“जब दुनिया थक जाए, तब आशा की तीर्थयात्रा शुरू होती है”
जयंती वर्ष 2025 का समापन और संत फ्रांसिस का नया आध्यात्मिक आह्वान
अभी-अभी “आशा के तीर्थयात्री” (Pilgrims of Hope)—कैथोलिक चर्च के जयंती वर्ष 2025—का औपचारिक समापन हुआ है.यह वही पवित्र वर्ष था, जिसकी घोषणा पोप फ्रांसिस ने ऐसे समय में की थी, जब दुनिया युद्ध, महामारी, जलवायु संकट और सामाजिक विभाजन से जूझ रही थी. इस जयंती वर्ष ने मानवता को एक सीधा संदेश दिया—निराशा के अंधकार में भी आशा की लौ बुझनी नहीं चाहिए.
हर 25 वर्षों में आने वाला यह विशेष कैथोलिक वर्ष 24 दिसंबर 2024 को आरंभ हुआ था और 6 जनवरी 2026, प्रभु प्रकाश महापर्व के दिन, इसका समापन हुआ.यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि एक वैश्विक नैतिक पुकार थी—कि हर व्यक्ति अपने जीवन में आशा को पुनर्जीवित करे और उसे दूसरों तक पहुँचाए.
जयंती के बाद भी अनुग्रह का द्वार खुला
जयंती वर्ष के समापन के साथ ही पोप लियो XIV ने कलीसिया को एक और आध्यात्मिक उपहार दिया है. उन्होंने संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की 800वीं पुण्यतिथि की स्मृति में “संत फ्रांसिस का विशेष वर्ष” घोषित किया है, जो जनवरी 2027 तक चलेगा.यह फ्रांसिस्कन जयंती वर्ष केवल स्मृति का समय नहीं, बल्कि वास्तविक आध्यात्मिक नवीनीकरण का अवसर है. 10 जनवरी को पवित्र सीन की अपोस्टोलिक पेनिटेंशरी द्वारा जारी निर्णय के अनुसार, विश्वासी इस अवधि में सामान्य शर्तों—साकारमेन्टल कन्फेशन,यूखरिस्त में सहभागिता पोप की मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना के साथ पूर्ण क्षमा (Plenary Indulgence) प्राप्त कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें किसी भी फ्रांसिस्कन मठ या संत फ्रांसिस को समर्पित तीर्थस्थल की यात्रा करनी होगी.
जो चल नहीं सकते, उनके लिए भी रास्ता खुला है
इस निर्णय की मानवीय संवेदनशीलता उल्लेखनीय है.वृद्ध, रोगी और वे लोग जो गंभीर कारणों से अपने घर से बाहर नहीं जा सकते, वे भी आध्यात्मिक रूप से इस जयंती में सहभागी होकर—अपनी प्रार्थनाएँ, पीड़ा और कष्ट ईश्वर को अर्पित करके—पूर्ण क्षमा प्राप्त कर सकते हैं. यह संदेश स्पष्ट है: ईश्वर का अनुग्रह दूरी या असमर्थता से बंधा नहीं है.
हिंसा और अविश्वास के समय में संत फ्रांसिस की पुकार
निर्णय में आज की दुनिया का यथार्थ चित्रण भी किया गया है—“जब आभासी वास्तविक को प्रभावित कर रहा है, सामाजिक हिंसा सामान्य हो गई है और शांति दिन-ब-दिन दूर होती जा रही है…”ऐसे समय में संत फ्रांसिस का जीवन हमें फिर से आमंत्रित करता है—अस्सीसी के उस गरीब पुरुष की तरह जीने के लिए, जिसने मसीह को अपने जीवन का केंद्र बनाया.
पोप लियो XIV ने फ्रांसिस्कन फैमिली कॉन्फ्रेंस के नाम अपने पत्र में लिखा कि आज के युग में, जो अंतहीन युद्धों, विभाजनों और भय से भरा है, संत फ्रांसिस की वाणी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वह तकनीकी समाधान नहीं, बल्कि शांति के वास्तविक स्रोत की ओर संकेत करती है.उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि—“ईश्वर के साथ शांति, लोगों के बीच शांति और सृष्टि के साथ शांति—ये तीनों एक ही सार्वभौमिक मेल-मिलाप के अविभाज्य आयाम हैं.”
आशा की यात्रा जारी है
जयंती वर्ष भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उसका संदेश अभी जीवित है। संत फ्रांसिस का यह विशेष वर्ष कलीसिया और विश्व को याद दिलाता है कि सच्ची शांति न तो शक्ति से आती है, न ही प्रभुत्व से—वह आती है विनम्रता, करुणा और विश्वास से.आज, जब दुनिया थक चुकी है, यही समय है कि हम फिर से तीर्थयात्री बनें—आशा के, शांति के और मानवता के.
आलोक कुमार