बजट केवल आय–व्यय का लेखा-जोखा नहीं होता, वह यह भी तय करता है कि सरकार किसे प्राथमिकता देती है और किसे इंतज़ार की कतार में खड़ा रखती है. हर साल की तरह इस बार भी लाखों EPS-95 पेंशनधारकों की निगाहें बजट पर टिकी थीं. उम्मीद थी कि वर्षों से चली आ रही न्यूनतम पेंशन बढ़ाने की मांग पर कोई निर्णायक कदम उठेगा.लेकिन बजट के बाद वही पुरानी चुप्पी, वही अधूरा आश्वासन—और वही टूटा भरोसा सामने आया.
एक बार दिल तोड़ा जाता है.
यहाँ तो दिल टूटते-टूटते लोग ऊपर चले गए.
यह पंक्ति कोई काव्यात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उस यथार्थ का बयान है जिसे EPS-95 पेंशनधारक रोज़ जी रहे हैं। जब उम्मीदें बार-बार टूटती हैं, तो वह केवल मानसिक आघात नहीं देतीं—कई बार जीवन की डोर भी कमजोर कर देती हैं.
EPS-95 पेंशन योजना उन कर्मचारियों के लिए बनी थी, जिन्होंने संगठित क्षेत्र में दशकों तक देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी। यह पेंशन कोई सरकारी दया नहीं है, बल्कि कर्मचारियों और नियोक्ताओं के नियमित योगदान से बना सामाजिक सुरक्षा का अधिकार है। इसके बावजूद, आज लाखों पेंशनधारक ऐसी मामूली राशि पर जीवन गुज़ारने को मजबूर हैं, जो बढ़ती महंगाई के सामने लगभग निष्प्रभावी हो चुकी है। दवाइयों के दाम, किराया, बिजली-पानी के बिल—हर खर्च बढ़ता गया, लेकिन पेंशन वहीं ठहरी रही.
बजट 2026 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विकास, निवेश और आर्थिक स्थिरता की तस्वीर तो पेश की, लेकिन EPS-95 पेंशनधारकों के लिए कोई ठोस राहत नहीं दिखी। न्यूनतम पेंशन बढ़ाने की मांग वर्षों से उठ रही है, अदालतों से लेकर सड़कों तक आवाज़ बुलंद हुई है, फिर भी हर बार यह मुद्दा “भविष्य में विचार” की फाइल में डाल दिया जाता है। सवाल यह है कि क्या वृद्धावस्था की सुरक्षा इतनी भी जरूरी नहीं कि उस पर स्पष्ट नीति बने?
आंकड़ों के पीछे छिपा मानवीय पक्ष कहीं ज़्यादा कठोर है.यह वही पीढ़ी है जिसने अपने सुनहरे साल फैक्ट्रियों, दफ्तरों और मशीनों के बीच बिताए.आज वही लोग इलाज और भोजन के बीच चयन करने को मजबूर हैं.कई परिवारों में पेंशनधारक ही एकमात्र स्थायी सहारा हैं, लेकिन कमजोर पेंशन ने उन्हें स्वयं पर बोझ समझने की पीड़ा दे दी है.यह स्थिति किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए.
EPS-95 का मुद्दा अब केवल आर्थिक गणना का प्रश्न नहीं रहा, यह नीति-निर्माण में संवेदना के अभाव को उजागर करता है.जब सरकारें “सबका साथ, सबका विकास” की बात करती हैं, तो उस विकास में बुज़ुर्गों की गरिमा और सुरक्षा भी शामिल होनी चाहिए। पेंशन को खैरात समझने की सोच बदलनी होगी—यह सम्मान के साथ जीने का अधिकार है, कोई उपकार नहीं.
यह भी सच है कि सरकार के सामने संसाधनों की सीमाएं होती हैं, लेकिन प्राथमिकताएं तय करना ही शासन का असली इम्तिहान होता है.जिन लोगों ने अपने श्रम से देश की नींव मजबूत की, उन्हें बुढ़ापे में अनिश्चितता के हवाले कर देना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता.अगर नीति का केंद्र इंसान नहीं होगा, तो विकास के दावे खोखले साबित होंगे.
यह लेख केवल बजट की आलोचना नहीं है, बल्कि एक चेतावनी भी है.अभी भी वक्त है कि सरकार EPS-95 पेंशनधारकों की मांगों को गंभीरता से सुने और सम्मानजनक समाधान निकाले.क्योंकि दिल एक बार टूटे तो संभल भी सकता है,
लेकिन जब दिल टूटते-टूटते लोग ऊपर चले जाएँ—तो इतिहास माफ़ नहीं करता.
आलोक कुमार
