बुधवार, 25 मार्च 2026

बिहार में शिक्षा की जंग: हाशिए के समुदायों के लिए हर दाखिला एक क्रांति

 बिहार में शिक्षा की जंग: हाशिए के समुदायों के लिए हर दाखिला एक क्रांति

रिपोर्टः आलोक कुमार


बिहार की धरती ने कभी ज्ञान और शिक्षा की महान परंपरा को जन्म दिया था, लेकिन आज विडंबना यह है कि यही राज्य शिक्षा के कई बुनियादी मानकों पर राष्ट्रीय औसत से पीछे दिखाई देता है। खासकर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), मुस्लिम समुदाय, और सबसे अधिक उपेक्षित नॉमेडिक ट्राइब्स (NT) तथा डिनोटिफाइड एंड नॉमेडिक ट्राइब्स (DNT) के लिए शिक्षा अब भी एक दूर का सपना है—एक ऐसा सपना, जिसे पाने के लिए हर दिन संघर्ष करना पड़ता है।

बिहार के जाति-आधारित सर्वेक्षण के आंकड़े इस असमानता की गहराई को स्पष्ट करते हैं। पूरे राज्य में जहां केवल लगभग 9.19% लोग ही हायर सेकेंडरी (+2) तक पहुंच पाते हैं, वहीं SC समुदाय में यह आंकड़ा करीब 7% और ST में 8% तक सीमित है। मुस्लिम समुदाय की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है, जहां लगभग 10% ही इस स्तर तक पहुंच पाते हैं। इन आंकड़ों में भी लड़कियों की स्थिति और अधिक चिंताजनक है—SC लड़कियों में केवल 4.4% और ST लड़कियों में 5.8% ही +2 तक पढ़ पाती हैं।

जब बात NT और DNT समुदायों की आती है, तो तस्वीर और भी गंभीर हो जाती है। इन समुदायों में शिक्षा का स्तर लगभग नगण्य है। महादलितों में सबसे पिछड़ा माने जाने वाले मुसहर समुदाय की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है—यहां हायर सेकेंडरी पास करने वाले लड़कों का प्रतिशत लगभग 2% है, जबकि लड़कियों में यह 1% से भी कम है। साक्षरता दर भी मुश्किल से 22% के आसपास सिमटी हुई है।

ये आंकड़े महज संख्याएं नहीं हैं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक उपेक्षा, भेदभाव और आर्थिक विषमता की कहानी कहते हैं। जब कोई बच्चा स्कूल छोड़कर मजदूरी करने लगता है, या किसी लड़की की कम उम्र में शादी कर दी जाती है, तो उसका असर केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता—पूरे समुदाय की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं।

बिहार के लाखों परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं—कच्चे मकान, स्वच्छता की कमी और अनिश्चित आय। ऐसे माहौल में शिक्षा उनके लिए विकल्प नहीं, बल्कि संघर्ष बन जाती है। इसलिए जब इन समुदायों का कोई युवा उच्च शिक्षा तक पहुंचता है, तो वह सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती, बल्कि सामाजिक बदलाव की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होती है।

इसी संदर्भ में National Youth Equity Forum (NYEF) जैसी पहलें उम्मीद की किरण बनकर सामने आई हैं। यह संगठन उन युवाओं को सहयोग देता है, जो अपने परिवार में पहली बार स्कूल या कॉलेज तक पहुंचते हैं। “अंबेडकर फेलो” और “CLAY फेलोशिप” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से यह न केवल शिक्षा को प्रोत्साहित करता है, बल्कि नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जागरूकता को भी विकसित करता है।

इन कार्यक्रमों के तहत युवाओं को मेंटरशिप, छात्रवृत्ति सहायता और सामुदायिक संगठन का प्रशिक्षण दिया जाता है। नतीजतन, ये युवा अपने गांवों और मोहल्लों में लौटकर दूसरों के लिए प्रेरणा बनते हैं। आज बिहार के कई जिलों में NYEF के हजारों सदस्य सक्रिय हैं, जो शिक्षा के अधिकार को लेकर जन-जागरूकता अभियान चला रहे हैं।

NT और DNT समुदायों की पृष्ठभूमि को समझना भी जरूरी है। ये वे समुदाय हैं, जो पारंपरिक रूप से घुमंतू जीवनशैली अपनाते आए हैं—जैसे कलाकार, बाजीगर और हस्तशिल्पी। ब्रिटिश शासन के दौरान 1871 के Criminal Tribes Act के तहत इन्हें “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया गया था। हालांकि 1952 में यह कानून समाप्त कर दिया गया, लेकिन इसका सामाजिक कलंक आज भी इनके साथ जुड़ा हुआ है।

घुमंतू जीवन, स्थायी निवास की कमी, दस्तावेजों का अभाव और सामाजिक पूर्वाग्रह—ये सभी कारण इन समुदायों के बच्चों को शिक्षा से दूर रखते हैं। परिणामस्वरूप, कई बच्चे प्राथमिक स्तर पर ही स्कूल छोड़ देते हैं।

सरकार ने इन समुदायों के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें SEED Scheme प्रमुख है। इस योजना के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और आवास पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसके अलावा छात्रवृत्ति, मुफ्त कोचिंग और हॉस्टल जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं।

फिर भी, इन योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। दस्तावेजों की कमी, जानकारी का अभाव और प्रशासनिक जटिलताएं इनकी प्रभावशीलता को सीमित कर देती हैं।

इस स्थिति को बदलने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार जरूरी है। रेजिडेंशियल स्कूल, मोबाइल स्कूलिंग और पारंपरिक कौशलों को आधुनिक व्यावसायिक प्रशिक्षण से जोड़ने जैसे कदम उठाने होंगे। साथ ही, NT/DNT समुदायों के लिए अलग नीति और मजबूत संस्थागत ढांचे की आवश्यकता है।

यह समझना बेहद जरूरी है कि शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, सशक्तिकरण और सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी साधन है। जब इन समुदायों का कोई युवा डॉक्टर, शिक्षक या प्रशासनिक अधिकारी बनता है, तो वह पूरे समाज के लिए एक नई दिशा तय करता है।

B. R. Ambedkar ने कहा था कि शिक्षा ही वह माध्यम है, जिससे समाज में समानता लाई जा सकती है। आज उनके इस विचार को धरातल पर उतारने की आवश्यकता है।

आइए, हम उन युवाओं के संघर्ष और सफलता का सम्मान करें, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा का रास्ता चुना। हर दाखिला, हर सफलता—एक नई क्रांति की शुरुआत है। जब समाज के सबसे कमजोर वर्ग का बच्चा आगे बढ़ेगा, तभी बिहार सच्चे अर्थों में प्रगति करेगा।

यह संघर्ष जारी है—और यह क्रांति भी, हर एक दाखिले के साथ।

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