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सोमवार, 23 मार्च 2026

बिहार का भविष्य: विकास या फिर वही पुरानी राजनीति?

 


बिहार का भविष्य: विकास या फिर वही पुरानी राजनीति?

रिपोर्टः आलोक कुमार

बिहार आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से उसकी दिशा आने वाले दशकों का भविष्य तय करेगी। एक ओर विकास, रोजगार, शिक्षा और आधारभूत संरचना की आकांक्षा है, तो दूसरी ओर जातीय समीकरणों, गठबंधन की जोड़-तोड़ और सत्ता के पारंपरिक खेल की पुरानी राजनीति। सवाल यह है कि क्या बिहार अब उस दायरे से बाहर निकल पाएगा, जिसने दशकों तक उसकी गति को सीमित रखा?

पिछले दो दशकों में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार ने कुछ महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं। सड़कों का जाल, शिक्षा में सुधार के प्रयास, कानून-व्यवस्था में अपेक्षाकृत स्थिरता—ये सब ऐसे संकेत हैं जो बताते हैं कि विकास की दिशा में कदम उठाए गए। लेकिन यह भी सच है कि इन उपलब्धियों के बावजूद बिहार आज भी देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिना जाता है। बेरोजगारी, पलायन और उद्योगों की कमी आज भी बड़े सवाल बने हुए हैं।

दरअसल, बिहार की राजनीति लंबे समय तक सामाजिक न्याय के मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लालू प्रसाद यादव के दौर में पिछड़े वर्गों की आवाज को मुख्यधारा में लाया गया, जो लोकतांत्रिक दृष्टि से एक बड़ा परिवर्तन था। लेकिन समय के साथ यह राजनीति विकास के एजेंडे से कटती चली गई और जातीय पहचान की राजनीति में सिमट कर रह गई। इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य आर्थिक रूप से पीछे छूटता गया।


आज की नई पीढ़ी के सामने प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। उन्हें जाति से ज्यादा नौकरी चाहिए, पहचान से ज्यादा अवसर चाहिए। यही कारण है कि बिहार से हर साल लाखों युवा दिल्ली, मुंबई, पुणे और बेंगलुरु जैसे शहरों की ओर पलायन करते हैं। यह पलायन केवल आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि राज्य की नीतिगत असफलता का भी संकेत है। अगर बिहार में ही रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं, तो यही युवा राज्य के विकास के इंजन बन सकते हैं।

बिहार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उद्योगों का अभाव है। निवेशक राज्य में आने से हिचकते हैं, जिसका कारण केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि नीति और राजनीतिक स्थिरता का अभाव भी है। बार-बार बदलते गठबंधन और सरकार की अनिश्चितता निवेश के माहौल को प्रभावित करती है। जब तक सरकारें दीर्घकालिक दृष्टि के साथ काम नहीं करेंगी, तब तक बड़े उद्योगों का आना मुश्किल ही रहेगा।

शिक्षा के क्षेत्र में भी बिहार को लंबा सफर तय करना है। प्राथमिक स्तर पर नामांकन बढ़ा है, लेकिन गुणवत्ता अभी भी एक बड़ी समस्या है। उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों की कमी के कारण छात्रों को बाहर जाना पड़ता है। अगर राज्य में बेहतर विश्वविद्यालय, स्किल डेवलपमेंट सेंटर और रिसर्च संस्थान स्थापित किए जाएं, तो न केवल शिक्षा का स्तर सुधरेगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।


राजनीति की बात करें तो आज भी चुनावी मुद्दे अक्सर विकास से हटकर भावनात्मक और सामाजिक समीकरणों पर केंद्रित रहते हैं। राजनीतिक दल जनता को दीर्घकालिक योजनाओं के बजाय तात्कालिक लाभ और वादों से प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए भी चिंताजनक है, क्योंकि इससे नीतिगत बहस कमजोर होती है।

हालांकि, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। हाल के वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल कनेक्टिविटी और स्टार्टअप संस्कृति में कुछ सकारात्मक पहलें देखने को मिली हैं। अगर इन प्रयासों को सही दिशा और निरंतरता मिले, तो बिहार आने वाले वर्षों में बदलाव की नई कहानी लिख सकता है।

बिहार के भविष्य का असली निर्णय केवल नेताओं के हाथ में नहीं, बल्कि जनता के हाथ में भी है। जब मतदाता विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को प्राथमिकता देंगे, तभी राजनीतिक दल भी अपने एजेंडे को बदलने के लिए मजबूर होंगे। लोकतंत्र में बदलाव ऊपर से नहीं, नीचे से आता है।

अंततः, बिहार के सामने दो रास्ते स्पष्ट हैं—एक, वही पुरानी राजनीति जो समाज को बांटती है और विकास को पीछे धकेलती है; दूसरा, एक नया रास्ता जो समावेशी विकास, पारदर्शिता और अवसरों की समानता पर आधारित है। यह चुनाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक भी है।

अगर बिहार अपनी ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक समृद्धि और युवा शक्ति का सही उपयोग कर पाए, तो वह न केवल खुद को बदल सकता है, बल्कि पूरे देश के लिए एक उदाहरण भी बन सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि समाज का समग्र विकास बने।

अब देखना यह है कि आने वाले समय में बिहार विकास की राह चुनता है या फिर एक बार फिर पुरानी राजनीति के चक्रव्यूह में उलझ जाता है।

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