विकास की दीवारें, जिम्मेदारी की दरारें
रिपोर्टः आलोक कुमार
पटना नगर निगम के वार्ड संख्या 22ए स्थित लालू नगर के बालूपर मुसहरी इलाके में एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है—क्या केवल निर्माण ही विकास है, या उसके उपयोग और संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है? करीब 20 मुसहर परिवारों की इस बस्ती में सातवीं बार शौचालय का निर्माण होना अपने आप में एक विडंबना को दर्शाता है।
एक समय था जब यहां शौचालय नहीं था और लोग खुले में शौच के लिए मजबूर थे। स्वच्छता और गरिमा के नाम पर जब पहली बार शौचालय बना, तो लोगों में उम्मीद जगी कि अब जीवन स्तर सुधरेगा। लेकिन यह उम्मीद धीरे-धीरे लापरवाही और अव्यवस्था के कारण टूटती गई। पहले बनाए गए छह शौचालयों का सही उपयोग और रखरखाव नहीं हो सका, जिसके कारण वे धीरे-धीरे बेकार हो गए और हर बार नई शुरुआत करनी पड़ी।
अब सातवीं बार बना शौचालय भी उसी स्थिति की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। दरवाजे टूट चुके हैं और सबसे बुनियादी जरूरत—पानी की व्यवस्था—अब भी नहीं है। लोग आज भी बाल्टी में पानी भरकर ले जाने को मजबूर हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल स्थानीय लोगों की जिम्मेदारी है, या निर्माण कराने वाली एजेंसियों और प्रशासन की भी जवाबदेही बनती है?
स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य सिर्फ शौचालय बनाना नहीं, बल्कि स्वच्छता की आदत विकसित करना और सुविधाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना भी है। जब तक जागरूकता, जिम्मेदारी और आधारभूत सुविधाओं का संतुलन नहीं बनेगा, तब तक ऐसे प्रयास अधूरे ही रहेंगे।
बालूपर मुसहरी की यह कहानी एक बड़ी सीख देती है—विकास केवल ईंट और सीमेंट से नहीं होता, बल्कि सोच, जिम्मेदारी और सहभागिता से होता है। अब समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन और स्थानीय समुदाय मिलकर इस स्थिति को बदलें, ताकि सातवीं बार की यह कोशिश अंतिम साबित हो, न कि अगली विफलता की शुरुआत।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
welcome your comment on https://chingariprimenews.blogspot.com/