गरीबों के हक का अनाज—नीति, नीयत और बाजार का खेल
रिपोर्ट: आलोक कुमार
कोविड-19 महामारी के दौर में, जब देश की बड़ी आबादी रोज़गार, आय और भोजन की असुरक्षा से जूझ रही थी, तब केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के रूप में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। यह योजना आत्मनिर्भर भारत अभियान का हिस्सा थी, जिसका उद्देश्य प्रवासी मजदूरों और गरीब तबकों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराना था।
अप्रैल 2020 में शुरू हुई यह योजना कई चरणों में आगे बढ़ती रही और अब 1 जनवरी 2024 से इसे अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया है। इस दौरान लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया गया—जो अपने आप में दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा पहलों में से एक है। आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न चरणों में 1118 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न वितरित किया गया और सरकार ने करीब 3.91 लाख करोड़ रुपये खर्च किए।
यह योजना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत संचालित होती है। इसके अंतर्गत प्राथमिकता वाले परिवारों (PHH) को प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम अनाज मिलता है, जबकि अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के तहत सबसे गरीब परिवारों को प्रति परिवार 35 किलोग्राम राशन दिया जाता है। उद्देश्य स्पष्ट है—समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना।
लेकिन जमीनी हकीकत इस आदर्श तस्वीर से अलग नजर आती है, खासकर पटना और आसपास के इलाकों में। यहां इस योजना के तहत मिलने वाले चावल—चाहे अरवा हो या उसना—का एक समानांतर बाजार विकसित हो चुका है। लाभार्थी, जिन्हें यह अनाज मुफ्त में मिलता है, अक्सर इसे 10–15 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच देते हैं और उस पैसे से बेहतर गुणवत्ता का चावल खरीदते हैं।
दीघा हाट जैसे बाजारों में यह प्रवृत्ति खुले तौर पर देखी जा सकती है। स्थानीय दुकानदार गरीबों से सस्ते दाम पर चावल खरीदते हैं और फिर उसे बड़े व्यापारियों या राइस मिलों तक पहुंचाते हैं। दानापुर की राइस मिलों में यह अनाज रिफाइन और पैकेजिंग के बाद ऊंचे दाम पर दोबारा बाजार में बिकता है। इस पूरी प्रक्रिया में गरीबों के हिस्से का अनाज एक तरह से “रिसाइकिल” होकर मुनाफे का जरिया बन जाता है।
यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। पहला—क्या योजना का मूल उद्देश्य पूरा हो रहा है? जब लाभार्थी खुद ही अनाज बेच रहे हैं, तो यह संकेत है कि उनकी जरूरतें केवल खाद्यान्न तक सीमित नहीं हैं। उन्हें नकदी की जरूरत है—दवा, शिक्षा, कपड़े और अन्य जरूरी खर्चों के लिए। ऐसे में मुफ्त अनाज उनकी समस्या का आंशिक समाधान ही बन पाता है।
दूसरा सवाल निगरानी और पारदर्शिता का है। यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का अनाज खुले बाजार में बेचा जा रहा है, तो यह न केवल योजना की प्रभावशीलता को कमजोर करता है, बल्कि एक समानांतर काला बाजार भी तैयार करता है। इसमें स्थानीय स्तर पर दुकानदार, बिचौलिए और मिल मालिक जैसे कई हितधारक शामिल होते हैं।
तीसरा और महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक है। इतनी बड़ी योजना, जो 80 करोड़ लोगों को सीधे प्रभावित करती है, स्वाभाविक रूप से एक बड़ी राजनीतिक पूंजी भी बनती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि PMGKAY ने सरकार के लिए एक मजबूत जनाधार तैयार किया है। लेकिन जब इसके क्रियान्वयन में खामियां सामने आती हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह केवल कल्याणकारी नीति है या एक दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति भी?
हालांकि, आलोचना के बीच इसके सकारात्मक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोविड काल में जब लाखों लोग बेरोजगार हो गए थे, तब इस योजना ने भूख और कुपोषण के खतरे को काफी हद तक कम किया। यह भारत की प्रशासनिक क्षमता और संसाधन प्रबंधन का एक बड़ा उदाहरण भी है।
फिर भी, अब समय आ गया है कि इस योजना की गंभीर समीक्षा की जाए। क्या इसे केवल मुफ्त अनाज वितरण तक सीमित रखा जाए, या नकद हस्तांतरण (DBT) जैसे विकल्पों के साथ जोड़ा जाए? क्या लाभार्थियों को अपनी जरूरत के अनुसार विकल्प चुनने की स्वतंत्रता दी जा सकती है? और सबसे अहम—क्या वितरण प्रणाली को इतना पारदर्शी बनाया जा सकता है कि दुरुपयोग को रोका जा सके?
अंततः, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना एक नेक इरादे से शुरू की गई पहल है, जिसने कठिन समय में करोड़ों लोगों को सहारा दिया। लेकिन इसकी वास्तविक सफलता केवल वितरण के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि यह गरीबों के जीवन में कितना स्थायी बदलाव ला पाती है।
अगर गरीब अपने हिस्से का अनाज बेचने को मजबूर हैं, तो यह संकेत है कि समस्या कहीं अधिक गहरी है—और उसका समाधान भी उतना ही व्यापक होना चाहिए।
