मंगलवार, 13 जून 2023

 

पटना.बक्सर धर्मप्रांत के महामहिम धर्माध्यक्ष डॉ जेम्स शेखर के पवित्र मिस्सा अर्पित करने के बाद दो दिवसीय आवासीय शिविर संपन्न हो गया.यह शिविर 'दाम्पत्य जीवन सुचारू रूप से संचालित हो' पर जानकारी देने के लिए आयोजित था.
सर्वविदित है कि ईसाई धर्म रीति के अनुसार विवाह करने वालों को विवाह के पूर्व विशेष जानकारी दी जाती है.विवाह कर लेने वाले दम्पतियों को वैवाहिक जीवन के बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए नवज्योति निकेतन पटना में दो दिवसीय आवासीय शिविर शनिवार से शुरू हुआ था.
इसमें पटना महाधर्मप्रांत के पटना, मुजफ्फरपुर, बेतिया और पूर्णिया धर्मप्रांत के पचास से अधिक दम्पतियों ने हिस्सा लिए.इस शिविर का संचालन बेतिया धर्मप्रांत के विकर जनरल फादर फिंटन साह और गोवा-दमन महाधर्मप्रांत के फादर अरूण कर रहे थे.
विभिन्नन धर्मप्रांतों से आए कपल (कपल (couple) कपल का मतलब जोड़ा, जोड़ी, युगल, युग्मन या युग्म, दो लोगो का समूह, दम्पति, जोड़ना आदि होता है.उन्होंने अपने मैरिज लाइफ के बारे में विस्तार से बताया.
मौके पर पटना महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष सेबेस्टियन कल्लूपुरा, मुजफ्फरपुर धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष कैजेटन फ्रांसिस ओस्ता व बेतिया धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष पीटर सेबेस्टियन गोबियस उपस्थित थे.बक्सर धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष डॉ.जेम्स शेखर शिविर के समापन दिवस रविवार को पवित्र मिस्सा अर्पित किए.उनके साथ फादर फिंटन साह और फादर ज्ञान प्रकाश, फादर अरुण आदि पुरोहित थे.
इस अवसर पर बक्सर धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष डॉ.जेम्स शेखर शिविर ने कहा कि विभिन्न धर्मप्रांतों में द कपल्स फॉर क्राइस्ट संचालित है. मिशनरी फैमिली ऑफ क्राइस्ट के भूतपूर्व कंट्री सर्वेंट एवी जोसेफ थे.जो कपल ऑफ क्राइस्ट के लिए समर्पित थे. वक्त का मांग है कि प्रत्येक घरों में जीवंत क्राइस्ट का दर्शन दूर से ही हो जाए.
शिविर के संचालक फादर फिंटन साह और फादर अरुण ने कहा कि द कपल्स फॉर क्राइस्ट ( CFC ) एक अंतरराष्ट्रीय कैथोलिक लोक कलीसियाई आंदोलन है जिसका लक्ष्य ईसाई मूल्यों को नवीनीकृत और मजबूत करना है.घरेलू समूह 'परिवार' सप्ताह में एक बार या सप्ताह में दो बार मिलते हैं. घर के प्रत्येक सदस्य को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे अपने घर पर बैठकें आयोजित करें, जब वे गिरजे की सभाओं में नहीं होती हैं. एक घरेलू समूह 'परिवारों के परिवार' के रूप में कार्य करता है. घरेलू बैठकों को देहाती या फेलोशिप के रूप में आयोजित किया जा सकता है.
शिविरार्थियों ने निश्चिय किए कि घर पर जाने के बाद द कपल्स फॉर क्राइस्ट के बारे में पल्लिवासियों के कपल को जानकारी देंगे और उनलोगों के साथ योजना बनाकर काम करेंगे. हमलोगों का प्रयास होगा की हर परिवार में जा कर परिवारिक प्रार्थना करना.पारिवारिक मुलाकात के दरम्यान बुजुर्ग और बीमार लोगों से मिलना.उनके साथ प्रार्थना करना उनकी समस्याओं को परिवार के लोगों के साथ मिलकर सुलझाना.
इस शिविर में बेतिया धर्मप्रांत से 3 कपल भाग लिए. बेतिया पल्ली से केविन क्लारेंस और उनकी पत्नी शालिनी विशाल विक्टर और उनकी पत्नी अनु विशाल और चुहड़ी पल्ली से रवि राजेश और उनकी पत्नी ज्योति रवि थे.
आलोक कुमार

मेरे इन अनुभवों एवं विचारों पर आप सभी ने ध्यान दिया

नई दिल्ली. प्रख्यात गांधीवादी पी.व्ही.राजगोपाल को इंटरनेशनल हाउस, टोक्यो, जापान में आयोजित समारोह में 40वां निवानो शांति पुरस्कार मिला.इस अवसर पर निवानो शांति पुरस्कार समारोह में सम्मानित पी.व्ही.राजगोपाल ने अपने सम्मान भाषण में कहा कि सर्वप्रथम माननीय अतिथियों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ-साथ अन्य देशों के मित्रों और इस 40वें वार्षिक निवानो शांति पुरस्कार समारोह में भाग लेने वाले सभी लोगों को आत्मीय रूप से आभार व्यक्त करता हूं. 

        उन्होंने कहा कि आप लोगों ने मेरे काम को सराहने और उसे मान्यता देकर मुझे इस पुरस्कार के लिए चयन किया है.इसके लिए निवानो फाउंडेशन को धन्यवाद देता हूं. मैं इसके अध्यक्ष, बोर्ड के सभी सदस्यों और ज्यूरी को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिन्होंने मुझे यह सम्मान दिया है. मैं इस बात से अवगत हूं कि समारोह में आए अतिथियों में कुछ वे साथी भी हैं, जिन्हें यह पुरस्कार पहले ही मिल चुका है.पुरस्कार प्राप्त उन साथियों की बिरादरी में शामिल होने पर मुझे गर्व महसूस हो रहा है और मैं शांति के पथ पर ऐसे दिग्गजों के साथ चलने के लिए तैयार हूं.   
           आगे कहा कि अब आपके सामने उन अनुभवों को रखना चाहता हूं, जिन्होंने अहिंसा और शांति के प्रति मेरे विचारों को ज्यादा ठोस बनाया.मैंने अपनी शांति यात्रा की शुरुआत एक भयानक संघर्ष वाले क्षेत्र से की.भारत की राजधानी दिल्ली से लगभग 300 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में चंबल घाटी है. वहां सर्वोदय के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ काम करने के दरम्यान मेरा सामना डकैतों की हिंसा से हुआ. उन्हें वहां विद्रोही कहा जाता है.आज उनके समूह को एक आतंकवादी समूह करार दिया जाता.मैं कुछ समय तक उनके बीच रहा और काम किया. काम के दरम्यान उन्हें हथियार छोड़ने के लिए राजी किया.            
          उन्होंने अहिंसा के विचारों से प्रभावित होकर आत्मसमर्पण किया और जेल की सजा काटकर समाज की मुख्यधारा में वापस आ गए. हमने पिछले साल उनके आत्मसमर्पण की 50वीं वर्षगांठ मनाई थी और हमने देखा कि कैसे सबसे कठोर हिंसक व्यक्ति भी शांति के उपासक बन सकते हैं.578 डकैतों में से अधिकांश के लिए हिंसा के मार्ग को छोड़कर शांति के मार्ग को अपनाने का यह परिवर्तन अहिंसा के प्रति लगाव से ही संभव था.       
     इस अनुभव के बाद मैं भारत में अन्य स्थानों पर चला गया, जहां कुछ मूल सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए काम कर सकता था.उन सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए बहुत कम लोगों ने ही हिंसा का मार्ग अपनाया था.फिर भी मैं इस बात को समझने लगा कि प्रत्यक्ष हिंसा या हथियारों का उपयोग ढांचागत हिंसा या अन्याय का परिणाम था और अन्याय को दूर करने से शारीरिक संघर्ष या प्रत्यक्ष हिंसा कम हो सकती है.दूसरे शब्दों में कहूं तो मैं ’प्रत्यक्ष’ या शारीरिक हिंसा को खत्म करने से आगे बढ़कर ’अप्रत्यक्ष’ या ढांचागत या व्यवस्थागत हिंसा को खत्म करने के लिए काम करना शुरू किया.मेरा मानना था कि घृणा, अन्याय और पाशविक बल के कारणों को सामाजिक ढांचों के भीतर ही उसे गहराई से हल करने की जरूरत है.गरीबी, भेदभाव और बहिष्कार के कारणों का समाधान करने से ही शांति आ सकती है.           
           इस दरम्यान मुझे इस बात की समझ भी हुई कि अहिंसा का उपयोग करते हुए न्याय पर आधारित एक शांतिपूर्ण समाज का निर्माण करना एक चरणबद्ध प्रक्रिया है.अहिंसा मेरे लिए प्रेरक शक्ति रही है जिसने मुझे लगातार इस पर काम करने के लिए प्रेरित किया.इस प्रक्रिया में मैं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और उनके दिए ’ताबीज’ से प्रभावित हुआ. ताबीज का अर्थ उनके एक प्रेरक विचार से है, जिसे वे ताबीज कहते थे.उन्होंने कहा है -“सबसे गरीब और सबसे कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करें जिसे आपने अपने जीवन में देखा हो, और अपने आप से पूछें कि क्या आप जो कदम उठाने का विचार कर रहे हैं, वह उसके लिए उपयोगी होगा.’’       
     निश्चय ही यह कथन गांधी मार्ग पर चलने वाले हम जैसे पथिकों के लिए प्रेरक है.सामाजिक-आर्थिक पदानुक्रम के निचले स्तर पर रह रहे लोगों पर इस तरह के विचार से अन्य लोगों ने भी ध्यान दिया था.ये सभी गांधीवादी मंडली के लोग ही थे, जैसे कि विनोबा भावे, जे.सी. कुमारप्पा, राधा कृष्ण मेनन, सुब्बा राव और अन्य साथी.मैं एक ऐसे देश का निवासी हूं, जिसकी संस्कृति को बुद्ध, महावीर, कबीर और विवेकानंद ने आकार दिया था, लेकिन इसके बावजूद आज भारत में हाशिए पर रह रही आबादी को गरीबी और अभाव से मुक्त करने और समाज के संपन्न वर्गों को शांति निर्माण के लिए राजी करने की आवश्यकता है.   
      मैं अपने बयानों में ईमानदार नहीं होता अगर मैं पूरे भारत के और कुछ चुनिंदा अन्य देशों के उन हजारों लोगों के योगदान को स्वीकार नहीं करता जो इतने वर्षों से मेरे साथ खड़े हैं. इनमें कई लोग शामिल हैं, जैसे कि हाशिए पर रहने वाले समुदाय के वे लोग, जिन्होंने कई कठिन कार्रवाइयों में भाग लिया; बड़ी संख्या में महत्वपूर्ण आयोजनों को डिजाइन करने और आकार देने के लिए कष्ट उठाने वाले श्रमिकों की टीम; मध्यवर्गीय मित्रों की टोली; और राजनीतिक कार्यकर्ता और अधिकारी जिन्होंने नीतिगत स्तर पर बदलाव करने में योगदान देकर हमारे सपने को आगे बढ़ाने में हमारी मदद की.वास्तव में यह पुरस्कार इन सभी मित्रों की साझा प्रयासों का परिणाम है.समाचारों में पुरस्कार की घोषणा देखकर लोगों की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट हो गया कि व्यक्तियों और संगठनों ने कितनी खुशी व्यक्त की है.     
          हमने जो किया, उससे सीखते हुए, मैं इस बात का विस्तार करना चाहता हूं कि हम वर्तमान में क्या कर रहे हैं? हमने शांति निर्माण के लिए फोरफोल्ड दृष्टिकोण को अपनाया है, जिसमें शामिल हैं- (1) अहिंसक शासन; (2) अहिंसक सामाजिक कार्रवाई; (3) अहिंसक अर्थव्यवस्था; और (4) अहिंसक शिक्षा.
अहिंसक शासन-  विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे कई क्षेत्रों में प्रगति करने के साथ हमें यह मानना चाहिए कि सत्ता और पदों पर बैठे लोगों द्वारा अधिक सभ्य व्यवहार किया जाएगा. दुर्भाग्य से जब हम बहुत सारे देशों में नेतृत्व को देखते हैं तो हम पाते हैं कि ऐसा नहीं है. अहिंसक शासन के संदर्भ में, हम निर्णय लेने वालों यानी नीति निर्माताओं को सबसे अधिक वंचित समुदायों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाने के लिए काम कर रहे हैं.कई जगहों पर हमने एक तरह की जन-आधारित नीति की हिमायत की है.हमने विरोध करने वाली आवाज़ों को शांत करने के लिए पुलिस बल को नियुक्त करने के बजाय समस्याओं को हल करने के तरीके के रूप में बातचीत को प्रोत्साहित किया है.हमने विशेष रूप से भारत में जल, जंगल और जमीन के मुद्दों के संबंध में सामाजिक रूप से समावेशी नीतियां बनाने के लिए कई नीति निर्माताओं के साथ काम किया है.           हम नीति परिवर्तन पर नहीं रुके हैं. हमने भारत के एक राज्य में शांति विभाग भी स्थापित किया है और भारत और बाहर शांति मंत्रालयों की स्थापना का वकालत करना जारी रखा है.कोई भी शांतिपूर्ण और अहिंसक शासन एक बेहतर व्यवस्था से आता है जो लोगों और राज्य के बीच सहयोग को बढ़ाता है. इस तरह की व्यवस्था में लोग बेहतर स्थिति में होते हैं क्योंकि उन्हें अपनी समस्याओं को हल करने के लिए अधिक स्वायत्तता प्राप्त होती है.अगर शांतिपूर्ण समाज और शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था बनाने के लिए फोरफोल्ड दृष्टिकोण पर आगे बढ़ते हैं, तो संघर्षों को हल करने के लिए संस्थानों और लोगों के बीच सहयोग आवश्यक है.
       अहिंसक सामाजिक कार्रवाई -  वर्तमान समय में लाखों लोगों के जीवन और आजीविका पर प्रभाव डालने वाले कई संकट हैं, जिन्हें हम ढांचागत या व्यवस्थागत हिंसा कहते हैं. लोग संगठित होकर न्याय की मांग कर रहे हैं.हम इस बात से चिंतित हैं कि आज वैसे विरोध प्रदर्शन अधिक हो रहे हैं जो हिंसक हो रहे हैं और लोग अपने लक्ष्य को प्राप्त तक नहीं कर पा रहे हैं.इससे लोगों में असंतोष बढ़ रहा है.जो लोग सामाजिक कार्रवाइयों का नेतृत्व कर रहे हैं उन्हें अहिंसक तरीकों की गहरी समझ होनी चाहिए. इस समझ के अभाव में लोगों को हिंसा के लिए उकसाया जा सकता है.भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसक सामाजिक कार्रवाई महात्मा गांधी की मुख्य ताकत थी. विनोबा भावे और उनके सहयोगियों ने भूमि सुधारों के लिए बड़े अहिंसक आंदोलनों का आयोजन किया.अहिंसक सामाजिक कार्रवाई के इन तरीकों को हमारे संगठन ने कई साल पहले अपनाया था. हम जमीनी स्तर पर वंचित समुदायों को संगठित करने के लिए बड़ी संख्या में युवाओं को प्रशिक्षित करने में सक्षम थे.हमारे काम की अधिकांश सफलता इस पद्धति का प्रत्यक्ष परिणाम है.     
      उदाहरण के लिए, 2007 में हमने एक बड़ी अहिंसक कार्रवाई की, जब 25,000 लोगों ने चंबल से नई दिल्ली तक एक महीने में 350 किलोमीटर की पैदल यात्रा की.यह लोगों के लिए भूमि पर अधिकार और आजीविका संसाधनों को हासिल करने के लिए था, विशेष रूप से आदिवासी आबादी के लिए वन भूमि पर अधिकार. अहिंसक अर्थव्यवस्था- महात्मा गांधी, जे.सी. कुमारप्पा और शूमाकर ने सुझाव दिया था कि अर्थव्यवस्था अधिक सहभागी और ’नीचे से ऊपर’ यानी बॉटम-अप हो सकती है, इस अर्थ में कि स्व-संगठित समुदाय एक अर्थव्यवस्था बनाने के लिए एक साथ आते हैं.इसके विपरीत, एक अर्थव्यवस्था जो कुछ लोगों को अवसर देती है और लाखों लोगों के लिए गरीबी और दुख को बढ़ावा देती है, वह ’अच्छी’ या समावेशी नहीं हो सकती है.
     आज आदिवासी लोगों, मछुआरों, शरणार्थियों, झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले, किसानों और खेतिहर मजदूरों को जिन आजीविका के अवसरों का लाभ मिल रहा है, वे अक्सर दैनिक मजदूरी कमाने वाले हैं, जो सुरक्षित नहीं है. अर्थव्यवस्था के पक्ष में काम नहीं करती है.फोरफोल्ड दृष्टिकोण में, सहयोग की भावना का निर्माण करते हुए अपने उत्पादों के विपणन के लिए कई छोटे और स्थानीय उत्पादक समूहों के एक साथ आने का अनुभव दर्शाता है कि वे एक अधिक अहिंसक अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं.हम इसका संक्रमण काल देख सकते हैं, जहां जैविक और प्राकृतिक खेती, हथकरघा और हाथ-आधारित उत्पादन जैसी कई सूक्ष्म गतिविधियां वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग एक ’मैक्रो-नैरेटिव’ बना रही हैं जो बड़े पैमाने पर बड़े निगमों द्वारा नियंत्रित है. जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था रू “प्रकृति में हर किसी की जरूरत के लिए पर्याप्त संसाधन है लेकिन किसी के लालच के लिए नहीं.
     अहिंसक अर्थव्यवस्था - इसके कारण जलवायु संकट की स्थिति भी बनी है जो बड़ी आबादी को प्रभावित कर रही है.देर हो जाए, इससे पहले ही हम वर्तमान समय में पृथ्वी पर अधिक टिकाऊ और अहिंसक उत्पादन, विनिमय और उपभोग के तरीकों पर फिर से विचार करें.गांधी के सहयोगियों में से एक जे.सी. कुमारप्पा ने कहा था कि एक आर्थिक दृष्टि से एक स्थायी अर्थव्यवस्था का निर्माण करना आवश्यक है, जो जन-समर्थक, गरीब-समर्थक और पर्यावरण के अनुकूल हो.
  अहिंसक शिक्षा- आजकल के युवा शांति बल के बजाय क्रूर बल में विश्वास करते हैं, क्योंकि आजकल के गेम्स, सोशल मीडिया और फिल्में एक व्यवहार पैटर्न को मजबूत करती हैं.दुर्भाग्य से बच्चे ऐसे नकारात्मक प्रभावों के शिकार हो जाते हैं या मानते हैं कि हिंसा के माध्यम से वे अपने लक्ष्यों को बेहतर ढंग से प्राप्त कर सकते हैं.माता-पिता अपने बच्चों को स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लाने पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं ताकि वे ऊपर की ओर बढ़ सकें और अधिक समृद्ध हो सकें, बिना यह विचार किए कि उनके बच्चे समाज में शांति कैसे ला सकते हैं.हमारे काम का एक उदाहरण यह है कि युवाओं को शांति क्लब स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. हम संगठनों का एक नेटवर्क बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो इस एजेंडे को बड़े पैमाने पर ले जाएगा जो शांति और अहिंसा को व्यापक आधार देगा.कक्षा और पाठ्येतर गतिविधियों के अलावा, हम विभिन्न राज्य सरकारों के साथ यह वकालत कर रहे हैं कि क्या वे शांति मंत्रालयों या विभागों की स्थापना कर सकते हैं जो कई स्वावलंबी तरीकों से अहिंसक शिक्षा को प्रोत्साहित करेंगे. पुलिस या सशस्त्र बलों द्वारा शांति लाए जाने की अपेक्षा करने के बजाय बच्चे और युवा शांति-निर्माण को महत्व देना सीखेंगे. शांति शिक्षा ही शांति निर्माण की केंद्रीय धुरी है और अगर हम इस बारे में विश्व स्तर पर जागरूकता पैदा करते हैं तो इस फोरफोल्ड दृष्टिकोण को व्यापक रूप से लागू किया जा सकता है.         
     मैंने आपके सामने इस फोरफोल्ड दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया है, लेकिन मुझे पता है कि कई संशयवादी हैं जो शांति निर्माण के तरीके के रूप में अहिंसा के प्रभाव के बारे में संदेह करते हैं.उनके लिए मैं कहता हूं, इतिहास के उन महत्वपूर्ण पलों पर विचार करना महत्वपूर्ण है जब ज्ञान को हमारी मानव उन्नति के साथ जोड़ा गया था.           
       1931 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी जी को एक पत्र लिखा था.उस पत्र में लिखे उनकी बात से मैं शुरू करता हूं.उस पत्र में उन्होंने लिखा था रू “आपने अपने कार्यों के माध्यम से दिखाया है कि हिंसा के बिना सफल होना संभव है, यहां तक कि उन लोगों के साथ भी जिन्होंने हिंसा के तरीके को नहीं छोड़ा है.मेरा मानना है कि गांधी के विचार हमारे समय के सभी राजनीतिक व्यक्तियों में सबसे प्रबुद्ध है.हमें उनकी भावना एवं सोच के साथ काम करने का प्रयास करना चाहिए. हमारे अपने लक्ष्य के लिए लड़ने में हिंसा का उपयोग नहीं करना चाहिए. साथ ही किसी भी मामले में भागीदारी नहीं करना, जिसे आप बुरा मानते हैं.”         
       अप्रैल 1953 में अमेरिकी सेना के कमांडर के रूप में ड्वाइट आइजनहावर ने कहा था- “हर बंदूक जो बनाई जाती है, हर युद्धपोत जो लॉन्च किया जाता है और हर रॉकेट जो दागा जाता है, यह अपने अंतिम अर्थों में, उन लोगों से चोरी है जो भूखे हैं और जिन्हें खिलाया नहीं जाता है, जो ठंड से कांप रहे हैं और कपड़े नहीं पहने हैं. इस दुनिया मे हथियारों पर सिर्फ पैसा ही नहीं खर्च किया जा रहा है, बल्कि यह अपने मजदूरों का पसीना, अपने वैज्ञानिकों की प्रतिभा और अपने बच्चों की आशाओं को खर्च कर रहा है.’’       
     भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार भारत रत्न को 1993 में प्राप्त करने पर नेल्सन मंडेला ने कहा था रू “महात्मा गांधी हमारे (दक्षिण अफ्रीकी) इतिहास के अभिन्न अंग हैं क्योंकि यहीं पर उन्होंने पहली बार सत्य का प्रयोग किया था; यहां उन्होंने न्याय की खोज में अपनी विशिष्ट धैर्य का प्रदर्शन किया था; यहां उन्होंने सत्याग्रह को एक दर्शन और संघर्ष की एक विधि के रूप में विकसित किया था.‘‘      
      मैं यह कहकर अपनी बात समाप्त करता हूं कि गांधी जी ने अहिंसा को शक्तिशाली साधन के रूप में देखा.यह अनुभव मुझे भारत में सबसे अधिक वंचित समुदायों के साथ कई वर्षों तक काम करने के बाद हुआ है.यही कारण है कि हमने शांति निर्माण के लिए फोरफोल्ड दृष्टिकोण विकसित किया है.         
    हालांकि यह पुरस्कार मुझे एक व्यक्ति के रूप में दिया जा रहा है, लेकिन हमने इसे एक “शांति कोष“ बनाने का फैसला किया है जो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में शांति निर्माण के लिए फोरफोल्ड दृष्टिकोण को सहयोग करने में मदद करेगा.       
    मेरे इन अनुभवों एवं विचारों पर आप सभी ने ध्यान दिया. इसके लिए फिर से आप सभी को धन्यवाद.

आलोक कुमार

सोमवार, 12 जून 2023

एनडीए सरकार गिरने के कारण भूमि आवंटन प्रक्रिया रुकी

 ● नीतीश कुमार के अहंकार की भेंट चढ़ा 2 हजार करोड़ का दरभंगा एम्स

● प्रधानमंत्री मोदी को श्रेय न मिलने देने के लिए की गई अड़ंगेबाजी 

● एनडीए सरकार गिरने के कारण भूमि आवंटन प्रक्रिया रुकी 

● महागठबंधन सरकार में राजद-जदयू के बीच एम्स को लेकर खींचतान

● एम्स को सहरसा ले जाने के लिए जदयू सांसदों ने सौंपा था ज्ञापन 

● शोभन में आवंटित जल-जमाव वाली भूमि लेने से केंद्र  ने किया इनकार 

पटना। पूर्व उपमुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सदस्य सुशील कुमार मोदी ने कहा कि नीतीश कुमार के अहंकार और महागठबंधन सरकार में राजद-जदयू के बीच खींचतान के चलते उत्तर बिहार के लाखों लोग  2000 करोड़ रुपये से बनने वाले दरभंगा एम्स के रूप में  केंद्र सरकार की बड़ी सौगात पाने से वंचित रह गए।

श्री मोदी ने कहा कि दरभंगा में एम्स बनाने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं मिले, इसलिए पहले दो साल तक तो मुख्यमंत्री इस बात अड़े रहे कि दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (डीएमसीएच) को ही अपग्रेड कर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) बना दिया जाए।  

   उन्होंने कहा कि किसी मेडिकल कॉलेज को अपग्रेड कर एम्स बनाने का नियम नहीं है, इसलिए अन्ततरू बिहार सरकार दरभंगा एम्स के लिए  डीएमसीएच परिसर में ही 150 एकड़ जमीन देने पर राजी हो गई। 82 एकड़ जमीन आवंटित भी कर दी गई थी। 

श्री मोदी ने कहा कि इस बीच नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के कारण जैसे ही राजद से हाथ मिलाया और सरकार बदल दी, वैसे ही दरभंगा एम्स सहित कई विकास परियोजनाओं पर ग्रहण लग गया। 

श्री मोदी ने कहा कि बदली सरकार में राजद और जदयू के बीच दरभंगा एम्स का श्रेय लेने की होड़ मच गई। उन्होंने कहा कि लालू प्रसाद के करीबी भोला यादव ने जब किसी संवैधानिक पद पर रहे बिना अशोक पेपर मिल (हायाघाट) की जमीन पर एम्स बनने की घोषणा कर दी, तब इसके जवाब में जदयू के लोग शोभन में एम्स बनवाने के लिए सक्रिय हुए। 

श्री मोदी ने कहा कि नीतीश कुमार के इशारे पर मधेपुरा के दिनेशचंद्र यादव सहित दो  दर्जन जदयू सांसदों ने केंद्र सरकार को ज्ञापन देकर दरभंगा के बजाय सहरसा में एम्स बनवाने की मांग कर दी। श्री मोदी ने कहा कि बाद में जदयू के दबाव में बिहार सरकार ने शोभन में जो 151 भूमि आवंटित की, वह एम्स का भवन बनाने के लिए उपयुक्त नहीं पायी गई। 

उन्होंने कहा कि शोभन की 20-30 फीट गड्ढे और जल-जमाव वाली जमीन का निरीक्षण करने बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम ने इसे अस्वीकार कर दिया और कोई दूसरी भूमि आवंटित करने का आग्रह किया। श्री मोदी ने कहा कि इस तरह नीतीश कुमार ने दरभंगा एम्स की योजना को  गहरे गड्ढे में धकेल दिया।  ऐसी राजनीति बिहार की जनता के प्रति जानबूझ किया गया अन्याय है।

आलोक कुमार


9 सूत्री माँगों की पूर्त्ति के लिए 22 जून को सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रदर्शन

  पटना.बिहार की ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा की बुनियाद के रूप में करीब एक लाख आशा कार्यकर्ता-आशा फैसिलिटेटर विगत 17 वर्षों से सेवा देती आ रही हैं. इनकी सेवाओं का ही परिणाम है कि आज बिहार में संस्थागत प्रसव- प्रसव के दौरान मातृ-शिशु मृत्यु दर-परिवार नियोजन से लेकर रोग निरोधक टीकाकरण तक के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियां हासिल हुई है.       

    कोरोना महामारी के दौरान उसकी रोकथाम के अभियान इनलोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर भी सेवा देती रही और इस क्रम में दर्जनों लोगों को जान तक गंवानी पड़ी हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से लेकर पटना उच्च न्यायालय तक ने उनकी उक्त भूमिका की प्रशंसा की. लेकिन उनकी उक्त भूमिका और योगदान के बावजूद संगठन की ओर से लगातार ज्ञापन-प्रतिनिधिमंडल वार्ता-धरना-प्रदर्शन जैसे सांकेतिक आंदोलन द्वारा ध्यानाकर्षित किये जाने के बावजूद केंद्र सरकार से लेकर बिहार सरकार द्वारा उनकी बुनियादी माँगों को पूरा करने के मामले में ताल-मटोल एवं अनदेखी करती आ रही है. स्वाभाविक तौर पर सरकार के इस रवैये के कारण लेकर राज्य की आशाओं-फैसिलिटेटरों के बीच भारी असंतोष व्याप्त है और निर्णायक आंदोलन शुरू करने को बाध्य हैं जिसकी सारी जिम्मेवारी सरकार पर है.

  ऊपर वर्णित परिस्थिति में बाध्य होकर आशा संयुक्त संघर्ष मंच के आह्वान पर आशा कार्यकर्त्ताओं व आशा फैसिलिटेटरों की 9 सूत्री माँगों की पूर्त्ति के लिए 22 जून,23 को सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रदर्शन नारेबाजी, 4 जुलाई,23 को सभी सिविल सर्जनों के समक्ष प्रदर्शन- नाराबाजी और 12 जुलाई,23 से राज्यव्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू करने का निर्णय लिया गया है । 

हमारी मांग है कि-

1(क). आशा कार्यकर्त्ता-फैसिलिटेटरों को राज्य निधि से देय 1000 रू० मासिक संबंधी सरकारी संकल्प में अंकित पारितोषिक  शब्द को बदलकर अन्य राज्यों की तरह नियत मासिक मानदेय किया जाय और इसे बढ़ाकर 10 हजार रू० किया जाय .              

(ख) उक्त विषयक सरकारी संकल्प के अनुरूप इस मद का वित्तीय वर्ष 19-20 (अप्रैल,19 से नवंबर,20 तक) का  मासिक 1000 रु० का बकाया राशि का  जल्द से जल्द भुगतान किया जाय.

2 .अश्विन पोर्टल से भुगतान शुरू होने के पूर्व का सभी बकाया राशि का भुगतान किया जाए  .

3(क). आशा कार्यकर्ताओं-फैसिलिटेटरों को देय प्रोत्साहन-मासिक पारितोषिक राशि का अद्यतन भुगतान सहित इसमें एकरूपता -पारदर्शिता लाई जाय.  

(ख) आशाओं के भुगतान में व्याप्त भ्रष्टाचार - कमीशनखोरी पर सख्ती से रोक लगाई जाए.

4. कोरोना काल की डियूटी के लिए सभी आशाओं-फैसिलिटेटरों को 10 हजार रुपया कोरोना भत्ता भुगतान किया जाय.

5(क). आशाओं को देय पोशाक (सिर्फ साड़ी) के साथ ब्लाउज, पेटीकोट तथा ऊनी कोट की व्यवस्था की जाय और इसके लिए देय राशि का अद्यतन भुगतान किया जाय.

(ख) फैसिलिटेटर के लिए भी पोशाक का निर्धारण और उसकी राशि भुगतान की शीघ्र व्यवस्था किया जाए .

(ग)फैसिलिटेटरों को 20 दिन की जगह पूरे माह का भ्रमण भत्ता (SVC) दैनिक 500/-रू की दर से भुगतान किया जाए .

6.(क).वर्षों पूर्व विभिन्न कार्यों के लिए निर्धारित प्रोत्साहन राशि की दरों में समुचित वृद्धि के लिए केन्द्र सरकार को प्रस्ताव एवं अनुशंसा प्रेषित किया जाए.

(ख) आशा व आशा फैसिलिटेटरों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाय .

7. कोरोना से (पुष्ट/अपुष्ट) मृत आशाओं को  राज्य योजना का 4 लाख और केंद्रीय बीमा योजना का 50 लाख राशि का  भुगतान किया जाये.

8. आशा कार्यकर्ता -फैसिलिटेटर को भी सामाजिक सुरक्षा योजना-पेंशन योजना का लाभ दिया जाय. जब तक नहीं किया जाता तब तक रिटायरमेंट पैकेज के रूप में एकमुश्त 10 लाख का  भुगतान किया जाय.

9. जनवरी 2019 के समझौते के अनुरूप मुकदमों की वापसी सहित अन्य अकार्यान्वित बिन्दुओं को शीघ्र लागू किया जाए.

  हम संवाददाता सम्मेलन के माध्यम बिहार सरकार से माँग करते हैं  कि समय रहते ऊपर वर्णित माँगों पर सकारात्मक निर्णय लेकर सरकारी आदेश जारी कर कर स्वास्थ्य सेवा में व्यवधान और टकराव को टालने के लिए अग्रसर होगी.

आलोक कुमार

रविवार, 11 जून 2023

कांग्रेस मुख्यालय में मिलन समारोह आयोजित

 भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुई पूर्व विधायक सुनीता देवी

पटना. कटिहार के कोढ़ा विधान सभा क्षेत्र की पूर्व विधायक श्रीमती सुनीता देवी अपने सैकड़ो समर्थकों के साथ भाजपा को छोड़ आज कांग्रेस में शामिल हुई। इसके लिए
कांग्रेस मुख्यालय में मिलन समारोह आयोजित किया गया.बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष डा0 अखिलेश प्रसाद सिंह ने श्रीमती सुनीता देवी एवं उनके समर्थकों को कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण करवायी. इस अवसर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के महासचिव श्री तारिक अनवर एवं विधायक दल के नेता डा0 शकील अहमद खान भी मौजूद थे.

     इस अवसर पर बिहार कांग्रेस अध्यक्ष डा0 अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा कि श्रीमती सुनीता देवी के कांग्रेस में आने से कांग्रेस की दलितों के लिए की जाने वाली संघर्ष को धार मिलेगी । लोगों को बताने में आसानी होगी कि कांग्रेस ही सच्चा हमदर्द है.

      भाजपा को छोड़ने की वजह बताते हुए श्रीमती सुनीता देवी ने कहा कि भाजपा में महिलाओं के साथ काफी भेदभाव अपनाया जाता है. नारा भले ही बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का दिया जाता है लेकिन अंदर जाने पर पता चलता है कि किस हद तक नारी उत्पीड़न के मामले भाजपा में सामने आते रहते हैं.मैं घुटन महसूस कर रही थी इसलिए भाजपा छोड़ कांग्रेस में वापसी कर रही हूँ. इस मिलन समारोह का मंच संचालन सदस्यता प्रभारी ब्रजेश प्रसाद मुनन ने किया.

      इस अवसर पर पूर्व विधान पार्षद लाल बाबू लाल, सदस्यता प्रभारी ब्रजेश प्रसाद मुनन, मीडिया चेयरमैन राजेश राठौड़, कटिहार जिला अध्यक्ष सुनील यादव, निर्मल वर्मा, ब्रजेश पाण्डेय, जमाल अहमद भल्लू, राज किशोर सिंह, कैलाश पाल,रामायण प्रसाद यादव, कैसर कुमार सिंह, शशि रंजन, अजय सिंह, रवि गोल्डन, दुर्गा प्रसाद,कुंदन गुप्ता, वसी अख्तर, संतोष श्रीवास्तव, उमेश कुमार राम, राजनन्दन कुमार सहित अन्य कांग्रेसजन उपस्थित थे.


आलोक कुमार

भाजपा ने दलितों और आदिवासियों को छलने का काम किया हैः के राजू

  

* दलितों के हित में विचारों और हक की लड़ाई लड़ती रही है कांग्रेसः के राजू

* भाजपा ने दलितों और आदिवासियों को छलने का काम किया हैः के राजू

* दलितों के उत्थान के लिए कांग्रेस प्रतिबद्ध, दलित संवाद में बोले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ अखिलेश प्रसाद सिंह

* दलित समाज के युवाओं को आगे बढ़कर लेनी होगी जिम्मेदारी: बिहार कांग्रेस प्रभारी भक्तचरण दास

पटना. बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी एवं रिसर्च विभाग के संयुक्त तत्वावधान में जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान सभागार में वृहद स्तर पर दलित संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया.बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डा. अखिलेश प्रसाद सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की.

    दलित संवाद कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, एस सी एस टी विभाग, पिछड़ा वर्ग विभाग एवं अल्पसंख्यक विभाग के राष्ट्रीय समन्वयक के राजू ने कहा कि दलितों के हित में विचारों और हक की लड़ाई कांग्रेस लगातार लड़ती रही है. आजादी के बाद से ही कांग्रेस ने इस देश में दलितों के उत्थान के लिए लगातार काम किया है और अब भी उस वैचारिक लड़ाई को लड़ने में अपनी पूरी ताकत लगा रही है.

    उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें दलितों की हमेशा चिंता रहती है. हमारे नेता को इससे मतलब नहीं है कि दलित समाज किस दल का मतदाता है उन्हें केवल उनके हक की चिंता होती है जिस पर उन्होंने कर्नाटक की एक घटना का जिक्र किया. देश के उत्थान में उन्होंने दलितों के योगदान का भी जिक्र किया. उन्होंने युवाओं और महिलाओं से आगे बढ़कर देशहित में काम करने का आह्वान किया और कहा कि कांग्रेस संगठन में इस वर्ग को सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व दी गयी है और आगे भी दी जाएगी. साथ ही उन्होंने जिक्र किया कि कांग्रेस ने दलित उत्थान के कितने लोक कल्याणकारी योजनाओं को उन्होंने संचालित किया और कैसे अपने दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में भी दलित समुदाय के सबसे बड़े नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को जिम्मेदारी सौंपी.

       बिहार कांग्रेस के प्रभारी भक्त चरण दास ने कहा कि कांग्रेस को जब जब मौका मिला है तब तब उसने देश में दलितों की स्थिति को सुधारा है और साथ ही अपने संगठन में भी उचित प्रतिनिधित्व देने का काम किया है.

    अपने अध्यक्षीय संबोधन   में प्रदेश अध्यक्ष डॉ अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा कि भाजपा की नीतियों के खिलाफ लड़ने को हमें एकजुट होना पड़ेगा. दलितों के साथ कांग्रेस ने हमेशा साथ निभाया है और संगठन ने जब-जब दलितों पर अत्याचार किया है तब-तब हमने प्रदेश से नेताओं की टीम बनाकर भेजने का काम किया है.उन्होंने दलित संवाद के आयोजकों को धन्यवाद करते हुए कहा कि बिहार में सरकार के सहयोगी होने के नाते हम लोग प्रतिबद्ध हैं कि दलितों के स्थिति को मजबूत बनाना है.

    विधानसभा में कांग्रेस दल के नेता डॉ शकील अहमद खान ने कहा कि दलितों को अवसर प्रदान करने की जरूरत बै इसके बाद समानता स्वतः आने लगेगी.बिहार सरकार के मंत्री मुरारी गौतम ने कहा कि भाजपा ने दलित राष्ट्रपति और आदिवासी राष्ट्रपति के आड़ में देश के मूल संविधान को बदलने का काम किया है इसके लिए बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के अनुयायी उन्हें माफ नहीं करेंगे.

   रिसर्च विभाग के राष्ट्रीय प्रभारी सचिव हर्षवर्धन श्याम ने कहा कि इस देश के निर्माण में गरीबों, दलितों और पिछड़ों का बहुत बड़ा योगदान है इसलिए उनके हक की लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है और कांग्रेस उसके लिए प्रतिबद्ध है. दलितों के दर्द और उत्पीड़न को समझने की जरूरत है और इसके लिए दलित वर्ग के युवाओं को आगे आने की जरूरत है. शैक्षणिक संस्थानों में दलित युवाओं की हकमारी पर भी उन्होंने विचार रखें.

   बिहार कांग्रेस रिसर्च विभाग के चेयरमैन व प्रवक्ता और कार्यक्रम के संयोजक आनन्द माधव ने अपने संबोधन में कहा  कि इस बैठक में दलितों के साथ एवं उनके लिये काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता, समाजसेवी संस्थायें, शिक्षक, छात्र नेता, राजनीतिक नेतागण एवं दलित लाभार्थी के द्वारा उचित सुझाव दिए गए जिसको निश्चित तौर पर हमारे नेता नीति निर्माण में इस्तेमाल करेंगे.  

  उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का मूल उद्देश्य दलितों के मूल समस्याओं से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को द्विपक्षीय संवाद के माध्यम से अवगत कराना था जिसमें इस कार्यक्रम को शीर्ष नेतृत्व ने इसे गांवों तक ले जाने की बात कही है.

    सिविल सोसायटी के सदस्यों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रबुद्धजनों ने भी संवाद में हिस्सा लेकर अपने सुझाव दिए जिनका अभिनंदन नेताओं द्वारा मंच पर किया गया.कार्यक्रम में मंच संचालन डॉ मधुबाला ने किया.

    कार्यक्रम में बिहार के प्रभारी भक्तचरण दास, एआईसीसी एस सी एस टी विभाग के राष्ट्रीय चेयरमैन राजेश लिलोटिया, बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री मुरारी प्रसाद गौतम, कांग्रेस विधायक दल के नेता डॉ शकील अहमद खान, विधान परिषद में दल के नेता डॉ मदन मोहन झा, रिसर्च विभाग के राष्ट्रीय प्रभारी सचिव हर्षवर्धन श्याम, विधान पार्षद प्रेमचंद मिश्र, डॉ समीर कुमार सिंह, मुख्य सचेतक व एससी एसटी विभाग के प्रदेश चेयरमैन राजेश राम, विधायक मुन्ना तिवारी, विजेंदर चौधरी, आनंद शंकर सिंह, मीडिया विभाग के चेयरमैन राजेश राठौड़, पूर्व मंत्री वीणा शाही, पूर्व विधायक डॉ अशोक राम, बंटी चौधरी, लालबाबू लाल, विजेंद्र यादव, पूनम पासवान, ब्रजेश पांडेय, ब्रजेश मुनन, निर्मल वर्मा, अशोक गगन, डॉ स्नेहाशीष वर्धन पाण्डेय, सौरभ सिन्हा, चुन्नू सिंह, सुमित सन्नी सहित सिविल सोसायटी के लोग एवं कांग्रेसजन उपस्थित रहें.



आलोक कुमार

डब्ल्यूपीओ का मुख्यालय बिहार से हटाना मोदी सरकार का बिहार विरोधी फैसला

 

पटना.बिहार कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने महागठबंधन द्वारा 15 जून को आयोजित की जाने वाली धरना में पूरी ताकत से प्रदेश के सभी जगहों पर भाग लेने का निर्णय लिया है. इसके लिए बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डा0 अखिलेश प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में पार्टी मुख्यालय, सदाकत आश्रम में एक बैठक आयोजित की गयी जिसमें धरना में सम्मिलित होने का निर्णय लिया गया.इसकी जानकारी स्वयं बिहार कांग्रेस अध्यक्ष ने दी.गौरतलब है कि अगले 15 जून को महागठबंधन की ओर से दिल्ली में संघर्षरत महिला पहलवानों के समर्थन में प्रदेश भर में धरना आयोजित करने का प्रस्ताव था जिस पर बिहार कांग्रेस अध्यक्ष ने आज एक बैठक बुलाई थी जिसमें सम्मिलित होने का निर्णय लिया गया. बैठक में भाग लेने वाले नेताओं में मुख्य रूप से राजेश राठौड़, पूर्व विधायक बंटी चौधरी, निर्मल वर्मा, राज कुमार राजन, लाल बाबू लाल, कपिलदेव प्रसाद यादव, मिन्नत रहमानी, असित नाथ तिवारी, चन्द्र प्रकाश सिंह, संजीव कुमार कर्मवीर सहित अन्य नेता शामिल रहे.

डब्ल्यूपीओ का मुख्यालय बिहार से हटाना मोदी सरकार का बिहार विरोधी फैसला

केंद्र की भाजपा सरकार लगातार बिहार के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है.ये बातें बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने कही. कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि जीएसटी में बिहार की हिस्सेदारी हो चाहे केंद्रीय कोटे से मिलने वाली बिजली बिहार की लगातार उपेक्षा हो रही है. केंद्रीय योजनाओं में भी बिहार को पूरी हिस्सेदारी नहीं मिल रही है. बिहार का इतना बड़ा नुकसान करने वाली मोदी सरकार एक बार फिर बिहारियों का रोजगार छीन रही है. भारतीय रेल के अलग-अलग कारखानों के निर्माण और आधुनिकीकरण में बड़ी भूमिका निभाने वाले कारखाना परियोजना संगठन (डब्ल्यूपीओ) का मुख्यालय बिहार से हटा कर बिहारियों का रोजगार छीनने वाली मोदी सरकार को बिहार के लोग कभी माफ नहीं करेंगे. मोदी सरकार के इस फैसले से राज्य को सालाना 50 करोड़ रुपए से अधिक का जीएसटी नुकसान होगा. इससे जीएसटी में राज्य की हिस्सेदारी घटेगी और राजस्व का बड़ा नुकसान होगा. भाजपा ने बिहार को अपना दुश्मन राज्य मान लिया है और बदले की भावना से केंद्र सरकार फैसले ले रही है.ये बिहार के हक़ की लड़ाई है.बिहार कांग्रेस इस मसले पर चुप नहीं बैठने वाली.

आलोक कुमार

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