शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

आस्था, संस्कृति और स्वच्छता का महायज्ञ

 आस्था, संस्कृति और स्वच्छता का महायज्ञ

प्रस्तावना : सूर्योपासना की अनोखी परंपरा भारतवर्ष की मिट्टी में जितनी विविधताएं हैं, उतनी ही उसमें आस्थाओं की गहराई भी है. हर प्रदेश, हर जनपद, हर बोली अपने भीतर लोकजीवन का एक अध्याय समेटे हुए है. इन्हीं अध्यायों में एक उज्ज्वल पृष्ठ है — छठ महापर्व. यह पर्व केवल पूजा-अर्चना का अवसर नहीं, बल्कि मानव, प्रकृति और संस्कृति के मध्य संतुलन का अनुपम प्रतीक है. 

बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला यह पर्व आज देश की सीमाओं को लांघकर विश्व के हर कोने तक पहुँच चुका है. जहाँ-जहाँ भोजपुरी, मैथिली, मगही या हिंदी बोलने वाले बसे हैं, वहाँ-वहाँ डूबते और उगते सूर्य की आराधना में डूबे लोगों की झिलमिलाती आरतियाँ दिखाई देते हैं.

     छठ केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि पर्यावरण, श्रम, अनुशासन और समर्पण का जीवंत उत्सव है.यह पर्व समाज को वह सीख देता है, जो शायद किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलती — शुद्धता ही पूजा है, निष्ठा ही साधना है और सूर्य ही साक्षात् जीवन है.

    छठ का ऐतिहासिक और पौराणिक आधार छठ पर्व की जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं. ऋग्वेद में ‘सूर्य उपासना’ के अनेक मंत्र मिलते हैं. वैदिक ऋषि सूर्य को जीवनदायिनी शक्ति मानते थे, जो पृथ्वी पर प्रकाश, ऊर्जा और जीवन का संचार करती है. यह परंपरा कालांतर में लोकजीवन से जुड़ती गई और छठ का स्वरूप सामने आया.पौराणिक मान्यता है कि त्रेतायुग में जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तब माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्यदेव की आराधना की थी.उन्होंने नदी के किनारे उपवास रखकर सूर्य को अर्घ्य दिया. इसी से यह पर्व आरंभ हुआ माना जाता है.

     महाभारत काल में भी इस व्रत का उल्लेख मिलता है। कर्ण, को सूर्यपुत्र थे, प्रतिदिन सूर्यदेव की पूजा करते और उन्हें अर्घ्य अर्पित करते थे. माना जाता है कि सूर्य की उपासना से ही कर्ण को अपार तेज और शक्ति प्राप्त हुई थी.व्रत की वैज्ञानिकता और अनुशासन छठ पर्व की सबसे बड़ी विशेषता इसका वैज्ञानिक और अनुशासित स्वरूप है. इसमें किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि प्रकृति और पंच तत्वों की आराधना की जाती है.

       व्रती (छठव्रती) चार दिनों तक कड़े नियमों का पालन करती हैं —नहाय-खाय: पहला दिन शरीर और मन की शुद्धता का प्रतीक है. व्रती नदी या तालाब में स्नान कर घर में शुद्ध भोजन बनाती हैं.खरना: दूसरे दिन व्रती पूरे दिन निर्जल उपवास रखती हैं और शाम को गुड़-चावल की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण करती हैं.संध्या अर्घ्य: तीसरे दिन व्रती पूरे दिन निर्जल रहकर शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं.प्रातः अर्घ्य: चौथे दिन सूर्योदय से पहले उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रत का समापन होता है.

     यह क्रम केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आयुर्वेद और पर्यावरणीय दृष्टि से भी अद्भुत संतुलन दर्शाता है. इस दौरान शरीर विषैले तत्वों से मुक्त होता है, आत्मा अनुशासन से परिष्कृत होती है, और मन संयम से शांत होता है.सूर्य — ऊर्जा का परम स्रोत सूर्य को विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं ने जीवनदायिनी शक्ति माना है.मिस्र की सभ्यता में ‘रा’, जापान में ‘अमातेरासु’, और भारत में ‘सूर्यदेव’ — ये सभी एक ही चेतना के प्रतीक हैं. छठ पर्व उसी चेतना की उपासना है.

            सूर्य की किरणें हमारे शरीर को विटामिन-डी प्रदान करती हैं, जो हड्डियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए आवश्यक है. सुबह की किरणें शरीर के प्रत्येक कोशिका को सजीव करती हैं. इसलिए छठ का अर्घ्य अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य दोनों को दिया जाता है — यानी जीवन के हर पक्ष, हर अवस्था को समान सम्मान.

महिलाओं की भूमिका : श्रद्धा की साक्षात मूर्ति छठ पर्व का सबसे भावनात्मक पहलू है — स्त्री का त्याग और तपस्या। यह व्रत प्रायः महिलाएं ही करती हैं, हालांकि पुरुष भी इसमें पीछे नहीं.

चार दिनों तक निराहार रहकर, ठंडे जल में खड़ी होकर, घंटों तक ध्यानमग्न रहना किसी तपस्या से कम नहीं.यह पर्व नारी-शक्ति के असीम धैर्य, विश्वास और शक्ति का दर्पण है. व्रती महिलाएं न केवल अपने परिवार के लिए वरदान मांगती हैं, बल्कि पूरे समाज की समृद्धि, आरोग्यता और उज्जवल भविष्य के लिए प्रार्थना करती हैं.

लोक संस्कृति का उत्सव : गीत, गंध और गंगा की लहरें छठ पर्व केवल पूजा का अनुष्ठान नहीं, यह लोकगीतों, संगीत और सादगी का पर्व है। जब घाटों पर “केलवा जे फरेला घवद से ओ पिया” या “उग हो सूरज देव” जैसे गीत गूंजते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है.यह गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति, मातृत्व की पुकार और आस्था की गूंज हैं.मिट्टी के दीये, बाँस की टोकरी, ठेकुआ, कसार और फल — इन सबका अपना सांस्कृतिक महत्व है.ये लोकजीवन को प्रकृति से जोड़ते हैं.छठ और प्रवासी समाज आज छठ बिहार या पूर्वांचल तक सीमित नहीं रहा.मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, सूरत, चेन्नई से लेकर दुबई, लंदन, सिडनी और न्यूयॉर्क तक इसके आयोजन होने लगे हैं. प्रवासी भारतीयों के लिए यह पर्व अपनी जड़ों से जुड़ने का भावनात्मक पुल बन गया है.

शहरों की बहुमंजिली इमारतों की छतों पर, या समुद्र तटों पर, जब लोग पीले वस्त्रों में सूर्य की आराधना करते हैं, तो वह केवल पूजा नहीं, बल्कि अपने गाँव-घाट, अपनी मिट्टी और अपनी माँ की याद का प्रतीक होता है।पर्यावरण और स्वच्छता का संदेश छठ पर्व का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश है — स्वच्छता ही श्रद्धा है. इस पर्व से पहले गाँव-शहर के तालाब, नदी और सड़कों की सफाई होती है. लोग अपने घरों और मोहल्लों को धो-पोंछकर सजाते हैं. छठ व्रत यह सिखाता है कि प्रकृति की पूजा तभी संभव है जब हम कैसे स्वच्छ रखें.

             आज जो विश्व प्रदूषण और जल-संकट से जूझ रहा है, तब छठ का यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।आर्थिक दृष्टि से छठ का प्रभाव छठ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर है.मिट्टी के बर्तन बनाने वाले, बांस की टोकरी बनाने वाले, फल-सब्जी विक्रेता, वस्त्र और पूजा सामग्री बेचने वाले — सभी के लिए यह पर्व आय का प्रमुख स्रोत बन जाता है.गाँवों में कुटीर उद्योगों का पुनर्जीवन इस पर्व से देखा जा सकता है.

          यह अपने आप में आर्थिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता का मॉडल है.सामाजिक समरसता और लोक एकता छठ पर्व में कोई जात-पात, ऊँच-नीच या वर्ग भेद नहीं रहता.गाँव का अमीर हो या गरीब, सब एक ही घाट पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं.यह पर्व सामाजिक समानता का प्रतीक है — जहाँ भक्ति ही पहचान है और सत्य ही धर्म।आधुनिक संदर्भों में छठ की चुनौतियाँ तेजी से बदलते समय में, जब जीवन की गति कृत्रिम होती जा रही है, छठ जैसे पर्वों के सामने भी कई चुनौतियां हैं.

    नदियों का प्रदूषण, प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग, और नगरीकरण के कारण प्राकृतिक घाटों का अभाव — ये सब इस महापर्व की पवित्रता को चुनौती दे रहे हैं.इसलिए अब यह आवश्यक है कि हम छठ को केवल धार्मिक अनुष्ठान न मानें, लेकिन पर्यावरणीय आंदोलन के रूप में भी देखें. हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह नदी, तालाब और पर्यावरण की रक्षा करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी छठ की वही दिव्या महसूस कर सकें.

छठ : लोकजीवन में स्त्री-पुरुष की समान भागीदारी भले ही व्रत करने वाली महिला प्रमुख रूप से केंद्र में होती हैं, लेकिन पुरुष भी इस पर्व में समान भूमिका निभाते हैं.पूरे परिवार का सहयोग, प्रसाद बनाने में मदद, घाट सजाने में श्रमदान — यह सब मिलकर पारिवारिक एकता और सामूहिक जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं.

        छठ का यह स्वरूप भारतीय परिवार की उस परंपरा को पुनः जीवित करता है, जिसमें घर ही मंदिर और परिवार ही समाज होता है.सांस्कृतिक निर्यात : विश्व में बिहार की पहचान छठ ने बिहार की पहचान को नया आयाम दिया है.

         आज न्यू जर्सी, मेलबर्न, दुबई, मस्कट, सिंगापुर, लंदन, मॉरीशस तक इस पर्व का आयोजन होता है.विदेशों में रहने वाले भारतीय अपने बच्चों को यह सिखाते हैं कि यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि संस्कार और जीवनशैली है.विश्व स्तर पर यह पर्व भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का उदाहरण बन चुका है.छठ और नारी सशक्तिकरण इस पर्व में नारी केवल पूजा करने वाली नहीं, बल्कि संरक्षक और नेतृत्वकर्ता की भूमिका में होती है.सफाई से लेकर आयोजन तक, हर स्तर पर महिला नेतृत्व करती हैं.उनकी एकाग्रता, अनुशासन और संयम समाज को यह संदेश देता है कि नारी शक्ति यदि संकल्प कर ले, तो असंभव कुछ भी नहीं.यह पर्व स्त्री के भीतर छिपे ऋषिता की पहचान है.लोक कला और साहित्य में छठ छठ का प्रभाव लोक कला, चित्रकला, नृत्य और साहित्य तक फैला हुआ है.

           मधुबनी चित्रों में सूर्य की आराधना के दृश्य, भोजपुरी कविताओं में व्रती के गीत, और हिंदी साहित्य में आस्था के प्रतीक के रूप में छठ — ये सभी इस पर्व की सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाते हैं.भोजपुरी सिनेमा और गीतों ने भी इसे जन-जन तक पहुँचाया है, जिससे यह पर्व लोकधारा से राष्ट्रीय धारा में परिवर्तित हुआ है.आस्था और विज्ञान का संगम छठ पर्व का हर नियम विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है.सूर्यास्त और सूर्योदय के समय अर्घ्य देने से शरीर की कोशिकाएं सौर ऊर्जा को ग्रहण करती हैं.निर्जल उपवास शरीर के भीतर विषैले तत्वों को निकालता है.प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग पर्यावरण-संरक्षण को बढ़ावा देता है. इस प्रकार यह पर्व आस्था और विज्ञान के बीच संतुलन का अद्भुत उदाहरण है.

निष्कर्ष : छठ एक जीवन-दर्शन छठ केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है.यह सिखाता है कि जीवन में शुद्धता, अनुशासन, संयम और प्रकृति के प्रति सम्मान ही सच्ची भक्ति है.जब डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तो यह जीवन के संघर्षों के प्रति आभार है;और जब उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तो यह भविष्य की आशा का प्रतीक है.आज के भौतिक युग में, जहां आडंबर और उपभोग का अंधकार फैलता जा रहा है, छठ महापर्व एक दीपक की तरह है — जो हमें याद दिलाता है कि आस्था केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि हमारे कर्म, हमारी निष्ठा और हमारे पर्यावरण की रक्षा में है.यह पर्व हमें जोड़ता है — मनुष्य से मनुष्य को, मनुष्य से प्रकृति को, और मनुष्य से परमात्मा को।समापन विचार जब घाटों पर डूबते सूर्य की सुनहरी किरणें जल में झिलमिलाती हैं, व्रती के हाथ folded होकर प्रार्थना में उठते हैं, और हवा में गूंजता है —

"छठ मइया के जयकारा, उग हो सूरज देव!" — तब लगता है मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक ही सुर में कह रहा हो — “यह आस्था नहीं, यह जीवन का उत्सव है.”


आलोक कुमार 

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

छठ पर्व को लेकर जिला पदाधिकारी की अध्यक्षता में समीक्षा बैठक सम्पन्न

 छठ घाटों पर स्वच्छता, प्रकाश और सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित करें : जिला पदाधिकारी

छठ व्रतियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसका रखें विशेष ध्यान

छठ व्रतियों की सुविधा के मद्देनजर चेंजिंग रूम की करें व्यवस्था

छठ पर्व को लेकर जिला पदाधिकारी की अध्यक्षता में समीक्षा बैठक सम्पन्न

बेतिया .छठ महापर्व को लेकर जिला प्रशासन पश्चिम चम्पारण पूरी तरह से सक्रिय हो गया है। जिला पदाधिकारी, श्री धर्मेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से एक समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें छठव्रती महिलाओं और श्रद्धालुओं की सुविधा एवं सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए.

     जिला पदाधिकारी ने सभी अधिकारियों को निर्देशित किया कि जिले के सभी छठ घाटों की सफाई, प्रकाश व्यवस्था, जल निकासी, पेयजल आपूर्ति, विधि-व्यवस्था एवं सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियां समय पर पूरी कर ली जाएँ. उन्होंने कहा कि घाटों तक जाने वाले मार्गों की मरम्मत, कीचड़ की सफाई और पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो.

       उन्होंने कहा कि छठ महापर्व लोक आस्था का पर्व है, इसलिए श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.सभी पदाधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों के प्रमुख छठ घाटों का भौतिक निरीक्षण करें और सड़कों, नालियों तथा घाटों की सफाई एवं मरम्मत कार्य को सुनिश्चित करें.

     बैठक में स्वास्थ्य विभाग को घाटों एवं भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर प्राथमिक उपचार केंद्र संचालित करने के निर्देश दिए गए. वहीं विद्युत विभाग को सभी घाटों और प्रमुख स्थलों पर प्रकाश की समुचित व्यवस्था करने तथा खराब तारों और पोलों की तत्काल मरम्मत का आदेश दिया गया. जिला पदाधिकारी ने सभी विभागों को आपसी समन्वय एवं सतत निगरानी बनाए रखने का निर्देश देते हुए कहा कि प्रशासन का उद्देश्य है कि जिले के सभी व्रतधारी और श्रद्धालु सुरक्षित, स्वच्छ और श्रद्धा मय वातावरण में छठ महापर्व मनाएँ.

     बैठक में नगर आयुक्त, नगर निगम बेतिया श्री लक्ष्मण तिवारी, विशेष कार्य पदाधिकारी, जिला गोपनीय शाखा, श्री सुजीत कुमार सहित सभी अनुमंडल पदाधिकारी, अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी, सभी नगर निकायों के कार्यपालक पदाधिकारी, प्रखंड विकास पदाधिकारी, अंचलाधिकारी सहित अन्य प्रशासनिक एवं पुलिस पदाधिकारी उपस्थित थे.

              छोटे सिंह ने कहा कि  सर पर्व के महत्व को देखते हुए आप से जनहित से अनुरोध पूर्वक कहना है कि पूर्व से चिन्हित छठ घाटों का निरीक्षण और अवलोकन अपने से हर-एक घाटों के साज सज्जा करने वाले कमिटी के साथ करने का कष्ट करेंगे बहुत मेहरबानी होगी.


आलोक कुमार

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

बरौली में महिलाओं की टोली ने मतदाताओं को किया जागरूक

 बरौली में महिलाओं की टोली ने मतदाताओं को किया जागरूक


बरौली.आगामी 6 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर मतदाताओं को लगातार जागरूक किया जा रहा है, ताकि मतदान के प्रतिशत को अधिक से अधिक बढ़ाया जा सके. इस क्रम में इस जागरूकता अभियान में महिलाओं की भी अहम भागीदारी है. जिला स्वीप कोषांग की ओर से आयोजित हो रही विभिन्न गतिविधियों में महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है. बुधवार को बरौली विधानसभा क्षेत्र के बरौली प्रखंड मुख्यालय में जीविका से जुड़ी दो दर्जन से अधिक महिलाओं ने अभियान चलाकर महिला व पुरुष मतदाताओं को जागरूक किया तथा 6 नवंबर को मतदान करने का संकल्प दिलाया. जागरूकता बैनर के साथ निकली महिलाओं ने जागरूकता से संबंधित कई नारे लगाए तथा लोगों से मतदान करने की अपील की.


आलोक कुमार

बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

स्व. श्रीकृष्ण सिंह के तैल चित्र पर कांग्रेसजन ने पुष्पांजलि अर्पित की

 स्व. श्रीकृष्ण सिंह के तैल चित्र पर कांग्रेसजन ने पुष्पांजलि अर्पित की

पटना. आधुनिक बिहार के निर्माता और बिहार के पहले मुख्यमंत्री बिहार केसरी स्व. श्रीकृष्ण सिंह की 138 वीं जयंती प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में मनाई गई। स्व. श्रीकृष्ण सिंह के तैल चित्र पर कांग्रेसजन ने पुष्पांजलि अर्पित की.

    इस अवसर पर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सांसद डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा कि श्रीकृष्ण बाबू आधुनिक बिहार के निर्माता रहें हैं और देश की आजादी के लड़ाई में अग्रिम पंक्ति के नेता

रहें हैं. उन्होंने बिहार के विकास को राह प्रदान किया। बरौनी और पतरातू थर्मल पावर स्टेशन से लेकर बरौनी तेल शोधक कारखाना, बोकारो स्टील कारखाना, बरौनी व सिंदरी सीमेंट कारखाना, हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन आदि प्रमुख कारखानों को उन्होंने अविभाजित बिहार लगने का मार्ग प्रशस्त किया। श्रीकृष्ण बाबू आजादी के लड़ाई में देश को दिशा देने वाले नेताओं में से एक रहें हैं. उन्होंने कहा कि आधुनिक बिहार के निर्माण में श्रीकृष्ण बाबू का योगदान अविस्मरणीय है.

      बिहार को प्रगति पथ पर अग्रसर करने में उनकी अहम भूमिका रही है.जयंती कार्यक्रम में प्रो. रामजतन सिन्हा, नरेन्द्र कुमार, ब्रजेश प्रसाद मुनन, जमाल अहमद भल्लू , अजय कुमार  चौधरी ,पंकज यादव, डा0 कमलदेव नारायण शुक्ला, रौशन कुमार सिंह, शशिकांत तिवारी, संजय कुमार पाण्डेय, प्रदुम्न कुमार, प्रियंका सिंह, राजनन्दन कुमार, धर्मवीर शुक्ला, आलोक हर्ष, सतीश कुमार चंदन, डा0 अफजल इमाम, रंजीत कुमार बाल्मीकी , बाल्मीकी शर्मा, मुन्ना ठाकुर समेत प्रमुख नेतागण मौजूद रहें.

आलोक कुमार

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

जो हर नए वादे के साथ बस “कल तक” का इंतज़ार करते रहते

 सरकार के फैसलों और घटती पेंशनभोगियों की संख्या से जुड़ा ताज़ा अपडेट सामने आया है। EPS-95 के लाखों बुजुर्गों को राहत की उम्मीद, लेकिन क्या सच में ₹7500 न्यूनतम पेंशन मिल पाएगी? पेंशन में बढ़ोतरी के पीछे छिपे असर और ताज़ा हालात जानकर आप चौंक जाएंगे!



पटना . ईपीएस-95 पेंशन : उम्मीदें, वादे और हकीकत 1995 में जब आजतक ने दूरदर्शन पर एक 20 मिनट के समाचार कार्यक्रम के रूप में शुरुआत की थी, तब हर बुलेटिन के अंत में ऐंकर कहते थे — “इंतज़ार करिए कल तक.” उस समय यह वाक्य सिर्फ समाचारों की निरंतरता का प्रतीक था, पर आज यह पंक्ति लाखों ईपीएस-95 पेंशनधारियों की ज़िंदगी का पर्याय बन चुकी है — जो हर नए वादे के साथ बस “कल तक” का इंतज़ार करते रहते हैं.

          ईपीएस-95 पेंशन योजना से जुड़े करीब 75 लाख पेंशनधारी वर्षों से अपनी न्यूनतम पेंशन में सम्मानजनक वृद्धि की मांग कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि ₹7500 मासिक पेंशन, महंगाई भत्ता और पति-पत्नी के लिए चिकित्सा सुविधा लागू हो. पर हर बार उम्मीदें बंधती हैं, घोषणा होती हैं, और फिर सब “फाइल प्रक्रिया में है” कहकर टाल दिया जाता है. जब केंद्रीय श्रम मंत्री भूपेंद्र यादव सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) के अध्यक्ष थे, तब उन्होंने घोषणा की थी कि आगामी बैठक में पेंशन वृद्धि का निर्णय लिया जाएगा. पर बोलते-बोलते मंत्रालय बदल गया और वे किसी और विभाग में स्थानांतरित हो गए.        

         अब श्रम मंत्रालय की कमान डॉ. मनसुख लक्ष्मण भाई मंडाविया के पास है. वे भी वही पुराने शब्द दोहरा रहे हैं — “आपका आंदोलन मर्यादित है, मैं उसका सम्मान करता हूं, सरकार सकारात्मक है, जल्द ही सम्मानजनक पेंशन मिलेगी — पर मैं समय नहीं बता सकता.”यह वही आश्वासन है जो वर्षों से दिया जा रहा है, पर कभी अमल में नहीं उतरा.

      अब खबर है कि सीबीटी की अगली बैठक नवंबर 2025 के अंत या दिसंबर की शुरुआत में हो सकती है. सूत्रों के अनुसार, वित्त मंत्रालय और श्रम मंत्रालय के बीच सहमति बन चुकी है, बस औपचारिक मंजूरी बाकी है. यही उम्मीद फिर से जागी है कि शायद इस बार फैसला हो जाए.पर सवाल वही है — “क्या यह भी सिर्फ कल तक का इंतज़ार बनकर रह जाएगा?”ईपीएफओ के विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पेंशन वृद्धि लागू होती है, तो इससे लाखों बुजुर्गों के जीवन में स्थायित्व आएगा. यह न केवल उनकी आर्थिक सुरक्षा को मजबूती देगा, बल्कि ईपीएफओ की छवि को भी सुदृढ़ करेगा.

      कई सेवानिवृत्त कर्मचारी अब भी 1000-1200 रुपये मासिक पेंशन पर गुज़ारा कर रहे हैं — जो मौजूदा समय में एक अपमानजनक स्थिति है. यह पेंशन नहीं, बल्कि औपचारिकता भर रह गई है.आज भी सड़कों पर बैठा वृद्धा पेंशन धारक सरकार से कोई एहसान नहीं, बल्कि अपना हक मांग रहा है.यह वही वर्ग है जिसने अपनी युवावस्था में देश की औद्योगिक और आर्थिक नींव को मजबूती दी.

    अब वही लोग अपनी बुज़ुर्गी में सरकार के रहम पर निर्भर हैं.शब्दों में सहानुभूति, पर कार्रवाई में सन्नाटा — यही इस पूरे प्रकरण का सार है.दरअसल, सरकारें बदलती है, मंत्रियों के नाम बदलते हैं, पर बयान वही रहते हैं — “हम इस दिशा में काम कर रहे हैं… फाइल आगे बढ़ गई है… फैसला जल्द होगा…”पर ‘जल्द’ की यह परिभाषा कभी हकीकत नहीं बन पाई।ईपीएस-95 पेंशनधारियों की कहानी आज आजतक की उस पुरानी आवाज़ जैसी है —जहाँ हर उम्मीद के बाद बस इतना कहा जाता है —“इंतज़ार करिए... कल तक.”


आलोक कुमार

सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

सम्पूर्ण पश्चिम चम्पारण में 11 नवंबर को शत प्रतिशत मतदान का सन्देश दिया

 

बेतिया . पश्चिम चंपारण वासियों को जिला प्रशासन की तरफ से दीपोत्सव की शुभकामनाओं के साथ शत प्रतिशत मतदान का सन्देश.मतदाता जागरूकता पर आधारित कार्यक्रम “दीपदान से मतदान तक” दिनांक - 19/10/2025, सायं 5:30, सागर पोखरा में श्री धर्मेंद्र कुमार-(जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह-जिलाधिकारी, पश्चिम चम्पारण) के मार्गदर्शन में लगभग 4000 दीपक को बेतिया वासियों  तथा जिला प्रशासन द्वारा प्रज्वलित किया गया .दीपदान के इस महोत्सव ने सम्पूर्ण पश्चिम चम्पारण में 11 नवंबर को शत प्रतिशत मतदान का सन्देश दिया.दीपदान के इस महोत्सव में जिला प्रशासन, जीविका दीदी, स्वयं सेवी संस्थाएं, और बड़ी संख्या में बेतिया वासियों ने हिस्सा लिया और दीप जलाकर यह संकल्प लिया कि इस दीपदान के साथ 11 नवंबर को बढ़ चढ़कर मतदान करेंगे

    उप विकास आयुक्त, श्री सुमित कुमार ने कहा की जिला प्रशासन इस तरह के आयोजन लगातार कर रहा है ताकि हर मतदाता तक पहुंच बनाई जा सके और पोलिंग बूथ पर हर सुविधा का ध्यान रखा जा रहा हैं मतदाताओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो साथ ही अपर समाहर्ता, श्री राजीव कुमार सिन्हा ने बताया कि हम इन कार्यक्रमों के माध्यम से संपूर्ण चंपारण में एक अलख जगाना चाहते हैं ताकि वह पोलिंग बूथ पर जाकर अपनी जिम्मेदारी को निभाएं.अपर समाहर्ता-सह-जिला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी, श्री अनिल कुमार सिन्हा ने बताया कि सभी मतदाताओं से अपील है कि पूर्ण रूप से स्वतंत्र भयमुक्त और सुविधाजनक वातावरण में मतदान करके अपने 11 नवंबर को पोलिंग बूथ पर पहुंचे प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है.

     नोडल पदाधिकारी, जिला स्वीप कोषांग, श्रीमती नगमा तबस्सुम द्वारा स्वच्छ, शांतिपूर्ण मतदान करने का संदेश दिया गया.कार्यक्रम में जिला प्रशासन से नजारत उप समाहर्ता, श्री सुजीत कुमार, DPM जीविका, श्री आर के निखिल, ज़िला कला संस्कृति पदाधिकारी, श्री राकेश कुमार और रश्मि कुमारी-केंद्र प्रशासक सखी वन स्टॉप सेंटर भी उपस्थित रहे। वहीं स्वीप कोषांग के सदस्य  राम इकबाल, नूतन कुमारी, राजीव कुमार के साथ अन्य  सभी ने दीपदान किया.कार्यक्रम आयोजन संपूर्ण स्वीप टीम द्वारा मिलकर किया गया.


आलोक कुमार

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

चुने हुए बस स्टैंड एवं रेलवे स्टेशन पर पिलाई जाएगी दवा

 

छठ पर्व पर विशेष पोलियो अभियान 18 से 28 अक्टूबर तक चलाया जा रहा है

नेपाल व बाहरी राज्यों से बिहार लौटने वाले 5 वर्ष तक के बच्चों पर रहेगी नजर

चुने हुए बस स्टैंड एवं रेलवे स्टेशन पर पिलाई जाएगी दवा

मोतिहारी. छठ पर्व पर विशेष पोलियो अभियान के तहत 18 से 28 अक्टूबर तक बच्चों को पल्स पोलियो से बचाव को दवा पिलाई जा रही है. वहीं इसको लेकर विशेष अभियान चलाया जा रहा है. इस सम्बन्ध में सिविल सर्जन डॉ रवि भूषण श्रीवास्तव व डीआईओ डॉ शरत चंद्र शर्मा ने बताया की नेपाल व बाहरी राज्यों से बिहार लौटने वाले 5 वर्ष तक के बच्चों पर रहेगी टीम की नजर.

    वहीं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र रक्सौल के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ राजीव रंजन ने बताया की रक्सौल के सटे हुए नेपाल की सीमा है जहाँ से बाहरी लोग आते है इसलिए यहाँ के चुने हुए बस स्टैंड एवं रेलवे स्टेशन पर बच्चों को दवा पिलाई जाएगी. 5 साल तक के बच्चों को  पोलियो की खुराक रेलवे स्टेश नए बस स्टैंड ए के साथ छठ घाटों पर भी टीकाकरण की व्यवस्था की जाएगी. विशेष अभियान में खासकर वैसे बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाना है, जो त्योहार के समय अपने घर आए हों। बता दें कि जिला को पोलियो के खतरों से मुक्त कराने के उद्देश्य से यह विशेष पोलियो टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है.जो आगामी 28 अक्टूबर तक चलेगा. पूर्वी चम्पारण के सीएस डॉ रविभूषण श्रीवास्तव ने बताया कि पर्व त्योहार में बाहर से आने.जाने वाले बच्चे पोलियो की खुराक पीकर पोलियो के संभावित खतरों के प्रति सुरक्षित हो सके.इसलिए ट्रांजिट टीम के साथ स्वास्थ्य कर्मियों को निर्देशित किया गया है कि रेलवे स्टेशन बस स्टैंड के साथ छठ घाटों पर बच्चों को पल्स पोलियो की दो बूंद दवा अवश्य पिलायें.

        डॉ एस सी शर्मा ने बताया कि चिह्नित स्थान जहां से बाहर के बच्चे जिले में प्रवेश करेंगे तथा जिले से प्रखंड व संबंधित गांव में प्रवेश करेंगे। उन जगहों पर कर्मी को नियुक्त किया गया है.पर्यवेक्षण के लिए सुपरवाइजर भी प्रतिनियुक्त किए गए हैं.बापूधाम मोतिहारी, समेत  प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र रक्सौल के अंतर्गत  दीपावली, छठ पूजा स्पेशल पोलियो उन्मूलन अभियान में पोलियो ट्रांजिट टीम रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म 1 पर दल कर्मी द्वारा बच्चों को दवा पिलाया गया.वहीं दल का अनुश्रवण प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी,नोडल चिकित्सा पदाधिकारी,बीएमसी यूनिसेफ द्वारा किया गया.


आलोक कुमार

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