“हरिश राणा: मानवता की अमर मिसाल”
रिपोर्टः आलोक कुमार
जब तक सूरज-चाँद रहेगा, हरिश राणा जैसे इंसान का नाम रहेगा—यह पंक्ति केवल भावुक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवन की सच्ची परिभाषा है, जिसने जाते-जाते भी कई ज़िंदगियों को रोशन कर दिया। गाज़ियाबाद के हरिश राणा की कहानी दर्द, संघर्ष, साहस और अंततः मानवता की विजय की कहानी है। 13 वर्षों तक कोमा की स्थिति में जीवन और मृत्यु के बीच झूलते रहने के बाद उनका इस दुनिया से जाना जितना पीड़ादायक है, उतना ही प्रेरणादायक भी।हरिश राणा का जीवन मानो एक लंबी परीक्षा था। एक ऐसा संघर्ष, जिसमें न केवल उनका शरीर, बल्कि उनके परिवार की भावनाएं भी लगातार तपती रहीं। कोमा की स्थिति में रहना केवल चिकित्सकीय अवस्था नहीं होती, यह पूरे परिवार के लिए एक मानसिक और सामाजिक चुनौती बन जाती है। हर दिन एक उम्मीद के साथ शुरू होता है और अनिश्चितता के साथ खत्म। लेकिन इस लंबे संघर्ष के बाद जब मंगलवार को हरिश ने अंतिम सांस ली, तो यह केवल एक जीवन का अंत नहीं था—यह एक महान उदाहरण की शुरुआत थी।
कहा जाता है कि अस्पताल ले जाते समय उनका हाथ जोड़कर विदा लेना हर किसी को भीतर तक हिला गया। वह क्षण यह बताने के लिए काफी था कि चेतना के पार भी कहीं न कहीं इंसान की संवेदनाएं जीवित रहती हैं। यह दृश्य मानो यह संदेश दे रहा था कि जीवन की अंतिम घड़ी में भी इंसान अपने भीतर की मानवता को जिंदा रख सकता है।
लेकिन हरिश राणा की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। असल में, उनकी विदाई एक नई शुरुआत बन गई। उन्होंने अपने अंगों का दान कर मानवता की सबसे बड़ी मिसाल पेश की। यह निर्णय केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का प्रतीक है। अंगदान के माध्यम से उन्होंने कई लोगों को नया जीवन देने का मार्ग प्रशस्त किया। उनका हृदय अब किसी और के शरीर में धड़क सकता है, उनकी आँखों की रोशनी किसी अंधेरे जीवन में उजाला भर सकती है, और उनके अन्य अंग कई बीमार लोगों को जीवन का दूसरा अवसर दे सकते हैं।
आज जब समाज में स्वार्थ और व्यक्तिगत हितों की चर्चा अधिक होती है, ऐसे समय में हरिश राणा जैसे उदाहरण यह याद दिलाते हैं कि इंसानियत अभी भी जीवित है। अंगदान केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह जीवन के प्रति एक व्यापक दृष्टिकोण है—जहाँ मृत्यु भी किसी और के लिए जीवन का कारण बन सकती है।
भारत में अंगदान को लेकर जागरूकता धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन अभी भी कई मिथक और डर लोगों को इस महान कार्य से रोकते हैं। हरिश राणा की कहानी इन भ्रांतियों को तोड़ने का कार्य करती है। यह दिखाती है कि मृत्यु के बाद भी हम समाज के लिए उपयोगी बन सकते हैं। यह सोच अपने आप में क्रांतिकारी है, क्योंकि यह जीवन को केवल व्यक्तिगत अस्तित्व तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे सामाजिक योगदान में बदल देती है।
इसी संदर्भ में एक और प्रेरणादायक उदाहरण सामने आता है—फादर जॉन डीमेलो। जेसुइट सोसाइटी के पटना प्रांत के पूर्व प्रोविंशियल रहे फादर जॉन डीमेलो ने जीवनकाल में ही पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में लिखित घोषणा कर दी थी कि उनकी मृत्यु के बाद उनका संपूर्ण शरीर दान कर दिया जाए। यह निर्णय केवल व्यक्तिगत आस्था का नहीं, बल्कि समाज के प्रति उनकी गहरी जिम्मेदारी का प्रतीक था। उनकी मृत्यु के बाद ईसाई धर्म की परंपरा के अनुसार केवल उनके बाल का दफन किया गया, जबकि उनका शरीर चिकित्सा शिक्षा और मानव कल्याण के लिए समर्पित कर दिया गया।
जेसुइट सोसाइटी के पटना प्रांत के 107 वर्षों के इतिहास में फादर डीमेलो पहले ऐसे पुरोहित थे जिन्होंने अंगदान का यह साहसिक और प्रेरणादायक कदम उठाया। यह उदाहरण यह दर्शाता है कि धर्म, समाज और मानवता के बीच कोई विरोध नहीं, बल्कि एक गहरा संबंध है। जब धर्म मानव कल्याण के साथ जुड़ता है, तब वह और भी अधिक सार्थक बन जाता है।
हरिश राणा और फादर जॉन डीमेलो—ये दोनों नाम हमें यह सिखाते हैं कि जीवन का असली अर्थ केवल जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीने में है। उनका त्याग हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम भी अपने जीवन के बाद किसी के लिए रोशनी बन सकते हैं?
आज जरूरत है कि समाज अंगदान को लेकर अपनी सोच बदले। इसे केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाए। सरकार और सामाजिक संस्थाओं को भी इस दिशा में और अधिक जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है, ताकि हरिश राणा जैसे उदाहरण अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य बन सकें।
अंततः, हरिश राणा की विदाई एक संदेश छोड़ जाती है—कि इंसान अपने कर्मों से अमर होता है। उनका जीवन भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उनका योगदान अनंत है। वे उन दिलों में जिंदा रहेंगे, जो उनके अंगों से धड़केंगे, उन आँखों में जो उनकी रोशनी से देखेंगे, और उन जीवनों में जो उनके कारण आगे बढ़ेंगे।
ऐसे महान और साहसी इंसान को विनम्र श्रद्धांजलि—आप सचमुच अमर हैं।
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