ईसा मसीह के जीवन की यह पावन गाथा
रिपोर्टः आलोक कुमार
मानव इतिहास की सबसे प्रेरणादायक घटनाओं में से एक है। ईसा मसीह के जन्म के पश्चात् उनके माता-पिता मरियम और जोसेफ मिस्र से लौटकर नाजरेथ में बस गए। यही वह स्थान था जहाँ प्रभु यीशु ने अपना बचपन और युवावस्था (लगभग 12 से 30 वर्ष की आयु तक) व्यतीत की। इसके बाद 30 से 33 वर्ष की आयु के बीच उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन, उपदेश और चमत्कारों के माध्यम से मानवता को प्रेम, करुणा और क्षमा का संदेश दिया।
लगभग दो हजार वर्ष पूर्व की यह ऐतिहासिक घटना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जब हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को नमन करते हैं, तो उनके पुत्र प्रभु यीशु को “होसान्ना” कहकर पुकारते हैं। “दाऊद के पुत्र को होसान्ना” का जयघोष उस विश्वास और आशा का प्रतीक है, जो मानव हृदय में उद्धार की आकांक्षा को प्रकट करता है। पवित्र बाइबल में वर्णित है कि जब प्रभु यीशु येरुसलेम में प्रवेश कर रहे थे, तब लोग उनके आगे-पीछे चलते हुए पुकार रहे थे—“दाऊद के पुत्र को होसन्ना! धन्य है वह जो प्रभु के नाम पर आता है। सर्वोच्च स्वर्ग में होसन्ना!”
यह दृश्य अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण था। लोगों ने खजूर की डालियाँ लहराकर और अपने वस्त्र मार्ग में बिछाकर उनका स्वागत किया। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में पाम संडे (खजूर रविवार) मनाया जाता है। यह दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी अवसर है—एक ऐसा समय जब हम अपने हृदय रूपी घर को प्रभु के लिए तैयार करते हैं।
पाम संडे के साथ ही पवित्र सप्ताह की शुरुआत होती है, जो प्रभु यीशु के दुःखभोग, क्रूस पर बलिदान और पुनरुत्थान की ओर ले जाता है। यह सप्ताह हमें त्याग, सेवा, प्रेम और बलिदान का गहरा संदेश देता है। प्रभु यीशु ने न केवल शारीरिक रोगों को चंगा किया, बल्कि आत्माओं को भी शांति और मुक्ति का मार्ग दिखाया। इसलिए आज के दिन हमें भी उनके सिद्धांतों पर चलकर अपने आध्यात्मिक और शारीरिक चंगाई के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।
पटना के कुर्जी पल्ली स्थित संत माइकल प्राइमरी स्कूल परिसर में भी इस पावन अवसर पर बड़ी संख्या में ईसाई समुदाय के लोग एकत्र हुए। यहाँ मुख्य अनुष्ठानकर्ता फादर जोशी मथियस ने खजूर की डालियों पर पवित्र जल का छिड़काव किया। उनके साथ फादर सेल्विन जेवियर और फादर लॉरेंस पास्काल भी उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं को खजूर की डालियाँ वितरित की गईं, जिन्हें हाथों में लेकर सभी ने भक्ति-भाव से जुलूस निकाला और प्रेरितों की रानी ईश मंदिर में प्रवेश कर पवित्र मिस्सा में भाग लिया।
इसी प्रकार चुहड़ी पल्ली में माँ मरियम के ग्रोटो से खजूर रविवार की शोभायात्रा निकाली गई। पुरोहितों द्वारा खजूर की डालियों को आशीष देकर श्रद्धालुओं में वितरित किया गया। “होसन्ना” के गीतों के साथ वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठा। इसके पश्चात् गिरजाघर में फादर हरमन रफायल, फादर मनोज तिर्की और फादर अमित रोशन द्वारा मिस्सा बलिदान चढ़ाया गया।
मोतिहारी के बरियारपुर स्थित संत फ्रांसिस असीसी चर्च में भी पाम संडे बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। मुख्य पुरोहित फादर ललित की अगुआई में विशेष प्रार्थना सभा और मिस्सा का आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने खजूर की डालियों के साथ जुलूस निकालकर प्रभु यीशु के येरुसलेम प्रवेश की स्मृति को जीवंत किया।
अपने संदेश में फादर ललित ने कहा कि पाम संडे हमें विनम्रता, सेवा और प्रेम का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सच्ची महानता दूसरों की सेवा में निहित है। हमें अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर भाईचारे, क्षमा और करुणा की भावना को अपनाना चाहिए, ताकि समाज में शांति और सद्भाव बना रहे।
डुमरांव के कैथोलिक चर्च में भी यह पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। बक्सर धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष बिशप जेम्स शेखर, फादर प्रताप और फादर विजय भास्कर के नेतृत्व में श्रद्धालुओं ने खजूर की डालियाँ लेकर “होसान्ना” गाते हुए जुलूस निकाला और प्रभु को शांति के राजा के रूप में स्वीकार किया।
अंततः, पाम संडे हमें यह सिखाता है कि प्रभु यीशु का स्वागत केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने जीवन में उनके आदर्शों को अपनाकर करना चाहिए। यह दिन हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर प्रेम, दया, क्षमा और सेवा की भावना को स्थायी रूप से स्थापित करें। जब हम सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं—“हे पिता, हमारी प्रार्थना स्वीकार कर”—तब हमारा जीवन भी प्रभु की कृपा से आलोकित हो उठता है।
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