पटना, (आलोक कुमार).बिहार की राजनीति में “परिवारवाद” पर उठती बहस कोई नई नहीं है, लेकिन ताज़ा घटनाक्रम ने इस पुराने विवाद को एक बार फिर से केंद्र में ला दिया है.विशेष रूप से इसलिए कि जिस एनडीए ने वर्षों तक कांग्रेस और राजद पर परिवारवाद का आरोप लगाकर राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश की, आज उसी गठबंधन के भीतर सत्ता और संगठन—दोनों जगह—विरासत की राजनीति का प्रभाव तेजी से उभर कर सामने आ रहा है.
टीवी बहसों में एनडीए के प्रवक्ता लंबे समय तक कांग्रेस–राजद पर परिवारवादी राजनीति को लेकर तंज कसते रहे। न्यूज़ स्टूडियो में बैठे एंकर भी विज्ञापन-चालित TRP की दौड़ में इसी एजेंडे को हवा देते रहे. लेकिन आज जब परिदृश्य पलटा है, तो वही प्रश्न अब एनडीए के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है—और उतनी ही तीव्रता से, जितनी तीव्रता से कभी विपक्ष पर उठाया गया था.
मीडिया बहस का केंद्र बिंदु अब एनडीए के भीतर मौजूद उन्हीं नेताओं के आसपास घूम रहा है जिनकी राजनीतिक पहचान पारिवारिक विरासत से ही उपजी है: एनडीए के ‘परिवारवाद’ का जीवंत दस्तावेज़
संतोष सुमन मांझी – पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के पुत्र, वर्तमान विधायक दीपांजलि मांझी के पति और ज्योति मांझी के दामाद.
सम्राट चौधरी – पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी और पूर्व विधायक पार्वती देवी के पुत्र; आज बिहार के उपमुख्यमंत्री.
दीपक प्रकाश – उपेंद्र कुशवाहा और विधायक स्नेहलता के पुत्र.
श्रेयसी सिंह – दिग्विजय सिंह और पुतुल कुमारी की पुत्री.
रमा निषाद – पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जय नारायण निषाद की पुत्रवधू और पूर्व सांसद अजय निषाद की पत्नी.
विजय चौधरी – पूर्व विधायक जगदीश प्रसाद चौधरी के पुत्र.
अशोक चौधरी – पूर्व मंत्री महावीर चौधरी के पुत्र तथा वर्तमान सांसद शांभवी चौधरी के पिता.
नितिन नवीन – पूर्व विधायक नवीन किशोर सिन्हा के पुत्र.
सुनील कुमार – पूर्व मंत्री चंद्रिका राम के पुत्र और पूर्व विधायक अनिल कुमार के भाई.
लेसी सिंह – समता पार्टी के पूर्व जिला अध्यक्ष भूटन सिंह की पत्नी.
मीडिया का प्रश्न — परिवारवाद का विरोध या परिवारवाद का पुनर संस्करण?
सबसे अधिक चर्चा उस कथन की हो रही है जिसमें नेताओं की नई पीढ़ी “ईश्वर की शपथ” लेकर यह दावा करती है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के “स्नेह व आशीर्वाद” से बिहार को परिवारवाद से मुक्त करेंगे.
लेकिन यही वह क्षण है जो मीडिया को कटाक्ष का अवसर देता है:
“परिवारवाद के विरोध का इतना बड़ा दावा, और राजनीतिक विरासत की नींव पर खड़ी पूरी फेहरिस्त—क्या यह विरोध वचन है या व्यंग्य?”
टेलीविज़न स्टूडियो में अब बहस का केंद्र यही द्वैधता है.
एंकर जो कभी विपक्ष के परिवारवाद पर लंबे मोनोलॉग पढ़ते थे, आज असहज होकर वही प्रश्न सत्ता पक्ष से पूछने को मजबूर हैं.
प्रवक्ता जो दूसरों के परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए ‘घातक’ बताते थे, अब या तो रक्षात्मक मुद्रा में हैं या विषय से भटकाने की कोशिश में.
राजनीतिक संदेश का उल्टा असर
नारा था—“परिवारवाद मुक्त राजनीति.”
लेकिन दृश्य है—“परिवारवाद में लिपटी राजनीतिक व्यवस्था.”
यह विरोधाभास ही मीडिया की सबसे बड़ी कहानी बन गया है.
समापन—बड़ी बहस का निष्कर्ष
परिवारवाद सिर्फ किसी एक दल की समस्या नहीं है, यह भारतीय राजनीति की संरचनात्मक बीमारी है.
लेकिन जब वही दल, जो इस बीमारी के सबसे बड़े आलोचक थे, अपने भीतर उसी प्रवृत्ति को आश्रय देते हैं, तो राजनीतिक नैतिकता का प्रश्न और तीखा होकर उठता है.
बिहार की राजनीति में यह बहस आने वाले दिनों में सिर्फ और तीव्र होगी—क्योंकि जनता अब केवल नारे नहीं, बल्कि नैरेटिव और वास्तविकताओं के बीच का अंतर देखने लगी है.
आलोक कुमार
