* 34वें रविवार को राजाओं का राजा का पर्व मनाया जाता है
पवित्र मिस्सा पूजा के बाद बचा हुआ परम प्रसाद रखा जाता है उसे तबरनाकल कहते हैं. वह बेदी के पास रहता है. युखरिस्तीय यात्रा के दौरान पवित्र सक्रामेंट को तबरनाकल से निकालकर मॉनस्ट्रेंस में रखा जाता है.इसके बाद भक्तिपूर्ण ढंग से पवित्र सक्रामेंट को लेकर युखरिस्तीय यात्रा में चला जाता है.पवित्र सक्रामेंट को कनोप्पी के अंदर ही रखा जाता है. बिशप अथवा उनके प्रतिनिधि ही अपने हाथो में मॉनस्ट्रेंस को लेकर चलते हैं.इस बार पटना महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष सेबस्टियन कल्लूपुरा,संजीवन निवास के सुपेरियर बेनी सेबस्टियन मूलन और कुर्जी पल्ली के पल्ली पुरोहित फादर पायस माइकल ओस्ता ने बारी बारी मॉनस्ट्रेंस लेकर चल रहे थे.
सफेद वस्त्र धारी परियों ने मॉनस्ट्रेंस के आगे फूलों की वर्षा करती रही.कुछ बच्चे मोमबत्तियों को जलाकर ले जा रहे थे.यह संदेश देने का प्रयास किया जाता है कि ख्रीस्त राजाओं के राजा हैं. प्रभु येसु ख्रीस्त अपने जीवन में कभी भी क्रोध एवं हिंसा नहीं किया. प्रभु येसु अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीते थे. प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1925 में बुराइयों को घटाने के लिए ख्रीस्त राजा पर्व शुरू किया गया था. येसु ख्रीस्त को एकमात्र राजा मानकर हम एकता और भाईचारा को बढ़ावा दे सकते हैं. बुराई के सामने हमें झुकना नहीं है. ईश्वर की मदद से आगे बढ़ना है.
आलोक कुमार