार क्रिकेट की नींव मजबूत करते रहे.बीसीए के सचिव ज़ियाउल अरफ़ीन ने इस उपलब्धि का श्रेय.नंदन सिंह की मुस्तैदी,विनायक सामंत की रणनीतिऔर पूरे सपोर्ट स्टाफ के समर्पण को दिया. कोच संजय, मृदुल, डॉक्टर हेमेंदु और गोपाल—ये वो सिपहसालार हैं, जिन्होंने इस जीत की इबारत को मुकम्मल किया.

अब एलीट ग्रुप में बिहार

अब बिहार क्रिकेट का परचम एलीट ग्रुप में लहराएगा. यह जीत हर उस बिहारी क्रिकेट प्रेमी की रूह को सुकून देती है, जिसने मुश्किल दौर में भी अपनी टीम का साथ नहीं छोड़ा.

मुबारक हो बिहार!

आज तुम्हारी तक़दीर ने खुद अपने हाथों से नया इतिहास लिखा है.


आलोक कुमार

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Chingari Prime News

Last Updated: 26 जनवरी 2026

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आलोक कुमार

रविवार, 25 जनवरी 2026

आज का भारत और बेरोज़गारी: डिग्री हाथ में, भविष्य सवालों में

 आज का भारत और बेरोज़गारी: डिग्री हाथ में, भविष्य सवालों में


आज भारत में सबसे डरावना शब्द अगर कोई है, तो वह है—बेरोज़गारी

यह सिर्फ आंकड़ों की समस्या नहीं है, यह हर उस युवा की आंखों में दिखने वाला डर है, जो हाथ में डिग्री लिए नौकरी की कतार में खड़ा है. आज सवाल यह नहीं कि भारत में प्रतिभा है या नहीं, सवाल यह है कि क्या प्रतिभा के लिए अवसर हैं? आज का युवा मेहनत कर रहा है, पढ़ रहा है, प्रतियोगी परीक्षाएं दे रहा है—लेकिन बदले में उसे मिल रहा है इंतज़ार, निराशा और अनिश्चित भविष्य.

डिग्री बढ़ी, नौकरियां घटीं

पिछले एक दशक में भारत में उच्च शिक्षा पाने वाले युवाओं की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। इंजीनियर, मैनेजमेंट ग्रेजुएट, पीएचडी—हर साल लाखों युवा डिग्री लेकर बाहर निकलते हैं.लेकिन नौकरियों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ी.

नतीजा यह है कि इंजीनियर डिलीवरी बॉय बन रहे हैं, पोस्ट ग्रेजुएट कॉल सेंटर में काम कर रहे हैं,और पीएचडी धारक अस्थायी नौकरी के सहारे जी रहे हैं.यह सिर्फ रोजगार का संकट नहीं, सम्मान और आत्मविश्वास का संकट भी है.

प्रतियोगी परीक्षाएं: उम्मीद का नहीं, थकान का नाम

सरकारी नौकरी आज भी करोड़ों युवाओं का सपना है.लेकिन हकीकत यह है कि एक पद के लिए लाखों आवेदन,सालों तक परीक्षा,फिर परिणाम में देरी, और कई बार भर्ती रद्द.यह प्रक्रिया युवाओं को मानसिक रूप से थका रही है.उनका सबसे उत्पादक समय सिर्फ तैयारी में निकल जाता है—बिना किसी गारंटी के

निजी क्षेत्र: अवसर या शोषण?

निजी क्षेत्र में नौकरियां हैं, लेकिन स्थिरता नहीं.कॉंट्रैक्ट जॉब, कम वेतन, लंबे घंटे,और नौकरी जाने का हमेशा डर. आज का युवा सिर्फ नौकरी नहीं चाहता, वह सम्मानजनक और सुरक्षित भविष्य चाहता है.

ग्रामीण युवा: सबसे ज्यादा प्रभावित

ग्रामीण भारत का युवा दोहरी मार झेल रहा है.खेती से आय घट रही है,और शहरों में नौकरी मिल नहीं रही.गांव से शहर की ओर पलायन बढ़ रहा है, लेकिन शहर भी अब सभी को जगह देने की स्थिति में नहीं हैं.यह असंतुलन सामाजिक तनाव को जन्म दे रहा है.

सरकार की भूमिका और सीमाएं

सरकारें रोजगार के वादे करती हैं,योजनाएं बनती हैं, स्किल डेवलपमेंट की बातें होती हैं.लेकिन ज़मीनी स्तर पर उद्योग, शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल की कमी साफ दिखती है.केवल कौशल सिखाना काफी नहीं,उसी कौशल के अनुरूप नौकरियां पैदा करना भी ज़रूरी है.

बेरोज़गारी के सामाजिक असर

बेरोज़गारी सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं है.यह पारिवारिक तनाव बढ़ाती है,मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती है, और कई बार अपराध की ओर भी धकेलती है.जब युवा खुद को बेकार महसूस करने लगता है,तो समाज की ऊर्जा कमजोर पड़ जाती है.

समाधान क्या हो सकता है?

समाधान एक नहीं, कई स्तरों पर चाहिए: शिक्षा को रोजगार-उन्मुख बनाना.छोटे और मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहन.स्टार्टअप्स को वास्तविक समर्थन.सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता और समयबद्धता.ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन.सबसे जरूरी है—युवा को सिर्फ आश्वासन नहीं, अवसर देना.

निष्कर्ष: बेरोज़गार युवा, कमजोर भविष्य

कोई भी देश अपने युवाओं की अनदेखी करके आगे नहीं बढ़ सकता.अगर आज का युवा हताश है, तो कल का भारत कमजोर होगा.आज ज़रूरत है ईमानदार आत्ममंथन की—क्या हम युवाओं को सिर्फ सपने दिखा रहे हैं,या उन्हें पूरा करने का रास्ता भी दे रहे हैं?

चिंगारी प्राइम न्यूज आज यही सवाल उठाता है,

क्योंकि बेरोज़गारी सिर्फ युवाओं की नहीं,

पूरे देश की समस्या है.

आलोक कुमार

शनिवार, 24 जनवरी 2026

आज की सबसे बड़ी सच्चाई: महंगाई नहीं बढ़ी, आम आदमी की सांसें छोटी हुई हैं

 आज की सबसे बड़ी सच्चाई: महंगाई नहीं बढ़ी, आम आदमी की सांसें छोटी हुई हैं


आज जब सुबह एक आम नागरिक घर से निकलता है, तो उसके हाथ में सिर्फ चाबी और मोबाइल नहीं होता—उसके कंधों पर महंगाई का बोझ भी लदा होता है। दूध, सब्ज़ी, दाल, गैस, दवा, शिक्षा—ऐसा शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो, जहां दाम चुपचाप न बढ़े हों. सवाल यह नहीं है कि महंगाई बढ़ रही है या नहीं, सवाल यह है कि क्या आम आदमी की आमदनी भी उसी रफ्तार से बढ़ी है?यही आज का सबसे बड़ा मुद्दा है। यही आज की सबसे कड़वी सच्चाई है.

आंकड़े कहते हैं “कंट्रोल में”, ज़िंदगी कहती है “मुश्किल में”

सरकारी आंकड़े अक्सर बताते हैं कि महंगाई दर “काबू में” हैलेकिन किचन का बजट कुछ और कहानी कहता है. सब्ज़ी मंडी, मेडिकल स्टोर और स्कूल की फीस—इन तीन जगहों पर खड़े होकर कोई भी समझ सकता है कि महंगाई सिर्फ प्रतिशत नहीं, अनुभव है.आज की महंगाई सबसे ज्यादा असर डाल रही है उस वर्ग पर, जो न गरीब है और न अमीर—मिडिल क्लास. न उसे सब्सिडी पूरी मिलती है, न उसकी आय इतनी है कि बढ़ते खर्च को नज़रअंदाज़ कर सके.

वेतन वहीं का वहीं, खर्च आसमान पर

नौकरीपेशा वर्ग की सैलरी साल में एक बार बढ़ती है—वो भी अगर किस्मत साथ दे.लेकिन महंगाई रोज़ बढ़ती है. बिजली का बिल, घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, और बुज़ुर्गों की दवाइयाँ—इन सबमें हर महीने “छोटी-छोटी” बढ़ोतरी होती है, जो साल के अंत तक बड़ा झटका बन जाती है.नतीजा यह है कि लोग बचत नहीं कर पा रहे,और जो कर रहे हैं, वह आपातकाल के डर से.

युवा वर्ग: सपनों और EMI के बीच फंसा

आज का युवा सिर्फ करियर नहीं बना रहा, वह EMI, क्रेडिट कार्ड और बढ़ते खर्चों से भी जूझ रहा है.घर खरीदना सपना बन गया है, शादी कर्ज़ बन गई है, और नौकरी की सुरक्षा सवाल बन गई है.महंगाई ने युवा वर्ग से सिर्फ पैसा नहीं छीना, भरोसा भी छीना है—भविष्य पर भरोसा.

ग्रामीण भारत की अलग लड़ाई

शहरों में महंगाई जेब पर असर डालती है, लेकिन गांवों में यह जीविका पर हमला करती है.किसान को फसल का सही दाम नहीं मिलता,लेकिन बीज, खाद और डीज़ल महंगे होते जा रहे हैं. ग्रामीण मज़दूरी बढ़ी है,लेकिन महंगाई उससे कहीं तेज़.इस असंतुलन का असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.

सरकार की चुनौती और ज़िम्मेदारी

सरकार के लिए महंगाई सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, यह राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा भी है.नीतियां बनती हैं, योजनाएं घोषित होती हैं, लेकिन ज़मीनी असर समय लेता है.सबसे बड़ी चुनौती यह है कि महंगाई पर नियंत्रण के साथ-साथ आमदनी के स्रोत भी मजबूत किए जाएं. केवल दाम रोकना काफी नहीं, कमाई बढ़ाना भी उतना ही ज़रूरी है.बाजार, मुनाफा और नैतिकता एक कड़वा सच यह भी है कि कुछ जगहों पर महंगाई मजबूरी नहीं,मुनाफाखोरी का नतीजा है. त्योहार आते ही दाम बढ़ जाते हैं.संकट आते ही जमाखोरी शुरू हो जाती है.यह सिर्फ आर्थिक नहीं, नैतिक संकट भी है.

आम आदमी क्या करे?

आम आदमी के पास विकल्प सीमित हैं, लेकिन विवेक अब भी है.खर्च की प्राथमिकता तय करना,अनावश्यक दिखावे से दूरी, और वित्तीय समझ—आज के दौर में यही बचाव के हथियार हैं.साथ ही, सवाल पूछना भी ज़रूरी है. लोकतंत्र में चुप्पी समाधान नहीं होती.

निष्कर्ष: महंगाई से बड़ी चुनौती है असमानता

आज की समस्या सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि यह है कि इसका बोझ बराबर नहीं बंट रहा.जो पहले से मजबूत हैं, वे संभल जाते हैं.जो कमजोर हैं, वे और पीछे छूट जाते हैं.आज ज़रूरत है ऐसी नीतियों की, जो सिर्फ आंकड़ों में नहीं,रसोई और जेब में राहत दें.क्योंकि जब आम आदमी थकता है, तो देश की रफ्तार भी धीमी पड़ती है.


आलोक कुमार

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

फेक न्यूज़ का जाल और लोकतंत्र पर हमला

 

फेक न्यूज़ का जाल और लोकतंत्र पर हमला: सवाल सिर्फ सूचना का नहीं, भरोसे का है

डिजिटल युग में सूचना जितनी तेज़ी से फैलती है, उतनी ही तेजी से भ्रम भी फैलता है. आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया जिस सबसे खतरनाक चुनौती से जूझ रही है, वह है फेक न्यूज़. यह सिर्फ झूठी खबरों का मामला नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र, सामाजिक सौहार्द और आम नागरिक के विवेक पर सीधा हमला बन चुका है.


एक समय था जब खबरें अख़बारों और टीवी चैनलों से छनकर आती थीं. संपादक की ज़िम्मेदारी, संस्थान की साख और पत्रकारिता के नियम खबरों की विश्वसनीयता तय करते थे. लेकिन सोशल मीडिया के दौर में हर हाथ में कैमरा है, हर अकाउंट एक “न्यूज़ चैनल” बन गया है और हर अफवाह “ब्रेकिंग न्यूज़”.

फेक न्यूज़: अफवाह से हथियार तक

फेक न्यूज़ अब सिर्फ गलत जानकारी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक हथियार बन चुकी है। चुनाव प्रभावित करने से लेकर धार्मिक तनाव भड़काने तक, भीड़ को उकसाने से लेकर किसी व्यक्ति की छवि तबाह करने तक—झूठी खबरें हर जगह इस्तेमाल हो रही हैं.

व्हाट्सऐप फॉरवर्ड, फेसबुक पोस्ट, एक्स (ट्विटर) ट्रेंड और यूट्यूब वीडियो—इन सबके जरिए झूठ को इस तरह पेश किया जाता है कि वह सच से ज़्यादा विश्वसनीय लगने लगता है. सबसे खतरनाक बात यह है कि फेक न्यूज़ अक्सर हमारी भावनाओं को निशाना बनाती है—धर्म, जाति, राष्ट्रवाद, डर और गुस्सा.

लोकतंत्र पर सीधा खतरा

लोकतंत्र की बुनियाद सही सूचना और जागरूक नागरिक पर टिकी होती है. जब नागरिक को ही ग़लत जानकारी दी जाए, तो उसका निर्णय भी ग़लत होगा. फेक न्यूज़ चुनावों को प्रभावित कर सकती है, जनमत को मोड़ सकती है और सरकारों पर अविश्वास पैदा कर सकती है.

आज राजनीतिक दलों से लेकर ट्रोल आर्मी तक, सब इस खेल में शामिल हैं। सवाल यह नहीं कि फेक न्यूज़ कौन फैला रहा है, सवाल यह है कि क्यों फैल रही है और किसके फायदे के लिए।

मीडिया की साख पर सवाल

फेक न्यूज़ का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसने मुख्यधारा मीडिया की विश्वसनीयता को भी कमजोर किया है. जब झूठ और सच एक ही स्क्रीन पर, एक ही फॉन्ट में दिखाई दें, तो आम दर्शक भ्रमित हो जाता है.

कुछ मीडिया संस्थान टीआरपी और क्लिक की दौड़ में बिना जांच-पड़ताल के खबरें चलाने लगे हैं। नतीजा यह कि असली पत्रकारिता और अफवाह के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।

सरकार, कानून और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म

सरकारें कानून बनाने की बात करती हैं, सोशल मीडिया कंपनियां गाइडलाइंस की. लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ कानून से फेक न्यूज़ रुकेगी? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियंत्रण के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम के जरिए वही कंटेंट आगे बढ़ाते हैं, जो ज्यादा भावनात्मक और उत्तेजक हो. और फेक न्यूज़ इस पैमाने पर पूरी तरह फिट बैठती है.

असली जिम्मेदारी किसकी?

सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी कानून बनाए.

मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यपरक पत्रकारिता करे.

सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे गलत सूचना पर लगाम लगाएं.

लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिक की है.

हर फॉरवर्ड सच नहीं होता.

हर वायरल वीडियो सच्चाई नहीं होता.

हर हेडलाइन खबर नहीं होती.

समाधान क्या है?

फेक न्यूज़ के खिलाफ लड़ाई किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना की लड़ाई है.

मीडिया साक्षरता को शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए

खबर साझा करने से पहले स्रोत की जांच की जाए

भावनाओं में बहकर प्रतिक्रिया न दी जाए

जिम्मेदार पत्रकारिता को समर्थन दिया जाए

निष्कर्ष: सच की लड़ाई लंबी है, लेकिन ज़रूरी है

फेक न्यूज़ का सबसे बड़ा हथियार हमारा डर और हमारी जल्दबाज़ी है। अगर हम रुककर सोचें, जांचें और समझें, तो आधी लड़ाई वहीं खत्म हो जाती है।

लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने से नहीं चलता,

वह सच जानने और सच बोलने से चलता है.

आज ज़रूरत है कि हम खबरों के उपभोक्ता नहीं,

जिम्मेदार नागरिक बनें

क्योंकि जब सच हारता है,

तो सिर्फ खबर नहीं मरती—

लोकतंत्र घायल होता है.

आलोक कुमार

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