सोमवार, 23 मार्च 2026

बीमारू की पहचान: एक कड़वा अतीत

 


बीमारू की पहचान: एक कड़वा अतीत

रिपोर्ट: आलोक कुमार

एक समय बिहार को ‘बीमारू राज्य’ कहा जाता था। यह शब्द 1980 के दशक में उन राज्यों के लिए इस्तेमाल हुआ, जो आर्थिक, सामाजिक और मानव विकास के पैमानों पर पिछड़े माने जाते थे।

बिहार भी उसी श्रेणी में रखा गया—

जहां गरीबी अधिक थी

शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर थी

और बुनियादी ढांचा लगभग नगण्य था

यह केवल एक टैग नहीं, बल्कि उस दौर की कठोर सच्चाई थी।

अब सवाल: क्या सच में बदल रहा है बिहार?

दशकों बाद आज सबसे बड़ा सवाल यही है—

 क्या बिहार सच में ‘बीमारू’ छवि से बाहर निकल रहा है?

या यह बदलाव सिर्फ कागजों और सरकारी दावों तक सीमित है?

बदलाव के संकेत: एक नई तस्वीर उभरती हुई

पिछले 15–20 वर्षों में बिहार में कई ऐसे बदलाव देखने को मिले हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

बुनियादी ढांचा (Infrastructure):

राज्य में सड़कों और पुलों का तेजी से निर्माण हुआ है।

जहां पहले गांवों तक पहुंचना मुश्किल था, आज वहां सड़क संपर्क बेहतर हुआ है।

इससे न केवल आवागमन आसान हुआ, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिली।

बिजली व्यवस्था:

जो गांव कभी अंधेरे में डूबे रहते थे, वहां अब बिजली पहुंच रही है।

हालांकि अभी भी पूरी तरह स्थिरता नहीं है, लेकिन स्थिति पहले से बेहतर हुई है।

कानून-व्यवस्था:

एक समय अपराध के लिए बदनाम बिहार में अब

 लोगों में सुरक्षा की भावना कुछ हद तक बढ़ी है

निवेश के लिए माहौल पहले से बेहतर हुआ है

शिक्षा में बदलाव:

स्कूलों में नामांकन बढ़ा

साइकिल योजना, पोशाक योजना जैसी योजनाओं का असर

लड़कियों की शिक्षा में वृद्धि

 ये सभी संकेत बताते हैं कि बिहार में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

 फिर भी चुनौतियां कायम: अधूरी कहानी

इन उपलब्धियों के बावजूद सच्चाई यह है कि बिहार की विकास यात्रा अभी अधूरी है।

 सबसे बड़ी समस्या: बेरोजगारी

राज्य में पर्याप्त रोजगार नहीं हैं।

हर साल लाखों युवा मजबूरी में

 दिल्ली, मुंबई, पंजाब, हरियाणा और दक्षिण भारत की ओर पलायन करते हैं

औद्योगिक विकास की कमी:

बड़े उद्योगों का अभाव

निवेशकों के लिए सीमित अवसर

स्थानीय रोजगार का संकट

स्वास्थ्य सेवाएं:

सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी

ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद सीमित सुविधाएं

इलाज के लिए बाहर जाना मजबूरी

शिक्षा की गुणवत्ता:

नामांकन बढ़ा है, लेकिन

पढ़ाई का स्तर

शिक्षक उपलब्धता

 बुनियादी सुविधाएं

अब भी सवालों के घेरे में हैं।

 सरकारी दावे vs जमीनी हकीकत

बिहार में विकास की दो तस्वीरें नजर आती हैं—

पहली: सरकारी आंकड़

जहां विकास तेज रफ्तार से दिखता है

दूसरी: जमीनी सच्चाई

जहां गांवों में

अस्पताल अधूरे

रोजगार सीमित

सुविधाएं कमजोर

 यही अंतर बताता है कि विकास केवल कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखना चाहिए।

सबसे बड़ा मुद्दा: रोजगार और उद्योग

अगर बिहार को सच में ‘बीमारू’ टैग से बाहर निकलना है,

तो सबसे पहले रोजगार और उद्योग पर फोकस करना होगा।

 वर्तमान स्थिति:

बिहार की अर्थव्यवस्था अभी भी मुख्य रूप से कृषि आधारित है

 जरूरत क्या है?

 छोटे और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा

बड़े निवेशकों को आकर्षित करना

स्किल डेवलपमेंट को मजबूत करना

जब तक

स्थानीय रोजगार नहीं बढ़ेगा

उद्योग नहीं आएंगे

तब तक

पलायन नहीं रुकेगा

और विकास अधूरा रहेगा

 ‘बीमारू’ से ‘बदलते बिहार’ तक: एक लंबा सफर

यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार बदल रहा है।

 बदलाव के संकेत स्पष्ट हैं

 कई क्षेत्रों में सुधार भी हुआ है

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि—यह बदलाव अभी अधूरा और असमान है

विकास का लाभ हर व्यक्ति तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है।

निष्कर्ष: यात्रा शुरू हो चुकी है, मंजिल अभी बाकी है

बिहार आज एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है—

 अतीत की कमजोरियों से बाहर निकलने की कोशिश

और एक नई पहचान बनाने की जद्दोजहद

‘बीमारू’ से ‘बदलते बिहार’ तक का सफर आसान नहीं है,

लेकिन असंभव भी नहीं।

अगर सरकार, समाज और युवा मिलकर काम करें,

तो बिहार केवल बदलाव की कहानी नहीं,

एक सफल मॉडल बन सकता है।

 फिलहाल सच्चाई यही है—

बिहार ने यात्रा शुरू कर दी है, मंजिल अभी बाकी है।

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