शनिवार, 26 जुलाई 2025

फादर जेरोम डिसूजा का निधन

कैपुचिन फादर जेरोम डिसूजा का अंतिम संस्कार संपन्न

फादर जेरोम डिसूजा का निधन 23 जुलाई को बरेली में हो गया था 

लखनऊ. फादर जेरोम डिसूजा का निधन 23 जुलाई को बरेली में हो गया था.आज 25 जुलाई को लखनऊ में फादर जेरोम डिसूजा, कैपुचिन का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ.जिसका संचालन बरेली, उत्तर प्रदेश, भारत के बिशप इग्नाटियस डिसूजा और कई कैपुचिन, डायोकेसन पुरोहित और कई शिक्षकों और विश्वासियों द्वारा किया गया था.

दुःखद निधन

फादर जेरोम डिसूजा कैपुचिन (87) का  23 जुलाई को बरेली में निधन हो गया.वे एक संत पुरोहित थे और उन्होंने कैपुचिन संप्रदाय, चर्च और समाज की अनेक पदों पर सेवा की. वे गोवा के मोंटे दे गिरिम में एक कुशल शिक्षक, आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज में प्रधानाचार्य और उत्तर प्रदेश के बरेली स्थित हार्टमैन कॉलेज में भी प्रधानाचार्य थे; वे न्यूज़ीलैंड में एक मिशनरी और बांग्लादेश के मैमनसिंह में क्लोइस्टर्ड सिस्टर्स के पादरी थे, और बरेली, उत्तर प्रदेश में सेवानिवृत्त हुए.

   

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शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

ईसाई मिशनरी संस्थाओं में स्वैच्छिक इस्तीफे की आड़ में जबरन निष्कासन

 

ईसाई मिशनरी संस्थाओं में स्वैच्छिक इस्तीफे की आड़ में जबरन निष्कासन कर दिया जाता है. मिशनरी प्रबंधन की सॉफ्ट टर्मिनेशन रणनीति उजागर,दर्जनों कर्मचारियों को इस रणनीति के तहत नौकरी से बाहर कर देने की खबर......

पटना.राजधानी पटना में है मेडिकल मिशन सिस्टर्स द्वारा संचालित कुर्जी होली फैमिली अस्पताल.यहां कार्यरत कर्मी हलकान और परेशान हैं.यहां के कर्मी जानते हैं कि कभी भी यहां की प्रबंधन की मनमर्जी के शिकार होकर स्वैच्छिक इस्तीफे की आड़ में जबरन नौकरी से निष्कासन कर दिया जाएगा.यहां के अगस्टीन,वर्गीस,अशोक,सत्यनारायण आदि कर्मियों पर निष्कासन की कैची चल गई है.ये सबके सब ईसाई मिशनरी संस्था की प्रबंधक की ‘सॉफ्ट टर्मिनेशन रणनीति‘ के शिकार हो चुके हैं.

        जानकार लोगों का कहना है कि कुर्जी होली फैमिली अस्पताल की प्रबंधक ने तारा टोप्पों को जबरन नौकरी से निकालने के बाद काफी बवाल हुआ था,तब से कर्मचारियों को  प्रत्यक्ष रूप से नहीं निकाला जाता हैं.उनको मनोवैज्ञानिक दबाव डालकर उनसे इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया जाता है.यहां तक घरेलू जांच कमिटी गठित कर जबरन मानसिक प्रताड़ना देना शुरू कर दिया जाता है.उनसे कहा जाता है कि अगर इस्तीफा नहीं देते हैं तो आपको वेतन व अन्य सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा. इस्तीफा देने से इनकार करने पर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी जाती है. उनके लिए विदाई सम्मान या फेयरवेल कार्यक्रम नहीं होता है, भले ही उनकी सेवा अवधि लंबी क्यों न हो.


1. मलहम लगाना -शुरुआत में कर्मचारी को समझाया जाता है कि “आपके लिए यह बेहतर होगा”

2. दबाव में कहा जाता है – “इस्तीफा नहीं देंगे तो कानूनी कार्रवाई होगी”

3.धमकी - "3 माह का वेतन और अन्य लाभ नहीं मिलेंगे”

4. मजबूरी में इस्तीफा- "कर्मचारी को दिखाया जाता है कि बाहर का रास्ता ही विकल्प है"

5. कोई फेयरवेल नहीं -"वर्षों की सेवा के बावजूद कोई सार्वजनिक विदाई नहीं होती"

यह प्रबंधन की चालाकी है. स्वेच्छा से इस्तीफा दिया.यह दिखाने से संस्था कानूनी झंझट से बचती है.कर्मचारी न्याय की लड़ाई नहीं लड़ पाते क्योंकि दस्तावेजों में ‘इस्तीफा’ होता है यह नैतिक सवाल है कि क्या यह स्वैच्छिक इस्तीफा है या ढका-छिपा निष्कासन?सेवा करने वाले कर्मचारियों को इस तरह बाहर करना क्या क्रूरता नहीं? प्रासंगिक उदाहरण है कि यही नीति उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के साथ हाल में उपयोग में लाई गई..जैसे दूध में गिरी मक्खी को निकाल फेंकना..यह नीति केवल अस्पताल या मिशनरी संस्था नहीं, कई अन्य एनजीओ और संस्थानों में भी प्रचलित है.

मांगें

1. ऐसे संस्थानों में लेबर लॉ और मानवाधिकार आयोग की जांच हो

2. निकाले गए कर्मचारियों को न्याय व हर्जाना मिले

3. पारदर्शी टर्मिनेशन पॉलिसी अनिवार्य हो

4. धर्म आधारित संस्थाओं की जवाबदेही तय हो


आलोक कुमार


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गुरुवार, 24 जुलाई 2025

उनकी स्थिति आज भी संवैधानिक हकों से कोसों दूर

 

बिहार में फिर गूंजा भूमि अधिकार का सवाल: तीन डिसमिल को लेकर जन सुराज का प्रदर्शन तेज

17 साल बाद भी लागू नहीं हुई बंदोपाध्याय आयोग की सिफारिशें, चुनावी मौसम में गरमाया मुद्दा

पटना. बिहार में आवासीय भूमिहीनों को जमीन देने का वादा एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है. वर्ष 2006 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भूमि सुधार के लिए डी. बंदोपाध्याय आयोग का गठन किया था, जिसने 2008 में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी थी. रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई थी कि भूमिहीनों को आवास के लिए जमीन दी जानी चाहिए.

प्रारंभ में सरकार ने दस डिसमिल जमीन देने की बात कही, जिसे बाद में पांच डिसमिल और अंततः तीन डिसमिल तक सीमित कर दिया गया.मगर 17 साल बाद भी इन सिफारिशों को जमीन पर उतारने की कोई ठोस पहल नहीं की गई है.

अब ‘जन सुराज’ ने उठाया मोर्चा

राज्य में चुनावी माहौल के बीच ‘जन सुराज’ संगठन ने इस मुद्दे को फिर से जोरदार ढंग से उठाया है.संगठन के कार्यकर्ता प्रदेश भर में प्रदर्शन कर रहे हैं और तीन डिसमिल भूमि आवंटन को चुनावी एजेंडे में शामिल करने की मांग कर रहे हैं.

जन सुराज के संस्थापक सदस्य गोडेन अंतुनी ठाकुर ने साफ शब्दों में कहा है, “हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक बिहार के हर भूमिहीन परिवार को तीन डिसमिल जमीन नहीं दिलवा देते.”

राजनीतिक खामोशी पर सवाल

विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा है कि नीतीश कुमार सरकार ने भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. यह रिपोर्ट राज्य के भूमिहीन, दलित, वंचित और आदिवासी समुदायों के लिए एक उम्मीद की किरण मानी जा रही थी, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह निष्क्रिय पड़ी है.

भूमिहीनों की दशा जस की तस

बिहार में लाखों परिवार आज भी बिना वैध आवासीय भूमि के झुग्गियों, सरकारी जमीनों या जल-जंगल की जमीन पर रह रहे हैं. न बिजली, न पानी, न स्थायी अधिकार—उनकी स्थिति आज भी संवैधानिक हकों से कोसों दूर है.


भूमि अधिकार फिर बना चुनावी मुद्दा

चुनाव नजदीक आते देख तीन डिसमिल जमीन का सवाल फिर गूंज रहा है.जन संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब तक गरीबों को जीने लायक जमीन नहीं दी जाएगी, तब तक विकास की बात अधूरी रहेगी.

आलोक कुमार 

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बुधवार, 23 जुलाई 2025

विधान सभा घेराव के लिए प्रस्थान करेगा

 

पटना. भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (बिहार) द्वारा बेरोजगार, पेपर लीक, पलायन और छात्रावासों सहित शिक्षण संस्थानों की जर्जर स्थिति के खिलाफ व निजी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग को लेकर कल दिनांक 24 जुलाई, 2025 को मध्याह्न 12-00 बजे प्रदेश काग्रेस मुख्यालय, सदाकत आश्रम से राजापुर पुल, बोरिंग रोड होते हुए विधान सभा घेराव के लिए प्रस्थान करेगा. उक्त कार्यक्रम में भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (बिहार) के प्रभारी श्री सत्यम कुशवाहा जी अलावे कई गणमान्य नेतागण के साथ-साथ हजारों की संख्या में एन.एस.यू.आई के छात्रगण भी उपस्थित रहेंगे।  

आलोक कुमार 

सोमवार, 21 जुलाई 2025

आवासीय भूमिहीनों को जमीन दिलाने एकता परिषद का गांधीवादी आंदोलन ग्वालियर से दिल्ली तक

 आवासीय भूमिहीनों को जमीन दिलाने एकता परिषद का गांधीवादी आंदोलन ग्वालियर से दिल्ली तक

जन सत्याग्रह, पी. वी. राजगोपाल के नेतृत्व में देशभर से हजारों लोगों की पदयात्रा होती थी

पटना. आवासीय भूमिहीनों को न्यूनतम तीन डिसमिल भूमि दिलाने की मांग को लेकर जन संगठन एकता परिषद ने बीते दो दशकों में कई बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया है.इस आंदोलन की अगुवाई देश के वरिष्ठ गांधीवादी नेता पी. वी. राजगोपाल ने की, जिसका उद्देश्य था – शांतिपूर्ण सत्याग्रह के माध्यम से गरीबों और हाशिए पर खड़े समुदायों के भूमि अधिकार सुनिश्चित करना.

2007 से लगातार उठती रही आवाज

2007 में जनादेश यात्रा के नाम से पहला बड़ा अभियान शुरू हुआ, जिसमें देशभर के हजारों भूमिहीनों ने भाग लिया.इस अभियान के तहत सरकार से आवास और आजीविका के लिए भूमि देने की नीति तैयार करने की मांग की गई.

2012 में ‘जन सत्याग्रह’ बनी निर्णायक घड़ी

इस आंदोलन की सबसे अहम कड़ी 2012 में देखने को मिली, जब ग्वालियर से दिल्ली तक लगभग 50,000 लोगों ने पैदल मार्च किया। इसे जन सत्याग्रह का नाम दिया गया. शांतिपूर्ण पदयात्रा के इस आयोजन ने देश का ध्यान आकर्षित किया.अंततः केंद्र सरकार ने आंदोलनकारियों से बातचीत की और कुछ बिंदुओं पर सहमति जताई, जिसमें भूमि सुधार नीति, भूमिहीनों की पहचान और भूमि आवंटन की प्रक्रिया तेज करने के वादे शामिल थे.

2018 में ‘जनांदोलन’ के रूप में फिर उठी मांग

2018 में जनांदोलन के नाम से एक और चरण शुरू किया गया.इसमें फिर से भूमि अधिकार, वन अधिकार और आजीविका सुरक्षा को लेकर मांगें उठाई गई.यह आंदोलन भी पूरी तरह अहिंसात्मक रहा और गांधीवादी मूल्यों पर आधारित था.

गांधी के रास्ते पर राजगोपाल

पी. वी. राजगोपाल, जो कभी चंबल के डकैतों के पुनर्वास में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं, ने जीवन भर अहिंसा और जन संगठन की ताकत को मजबूत किया.उनका मानना है कि भारत में भूमि के बिना न तो आत्मसम्मान संभव है और न ही स्थायी विकास.

मांग आज भी प्रासंगिक

एकता परिषद की प्रमुख मांग रही है कि हर भूमिहीन परिवार को कम-से-कम तीन डिसमिल भूमि आवास के लिए दी जाए.आज भी देश के कई हिस्सों में लाखों परिवार ऐसे हैं, जो बिना किसी वैध जमीन के बसे हैं.यह आंदोलन न केवल जमीन की मांग है, बल्कि गरिमा और अधिकार की भी मांग है.

आलोक कुमार

रविवार, 20 जुलाई 2025

भारतीय जनता पार्टी के नेता राजन क्लेमेंट साह नेआरोप को एक सिरे से नकारा

 

पटना. यह आरोप ईसाई समुदाय के द्वारा लगाया जाता है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ईसाइयों पर हमले बढ़े है. बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चा के उपाध्यक्ष राजन क्लेमेंट साह ने खुद ईसाई होकर आरोप को खारिज कर रहे हैं हम अल्पसंख्यक को निशाना बनाया जा रहा है.

     भाजपा के एक समर्पित कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं, तथा विगत कई वर्षों से अल्पसंख्यकों, खासकर ईसाई समुदाय के हितों की लड़ाई लड़ते आ रहे हैं.इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश में ईसाई समुदाय पर हमलों की संख्या में वृद्धि हुई है.यह गंभीर आरोप देश के  तथाकथित ईसाई संगठनों और धार्मिक नेताओं के द्वारा लगाया जाता हैं. 

      मीडिया में बने रहने और मिशनरी कर्ताधर्ताओं के सामने चमकने के लिए समय समय पर अखिल भारतीय ईसाई परिषद, यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम और अन्य संगठनों के द्वारा कहा जाता रहा है कि पिछले दस वर्षों में चर्चों पर हमलों, प्रार्थना सभाओं में तोड़फोड़, और पादरियों की गिरफ्तारी की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. संगठनों का कहना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का खुला उल्लंघन है.जबकि ईसाई नेता राजन का कहना है कि प्रधानमंत्री जी दिल्ली के गिरजाघर में जाते हैं और आर्चबिशप से मिलकर वार्तालाप करते हैं.

वहीं भाजपा ने इन आरोपों को पूरी तरह से निराधार बताते हुए कहा है कि उनकी सरकार सबका साथ, सबका विकास की नीति पर चल रही है और किसी भी धर्म के खिलाफ भेदभाव नहीं किया जाता है.भाजपा प्रवक्ता ने कहा, “देश में कानून का राज है. यदि कोई घटना घटती है, तो उस पर स्थानीय प्रशासन कार्रवाई करता है.यह कहना गलत है कि सरकार किसी एक धर्म के विरुद्ध है.”

आलोक कुमार

शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

स्मार्ट मीटरों ने आम जनता की कमर तोड़ दी

 पटना. भाकपा(माले) के राज्य सचिव कॉ. कुणाल ने कहा है कि चुनाव आते ही भाजपा-जदयू गठबंधन ने एक बार फिर जुमलों की झड़ी लगा दी है, लेकिन इस बार बिहार की जागरूक जनता इन झूठे वादों के जाल में फंसने वाली नहीं है.उन्होंने कहा कि बिजली दरों के मामले में बिहार देश का सबसे महंगा राज्य बना हुआ है. ऊपर से


स्मार्ट मीटरों ने आम जनता की कमर तोड़ दी है.पूरे राज्य में लोग फर्जी बिजली बिल, अनाप-शनाप चार्ज और जबरन वसूली से त्रस्त रहे हैं. स्मार्ट मीटरों के अनुभव से इतने लोग दुखी हैं कि उन्होंने इसे सही ही नाम दिया है — "खून चुसवा मीटर".आज भी हजारों लोग बिजली विभाग के दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन न सुनवाई है, न राहत.

         कॉ. कुणाल ने तंज कसते हुए कहा कि अब जब भाजपा-जदयू गठबंधन को अपनी हार सामने नजर आ रही है, तो इन्होंने फिर से एक नया जुमला फेंका है — हर परिवार को 125 यूनिट मुफ्त बिजली देने का.साथ ही दावा किया जा रहा है कि 2025 से 2030 के बीच एक करोड़ रोजगार दिए जाएंगे। सवाल है कि जब हर साल दो करोड़ रोजगार का वादा करके सत्ता में आए थे, तो पिछले 10 साल में 20 करोड़ रोजगार कहां गए?

      उन्होंने कहा कि 5 साल में 4.8 साल जनता को लूटो और चुनाव के दो महीने पहले बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर दो — यही भाजपा-जदयू का फार्मूला बन गया है.लेकिन बिहार की जनता अब इतनी भोली नहीं है। वह समझ चुकी है कि यह केवल सत्ता में बने रहने की साजिश है, न कि जनता की भलाई के लिए कोई गंभीर योजना।

कुणाल ने यह भी याद दिलाया कि भाकपा(माले) के विधायकों ने बार-बार विधानसभा से लेकर सड़कों तक आवाज उठाई है —स्मार्ट मीटरों को हटाने,सभी जरूरतमंद परिवारों को कम से कम 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने, और बिजली को निजी कंपनियों के चंगुल से मुक्त करने की.

            उन्होंने कहा कि INDIA गठबंधन अपने हर वादे और संकल्प पर गंभीरता से कायम है. केवल घोषणा नहीं, बल्कि ज़मीन पर बदलाव लाना ही हमारा लक्ष्य है. प्रेस वक्तव्य के अंत में उन्होंने पटना के पारस अस्पताल में दिनदहाड़े की गई हत्या की कड़ी निंदा की और कहा कि बिहार की राजधानी अब अपराध की राजधानी में तब्दील हो चुकी है.अपराधी बेलगाम हैं और शासन-प्रशासन मूक दर्शक बना बैठा है.

     उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है कि बिहार की जनता इस निकम्मी और लुटेरी सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाए। जनता ने बदलाव का मन बना लिया है और माले समेत INDIA गठबंधन इस बदलाव की लड़ाई में मजबूती से साथ है.


आलोक कुमार

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