रविवार, 18 जनवरी 2026

नागपुर की रात: जब चोरी नहीं, आस्था पर आघात हुआ

 नागपुर की रात: जब चोरी नहीं, आस्था पर आघात हुआ

नागपुर की धरती पर 14 जनवरी 2026 की वह रात केवल एक चोरी की घटना नहीं थी—वह सीधे आस्था के केंद्र पर किया गया आघात थी.बुट्टीबोरी स्थित सेंट क्लेरेट स्कूल के प्रार्थना कक्ष से परमपवित्र यूखारिस्त के टैबरनेकल का अवैध रूप से उठा लिया जाना न सिर्फ़ कानून-व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि समाज की नैतिक चेतना को भी कटघरे में खड़ा करता है.जब मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर की दीवारें असुरक्षित होने लगें, तब केवल ईंट-पत्थर नहीं टूटते—विश्वास की नींव हिलती है.

यह घटना इसलिए भी अत्यंत गंभीर है क्योंकि यहाँ केवल संपत्ति की चोरी नहीं हुई, बल्कि उस पवित्र उपस्थिति का अपमान हुआ, जिसे कैथोलिक विश्वास में ईश्वर की जीवित उपस्थिति माना जाता है.भले ही प्रत्यक्ष अपवित्रता के प्रमाण न मिले हों, किंतु परमपवित्र यूखारिस्त का जबरन हटाया जाना स्वयं में एक गंभीर धार्मिक अपराध है—ऐसा अपराध, जिसकी पीड़ा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती.

इस संदर्भ में महाधर्माध्यक्ष एलियास गोंसाल्वेस का तात्कालिक पास्तोरल संदेश घटना की गंभीरता को और गहराई देता है. उनका संदेश स्पष्ट है—प्रतिशोध नहीं, प्रायश्चित; आक्रोश नहीं, आत्ममंथन.23 जनवरी को ‘तपस्या और प्रायश्चित दिवस’ घोषित कर उन्होंने यह संकेत दिया कि आस्था पर हुए हमले का उत्तर शांति, प्रार्थना और नैतिक दृढ़ता से दिया जाना चाहिए.

आज प्रश्न यह नहीं है कि चोर कौन थे, बल्कि यह है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं. क्या धार्मिक स्थलों की सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी है, या समाज की सामूहिक चेतना भी इसके लिए उत्तरदायी है? यह घटना हमें याद दिलाती है कि आस्था की रक्षा तलवार से नहीं, सजगता, सम्मान और संवेदनशीलता से होती है.

नागपुर की यह पीड़ा केवल एक धर्मप्रांत की नहीं है. यह उस भारत की पीड़ा है, जो सदियों से धार्मिक सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान की मिसाल रहा है. ऐसे समय में प्रार्थना केवल ईश्वर से संवाद नहीं, बल्कि अपने भीतर के मनुष्य से प्रश्न करने की प्रक्रिया भी बन जानी चाहिए.


आलोक कुमार 

शनिवार, 17 जनवरी 2026

जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं

 जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं—याददाश्तें भी ताले में बंद हो जाती हैं

पटना जैसे शहर में, जहाँ हिंदी पत्रकारिता की एक मजबूत और संघर्षशील परंपरा रही है, वहाँ अख़बारों का बंद होना केवल एक कारोबारी घटना नहीं है—यह लोकतंत्र की आवाज़ के धीमे पड़ने जैसा है। पाटलिपुत्र टाइम्स, प्रदीप, सर्चलाइट, आर्यावर्त, इंडियन नेशन, नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अख़बारों का बंद होना पहले ही क्षेत्रीय मीडिया की ताक़त को कमजोर कर चुका था। अब राष्ट्रीय सहारा (पटना संस्करण) के बंद होने की खबर उस सिलसिले की एक और दुखद कड़ी बन गई है।

सहारा समूह की आर्थिक मुश्किलें—विशेषकर कानूनी मामलों और निवेश योजनाओं से जुड़े विवाद—अब उसके मीडिया संस्थानों पर भी साफ़ दिखने लगी हैं। 2024–25 के दौरान पटना यूनिट में वेतन न मिलने, कामकाज ठप होने और कर्मचारियों की हड़ताल की खबरें आती रहीं। अब जब पूर्ण बंदी की स्थिति सामने है, तो इसका सबसे बड़ा असर उन पत्रकारों पर पड़ा है, जिन्होंने वर्षों तक ज़मीनी सच्चाइयों को सामने लाने का काम किया।

दर्जनों अनुभवी पत्रकार एक झटके में बेरोज़गार हो गए, लेकिन इस पर न तो बड़ी बहस हुई और न ही डिजिटल मंचों पर कोई खास हलचल दिखी। आज की मीडिया दुनिया क्लिक, ट्रेंड और एल्गोरिदम के इर्द-गिर्द घूम रही है, जबकि स्थानीय और क्षेत्रीय प्रिंट पत्रकारिता की मौत चुपचाप हो रही है। शायद इसी कारण यह संकट “सामाजिक स्मृति से मिटते जाने” जैसा महसूस होता है।

यह हालात केवल पटना या बिहार तक सीमित नहीं हैं। देशभर में छोटे और मध्यम अख़बार डिजिटल विज्ञापन शिफ्ट, बढ़ती लागत और बदलती पाठक आदतों के दबाव में संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ जो ज़िम्मेदार, संदर्भयुक्त और ज़मीनी पत्रकारिता खत्म हो रही है, उसकी भरपाई कोई सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं कर सकता।

आज ज़रूरत है कि इस ख़ामोशी को तोड़ा जाए। प्रभावित पत्रकारों के लिए संवाद, सहयोग और सामूहिक प्रयास खड़े हों। क्योंकि अगर अख़बार यूँ ही बंद होते रहे, तो सवाल सिर्फ़ रोज़गार का नहीं रहेगा—लोकतंत्र की स्मृति बचाने का भी होगा

आलोक कुमार

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

6 सांसद ऐसे हैं, सांसद निधि से एक रुपया भी खर्च नहीं किया

जब विकास के लिए पैसा मौजूद हो, लेकिन ज़मीन पर काम न दिखे—तो सवाल सिर्फ़ आंकड़ों का नहीं, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का होता है.


सांसद निधि: करोड़ों का बजट, लेकिन बिहार में क्यों उठे सवाल?

सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस) देश की उन महत्वपूर्ण योजनाओं में शामिल है, जिसके जरिए सांसद अपने-अपने क्षेत्र की ज़रूरतों के अनुसार विकास कार्य करा सकते हैं. इस योजना के तहत लोकसभा, राज्यसभा और मनोनीत सांसदों को हर साल ₹5 करोड़ (₹2.5 करोड़ की दो किस्तों में) की राशि मिलती है. यह पैसा सीधे सांसद को नहीं, बल्कि जिला कलेक्टर के माध्यम से स्वीकृत विकास कार्यों पर खर्च किया जाता है.

एमपीएलएडीएस का उद्देश्य साफ है—पेयजल, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक ढांचे जैसे ज़रूरी क्षेत्रों में टिकाऊ विकास. योजना में यह भी प्रावधान है कि एससी क्षेत्रों के लिए 15% और एसटी क्षेत्रों के लिए 7.5% राशि खर्च की जाए, वहीं दिव्यांगों के लिए ₹10 लाख तक की सिफारिश संभव है.

कोविड-19 के दौरान यह योजना अस्थायी रूप से निलंबित रही, लेकिन 2021-22 से इसे फिर बहाल कर दिया गया। इसके बावजूद बिहार से जुड़े आंकड़े अब सियासी बहस का कारण बन गए हैं.

बिहार के 6 सांसद और ‘शून्य खर्च’ का सवाल

18वीं लोकसभा के गठन को लगभग दो साल होने जा रहे हैं, लेकिन बिहार के 40 सांसदों में से 6 सांसद ऐसे हैं जिन्होंने अब तक सांसद निधि से एक रुपया भी खर्च नहीं किया. इन सांसदों में मीसा भारती, राजीव प्रताप रूड़ी, शांभवी चौधरी, राजीव रंजन सिंह, संजय जायसवाल और विवेक ठाकुर शामिल हैं.

आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में बिहार के सांसदों को कुल मिलाकर ₹9.80 करोड़ प्रति सांसद की राशि मिली, लेकिन कुल खर्च महज़ ₹137.69 करोड़ ही हो सका. वहीं, कई सांसदों ने बेहतर प्रदर्शन भी किया—जैसे अररिया से प्रदीप कुमार सिंह ने लगभग पूरी राशि खर्च कर सभी कार्य पूरे किए.

शांभवी चौधरी का पक्ष

समस्तीपुर से सांसद और देश की सबसे युवा लोकसभा सदस्य शांभवी चौधरी ने इस मुद्दे पर साफ कहा कि सांसद निधि का उपयोग उनका संवैधानिक अधिकार है, और वह किसी दबाव में जल्दबाज़ी में फंड खर्च नहीं करेंगी. उनके अनुसार, विकास कार्यों का चयन पार्टी और एनडीए कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श के बाद ही किया जाएगा, ताकि क्षेत्र को दीर्घकालिक लाभ मिले.

बहस का असली मुद्दा

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि एमपीएलएडीएस फंड का समयबद्ध और पारदर्शी उपयोग अब जनविश्वास से जुड़ा सवाल बन चुका है. जब कई क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तब करोड़ों रुपये का अप्रयुक्त रहना स्वाभाविक रूप से जनता को सोचने पर मजबूर करता है.

आने वाले समय में यही देखा जाना बाकी है कि बिहार के ये सांसद सांसद निधि को किस दिशा में, किन प्राथमिकताओं के साथ और कितनी तेजी से ज़मीन पर उतारते हैं—क्योंकि विकास सिर्फ़ घोषणा से नहीं, अमल से दिखाई देता है.   

आलोक कुमार                                                                                                                        

हमारी पहली इच्छा

 

हमारी Wishlist और भविष्य की दिशा

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गुरुवार, 15 जनवरी 2026

संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की 800वीं पुण्यतिथि

 “जब दुनिया थक जाए, तब आशा की तीर्थयात्रा शुरू होती है”

जयंती वर्ष 2025 का समापन और संत फ्रांसिस का नया आध्यात्मिक आह्वान


अभी-अभी “आशा के तीर्थयात्री” (Pilgrims of Hope)—कैथोलिक चर्च के जयंती वर्ष 2025—का औपचारिक समापन हुआ है.यह वही पवित्र वर्ष था, जिसकी घोषणा पोप फ्रांसिस ने ऐसे समय में की थी, जब दुनिया युद्ध, महामारी, जलवायु संकट और सामाजिक विभाजन से जूझ रही थी. इस जयंती वर्ष ने मानवता को एक सीधा संदेश दिया—निराशा के अंधकार में भी आशा की लौ बुझनी नहीं चाहिए.

हर 25 वर्षों में आने वाला यह विशेष कैथोलिक वर्ष 24 दिसंबर 2024 को आरंभ हुआ था और 6 जनवरी 2026, प्रभु प्रकाश महापर्व के दिन, इसका समापन हुआ.यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि एक वैश्विक नैतिक पुकार थी—कि हर व्यक्ति अपने जीवन में आशा को पुनर्जीवित करे और उसे दूसरों तक पहुँचाए.

जयंती के बाद भी अनुग्रह का द्वार खुला                                     

जयंती वर्ष के समापन के साथ ही पोप लियो XIV ने कलीसिया को एक और आध्यात्मिक उपहार दिया है. उन्होंने संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की 800वीं पुण्यतिथि की स्मृति में “संत फ्रांसिस का विशेष वर्ष” घोषित किया है, जो जनवरी 2027 तक चलेगा.यह फ्रांसिस्कन जयंती वर्ष केवल स्मृति का समय नहीं, बल्कि वास्तविक आध्यात्मिक नवीनीकरण का अवसर है. 10 जनवरी को पवित्र सीन की अपोस्टोलिक पेनिटेंशरी द्वारा जारी निर्णय के अनुसार, विश्वासी इस अवधि में सामान्य शर्तों—साकारमेन्टल कन्फेशन,यूखरिस्त में सहभागिता पोप की मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना के साथ पूर्ण क्षमा (Plenary Indulgence) प्राप्त कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें किसी भी फ्रांसिस्कन मठ या संत फ्रांसिस को समर्पित तीर्थस्थल की यात्रा करनी होगी.

जो चल नहीं सकते, उनके लिए भी रास्ता खुला है

इस निर्णय की मानवीय संवेदनशीलता उल्लेखनीय है.वृद्ध, रोगी और वे लोग जो गंभीर कारणों से अपने घर से बाहर नहीं जा सकते, वे भी आध्यात्मिक रूप से इस जयंती में सहभागी होकर—अपनी प्रार्थनाएँ, पीड़ा और कष्ट ईश्वर को अर्पित करके—पूर्ण क्षमा प्राप्त कर सकते हैं. यह संदेश स्पष्ट है: ईश्वर का अनुग्रह दूरी या असमर्थता से बंधा नहीं है.

हिंसा और अविश्वास के समय में संत फ्रांसिस की पुकार

निर्णय में आज की दुनिया का यथार्थ चित्रण भी किया गया है—“जब आभासी वास्तविक को प्रभावित कर रहा है, सामाजिक हिंसा सामान्य हो गई है और शांति दिन-ब-दिन दूर होती जा रही है…”ऐसे समय में संत फ्रांसिस का जीवन हमें फिर से आमंत्रित करता है—अस्सीसी के उस गरीब पुरुष की तरह जीने के लिए, जिसने मसीह को अपने जीवन का केंद्र बनाया.

पोप लियो XIV ने फ्रांसिस्कन फैमिली कॉन्फ्रेंस के नाम अपने पत्र में लिखा कि आज के युग में, जो अंतहीन युद्धों, विभाजनों और भय से भरा है, संत फ्रांसिस की वाणी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वह तकनीकी समाधान नहीं, बल्कि शांति के वास्तविक स्रोत की ओर संकेत करती है.उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि—“ईश्वर के साथ शांति, लोगों के बीच शांति और सृष्टि के साथ शांति—ये तीनों एक ही सार्वभौमिक मेल-मिलाप के अविभाज्य आयाम हैं.”

आशा की यात्रा जारी है

जयंती वर्ष भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उसका संदेश अभी जीवित है। संत फ्रांसिस का यह विशेष वर्ष कलीसिया और विश्व को याद दिलाता है कि सच्ची शांति न तो शक्ति से आती है, न ही प्रभुत्व से—वह आती है विनम्रता, करुणा और विश्वास से.आज, जब दुनिया थक चुकी है, यही समय है कि हम फिर से तीर्थयात्री बनें—आशा के, शांति के और मानवता के.

आलोक कुमार

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