मंगलवार, 29 जुलाई 2025

एक बार फिर दक्षिणपंथियों के निशाने पर ईसाई समुदाय के नन

 


दुर्ग.एक बार फिर दक्षिणपंथियों के निशाने पर ईसाई समुदाय के नन और लोग आ गए हैं. बता दें कि कुछ दक्षिणपंथी समूहों द्वारा ईसाई समुदाय, विशेष रूप से नन और अन्य सदस्यों को निशाना बनाते  हैं. इस बार दुर्ग में कथित अंजाम देने में सफल हो गए.ये घटनाएं धार्मिक और राजनीतिक तनावों को दर्शाती हैं, जहां दक्षिणपंथी विचारधाराएं अक्सर ईसाई धर्म के साथ जुड़ जाती हैं और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देती हैं.

 दुर्ग रेलवे स्टेशन से आगरा जाने की तैयारी में दो नन सहित एक युवक को बजरंग दल के लोगों ने शुक्रवार की सुबह घेर लिया. दोनों नन के साथ तीन लड़कियां भी थीं, जो नारायणपुर एवं ओरछा क्षेत्र की है.बजरंग दल के नेताओं ने आरोप लगाया कि तीनों लड़कियों का मानव तस्करी कर मतांतरण के लिए ले जाने की तैयारी थी.दुर्ग रेलवे स्टेशन पर घंटों गहमागहमी के बाद जीआरपी ने दोनों नन प्रीति मेरी, वंदना फ्रांसिस एवं युवक सुकमन मंडावी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 143 के तहत मामला दर्ज कर लिया है.लड़कियों को फिलहाल सखी सेंटर ले जाया जा रहा है.

       इस संदर्भ में  भारतीय कैथोलिक बिशप्स सम्मेलन (सीबीसीआई) ने दुर्ग रेलवे स्टेशन पर हाल ही में दो कैथोलिक धार्मिक महिलाओं की गिरफ्तारी और कथित शारीरिक हमले की कड़ी निंदा की है.सीबीसीआई ने ननों के उत्पीड़न की निंदा की, सरकार से तत्काल कार्रवाई का आग्रह किया है.

 विस्तार से भारतीय कैथोलिक बिशप्स सम्मेलन (सीबीसीआई) के प्रवक्ता ने बताया कि दुर्ग रेलवे स्टेशन पर हाल ही में दो कैथोलिक धार्मिक महिलाओं की गिरफ्तारी और कथित शारीरिक हमले की कड़ी निंदा की है और इसे देश भर में ननों को निशाना बनाकर उत्पीड़न, झूठे आरोपों और मनगढ़ंत मामलों की एक परेशान करने वाली प्रवृत्ति का हिस्सा बताया है.

सीबीसीआई के अनुसार, ननों के साथ आई लड़कियों के माता-पिता के लिखित सहमति पत्र मौजूद होने के बावजूद यह घटना घटी.सभी लड़कियाँ कानूनी रूप से वयस्क हैं, जिनकी उम्र 18 वर्ष से अधिक है.सम्मेलन ने उन रिपोर्टों पर विशेष रूप से चिंता व्यक्त की जिनमें कहा गया था कि घटना के दौरान ननों के साथ शारीरिक हमला किया गया था.

सीबीसीआई ने चिंता जताई है कि ईसाई धार्मिक महिलाओं पर असामाजिक तत्वों द्वारा नज़र रखी जा रही है, जो उन्हें रेलवे स्टेशनों पर घेर लेते हैं, भीड़ को उकसाते हैं और अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं.सम्मेलन ने कहा कि ये कार्रवाइयाँ न केवल इन महिलाओं की गरिमा और शील के लिए, बल्कि उनके जीवन के लिए भी गंभीर खतरा हैं.

उत्पीड़न की इन लगातार घटनाओं को "संविधान का गंभीर उल्लंघन" बताते हुए, सीबीसीआई ने राज्य सरकारों से सभी महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने का आह्वान किया है.इसके अतिरिक्त, सम्मेलन ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है.

कैथोलिक चर्च ने इस मुद्दे को सभी उपयुक्त मंचों पर उठाने और धार्मिक ननों और पादरियों की गरिमा का हनन करने, धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करने या अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध शत्रुता फैलाने के किसी भी प्रयास के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े होने का संकल्प लिया है.

न्याय और अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए, सीबीसीआई ने अधिकारियों से धार्मिक महिलाओं के अधिकारों और गरिमा को बनाए रखने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने का आग्रह किया.संगठन ने स्थिति पर कड़ी नज़र रखने और भारत में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने का संकल्प लिया है.


सोमवार, 28 जुलाई 2025

14वीं पुण्यतिथि पर विशेष:

 14वीं पुण्यतिथि पर विशेष:

कुष्ठ रोगियों के मसीहा ‘बाबा’ ब्रदर क्रिस्टुदास को श्रद्धांजलि

बाबा क्रिस्टुदास की विरासत आज भी जीवित है

रक्सौल.सुंदरपुर, बिहार. कुष्ठ रोगियों के लिए अपने जीवन को समर्पित कर देने वाले समाजसेवी और "कुष्ठ रोगियों के मसीहा" के रूप में विख्यात ब्रदर क्रिस्टुदास की 14वीं पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई. 27 जुलाई 2011 को 74 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था.

केरल के कोट्टायम जिले के एडमावुकु गांव में 1937 में जन्मे ब्रदर क्रिस्टुदास ने जीवन के शुरुआती दिनों में ही मानव सेवा का मार्ग चुना.1970 के दशक में वे कोलकाता के पास टीटागढ़ स्थित सेंट मदर टेरेसा के कुष्ठ रोग केंद्र में निदेशक रहे. वहीं से प्रेरित होकर वे बिहार आए, जो उस समय कुष्ठ रोग से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में था.

लिटिल फ्लावर अस्पताल की स्थापना

1982 में ब्रदर क्रिस्टुदास ने पूर्वी चंपारण के रक्सौल प्रखंड के सुंदरपुर गांव में लिटिल फ्लावर लेप्रोसी वेलफेयर एसोसिएशन की स्थापना की. इस संस्था के तहत 200 बेड वाले लिटिल फ्लावर लेप्रोसी हॉस्पिटल ने हजारों कुष्ठ रोगियों को मुफ्त इलाज और पुनर्वास की सुविधा प्रदान की. उनकी करुणा और समर्पण के कारण मरीज उन्हें प्यार से ‘बाबा’ कहकर पुकारते थे.

नेपाल और यूपी तक फैली सेवा की पहुंच

उनकी सेवाओं की चर्चा बिहार तक सीमित नहीं रही।.नेपाल और उत्तर प्रदेश से भी कुष्ठ रोगी सुंदरपुर पहुंचने लगे। समाजसेविका कविता भट्टराई 'माताजी', जिन्हें क्रिस्टुदास ने अपने निधन से पहले संस्था की जिम्मेदारी सौंपी थी, आज भी उसी सेवा भाव से अस्पताल का संचालन कर रही हैं.

कुष्ठ रोग नियंत्रण की दिशा में योगदान

डॉ. गिरीश चंद्र के अनुसार, "आज 10 हजार की आबादी में मुश्किल से एक-दो मरीज ही मिलते हैं.यह बाबा क्रिस्टुदास जैसे लोगों की अथक मेहनत का परिणाम है कि कुष्ठ रोग अब नियंत्रित श्रेणी में आ चुका है." ब्रदर क्रिस्टुदास की पुण्यतिथि पर सुंदरपुर में विशेष प्रार्थना सभा आयोजित की गई और उनके मानव सेवा कार्यों को याद किया गया। स्थानीय लोगों ने कहा, "बाबा का सपना था कि समाज कुष्ठ रोग से मुक्त हो और मरीज सम्मानजनक जीवन जी सकें."बाबा क्रिस्टुदास की विरासत आज भी जीवित है.

आलोक कुमार

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शनिवार, 26 जुलाई 2025

फादर जेरोम डिसूजा का निधन

कैपुचिन फादर जेरोम डिसूजा का अंतिम संस्कार संपन्न

फादर जेरोम डिसूजा का निधन 23 जुलाई को बरेली में हो गया था 

लखनऊ. फादर जेरोम डिसूजा का निधन 23 जुलाई को बरेली में हो गया था.आज 25 जुलाई को लखनऊ में फादर जेरोम डिसूजा, कैपुचिन का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ.जिसका संचालन बरेली, उत्तर प्रदेश, भारत के बिशप इग्नाटियस डिसूजा और कई कैपुचिन, डायोकेसन पुरोहित और कई शिक्षकों और विश्वासियों द्वारा किया गया था.

दुःखद निधन

फादर जेरोम डिसूजा कैपुचिन (87) का  23 जुलाई को बरेली में निधन हो गया.वे एक संत पुरोहित थे और उन्होंने कैपुचिन संप्रदाय, चर्च और समाज की अनेक पदों पर सेवा की. वे गोवा के मोंटे दे गिरिम में एक कुशल शिक्षक, आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज में प्रधानाचार्य और उत्तर प्रदेश के बरेली स्थित हार्टमैन कॉलेज में भी प्रधानाचार्य थे; वे न्यूज़ीलैंड में एक मिशनरी और बांग्लादेश के मैमनसिंह में क्लोइस्टर्ड सिस्टर्स के पादरी थे, और बरेली, उत्तर प्रदेश में सेवानिवृत्त हुए.

   

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शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

ईसाई मिशनरी संस्थाओं में स्वैच्छिक इस्तीफे की आड़ में जबरन निष्कासन

 

ईसाई मिशनरी संस्थाओं में स्वैच्छिक इस्तीफे की आड़ में जबरन निष्कासन कर दिया जाता है. मिशनरी प्रबंधन की सॉफ्ट टर्मिनेशन रणनीति उजागर,दर्जनों कर्मचारियों को इस रणनीति के तहत नौकरी से बाहर कर देने की खबर......

पटना.राजधानी पटना में है मेडिकल मिशन सिस्टर्स द्वारा संचालित कुर्जी होली फैमिली अस्पताल.यहां कार्यरत कर्मी हलकान और परेशान हैं.यहां के कर्मी जानते हैं कि कभी भी यहां की प्रबंधन की मनमर्जी के शिकार होकर स्वैच्छिक इस्तीफे की आड़ में जबरन नौकरी से निष्कासन कर दिया जाएगा.यहां के अगस्टीन,वर्गीस,अशोक,सत्यनारायण आदि कर्मियों पर निष्कासन की कैची चल गई है.ये सबके सब ईसाई मिशनरी संस्था की प्रबंधक की ‘सॉफ्ट टर्मिनेशन रणनीति‘ के शिकार हो चुके हैं.

        जानकार लोगों का कहना है कि कुर्जी होली फैमिली अस्पताल की प्रबंधक ने तारा टोप्पों को जबरन नौकरी से निकालने के बाद काफी बवाल हुआ था,तब से कर्मचारियों को  प्रत्यक्ष रूप से नहीं निकाला जाता हैं.उनको मनोवैज्ञानिक दबाव डालकर उनसे इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया जाता है.यहां तक घरेलू जांच कमिटी गठित कर जबरन मानसिक प्रताड़ना देना शुरू कर दिया जाता है.उनसे कहा जाता है कि अगर इस्तीफा नहीं देते हैं तो आपको वेतन व अन्य सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा. इस्तीफा देने से इनकार करने पर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी जाती है. उनके लिए विदाई सम्मान या फेयरवेल कार्यक्रम नहीं होता है, भले ही उनकी सेवा अवधि लंबी क्यों न हो.


1. मलहम लगाना -शुरुआत में कर्मचारी को समझाया जाता है कि “आपके लिए यह बेहतर होगा”

2. दबाव में कहा जाता है – “इस्तीफा नहीं देंगे तो कानूनी कार्रवाई होगी”

3.धमकी - "3 माह का वेतन और अन्य लाभ नहीं मिलेंगे”

4. मजबूरी में इस्तीफा- "कर्मचारी को दिखाया जाता है कि बाहर का रास्ता ही विकल्प है"

5. कोई फेयरवेल नहीं -"वर्षों की सेवा के बावजूद कोई सार्वजनिक विदाई नहीं होती"

यह प्रबंधन की चालाकी है. स्वेच्छा से इस्तीफा दिया.यह दिखाने से संस्था कानूनी झंझट से बचती है.कर्मचारी न्याय की लड़ाई नहीं लड़ पाते क्योंकि दस्तावेजों में ‘इस्तीफा’ होता है यह नैतिक सवाल है कि क्या यह स्वैच्छिक इस्तीफा है या ढका-छिपा निष्कासन?सेवा करने वाले कर्मचारियों को इस तरह बाहर करना क्या क्रूरता नहीं? प्रासंगिक उदाहरण है कि यही नीति उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के साथ हाल में उपयोग में लाई गई..जैसे दूध में गिरी मक्खी को निकाल फेंकना..यह नीति केवल अस्पताल या मिशनरी संस्था नहीं, कई अन्य एनजीओ और संस्थानों में भी प्रचलित है.

मांगें

1. ऐसे संस्थानों में लेबर लॉ और मानवाधिकार आयोग की जांच हो

2. निकाले गए कर्मचारियों को न्याय व हर्जाना मिले

3. पारदर्शी टर्मिनेशन पॉलिसी अनिवार्य हो

4. धर्म आधारित संस्थाओं की जवाबदेही तय हो


आलोक कुमार


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गुरुवार, 24 जुलाई 2025

उनकी स्थिति आज भी संवैधानिक हकों से कोसों दूर

 

बिहार में फिर गूंजा भूमि अधिकार का सवाल: तीन डिसमिल को लेकर जन सुराज का प्रदर्शन तेज

17 साल बाद भी लागू नहीं हुई बंदोपाध्याय आयोग की सिफारिशें, चुनावी मौसम में गरमाया मुद्दा

पटना. बिहार में आवासीय भूमिहीनों को जमीन देने का वादा एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है. वर्ष 2006 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भूमि सुधार के लिए डी. बंदोपाध्याय आयोग का गठन किया था, जिसने 2008 में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी थी. रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई थी कि भूमिहीनों को आवास के लिए जमीन दी जानी चाहिए.

प्रारंभ में सरकार ने दस डिसमिल जमीन देने की बात कही, जिसे बाद में पांच डिसमिल और अंततः तीन डिसमिल तक सीमित कर दिया गया.मगर 17 साल बाद भी इन सिफारिशों को जमीन पर उतारने की कोई ठोस पहल नहीं की गई है.

अब ‘जन सुराज’ ने उठाया मोर्चा

राज्य में चुनावी माहौल के बीच ‘जन सुराज’ संगठन ने इस मुद्दे को फिर से जोरदार ढंग से उठाया है.संगठन के कार्यकर्ता प्रदेश भर में प्रदर्शन कर रहे हैं और तीन डिसमिल भूमि आवंटन को चुनावी एजेंडे में शामिल करने की मांग कर रहे हैं.

जन सुराज के संस्थापक सदस्य गोडेन अंतुनी ठाकुर ने साफ शब्दों में कहा है, “हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक बिहार के हर भूमिहीन परिवार को तीन डिसमिल जमीन नहीं दिलवा देते.”

राजनीतिक खामोशी पर सवाल

विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा है कि नीतीश कुमार सरकार ने भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. यह रिपोर्ट राज्य के भूमिहीन, दलित, वंचित और आदिवासी समुदायों के लिए एक उम्मीद की किरण मानी जा रही थी, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह निष्क्रिय पड़ी है.

भूमिहीनों की दशा जस की तस

बिहार में लाखों परिवार आज भी बिना वैध आवासीय भूमि के झुग्गियों, सरकारी जमीनों या जल-जंगल की जमीन पर रह रहे हैं. न बिजली, न पानी, न स्थायी अधिकार—उनकी स्थिति आज भी संवैधानिक हकों से कोसों दूर है.


भूमि अधिकार फिर बना चुनावी मुद्दा

चुनाव नजदीक आते देख तीन डिसमिल जमीन का सवाल फिर गूंज रहा है.जन संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब तक गरीबों को जीने लायक जमीन नहीं दी जाएगी, तब तक विकास की बात अधूरी रहेगी.

आलोक कुमार 

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बुधवार, 23 जुलाई 2025

विधान सभा घेराव के लिए प्रस्थान करेगा

 

पटना. भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (बिहार) द्वारा बेरोजगार, पेपर लीक, पलायन और छात्रावासों सहित शिक्षण संस्थानों की जर्जर स्थिति के खिलाफ व निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग को लेकर कल दिनांक 24 जुलाई, 2025 को मध्याह्न 12-00 बजे प्रदेश काग्रेस मुख्यालय, सदाकत आश्रम से राजापुर पुल, बोरिंग रोड होते हुए विधान सभा घेराव के लिए प्रस्थान करेगा. उक्त कार्यक्रम में भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (बिहार) के प्रभारी श्री सत्यम कुशवाहा जी अलावे कई गणमान्य नेतागण के साथ-साथ हजारों की संख्या में एन.एस.यू.आई के छात्रगण भी उपस्थित रहेंगे।  

आलोक कुमार 

सोमवार, 21 जुलाई 2025

आवासीय भूमिहीनों को जमीन दिलाने एकता परिषद का गांधीवादी आंदोलन ग्वालियर से दिल्ली तक

 आवासीय भूमिहीनों को जमीन दिलाने एकता परिषद का गांधीवादी आंदोलन ग्वालियर से दिल्ली तक

जन सत्याग्रह, पी. वी. राजगोपाल के नेतृत्व में देशभर से हजारों लोगों की पदयात्रा होती थी

पटना. आवासीय भूमिहीनों को न्यूनतम तीन डिसमिल भूमि दिलाने की मांग को लेकर जन संगठन एकता परिषद ने बीते दो दशकों में कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया है.इस आंदोलन की अगुवाई देश के वरिष्ठ गांधीवादी नेता पी. वी. राजगोपाल ने की, जिसका उद्देश्य था – शांतिपूर्ण सत्याग्रह के माध्यम से गरीबों और हाशिए पर खड़े समुदायों के भूमि अधिकार सुनिश्चित करना.

2007 से लगातार उठती रही आवाज

2007 में जनादेश यात्रा के नाम से पहला बड़ा अभियान शुरू हुआ, जिसमें देशभर के हजारों भूमिहीनों ने भाग लिया.इस अभियान के तहत सरकार से आवास और आजीविका के लिए भूमि देने की नीति तैयार करने की मांग की गई.

2012 में ‘जन सत्याग्रह’ बनी निर्णायक घड़ी

इस आंदोलन की सबसे अहम कड़ी 2012 में देखने को मिली, जब ग्वालियर से दिल्ली तक लगभग 50,000 लोगों ने पैदल मार्च किया। इसे जन सत्याग्रह का नाम दिया गया. शांतिपूर्ण पदयात्रा के इस आयोजन ने देश का ध्यान आकर्षित किया.अंततः केंद्र सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत की और कुछ बिंदुओं पर सहमति जताई, जिसमें भूमि सुधार नीति, भूमिहीनों की पहचान और भूमि आवंटन की प्रक्रिया तेज करने के वादे शामिल थे.

2018 में ‘जनांदोलन’ के रूप में फिर उठी मांग

2018 में जनांदोलन के नाम से एक और चरण शुरू किया गया.इसमें फिर से भूमि अधिकार, वन अधिकार और आजीविका सुरक्षा को लेकर मांगें उठाई गई.यह आंदोलन भी पूरी तरह अहिंसात्मक रहा और गांधीवादी मूल्यों पर आधारित था.

गांधी के रास्ते पर राजगोपाल

पी. वी. राजगोपाल, जो कभी चंबल के डकैतों के पुनर्वास में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं, ने जीवन भर अहिंसा और जन संगठन की ताकत को मजबूत किया.उनका मानना है कि भारत में भूमि के बिना न तो आत्मसम्मान संभव है और न ही स्थायी विकास.

मांग आज भी प्रासंगिक

एकता परिषद की प्रमुख मांग रही है कि हर भूमिहीन परिवार को कम-से-कम तीन डिसमिल भूमि आवास के लिए दी जाए.आज भी देश के कई हिस्सों में लाखों परिवार ऐसे हैं, जो बिना किसी वैध जमीन के बसे हैं.यह आंदोलन न केवल जमीन की मांग है, बल्कि गरिमा और अधिकार की भी मांग है.

आलोक कुमार

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