“जब दुनिया हथियारों में उलझी है, तब भी अहिंसा ही मानवता की असली ताकत है”
रिपोर्टः आलोक कुमार
हिंसा के उद्योग के बीच अहिंसा की पुकार आज का वैश्विक परिदृश्य एक चिंताजनक दिशा की ओर संकेत करता है, जहां हिंसा केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रह गई है, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित प्रवृत्ति का रूप लेती जा रही है। यह धारणा कि दुनिया में हिंसा और अशांति को बढ़ावा देने के पीछे संगठित आर्थिक शक्तियां सक्रिय हैं, अब केवल एक विचार नहीं बल्कि गहन विमर्श का विषय बन चुकी है। विशेष रूप से हथियार निर्माण से जुड़ी कंपनियों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाज के विभिन्न स्तरों पर हिंसात्मक प्रवृत्तियों को पोषित करती दिखाई देती हैं। इस प्रक्रिया की शुरुआत बचपन से ही हो जाती है।आज के बाजार में उपलब्ध अधिकांश खिलौने बंदूक, युद्ध या आक्रमण से जुड़े होते हैं। बच्चे खेल-खेल में हिंसा को सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकारने लगते हैं। यही नहीं, मनोरंजन उद्योग—विशेषकर फिल्में और ऑनलाइन गेम्स—भी हिंसा को आकर्षक और रोमांचक रूप में प्रस्तुत करते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे खेलों की भरमार है, जिनका मूल आधार युद्ध, हथियार और आक्रामकता है। यह एक ऐसी मानसिकता का निर्माण करता है, जिसमें संवेदनशीलता और सह-अस्तित्व के मूल्य पीछे छूटते जाते हैं। इसके विपरीत, अहिंसा के प्रचार-प्रसार के लिए इस स्तर पर कोई संगठित और व्यापक प्रयास नहीं दिखाई देता। यही कारण है कि समाज में आक्रोश, असहिष्णुता और संघर्ष की प्रवृत्तियां बढ़ती जा रही हैं।
ऐसे समय में महात्मा गांधी और पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जैसे विचारकों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, जिन्होंने अहिंसा को केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया। इसी संदर्भ में गायत्री शक्तिपीठ पर आयोजित स्वर्गीय रनसिंह परमार जी की श्रद्धांजलि सभा में महात्मा गांधी सेवा आश्रम के अध्यक्ष पी. वी. राजगोपाल ने अपने विचार रखते हुए इस गंभीर विषय को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हिंसा का स्वरूप समय के साथ और अधिक विनाशकारी होता गया है—तीर-कमान से लेकर बंदूक, और फिर परमाणु तथा हाइड्रोजन बम तक। यह प्रगति मानवता के लिए खतरे की घंटी है, न कि गर्व का विषय।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान की उपलब्धियां यदि मानवता के विनाश का कारण बनें, तो वे महानता का प्रतीक नहीं हो सकतीं। इसके विपरीत, एक अकेले महात्मा गांधी ने अहिंसा के माध्यम से जो परिवर्तन किया, वह आज भी विश्व के लिए प्रेरणा है, भले ही उन्हें नोबेल पुरस्कार न मिला हो। डॉ. राजगोपालन ने यह भी बताया कि दुनिया के कई देशों—जैसे अमेरिका और जर्मनी—में ‘पीस कॉर्नर’ और ‘पीस क्लब’ जैसी पहलें की जा रही हैं, जहां बच्चों और युवाओं को संवाद और सहमति के माध्यम से विवाद सुलझाने की शिक्षा दी जाती है। यह एक सकारात्मक पहल है, जिसे भारत में भी अपनाने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के सत्संकल्पों और बापू के आदर्शों को समाज परिवर्तन का आधार बताया गया। श्रद्धांजलि सभा के दौरान उपस्थित जनों ने स्व. रनसिंह परमार को पुष्पांजलि अर्पित की और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के रूप में पौधारोपण भी किया। अंततः, यह समय आत्ममंथन का है। यदि हिंसा को बढ़ावा देने वाली शक्तियां संगठित हैं, तो अहिंसा के पक्षधर लोगों को भी संगठित और सक्रिय होना होगा। शिक्षा, संस्कार और सामाजिक पहल के माध्यम से ही हम एक शांतिपूर्ण और समरस समाज की कल्पना को साकार कर सकते हैं।


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