दलितों की मुक्ति के लिए समर्पित 12 नवंबर रविवार
पटना. भारत में ख्रीस्तीयों ने 12 नवंबर को दलित मुक्ति रविवार के रुप में अंकित कर समाज में ‘आवाजहीनों की आवाज‘ बनने की आवश्यकता को उजागर करने का प्रयास किया है.
दलित पहले से ही अछूत के रूप में जाने जाते हैं और अनुसूचित जाति के सदस्य के रूप में भी जाने जाते हैं. हिंदू धर्म की कठोर वर्ण व्यवस्था के तहत वे सबसे नीचे वर्ण अर्थात पायदान में आते हैं.
भारत ने दलितों के उत्थान के लिए कई सार्वजनिक कार्यक्रमों की स्थापना की है लेकिन उनके प्रति व्यापक भेदभाव और हाशिए पर बनाये रखना जारी है. भारत में 300 मिलियन से अधिक दलित हैं.(1.3 बिलियन नागरिकों में से लगभग 25 प्रतिशत) और, ख्रीस्तीय एवं मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बीच, छूआछूत का कलंक व्यापक है.भारत के 28 मिलियन ईसाइयों में से दलितों की संख्या लगभग 60 प्रतिशत हैं, जिसका अर्थ है कि वे अधिकांश समुदायों में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हाशिए और बहिष्कार का अनुभव करते हैं.
दलितों की मुक्ति के लिए समर्पित रविवार, जिसमें हम बात करते, चर्चा करते, उत्पीड़न और भेदभाव से मुक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं, ताकि नागरिक सह-अस्तित्व को एक ऐसे संविधान द्वारा विनियमित किया जा सके जो न्याय, समानता, समान अधिकार और सभी के लिए अवसरों की गारंटी देता है। दलितों की स्थिति, जो अभी भी सामाजिक कलंक से चिह्नित है, अक्सर सभी के द्वारा बहिष्कृत हैं, एक असहनीय उल्लंघन है और एक लोकतांत्रिक दुर्बलता को दर्शाता है.
भारतीय कैथोलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग के लिए विभाग बने है.जब ईसाई मिशनरियों ने स्कूल खोले, तो इन दलितों को उन स्कूलों में दाखिला मिला और वो ईसाई बन गए. हर मौके का फायदा उठाते हुए, वो औपनिवेशिक नीति की मदद से आगे बढ़े और इस तरह से दलित आंदोलन संगठित हुआ.
बावजूद इसके आधुनिक युग में भी दलितों के खिलाफ अत्याचारों में कमी नहीं हुई बल्कि यह बढ़ रही है. इसी कारण से, कैथोलिक धर्माध्यक्षों ने भारत की कलीसियाओं के राष्ट्रीय परिषद के साथ मिलकर प्रतिवर्ष नवंबर के दूसरे रविवार को दलित लिबरेशन रविवार के रुप में घोषित किया है.इस वर्ष दलित कैथोलिक दलित लिबरेशन 12 नवम्बर 2023 रविवार को “दलितों की मुक्ति के लिए समर्पित रविवार” के रूप में मना रहे हैं.
हिन्दू होने पर भी दलितों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है लेकिन वे दलित, जो ख्रीस्तीय हैं, उन्हें विश्वास के आधार पर अतिरिक्त भेदभाव सहना पड़ता है, साथ ही वे अन्य दलितों के लिए उपलब्ध सरकारी सहायता कार्यक्रमों से भी वंचित किये जा रहे हैं.भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 1950 में एक राष्ट्रपति के आदेश पर हस्ताक्षर किया, जिसमें कहा गया कि हिंदू धर्म से अलग कोई भी धर्म अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा. बाद में सिख धर्म को(1956) से और बौद्ध धर्म को (1990) से दलितों के लिए लागू कानूनों से लाभ प्राप्त करने की अनुमति दी गई है.
1936 में ब्रिटिश शासन की तरफ से जारी आदेश में कहा गया था कि धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने दलितों को शोषित वर्ग नहीं माना जाएगा. 1950 में राष्ट्रपति की तरफ से जारी ‘ दी कॉन्स्टिट्यूशन (शेड्यूल्ड कास्ट्स) ऑर्डर‘ में इस बात का प्रावधान है कि सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध समुदाय से जुड़े दलितों को ही अनुसूचित जाति का दर्जा मिलेगा. चूंकि ईसाई और मुस्लिम समाज मे जाति व्यवस्था के न होने की बात कही जाती है, इसलिए हिंदू से ईसाई या मुस्लिम बने धर्म परिवर्तित लोग सामाजिक भेदभाव के आधार पर खुद को अलग दर्जा देने की मांग नहीं कर सकते.
साल 1950 के राष्ट्रपति आदेश को 1980 के दशक में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. ‘सूसाई बनाम भारत सरकार‘ नाम से चर्चित इस मामले पर 1985 में फैसला आया था. फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई और मुस्लिम दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से मना कर दिया था. कोर्ट ने माना था कि राष्ट्रपति आदेश काफी सोच-विचार कर जारी किया गया था. ऐसा कोई भी तथ्य या आंकड़ा उपलब्ध नहीं है जिसके आधार पर धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को वंचित या शोषित माना जा सके.
गाज़ी सादुद्दीन नाम के याचिकाकर्ता ने 2004 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मुस्लिम दलितों को भी आरक्षण का लाभ देने की मांग की. इसके बाद ईसाई संगठनों और लोगों की तरफ से भी कई याचिकाएं दाखिल हुईं जिनमें धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग की गई. यह याचिकाएं अभी तक लंबित है. कोर्ट ने 2011 में विस्तृत सुनवाई के लिए संवैधानिक सवाल तय किए थे, लेकिन सुनवाई नहीं हो सकी.
2007 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता मे आयोग का गठन किया. जस्टिस रंगनाथ मिश्रा ने 2009 में अपनी रिपोर्ट दी. इसमें सभी धर्म के लोगों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की सिफारिश की गई. उन्होंने मुस्लिम और ईसाइयों को आरक्षण का लाभ देने का भी सुझाव दिया.
7 अक्टूबर 2022 को केंद्र सरकार ने पूर्व चीफ जस्टिस के जी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में 3 सदस्यीय आयोग बनाया. यह आयोग इस बात की समीक्षा करेगा कि क्या धर्म परिवर्तन कर ईसाई या मुस्लिम बन चुके दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की ज़रूरत है. इस आयोग को अपनी रिपोर्ट देने के लिए 2 साल का समय दिया गया है.
केंद्र सरकार के लिए पेश एडिशनल सॉलिसीटर जनरल के एम नटराज ने बालाकृष्णन आयोग की रिपोर्ट का इंतजार करने का सुझाव दिया. याचिकाकर्ताओं के लिए पेश प्रशांत भूषण, कॉलिन गोंजाल्विस, सी यू सिंह जैसे वकीलों ने सुनवाई टालने का विरोध किया. उन्होंने संवैधानिक सवालों पर विचार की मांग की. उनका कहना था कि धर्म के आधार पर कुछ लोगों को अनुसूचित जाति न मानना समानता के अधिकार का उल्लंघन है.
जस्टिस संजय किशन कौल, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और अरविंद कुमार के सामने कुछ अनुसूचित जाति संगठनों ने भी अपनी बात रखी. उन्होंने ईसाई और मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने पर सुनवाई न करने की मांग की.
बताया जाता है अगर मुसलमान और ईसाई दलित धर्मपरिवर्तन करते हैं कि उनको अनुसूचित जाति का आरक्षण समाप्त कर दिया जाएगा.ऐसे लोगों को पिछड़ी जाति का आरक्षण मिलेगा.यदि मुसलमान और ईसाई दलित धर्मपरिवर्तन कर हिंदू धर्म स्वीकार करता है तो उनको वहां पर आरक्षण सुविधा मिल जाएगा.
आलोक कुमार
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