रिपोर्ट: आलोक कुमार
यह मामला केवल एक बयान या किसी एक व्यक्ति की चूक भर नहीं है, बल्कि आज की राजनीति, सार्वजनिक विमर्श और इतिहासबोध के बीच बढ़ती खाई का प्रतीक बनता जा रहा है। जब बिहार के उपमुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे नेता यह कहते हैं कि सम्राट अशोक ने गौतम बुद्ध से मिलकर ज्ञान प्राप्त किया और शांति का संदेश फैलाया, तो यह सिर्फ एक साधारण ऐतिहासिक भूल नहीं रह जाती, बल्कि सार्वजनिक स्मृति के साथ गंभीर खिलवाड़ जैसी प्रतीत होती है।इतिहास के तथ्य बिल्कुल स्पष्ट हैं। गौतम बुद्ध का जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व हुआ और 483 ईसा पूर्व में उनका महापरिनिर्वाण हुआ। दूसरी ओर, सम्राट अशोक का जन्म लगभग 304 ईसा पूर्व में हुआ। यानी दोनों के बीच लगभग 179 वर्षों का अंतर है। ऐसे में उनका मिलना ऐतिहासिक रूप से असंभव है। यह वे बुनियादी तथ्य हैं जो स्कूल स्तर की इतिहास की पुस्तकों में पढ़ाए जाते हैं। ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतनी सामान्य जानकारी भी जब सार्वजनिक मंचों से गलत तरीके से प्रस्तुत की जाती है, तो इसके पीछे कारण क्या हैं?
दरअसल, 2014 के बाद भारतीय राजनीति में एक नया ट्रेंड उभरा है—जहां इतिहास को तथ्य की बजाय ‘नैरेटिव’ के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। नेता इतिहास को अपने राजनीतिक संदेश के अनुरूप ढालते हैं, ताकि वर्तमान की राजनीति को मजबूती दी जा सके। इस प्रक्रिया में तथ्य अक्सर पीछे छूट जाते हैं और भावनात्मक अपील आगे आ जाती है। जब सम्राट अशोक को गौतम बुद्ध से सीधे जोड़ दिया जाता है, तो यह एक प्रतीकात्मक कथा बन जाती है—कि एक शासक ने धर्म और शांति का मार्ग अपनाया। जबकि वास्तविक इतिहास यह बताता है कि अशोक ने बुद्ध के उपदेशों को उनके महापरिनिर्वाण के काफी समय बाद, विशेषकर कलिंग युद्ध के पश्चात अपनाया।
यहां समस्या केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि उस व्यापक माहौल की भी है जिसमें ऐसे बयान बिना पर्याप्त जवाबदेही के दिए जाते हैं। पारंपरिक मीडिया, जिसे अक्सर “गोदी मीडिया” कहकर आलोचना की जाती है, कई बार ऐसे बयानों पर गंभीर सवाल उठाने से बचता है। इसका परिणाम यह होता है कि नेताओं के भीतर तथ्यात्मक सटीकता को लेकर दबाव लगातार कम होता जाता है।
दूसरी ओर, सोशल मीडिया ने एक नई प्रकार की जागरूकता को जन्म दिया है। यहां लोग तत्काल तथ्य-जांच (फैक्ट-चेक) करते हैं, पुराने रिकॉर्ड सामने लाते हैं और गलतियों को उजागर करते हैं। हालांकि, इसके साथ ही एक डर का माहौल भी निर्मित होता है, जहां असहमति रखने वालों को “देश-विरोधी” या “पाकिस्तान समर्थक” जैसे टैग दिए जाते हैं। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक विमर्श के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे आलोचना और बहस की जगह धीरे-धीरे सिमटने लगती है।
नेताओं का यह तर्क भी सामने आता है कि वे “नई पीढ़ी”, यानी Gen-Z को इतिहास से जोड़ना चाहते हैं। यह उद्देश्य निस्संदेह सराहनीय है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या गलत तथ्यों के आधार पर इतिहास की समझ विकसित की जा सकती है? यदि युवा पीढ़ी को यही बताया जाएगा कि गौतम बुद्ध और सम्राट अशोक समकालीन थे, तो यह उनके बौद्धिक विकास के साथ अन्याय होगा। इतिहास केवल गौरवगान नहीं, बल्कि तथ्यों, प्रमाणों और समयरेखा का अनुशासन है।
राजनीतिक विमर्श में एक और प्रवृत्ति यह भी देखने को मिलती है कि अतीत की गलतियों के लिए लगातार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया जाता है। आलोचना लोकतंत्र का एक स्वाभाविक और आवश्यक हिस्सा है, लेकिन जब वर्तमान की कमियों से ध्यान हटाने के लिए अतीत को बार-बार निशाना बनाया जाता है, तो यह ‘डाइवर्जन पॉलिटिक्स’ का रूप ले लेता है। इससे न तो इतिहास सुधरता है और न ही वर्तमान की समस्याओं का समाधान होता है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या सरकार और राजनीतिक दलों के भीतर ऐसी कोई प्रणाली मौजूद है जो सार्वजनिक बयानों की तथ्यात्मक जांच सुनिश्चित कर सके? यदि नहीं, तो इसकी तत्काल आवश्यकता है। क्योंकि जब सत्ता में बैठे लोग ही इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करेंगे, तो आम जनता के लिए सही और गलत के बीच अंतर करना कठिन हो जाएगा।
अंततः, इसे “ऐतिहासिक अज्ञानता”, “राजनीतिक लापरवाही” या “नैरेटिव निर्माण की रणनीति”—किसी भी रूप में देखा जाए, तीनों ही पहलू इसमें परिलक्षित होते हैं। लेकिन सबसे अधिक चिंताजनक यह है कि यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है। जब गलत तथ्य बिना किसी संकोच के बार-बार दोहराए जाते हैं, तो वे धीरे-धीरे ‘सत्य’ के रूप में स्वीकार किए जाने लगते हैं।
लोकतंत्र में जनता की जागरूकता ही सबसे बड़ा संतुलन है। यदि नागरिक लगातार प्रश्न पूछते रहें, तथ्यों की जांच करते रहें और इतिहास को उसके सही संदर्भ में समझने का प्रयास करें, तो ऐसे बयानों का प्रभाव सीमित रहेगा। अन्यथा, इतिहास और राजनीति के इस असंतुलित संबंध का खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।


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