समय की गणना और राजनीति का नया पैमाना
रिपोर्ट: आलोक कुमार
मानव सभ्यता ने समय को समझने और व्यवस्थित करने के लिए अनेक प्रणालियाँ विकसित की हैं। इतिहास को “ईसा पूर्व (BC)” और “ईस्वी (AD)” में विभाजित करने की परंपरा भी इसी क्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। “बिफोर क्राइस्ट” और “ऐनो डोमिनी” के रूप में प्रचलित यह कालगणना केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि वैश्विक इतिहास को एक साझा संदर्भ देने का माध्यम रही है।
लेकिन आज भारत में एक नई तरह की समय-रेखा उभरती दिख रही है—“2014 से पहले” और “2014 के बाद”।
साल 2014 भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज हुआ, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाली। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि राजनीतिक विमर्श की भाषा, शैली और संदर्भ में भी बड़े बदलाव का संकेत था। इसके बाद से राजनीतिक चर्चाओं में “2014 पूर्व” और “2014 बाद” की तुलना एक सामान्य प्रवृत्ति बन गई है।
यह तुलना कई स्तरों पर की जाती है—आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचा, विदेश नीति, सामाजिक योजनाएं, और यहां तक कि राष्ट्रवाद की परिभाषा तक। समर्थकों के लिए 2014 एक “नवयुग” की शुरुआत है, जहां भारत ने वैश्विक मंच पर नई पहचान बनाई। वहीं आलोचकों के लिए यह विभाजन एक राजनीतिक रणनीति है, जो अतीत की जटिलताओं को सरल बनाकर वर्तमान को श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास करता है।
समस्या तब पैदा होती है जब “2014 पूर्व और 2014 बाद” की यह सोच एक स्थायी मानसिकता बन जाती है। इतिहास को समझने के लिए जरूरी है कि उसे निरंतरता में देखा जाए, न कि किसी एक वर्ष को अंतिम सत्य मानकर। जिस तरह “BC” और “AD” केवल समय का संदर्भ हैं, उसी तरह 2014 भी एक राजनीतिक संदर्भ भर होना चाहिए—न कि पूरे इतिहास का केंद्र।
भारत का इतिहास हजारों वर्षों में फैला हुआ है—सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक। इसमें अनेक उपलब्धियां, संघर्ष और परिवर्तन शामिल हैं। यदि हर उपलब्धि को “2014 के बाद” और हर समस्या को “2014 के पहले” से जोड़ दिया जाए, तो यह न केवल इतिहास के साथ अन्याय होगा, बल्कि समाज को भी एक सीमित दृष्टिकोण में बांध देगा।
इस तरह की समय-रेखा का एक बड़ा प्रभाव विचारधारात्मक ध्रुवीकरण के रूप में सामने आता है। जब समय को ही राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगे, तो संवाद की गुंजाइश कम हो जाती है। एक पक्ष हर उपलब्धि का श्रेय वर्तमान को देता है, जबकि दूसरा हर समस्या के लिए उसी को जिम्मेदार ठहराता है। इस द्वंद्व में वस्तुनिष्ठता कहीं खो जाती है।
यह भी उल्लेखनीय है कि वैश्विक स्तर पर “BC” और “AD” की जगह अब “BCE” (Before Common Era) और “CE” (Common Era) जैसे अधिक समावेशी शब्दों का उपयोग बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य समय को धार्मिक सीमाओं से मुक्त कर एक सार्वभौमिक संदर्भ देना है। लेकिन भारत में इसके उलट, हम एक ऐसी समय-रेखा की ओर बढ़ते दिख रहे हैं, जो अधिक राजनीतिक और विभाजनकारी हो सकती है।
ऐसे में सवाल उठता है—क्या हम समय को समझने के अपने संतुलित दृष्टिकोण को खो रहे हैं? क्या इतिहास को निष्पक्ष अध्ययन के बजाय राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या यह प्रवृत्ति आने वाली पीढ़ियों को एक संतुलित और व्यापक इतिहास दे पाएगी?
निस्संदेह, हर युग का अपना महत्व होता है। 2014 भी भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। लेकिन इसे “शून्य बिंदु” के रूप में स्थापित करना, जहां से सब कुछ शुरू होता है, एक खतरनाक सरलीकरण हो सकता है। इतिहास न तो किसी एक व्यक्ति का होता है और न ही किसी एक सरकार का—यह एक सतत प्रवाह है, जिसमें हर दौर का अपना योगदान होता है।
अंततः, समय की गणना केवल तारीखों और वर्षों का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी सोच और दृष्टिकोण का प्रतिबिंब भी है। यदि हम इसे संकीर्ण राजनीतिक सीमाओं में बांध देंगे, तो हम न केवल अपने अतीत को सीमित करेंगे, बल्कि अपने भविष्य को भी।
इसलिए जरूरत है कि हम “2014 पूर्व और 2014 बाद” की बहस से आगे बढ़ें और इतिहास को उसकी व्यापकता और गहराई में समझने का प्रयास करें। तभी हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर पाएंगे, जो अपने अतीत से सीखता है, वर्तमान को समझता है और भविष्य की ओर संतुलित दृष्टि से आगे बढ़ता है।
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