शौचालय बने, लेकिन सोच कब बदलेगी?
रिपोर्ट: आलोक कुमार
बिहार में खुले में शौच की प्रथा को समाप्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने कई योजनाएं चलाई हैं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत व्यक्तिगत घरेलू शौचालय (IHHL) योजना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति खुले में शौच करने के लिए मजबूर न हो।
इस योजना के तहत पात्र ग्रामीण और शहरी निवासी ऑनलाइन स्वच्छ भारत मिशन पोर्टल पर आवेदन कर सकते हैं या ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायत और स्वच्छग्राही के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। पात्र लाभार्थियों को शौचालय निर्माण के लिए ₹12,000 की प्रोत्साहन राशि दी जाती है, जो सीधे उनके बैंक खाते में दो किश्तों में जमा होती है।
योजना का ढांचा स्पष्ट है—आवेदक के घर में पहले से शौचालय नहीं होना चाहिए और वह बीपीएल या विशेष एपीएल श्रेणी (जैसे अनुसूचित जाति, भूमिहीन, दिव्यांग या महिला मुखिया) में होना चाहिए। आवेदन के लिए आधार कार्ड, बैंक पासबुक और फोटो जैसे दस्तावेज जरूरी होते हैं। आवेदन के बाद भौतिक सत्यापन किया जाता है और स्वीकृति मिलने पर शौचालय का निर्माण कराया जाता है।
कागजों पर यह योजना जितनी सुदृढ़ दिखती है, जमीनी हकीकत उतनी ही जटिल नजर आती है—खासतौर पर बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में।
पटना जिले के मोकामा प्रखंड और नालंदा के हरनौत, राजगीर और बिंद जैसे क्षेत्रों में चलाए गए एक जागरूकता अभियान के दौरान यह सामने आया कि कई जगहों पर शौचालयों का उपयोग उनके मूल उद्देश्य के लिए नहीं हो रहा है। कहीं शौचालय में जलावन रखा गया है, तो कहीं उसे पशुओं के चारे का गोदाम बना दिया गया है। कई घरों में तो शौचालय के भीतर बकरियां बांधी जा रही हैं।
यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और व्यवहारिक समस्या का संकेत है।
ग्रामीणों की शिकायतें भी कम नहीं हैं। उनका कहना है कि शौचालयों की गुणवत्ता ठीक नहीं है। कई जगहों पर ढक्कन कमजोर हैं, जो पशुओं के चढ़ने से टूट जाते हैं। सबसे बड़ी समस्या पानी की कमी है। जब शौचालय में पानी की सुविधा ही नहीं होगी, तो उसका उपयोग कैसे संभव होगा?
यह स्थिति एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है—क्या केवल शौचालय बना देना ही स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है? स्पष्ट रूप से नहीं। स्वच्छता केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक बदलाव का विषय है। जब तक लोगों की आदतें और सोच नहीं बदलेंगी, तब तक योजनाएं अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाएंगी।
योजना के क्रियान्वयन में भी कई कमियां सामने आती हैं। कई बार लाभार्थियों को समय पर पूरी राशि नहीं मिलती, या निर्माण कार्य जल्दबाजी में और निम्न गुणवत्ता के साथ किया जाता है। स्थानीय स्तर पर निगरानी की कमी के कारण शौचालय निर्माण कई बार केवल “टारगेट पूरा करने” तक सीमित रह जाता है।
जागरूकता की कमी भी एक बड़ी वजह है। सरकारी अभियान चलते हैं, लेकिन अक्सर वे सतही स्तर तक ही सीमित रह जाते हैं। जब तक गांवों में लगातार संवाद और सहभागिता नहीं होगी, तब तक स्थायी बदलाव संभव नहीं है।
इसमें एनजीओ और स्थानीय संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वे लोगों तक सीधे पहुंचकर न केवल जागरूकता बढ़ाते हैं, बल्कि उनकी वास्तविक समस्याओं को भी समझते हैं। लेकिन केवल बाहरी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं—समुदाय के भीतर से भी पहल जरूरी है।
सरकार को भी अपनी रणनीति में सुधार करना होगा। केवल निर्माण पर ध्यान देने के बजाय उपयोग, रखरखाव, पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता पर समान जोर देना होगा।
अंततः, स्वच्छ भारत का सपना केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन है। जब तक हर व्यक्ति यह नहीं समझेगा कि शौचालय का उपयोग उसकी सेहत, सम्मान और पर्यावरण के लिए जरूरी है, तब तक यह लक्ष्य अधूरा रहेगा।
बिहार में शौचालय बन चुके हैं—अब असली चुनौती है उन्हें जीवन का हिस्सा बनाना। यही बदलाव इस अभियान की वास्तविक सफलता तय करेगा।

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