मंगलवार, 18 नवंबर 2025

सत्ता सिर्फ जीत का नाम नहीं

 

पटना .बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का परिवार सिर्फ एक राजनीतिक घराना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की उस लंबी लड़ाई का प्रतीक रहा है जिसने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया. परंतु हालिया चुनावी झटका इस विशाल परिवार में गहरी दरारें उभारता दिख रहा है—ऐसी दरारें, जिनके संकेत वर्षों से भीतर ही भीतर पनप रहे थे.

लालू प्रसाद और राबड़ी देवी—यह जोड़ी बिहार की राजनीति में ‘कठोर निर्णय’ और ‘मां-की ममता’ का असाधारण संगम मानी जाती है. एक ओर लालू की जन-नेतृत्व क्षमता, दूसरी ओर राबड़ी देवी की सादगी पर आधारित राजनीतिक उपस्थिति—इन दोनों ने मिलकर बिहार में एक वैकल्पिक राजनीति धारा तैयार की.परंतु नेतृत्व जब अगली पीढ़ी की ओर बढ़ा, तो परिवार की विविधता एकता पर भारी पड़ने लगीं.

पुत्रियाँ: त्याग, मौन और विद्रोह की तीन छवियाँ

मीसा भारती हमेशा पार्टी की वैचारिक धुरी के रूप में सामने आईं, लेकिन लोकसभा में दो लगातार हारों ने उनके राजनीतिक ग्राफ को धूमिल किया.रोहिणी आचार्य—वही बेटी जिन्होंने पिता को किडनी देकर देशभर में मिसाल कायम की—अब राजनीति से दूर जाने का फैसला कर चुकी हैं। यह निर्णय सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि परिवार की राजनीतिक थकान और अंदरूनी संघर्षों की ओर भी संकेत करता है.रागिनी, चंदा और हेमा—ये तीनों राजनीति से अलग, लेकिन परिवार की परिधि में स्थिर हैं; परंतु इनका मौन भी परिवार की खामोश बेचैनी का ही एक हिस्सा है.

पुत्र: महत्वाकांक्षाओं का टकराव

तेज प्रताप यादव—भावनात्मक, उग्र और अक्सर अप्रत्याशित. उनका राजनीतिक सफर किनारों से टकराता हुआ आगे बढ़ रहा है. वे परिवार की राजनीति में रंग तो भरते हैं, पर दिशा नहीं.

इसके विपरीत, तेजस्वी यादव—संगठित, संयमित और अपनी रणनीति में स्पष्ट। वे लालू के वास्तविक राजनीतिक उत्तराधिकारी बने और आज बिहार की विपक्षी राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ माने जाते हैं.

दोनों भाइयों के बीच टकराव और व्यक्तित्व का अंतर राजद के भीतर चल रहे अनकहे संघर्ष का आईना है. यह संघर्ष सत्ता के लिए नहीं, बल्कि विरासत की उस परिभाषा को लेकर है जो लालू प्रसाद की राजनीति ने दशकों में गढ़ी.

क्या परिवार और पार्टी साथ-साथ चल पाएंगे?

चुनावों में मिली करारी हार न केवल पार्टी की कमजोरी का परिणाम है, बल्कि परिवार के भीतर संवादहीनता की एक बड़ी कीमत भी. रोहिणी का राजनीति से दूरी बनाना, मीसा का संघर्ष, तेजप्रताप का असंतुलन, और तेजस्वी का एकाकी नेतृत्व—ये सभी संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि राजद अब एक सामूहिक परिवारवाद से आगे बढ़कर ‘एकल नेतृत्व’ की ओर जा रहा है.

समापन: राजनीति का नया मोड़

लालू परिवार की यह यात्रा उस दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां इतिहास की चमक और वर्तमान की चुनौतियों आमने-सामने खड़े हैं.तेजस्वी यादव इस परिवार की राजनीति का भविष्य हैं—लेकिन यह भविष्य तभी मजबूती से खड़ा होगा जब परिवार के भीतर की दरारें संवाद और विश्वास से भर सकें.क्योंकि बिहार की राजनीति में लालू परिवार सिर्फ एक घराना नहीं, बल्कि वह कथा है—जो बताती है कि सत्ता सिर्फ जीत का नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग और निरंतर आत्ममंथन का परिणाम है.

आलोक कुमार

रविवार, 16 नवंबर 2025

रोमन कैथोलिक चर्च चुहड़ी पल्ली में सालाना यूखरिस्तिय यात्रा निकाली गई


रोमन कैथोलिक चर्च चुहड़ी पल्ली में सालाना यूखरिस्तिय  यात्रा निकाली गई

चुहड़ी .चुहड़ी की शांत धरती आज प्रभु-भक्ति के स्वर से गूंज उठी. बेतिया धर्मप्रांत के अंतर्गत स्थित आवर लेडी असम्प्शन चर्च से निकली वार्षिक यूखरिस्तिय यात्रा ने पूरे क्रिश्चियन क्वार्टर को आस्था के उजाले से आलोकित कर दिया। येसु ख्रीस्त के सम्मान में उठते स्वर— “राजा तेरा राज्य आवे”—मानो आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँच रहे थे और हर सुनने वाले हृदय में आध्यात्मिक अनुराग जगाते जा रहे थे.

इस पवित्र यात्रा की गरिमा उस समय और बढ़ गई जब बेतिया धर्मप्रांत के बिशप पीटर सेबेस्टियन गोबियस तथा विकार जनरल फादर फिनटन ने श्रद्धालुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कदम बढ़ाए। उनके साथ अनेक पुरोहितों, सिस्टरों तथा बेतिया, दुसैया, चखनी, चनपटिया, रामनगर, सिरिसिया बगहा, सिवान, छपरा, गोपालगंज और नरकटियागंज से आए ईसाई समुदाय के सैकड़ों बच्चे, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे.

पल्ली पुरोहित फादर हरमन ने यात्रा में शामिल प्रत्येक श्रद्धालु के प्रति आभार व्यक्त किया और ईश्वर के प्रेम, एकता एवं त्याग के संदेश को जीवन में आत्मसात करने का आग्रह किया। उन्होंने याद दिलाया कि ईश्वर का राज्य सभी के लिए खुला है—इसलिए उसके उपकारों के प्रति कृतज्ञ रहना और मानवता को प्रेमपूर्वक अपनाना हम सभी की जिम्मेदारी है.

    यात्रा पारंपरिक मार्ग से होकर क्रिश्चियन क्वार्टर की गलियों से गुजरी. संत आग्नेस स्कूल में निर्मित बेदी तथा मां मरियम के ग्रोटो में सजाई गई बेदी पर पवित्र सैक्रामेंट के साथ विशेष प्रार्थनाएं अर्पित की गईं.छोटे-छोटे फ्लावर गर्ल्स और युवा बालिकाओं ने साक्रमेंट के सम्मान में फूल वर्षा की और संगीत मंडली ने भक्ति गीतों से वातावरण को और अधिक पवित्र बना दिया.

गिरजाघर हो या ग्रोटो, ईसाई मोहल्ला हो या गलियां—हर स्थान केले के पेड़ों, रंग-बिरंगी झंडियों और फूलों से सजा हुआ था. यूखरिस्तिय यात्रा सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि समुदाय को जोड़ने वाली उस अदृश्य डोर का प्रतीक बनी, जो प्रेम, सेवा और कृतज्ञता से समाज को अधिक मानवीय और शांतिमय बनाती है. आज चुहड़ी ने आस्था की इस सामूहिक अनुभूति के माध्यम से एक बार फिर संदेश दिया—ईश्वर प्रेम है, और वह प्रेम में एक-दूसरे से जोड़ता है.


आलोक कुमार

 

शनिवार, 15 नवंबर 2025

कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण संस्था

 


पटना. कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण संस्था — कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) — अब अपने लाखों पेंशनभोगियों के लिए एक राहत भरी खबर लाने की तैयारी में है. नवंबर में प्रस्तावित सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) की बैठक में पेंशन बढ़ोतरी पर अंतिम फैसला होने की संभावना जताई जा रही है.वर्तमान में EPFO के लगभग 75 लाख पेंशनभोगी हैं, जिनमें अधिकांश को न्यूनतम ₹1000 मासिक पेंशन मिल रही है — एक ऐसी राशि जो मौजूदा महंगाई दर और जीवन-यापन की लागत के सामने लगभग प्रतीकात्मक ही है। सरकार और संगठन अब इस रकम को ₹2000 या ₹2500 तक बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। यह सुधार यदि स्वीकृत होता है, तो इसे 1 जनवरी 2026 या 1 अप्रैल 2026 से लागू किया जा सकता है.

वित्तीय ढांचा और सरकार की भूमिका

EPFO की पेंशन योजना का ढांचा इस तरह बनाया गया है कि कर्मचारी और नियोक्ता — दोनों अपनी ओर से 12-12 प्रतिशत योगदान करते हैं। इसमें से 8.33 प्रतिशत हिस्सा कर्मचारी पेंशन स्कीम (EPS) में जाता है, जिससे पेंशन फंड बनता है. सरकार इस फंड के संचालन में सहयोगी भूमिका निभाती है और समय-समय पर अनुदान (subsidy) के माध्यम से इसका वित्तीय बोझ हल्का करती है.

बढ़ोतरी क्यों ज़रूरी है

₹1000 की न्यूनतम पेंशन, आज के दौर में किसी भी बुजुर्ग की आवश्यक जरूरतें पूरी करने में सक्षम नहीं है.चिकित्सा, किराया, दवा और महंगाई के बीच यह रकम महज़ औपचारिक सहायता बनकर रह गई है.इसीलिए पेंशन बढ़ोतरी न केवल आर्थिक राहत है बल्कि सम्मानजनक जीवन का अधिकार भी है.

चुनौतियाँ

बढ़ी हुई पेंशन का सीधा असर EPFO के फंड पर पड़ेगा. वित्तीय गणनाओं के अनुसार, अगर न्यूनतम पेंशन को ₹2000 किया जाता है, तो वार्षिक बोझ हजारों करोड़ रुपये तक जा सकता है. ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस अतिरिक्त खर्च का संतुलन कैसे बनाएगी — क्या वह अतिरिक्त अनुदान देगी, या योगदान के अनुपात में कुछ बदलाव होंगे.

निष्कर्ष

यदि यह प्रस्ताव पास होता है, तो यह उन करोड़ों श्रमिकों के लिए नई उम्मीद होगी जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे वर्ष मेहनत में खपा दिए। EPFO और सरकार को चाहिए कि इस बार का निर्णय महंगाई से मेल खाता हुआ, दीर्घकालिक और न्यायसंगत हो — ताकि पेंशन शब्द का अर्थ सिर्फ औपचारिक सहायता नहीं, बल्कि सुरक्षित वृद्धावस्था का भरोसा बन सके.


आलोक कुमार

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

देश के पहले प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू की 136 वीं जयंती

 बिहार कांग्रेस ने मनाया पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की 136 वीं जयंती

 


पटना.आधुनिक भारत के निर्माता और देश के पहले प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू की 136  वीं जयंती प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में उनके आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण कर मनाई गई.

     जयंती कार्यक्रम में माल्यार्पण के पश्चात प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रो रामजतन सिन्हा  ने कहा कि आधुनिक भारत के निर्माणकर्ता देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने देश को प्रगति पथ पर अग्रसर होने की आधारभूत संरचना के अर्जन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। पंडित नेहरू ने देश की एकता, अखंडता और सम्प्रभुता को मजबूती और स्थिरता प्रदान की.उन्होंने देश में समता और संवैधानिक प्रतिबद्धता का सृजन किया.

     जयंती कार्यक्रम में ब्रजेश प्रसाद मुनन,राजेश राठौड़,  संजीव सिंह,नागेन्द्र कुमार विकल, डा0 संजय यादव, अफरोज खान, कुमार आशीष,आशुतोष शर्मा, संतोष कुमार श्रीवास्तव, वैद्यनाथ शर्मा, रौशन कुमार सिंह,चन्द्रभूषण राजपूत, अरविन्द लाल रजक,निधि पाण्डेय, राजीव मेहता, प्रदुम्न कुमार, उदय शंकर पटेल, मृणाल अनामय,मनोज शर्मा, वसी अख्तर, विमलेश तिवारी, अभिषेक कुमार, रामाशंकर पाण्डे सहित अन्य कांग्रेसजन मौजूद थे.

आलोक कुमार

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

लोकतंत्र की जीत, अनुशासन की परीक्षा

 


लोकतंत्र की जीत, अनुशासन की परीक्षा — पटना प्रशासन की सख़्त निगरानी में मतगणना दिवस

पटना.बिहार विधान सभा चुनाव 2025 अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है. 14 नवम्बर को ए.एन. कॉलेज, पटना में होने वाली मतगणना केवल नतीजों का दिन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा भी है. जिस तरह से पटना जिला प्रशासन ने मतगणना की तैयारियों को लेकर सतर्कता बरती है, वह यह संदेश देता है कि लोकतंत्र का उत्सव तभी सार्थक है जब उसमें अनुशासन की भावना जुड़ी हो.

    जिलाधिकारी और वरीय पुलिस अधीक्षक द्वारा संयुक्त रूप से की गई ब्रीफिंग में स्पष्ट कर दिया गया कि कानून-व्यवस्था से किसी भी तरह का समझौता नहीं होगा.निषेधाज्ञा लागू रहेगी, विजय जुलूसों पर रोक रहेगी और मतगणना स्थल के आसपास किसी भी प्रकार का राजनीतिक प्रदर्शन, नारेबाजी या भीड़ जुटाने की अनुमति नहीं होगी. यह कठोरता केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि नागरिक उत्तरदायित्व की याद दिलाती है — कि लोकतंत्र में उत्सव भी अनुशासन से ही खिलता है.

प्रशासन का यह निर्णय न केवल चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को सुरक्षित करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि किसी भी प्रकार की अफवाह या उत्तेजना से जन-शांति प्रभावित न हो. सीसीटीवी निगरानी, नियंत्रित यातायात व्यवस्था और नियंत्रण कक्ष की 24 घंटे सक्रियता इस बात का प्रमाण है कि पटना जिला प्रशासन इस बार कोई ढिलाई नहीं बताना चाहता.

सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा या कौन हारेगा; असली सवाल यह है कि क्या हम परिणाम आने तक संयम बनाए रखें. लोकतंत्र की असली पहचान केवल मतदान नहीं, बल्कि मतगणना के समय की शांति और मर्यादा से भी होती है.

ऐसे में यह प्रशासनिक पहल सराहनीय है — क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि नागरिक सजगता से भी होती है। परिणाम का इंतजार घर बैठे कीजिए, और मतगणना स्थल को अनुशासन और मर्यादा का प्रतीक बनने दीजिए.यही एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है.

आलोक कुमार

बुधवार, 12 नवंबर 2025

भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की 137वीं जयंती

 पटना.भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की 137वीं जयंती आज प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में मनाई गई.इस अवसर पर बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मदन मोहन झा ने कहा कि स्वतंत्रता आन्दोलन में मौलाना अबुल कलाम आजाद ने पंडित नेहरू के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया. मौलाना अबुल कलाम आजाद स्वतंत्रता के बाद 12 वर्षों तक देश के शिक्षा मंत्री रहे। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने देश में नई शिक्षा नीति की आधारशिला रखी. वे देश में साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रबल समर्थक थे. आज कृतज्ञ राष्ट्र मौलाना अबुल कलाम आजाद के योगदान को स्मरण कर उनकी स्मृति को बार-बार नमन करती है.इसके पूर्व पार्टी के नेताओं के द्वारा मौलाना अबुल कलाम आजाद के तैल चित्र पर माल्यार्पण किया गया.

    इस अवसर पर कोषाध्यक्ष जितेन्द्र गुप्ता, जमाल अहमद भल्लू, ,अम्बुज किशोर झा, अरविन्द लाल रजक, चन्द्रभूषण राजपूत, संजय कुमार पाण्डेय, वैद्यनाथ शर्मा, रौशन कुमार सिंह, सुधीर शर्मा, फिरोज हसन, सत्येन्द्र प्रसाद, किशोर कुमार, मो0 शाहनवाज, अभिषेक कुमार, राकेश कुमार, पं0 अनोखे लाल तिवारी ने भी मौलाना अबुल कलाम आजाद के चित्र पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित किये.


आलोक कुमार

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