सोमवार, 3 नवंबर 2025

अमोल अनिल मजूमदार घरेलू क्रिकेट के पूर्व स्टार

 “अमोल अनिल मजूमदार: वह कोच जिसने अधूरी पारी को भारतीय महिला क्रिकेट के वर्ल्ड कप से पूरा किया”


पटना.भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने जब इतिहास रचते हुए अपना पहला वनडे विश्व कप खिताब जीता, तो इस जीत के पीछे एक शांत, संयमित और बेहद रणनीतिक सोच वाले कोच का हाथ था — अमोल 
अनिल मजूमदार. यह जीत सिर्फ देश के लिए नहीं, बल्कि खुद मजूमदार के लिए भी एक भावनात्मक क्षण थी, क्योंकि टीम ने यह सफलता उनके जन्मदिन (11 नवंबर) से ठीक पहले हासिल कर उन्हें अब तक का सबसे बड़ा तोहफा दिया.

अमोल अनिल मजूमदार घरेलू क्रिकेट के पूर्व स्टार हैं. उन्होंने भारतीय क्रिकेट इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी है.वह भारतीय क्रिकेट के उन चुनिंदा दिग्गजों में हैं, जो बिना इंटरनेशनल डेब्यू किए भी लीजेंड बने. वह मुंबई और बाद में असम के लिए दाएं हाथ के बल्लेबाज रहे. उन्होंने रणजी ट्रॉफी में अमरजीत कायपी को पीछे छोड़ते हुए सर्वाधिक रनों का रिकॉर्ड बनाया और 1993-94 सीजन में बॉम्बे के लिए हरियाणा के खिलाफ अपने प्रथम श्रेणी पदार्पण मैच में विश्व रिकॉर्ड 260 रन बनाकर सुर्खियां बटोरीं.

 अमोल मजूमदार क्रिकेट की उस दुर्लभ श्रेणी में आते हैं जिन्हें प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी, पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कभी खेलने का अवसर नहीं मिला. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि कोचिंग के ज़रिए अपनी अधूरी पारी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.

घरेलू क्रिकेट का दिग्गज सितारा

11 नवंबर 1974 को मुंबई में जन्मे मजूमदार घरेलू क्रिकेट के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाजों में से एक रहे हैं. उन्होंने 171 फर्स्ट क्लास मैचों में 11,167 रन बनाए, जिसमें 30 शतक और 60 अर्धशतक शामिल हैं। उनके बल्ले की गूंज रणजी ट्रॉफी में वर्षों तक सुनाई दी, लेकिन भारतीय टीम का ब्लू जर्सी उन्हें नसीब नहीं हुआ.

सचिन-आचरेकर की परंपरा से निकला एक नाम

मजूमदार ने क्रिकेट की बारीकियां शारदाश्रम विद्यामंदिर में सीखी, वही संस्था जिसने सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली जैसे दिग्गज दिए। कोच रामाकांत आचरेकर की शागिर्दी में उन्होंने अनुशासन, धैर्य और खेल के प्रति सम्मान सीखा—वही गुण जो बाद में उनकी कोचिंग की पहचान बने.

मैदान से डगआउट तक का सफर

2014 में क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद मजूमदार ने कोचिंग का रास्ता चुना. उन्होंने भारत की अंडर-19 और अंडर-23 टीमों के बल्लेबाजी कोच के रूप में काम किया, राजस्थान रॉयल्स (IPL) के साथ भी जुड़े, और दक्षिण अफ्रीका की राष्ट्रीय टीम तथा नीदरलैंड क्रिकेट टीम को भी अपने अनुभव से दिशा दी.

भारतीय महिला टीम की नई उड़ान

अक्टूबर 2023 में जब बीसीसीआई ने उन्हें भारतीय महिला टीम का हेड कोच नियुक्त किया, तो आलोचकों ने सवाल उठाए—"जिसे कभी भारत के लिए खेलने का मौका नहीं मिला, वह विश्व कप जिताएगा कैसे?" लेकिन मजूमदार ने अपने अनुभव, शांत स्वभाव और रणनीतिक सोच से टीम में अनुशासन, आत्मविश्वास और दृढ़ता का संचार किया.उनकी कोचिंग में टीम ने सिर्फ क्रिकेट नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती सीखी। खिलाड़ियों को "खेलो, डर के बिना" का मंत्र मिला। और परिणाम—भारत का पहला महिला वर्ल्ड कप.

जन्मदिन पर देश का तोहफा

भारत की इस ऐतिहासिक जीत के कुछ ही दिन बाद, जब अमोल मजूमदार 51 वर्ष के हुए, पूरा देश उन्हें एक नायक की तरह देख रहा था। यह उस खिलाड़ी की कहानी है, जिसे मैदान पर खेलने का मौका नहीं मिला, लेकिन उसने डगआउट से इतिहास लिख दिया.अमोल मजूमदार ने साबित कर दिया — “कभी-कभी अधूरी पारी ही सबसे प्रेरक कहानी बन जाती है.”

आलोक कुमार


रविवार, 2 नवंबर 2025

“सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस: आत्माओं के लिए प्रार्थना का दिन”

 “सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस: आत्माओं के लिए प्रार्थना का दिन”


पटना.  आज, 2 नवंबर, कैथोलिक समुदाय विश्व भर में ‘ऑल सोल्स डे’ (सभी मृत विश्वासियों का स्मरण दिवस) श्रद्धा और आस्था के साथ मनाता है.यह दिन उन सभी दिवंगत आत्माओं के लिए समर्पित होता है, जिन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया है, परंतु अब भी परमेश्वर की अनंत उपस्थिति में प्रवेश से पूर्व शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजर रही हैं.

     इस दिन का मूल भाव है — प्रार्थना, स्मरण और प्रेम का प्रदर्शन. कैथोलिक परंपरा के अनुसार, पृथ्वी पर जीवित विश्वासी अपने दिवंगत परिजनों के लिए मिस्सा (पवित्र बलिदान), प्रार्थना और दान के माध्यम से ईश्वर से कृपा की याचना करते हैं ताकि वे आत्माएं शीघ्र ही स्वर्ग में परम शांति प्राप्त कर सकें.

      सुबह से ही चर्चों में विशेष पवित्र मिस्सा आयोजित किए जाते हैं, जहां श्रद्धालु परिवारजन अपने मृत परिजनों के नाम लेकर उनके लिए प्रार्थना करते हैं. प्रार्थना के पश्चात, लोग कब्रिस्तान जाकर कब्रों को फूलों से सजाते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं, और मौन साधकर अपने प्रियजनों की स्मृतियों को नमन करते हैं. यह दृश्य एक आध्यात्मिक एकता का प्रतीक होता है, जहां मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि अनंत जीवन की ओर एक मार्ग बन जाती है.

        इस पर्व का धार्मिक और भावनात्मक संदेश गहरा है — यह हमें याद दिलाता है कि जीवन क्षणभंगुर है, परंतु प्रेम और विश्वास अमर हैं। मृतकों के लिए की गई प्रार्थनाएं केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आत्माओं के मोक्ष की दिशा में एक ईश्वरीय सहयोग हैं.

         प्रभु यीशु मसीह के वचन इस दिन विशेष रूप से स्मरण किए जाते हैं — “मैं ही पुनरुत्थान और जीवन हूँ; जो मुझ पर विश्वास करता है, वह यद्यपि मर भी जाए, तो भी जीवित रहेगा.”

          यह वचन ऑल सोल्स डे की आत्मा है — आशा, पुनरुत्थान और अनंत जीवन की गारंटी.इस पवित्र अवसर पर, जब मोमबत्तियों की लौ कब्रों के पास झिलमिलाती है, तो यह केवल मृतकों के स्मरण की नहीं, बल्कि जीवितों की जिम्मेदारी की भी याद दिलाती है — कि हम प्रेम, क्षमा और करुणा से भरा जीवन जिएं, ताकि जब हमारी बारी आए, तो कोई और हमारे लिए भी उसी श्रद्धा से दीप जलाए.सभी दिवंगत आत्माओं को परम शांति मिले.

आलोक कुमार

शनिवार, 1 नवंबर 2025

पवित्रता और मानवीयता का उत्सव 1 नवंबर

 सभी संतों को नमन

पटना.सभी संतों को नमन: पवित्रता और मानवीयता का उत्सव 1 नवंबर — यह तिथि केवल ईसाई कैलेंडर का एक दिन नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता और मानवता की महानता का उत्सव है.इस दिन विश्व भर का ईसाई समुदाय ऑल सेंट्स डे या सर्व संतों का पर्व मनाता है — एक ऐसा अवसर, जब वे उन सभी संतों को स्मरण करते हैं जिन्होंने अपने जीवन को ईश्वर और मानवता की सेवा में अर्पित किया.

    इतिहास की पवित्र गूंज इस परंपरा की जड़ें 609 ईस्वी में मिलते हैं, जब पोप बोनिफेस चतुर्थ ने रोम के प्रसिद्ध पैंथियन मंदिर को एक ईसाई चर्च में रूपांतरित कर दिया. इसे उन्होंने सेंट मैरी एंड द मार्टियर्स (सेंट मैरी और शहीदों का चर्च) के नाम से समर्पित किया.दो शताब्दियों बाद, 837 ईस्वी में पोप ग्रेगरी चतुर्थ ने इस पर्व को नवंबर में स्थानांतरित किया. तब से यह दिन न केवल पश्चिमी ईसाई जगत में, बल्कि विश्व के हर कोने में श्रद्धा और विनम्रता के साथ मनाया जाता है.

    संतत्व का अर्थ ईसाई परंपरा में “संत” वह नहीं जो केवल मठों में तपस्या करता है, बल्कि वह भी है जो जीवन की कठोर वास्तविकताओं में भी करुणा और सच्चाई का उदाहरण बनता है.भारतीय संस्कृति में भी यही भाव संत तुलसीदास, कबीर, नानक और बुद्ध की वाणी में प्रतिध्वनित होता है. जिस प्रकार भारत में ‘संत’ शब्द करुणा, समानता और प्रेम का प्रतीक है, उसी प्रकार पश्चिम में Saint ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले उन साधकों का प्रतीक है, जिन्होंने समाज को प्रकाश दिया.

  आध्यात्मिक निरंतरता 31 अक्टूबर की रात को ऑल हैलोज़ ईव यानी हैलोवीन मनाई जाती है — संतों की पूर्वसंध्या. इसके अगले दिन, 2 नवंबर को ऑल सोल्स डे आता है, जब ईसाई मृत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं.इस प्रकार अक्टूबर के अंत और नवंबर की शुरुआत आत्मचिंतन, स्मरण और आत्मा की पवित्रता के उत्सव के रूप में देखी जाती है.

     आज के समय का संदेश आज जब दुनिया भौतिकता की दौड़ में आत्मा को पीछे छोड़ चुकी है, ऑल सेंट्स डे हमें भीतर झाँकने का अवसर देता है. यह पर्व याद दिलाता है कि पवित्रता कोई चमत्कार नहीं, बल्कि जीवन जीने की सजग शैली है.संत हमें यही सिखाते हैं कि भलाई के लिए कोई मंच नहीं चाहिए — एक विनम्र कर्म, एक सच्चा शब्द, एक करुणामय दृष्टि भी संतत्व की राह है.जिस प्रकार भारत में दीपावली अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक है, उसी प्रकार ऑल सेंट्स डे अंधेरे मन से उजली आत्मा की ओर लौटने का आह्वान है.संतों को नमन — क्योंकि वे हमारे भीतर सोई हुई दिव्यता को जगाने की प्रेरणा हैं.


आलोक कुमार

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

"देश के गरीब और वंचित वर्गों को आत्मसम्मान और अधिकार की भावना दी"


 *स्व. इंदिरा गांधी और सरदार पटेल को कांग्रेस ने किया याद

 पटना .आज बिहार प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय, सदाकत आश्रम में भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी जी की 41वीं पुण्यतिथि पर उनकी प्रतिमा पर एवं भारत के लौह पुरुष, पूर्व गृह व रक्षा मंत्री स्व. सरदार वल्लभ भाई पटेल की 150वीं जयंती के अवसर पर उनके तैल चित्र पर माल्यार्पण किया गया.

     इस अवसर पर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत  ने इंदिरा गांधी जी के राष्ट्र निर्माण में योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने अदम्य साहस, निर्णायक नेतृत्व और भारत की एकता-अखंडता की रक्षा के लिए जो योगदान दिया, वह सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा. उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी जी ने गरीबी हटाओ का नारा देकर देश के गरीब और वंचित वर्गों को आत्मसम्मान और अधिकार की भावना दी.

     अशोक गहलोत  ने साथ ही सरदार वल्लभभाई पटेल जी की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए कहा कि लौह पुरुष पटेल ने अपने अद्भुत संगठन कौशल और दृढ़ संकल्प के बल पर 562 रियासतों का एकीकरण कर भारत की एकता की नींव रखी। उनके योगदान को सदैव स्वर्ण अक्षरों में याद किया जाएगा.

        कार्यक्रम में मुख्य रूप से राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, अ.भा.कां.कमेटी के महासचिव अविनाश पाण्डेय, अ.भा.कां.क. मीडिया विभाग के चेयरमैन पवन खेड़ा, बिहार चुनाव के पर्यवेक्षक अधीर रंजन चौधरी , सांसद डा0 अखिलेश प्रसाद सिंह, पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी, कोषाध्यक्ष जितेन्द्र गुप्ता, मोती लाल शर्मा,सुबोध कुमार, राजेश राठौड़, जमाल अहमद भल्लू, ब्रजेश प्रसाद मुनन, अजय चौधरी , शरवत जहां फातिमा, कमलदेव नारायण शुक्ला,रौशन कुमार सिंह, मंजीत आनन्द साहू, राज किशोर सिंह,वैद्यनाथ शर्मा, शशि कांत तिवारी,विमलेश तिवारी, शकीलुर रहमान, सत्येन्द्र कुमार सिंह, अरविन्द लाल रजक, आदित्य पासवान,सुनील कुमार सिंह, गुरूदयाल सिंह, शशि भूषण कुमार, प्रदुम्न कुमार, साधना रजक,मधुरेन्द्र कुमार, हसीब अनवर, वसीम अहमद,राजेन्द्र चौधरी , अर्जुन पासवान, सुदय शर्मा, किशोर कुमार, विवेक यादव सहित सैकड़ों कार्यकर्ता मौजूद रहें.


आलोक कुमार

मोकामा सीट अपनी ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि

 पटना.मोकामा सीट अपनी ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ बाहुबलियों के प्रभाव के लिए जानी जाती है. बाहुबली नेता अनंत सिंह यहां से कई बार विधायक रह चुके हैं. गंगा नदी के दक्षिण में बसे इस क्षेत्र में घोसवरी, मोकामा और पंडारक प्रखंड के कुछ गांव शामिल हैं. आगामी 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में मोकामा सीट पर कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है, क्योंकि जातीय समीकरण और बाहुबली प्रभाव इस क्षेत्र की राजनीति को आकार देते हैं.

            बिहार में चुनाव हो रहा है.कुल 243 सीटों पर चुनाव होना है.चुनाव दो चरणों में होना है.पहला चरण 6 नवंबर और दूसरा 11 नवंबर हो है.चुनाव परिणाम 14 नवंबर को आएगा.बिहार के लोगों की नजर मोकामा विधानसभा पर जा ठीक गयी है.भूमिहार बहुल मोकामा विधानसभा सीट पर इस बार दो बाहुबलियों की भिड़ंत होने वाली है. मोकामा के छोटे सरकार जदयू से चुनाव लड़ रहे हैं, तो सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी ने राजद के टिकट पर परचा भर दिया है. चुनाव भले वीणा लड़ रहीं हों, लेकिन मुकाबला अनंत सिंह बनाम सूरजभान सिंह ही बताया जा रहा है.अब दोनों बाहुबलि पसंद नहीं करते हैं कि बाहुबलि  कहा जाए.अब जनता ही बाहुबली है.

        बिहार विधानसभा चुनाव में मोकामा विधानसभा क्षेत्र की अलग अहमियत होती है. मोकामा विधानसभा क्षेत्र और ‘बाहुबली’ अनंत सिंह राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं. इस बार ‘छोटे सरकार’ को उनके ही गढ़ में शिकस्त देने के लिए वीणा देवी मैदान में तर गयीं हैं. वीणा देवी ‘बाहुबली’ सूरजभान सिंह की पत्नी हैं. वह कहते हैं कि जनता ने एक बार मौका दिया, तो वह मोकामा की तस्वीर बदल देंगी. ठीक वैसे ही, जैसे अपने पति सूरजभान सिंह के व्यक्तित्व को बदल दिया.

  मोकामा विधानसभा क्षेत्र दिलीप सिंह का क्षेत्र रहा है.अनंत सिंह के भाई दिलीप सिंह 1990 से एकतरफा चुनाव जीतते थे.उनको बाहुबलि  सूरजभान सिंह ने 2000 में पराजित कर बिहार विधानसभा में पहुंचे.उसके बाद सूरजभान सिंह 2004 में उत्तर प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़े और लोकसभा में पहुंचे.बाहुबलि अनंत सिंह 2005 में बिहार विधानसभा का चुनाव लड़े और विधायक बन गए.तब से अनंत सिंह का सीट बनकर रह गया.लोकसभा चुनाव के एक साल बाद बिहार में हुए विधानसभा चुनाव 2020 में अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार ने राजद के टिकट पर मोकामा सीट पर जीत दर्ज की थी. वर्ष 2022 में एक आपराधिक मामले में सजा होने के बाद उनकी सदस्यता समाप्त हो गयी. इसके बाद उनकी पत्नी नीलम देवी ने उपचुनाव जीता और बाद में जदयू में शामिल हो गयी. इस बार अनंत सिंह जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. 2025 में खुद अनंत सिंह मैदान में हैं.उनके सामने सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी चुनौती दे रही हैं.


आलोक कुमार

बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

इस त्याग ने बेटी को यह सोचने पर विवश किया

 त्याग और अनुशासन का मौन स्तंभ

पटना.1909 में जब सोनोरा स्मार्ट डोड ने मदर्स डे पर एक उपदेश सुना, तो उनके मन में यह प्रश्न उठा कि पिताओं के लिए भी कोई दिन क्यों न हो? माँ के प्रेम की तरह पिता का समर्पण भी तो समान रूप से आदरणीय है। इसी भाव से उन्होंने फादर्स डे की नींव रखी।उनकी प्रेरणा के केंद्र में उनके अपने पिता विलियम जैक्सन स्मार्ट थे — गृह युद्ध के एक सैनिक, जिन्होंने पत्नी के निधन के बाद छह बच्चों का पालन-पोषण अकेले किया.

    इस त्याग ने बेटी को यह सोचने पर विवश किया कि पिता के मौन संघर्ष को भी समाज की मान्यता मिलनी चाहिए।उनके अथक प्रयासों का परिणाम था — 19 जून 1910, जब स्पोकेन, वाशिंगटन में पहला फादर्स डे मनाया गया. लेकिन इसे आधिकारिक मान्यता मिलने में लंबा समय लगा. अंततः 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इसे अमेरिका का राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया.आज भारत सहित अनेक देशों में यह पर्व जून के तीसरे रविवार को मनाया जाता है. 2025 में यह दिन 15 जून को पड़ा.वहीं, कुछ यूरोपीय देशों में इसे 19 मार्च को मनाने की परंपरा है.

     हाल में कलकत्ता महाधर्मप्रांत में भी इस दिवस का उत्साह देखा गया.सेंट पॉल चर्च, कमर चौकी में 28 अक्टूबर 2025 को फादर्स डे समारोह आयोजित हुआ. समुदाय ने अपने पिताओं के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट की.फिर भी, कुछ लोगों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या इस अवसर की व्यापकता पूरे महाधर्मप्रांत तक पहुंच पा रही है? शिवचरण हांसदा ने चिंता जताई कि कुछ चुनिंदा चर्चों तक ही गतिविधियां सीमित हैं.दरअसल, फादर्स डे केवल उत्सव नहीं, बल्कि उस मौन शक्ति का सम्मान है जो परिवार को थामे रखती है. पिता अक्सर भावनाएँ नहीं जताते, पर हर जिम्मेदारी को निभाने में वे उदाहरण बन जाते हैं. समय है कि हम उस मौन त्याग को भी मुखर सम्मान दें — क्योंकि पिता का प्रेम दिखता नहीं, पर हर सफलता के पीछे उसका हाथ होता है.

आलोक कुमार

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

ढोरी माता तीर्थालय में उमड़ी श्रद्धा की भीड़, प्रेम और एकता का संदेश

 



ढोरी माता तीर्थालय में उमड़ी श्रद्धा की भीड़, प्रेम और एकता का संदेश

जारंगडीह.झारखंड के जारंगडीह स्थित ढोरी माता तीर्थालय में 69वां वार्षिक समारोह बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ. रांची महाधर्मप्रांत के अंतर्गत आने वाले गुमला धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष बिशप लिनुस पिंगल एक्का इस आयोजन के मुख्य अतिथि थे. उनके साथ हजारीबाग धर्मप्रांत के बिशप आनंद जोजो भी उपस्थित रहे.
    समारोह की शुरुआत अतिथि धर्माध्यक्ष के पादुका छाजन और भक्ति गीतों के साथ हुई. प्रवेश गान, नृत्य, दया याचना, महिमा गान, बाइबल जुलूस, चढ़ावा और स्तुति गान जैसे भक्ति गीतों की मनमोहक प्रस्तुतियाँ संत एंथोनी और कार्मेल स्कूल, करगली की छात्राओं एवं धर्म बहनों द्वारा दी गईं.
   मुख्य याजक के रूप में बिशप लिनुस पिंगल एक्का तथा धर्माध्यक्ष आनंद जोजो के नेतृत्व में पवित्र मिस्सा समारोह का आयोजन किया गया. देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं ने इसमें भाग लिया और ढोरी माता के प्रति अपनी गहरी आस्था व्यक्त की.धर्माध्यक्षों ने अपने प्रवचन में प्रेम, सेवा और सामाजिक एकता पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि “ढोरी माता आस्था, दया और मानवता की प्रतीक हैं। ईश्वर प्रेम का यही संदेश हमें एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील और सहयोगी बनाता है.
    ”भक्ति गीतों, संगीत और प्रार्थनाओं से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा. श्रद्धालुओं ने विश्व शांति और मानवीय सद्भाव की कामना की. आयोजन की व्यवस्था ढोरी माता समिति और स्थानीय श्रद्धालुओं के सहयोग से की गई थी.
    अनुष्ठान में फादर सिरियक जोसेफ, फादर माइकल लकड़ा, फादर नोर्बर्ट लकड़ा, फादर सुरेन्द्र पॉल, फादर अल्बर्ट केरकेट्टा, फादर अनुरंजन टोप्पो, फादर मुक्ति मिंज, फादर प्रमोद कुजूर, फादर संतोष टोपनो और फादर एमानुएल टेटे सहित अनेक पुरोहित शामिल हुए.
     दो दिवसीय इस वार्षिक महोत्सव में झारखंड के विभिन्न जिलों बोकारो, रांची, धनबाद, गिरिडीह, हजारीबाग, चतरा, कोडरमा और पलामू  के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से ढोरी माता के चरणों में मन्नत मांगता है, उसकी कामना अवश्य पूरी होती है.ढोरी माता तीर्थ केवल आस्था का नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और मानवता के संगम का स्थल बन चुका है.

आलोक कुमार

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