शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना'

 

पटना . मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी ने आज 1, अणे मार्ग स्थित 'संकल्प' से 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' की 10 लाख लाभुक महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये प्रति लाभुक की दर से 1000 करोड़ रुपये की राशि अंतरण किया. इसके पूर्व 1 करोड़ 46 लाख लाभुक महिलाओं के खाते में 14 हजार 600 करोड़ रुपये की राशि अंतरित की जा चुकी है.

    मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज 'महिला रोजगार योजना' के तहत अपनी पसंद का रोजगार करने के लिए 10 लाख महिलाओं को दस-दस हजार रुपये की सहायता राशि भेजी जा रही है. कुल मिलाकर 1 करोड़ 56 लाख महिलाओं को इसका फायदा मिल जायेगा. इस योजना में दी गयी सहायता से काफी संख्या में महिलाओं ने अपनी पसंद का रोजगार शुरू किया है. जो महिलाएं अपना रोजगार अच्छे से करेंगी, उन्हें आगे 2 लाख रुपये तक की सहायता दी जायेगी.

    मुख्यमंत्री जी ने कहा कि मुझे विश्वास है कि आप सभी महिलाओं को इस 10 हजार रुपये की राशि से अपना काम शुरू करने में काफी मदद मिलेगी. इससे आपका परिवार खुशहाल होगा तथा बिहार का और तेजी से विकास होगा. आज के कार्यक्रम में तीनों लाभार्थियों ने अपने-अपने अनुभव साझा किये हैं. महिलाओं में आत्मविश्वास देखकर मुझे खुशी होती है.हम लोग सभी लोगों के विकास के लिये लगातार काम कर रहे हैं. केन्द्र सरकार का भी राज्य के विकास में पूरा सहयोग मिल रहा है.


आलोक कुमार

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

नागरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर

 


पटना. 26 नवंबर—भारतीय लोकतंत्र का वह दिन, जब देश ने अपने भविष्य की दिशा स्वयं तय की.1949 में इसी तारीख को संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकार किया था, और एक दशक पहले सरकार ने इसे संविधान दिवस के रूप में स्थापित कर नई पीढ़ी को संविधान की आत्मा से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया.यह दिन केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि नागरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है.

      हमारा संविधान केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक आकांक्षाओं का जीवंत ग्रंथ है. यही वह शक्ति है जिसने सामाजिक पृष्ठभूमि को पार करते हुए एक साधारण परिवार के व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का अवसर दिया.लोकतंत्र की यह समावेशी क्षमता तब और भी स्पष्ट होती है जब देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाला व्यक्ति संसद की सीढ़ियों पर नतमस्तक होकर संस्थाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करता है—यह दृश्य संविधान की आत्मा का ही विस्तार है.

     संविधान दिवस पर देश उन महान विभूतियों को नमन करता है, जिन्होंने संविधान के निर्माण में अपनी बुद्धि, दूरदृष्टि और तपस्या समर्पित की.डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर और संविधान सभा की प्रतिष्ठित महिला सदस्यों ने इस दस्तावेज को न केवल कानूनी ढांचा दिया, बल्कि इसे मानवीय संवेदनाओं से भी आलोकित किया.संविधान के 60 वर्ष पूरे होने पर गुजरात में निकाली गई ‘संविधान गौरव यात्रा’ और संविधान के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित विशेष सत्र—ये सभी पहले दर्शाती हैं कि राष्ट्र अपने मूल्यों के प्रति जागरूक और कृतज्ञ है.

     इस वर्ष का संविधान दिवस इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह सरदार पटेल और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती का साक्षी है. देश का एकीकरण सरदार पटेल की अद्भुत राजनीतिक दूरदृष्टि का परिणाम था, जिसने बाद में जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने जैसे साहसिक निर्णयों को भी प्रेरित किया. वहीं भगवान बिरसा मुंडा का संघर्ष आज भी न्याय, गरिमा और जनजातीय सशक्तिकरण की दिशा में प्रकाशस्तंभ बना हुआ है. वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ और गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत वर्षगांठ हमें हमारी सांस्कृतिक दृढ़ता और आध्यात्मिक विरासत की याद दिलाती है.

     संविधान केवल अधिकारों का संग्रह नहीं; यह कर्तव्यों का भी आग्रह करता है. आर्टिकल 51 A में उल्लिखित मौलिक कर्तव्य नागरिकों को यह स्मरण कराते हैं कि अधिकार तभी सार्थक बनते हैं जब कर्तव्य भावनात्मक और व्यवहारिक रूप से अंगीकृत किए जाएं। महात्मा गांधी भी यही कहते थे—कर्तव्य का ईमानदार निर्वहन ही अधिकारों की सबसे सशक्त गारंटी है।

   सदी के 25 वर्ष बीत चुके हैं। अब 2047 के अमृत काल और 2049 के संविधान शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए कर्तव्यनिष्ठ नागरिक ही परिवर्तन के वाहक बन सकते हैं. आने वाले देशों की नीतियों और निर्णय ही नई पीढ़ियों के भाग्य का निर्माण करेंगे। विकसित भारत का सपना केवल सरकार से नहीं, नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और जिम्मेदारी से ही पूर्ण होगा.

    मतदान का अधिकार भी इसी सहभागिता का सबसे बड़ा उपकरण है। हर 26 नवंबर को फर्स्ट-टाइम वोटर्स का सम्मान—यह विचार न केवल अभिनव है, बल्कि लोकतंत्र को नई ऊर्जा देने वाला कदम भी है. यदि हर स्कूल और कॉलेज इसे परंपरा बना लें तो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति युवा पीढ़ी में गर्व और जिम्मेदारी का भाव स्वाभाविक रूप से विकसित होगा.

     अंततः, संविधान दिवस केवल रस्म का दिन नहीं—यह आत्मावलोकन का क्षण है। यह दिन हमें स्मरण करता है कि राष्ट्रनिर्माण कोई दूरस्थ लक्ष्य नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है. जब हम कर्तव्य को प्रधानता देंगे, तब ही हमारा हर कार्य संविधान की शक्ति बढ़ेगी और भारत को एक सशक्त, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बनाने में हमारा योगदान सार्थक साबित होगा.


आलोक कुमार


बुधवार, 26 नवंबर 2025

गुवाहाटी टेस्ट में बुमराह ने अपने टेस्ट करियर की 10,000वीं गेंद .....

 


पटना.भारतीय क्रिकेट में जसप्रीत बुमराह का नाम अब सिर्फ रफ्तार और सटीकता का पर्याय नहीं रहा, बल्कि निरंतरता और कसावट भरे प्रदर्शन का मानदंड भी बन चुका है. गुवाहाटी टेस्ट में बुमराह ने अपने टेस्ट करियर की 10,000वीं गेंद फेंक कर एक ऐसा मुकाम हासिल किया, जो किसी भी तेज गेंदबाज के लिए धैर्य, फिटनेस और उच्च स्तर की निरंतरता का प्रमाण होता है.

दिलचस्प बात यह है कि बुमराह की पहली टेस्ट गेंद एबी डिविलियर्स को थी और 10,000वीं गेंद एडन मार्क्रम को—दोनों ही दक्षिण अफ्रीका के दिग्गज बल्लेबाज। यह संयोग भी उनके करियर के उस दायरे को रेखांकित करता है, जिसमें उन्होंने अपना सबसे बेहतरीन क्रिकेट उन्हीं टीमों के खिलाफ खेला, जो तकनीकी रूप से विश्व क्रिकेट की सबसे मजबूत इकाइयों में रहती हैं.

भारत की ओर से तेज गेंदबाजी में यह मुकाम हासिल करने वाले बुमराह छठे भारतीय तेज गेंदबाज हैं, जबकि कुल मिलाकर वे 17वें भारतीय गेंदबाज और दुनिया के 130वें गेंदबाज बने हैं जिन्होंने टेस्ट में 10,000 से अधिक गेंदें फेंकी हैं. तेज गेंदबाजों की वैश्विक सूची में वे 75 वें नंबर पर हैं—एक उपलब्धि जो उनके अपेक्षाकृत छोटे टेस्ट करियर को देखते हुए और भी बड़ी दिखती है.

कपिल देव से लेकर बुमराह तक—एक सफर की निरंतरता

भारत के टेस्ट इतिहास में सबसे अधिक गेंदें फेंकने का रिकॉर्ड कपिल देव के नाम है—27,740 गेंदें, जो 227 पारियों में फेंकी गईं। इशांत शर्मा (19,160) और जहीर खान (18,785) जैसे बड़े नाम इस सूची के शीर्ष पर हैं. इनके बाद जवागल श्रीनाथ (15,104) और मोहम्मद सिराज (11,515) आते हैं.

इन दिग्गजों की पांत में अब बुमराह का नाम भी मजबूती से जुड़ चुका है—10,013 गेंदों के साथ। यह संख्या सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है, जिसके दम पर टीम इंडिया ने अक्सर कठिन परिस्थितियों में उन्हें आक्रमण का नेतृत्व सौंपा.

विश्व रिकॉर्ड और वैश्विक परिप्रेक्ष्य

टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक गेंदें फेंकने का विश्व रिकॉर्ड मुथैया मुरलीधरन के नाम है—44,039 गेंदें.उनके बाद अनिल कुंबले (40,850) और शेन वॉर्न (40,705) का नाम आता है.तेज गेंदबाजों में यह रिकॉर्ड इंग्लैंड के जेम्स एंडरसन के पास है, जिन्होंने 40,037 गेंदें फेंकी हैं—यह आंकड़ा अपने आप में तेज गेंदबाजी की कठिनाइयों पर प्रकाश डालता है.

बुमराह की उपलब्धि का असल महत्व

आंकड़ों से परे इस उपलब्धि का असली अर्थ यह है कि बुमराह अपनी अनोखी एक्शन, सीम-अप नियंत्रित स्विंग और लगातार विकेट लेने की क्षमता के बावजूद अपनी फिटनेस और वर्कलोड को संभालने में कितने परिपक्व हो चुके हैं.

उनका खेल अब सिर्फ ‘स्पेल’ नहीं, बल्कि ‘स्टेटमेंट’ बन गया है—कि आधुनिक क्रिकेट में भी क्लासिकल टेस्ट गेंदबाज अपनी जगह मजबूती से बनाए रख सकता है.

जसप्रीत बुमराह का यह मील का पत्थर भारतीय क्रिकेट के लिए एक और प्रमाण है कि तेज गेंदबाजी की परंपरा, जो कपिल देव ने शुरू की थी और जहीर-इशांत ने आगे बढ़ाई, वह अब बुमराह और सिराज की पीढ़ी के हाथों सुनहरे दौर में प्रवेश कर रही है.


आलोक कुमार)

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

विज्ञापन हटाने के निर्देश दिए


 
गोवा.गोवा में प्रस्तावित ‘टेल्स ऑफ कामसूत्र एंड क्रिसमस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम पर उठा विवाद केवल एक आयोजन का विरोध नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक चेतना का संकेत है जो धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक गरिमा और सार्वजनिक मर्यादा से जुड़े प्रश्नों पर बेहद सजग है.सोशल मीडिया पर जैसे ही इस कार्यक्रम का प्रचार सामने आया, समाज के विभिन्न वर्गों—सामाजिक संस्थाओं से लेकर धार्मिक संगठनों तक—ने इसकी तीखी प्रतिक्रिया दी.सार्वजनिक दबाव और शिकायतों के बाद गोवा पुलिस ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए आयोजन पर रोक लगा दी. विज्ञापन हटाने के निर्देश दिए गए और पूरे राज्य में सतर्कता बढ़ा दी गई.

    इस विवाद की जड़ केवल ‘कामसूत्र’ शब्द का प्रयोग नहीं है, बल्कि इसे क्रिसमस जैसे पवित्र पर्व के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना है. शिकायतकर्ताओं को आपत्ति इसी बात से है कि धार्मिक उत्सव की आस्था और आध्यात्मिकता को बाजारू आकर्षण के साथ मिलाकर पेश किया गया. एनजीओ संस्थापक अरुण पांडे का तर्क है कि यह गोवा का सेक्स टूरिज्म के अड्डे की तरह प्रचारित करने की चाल है. वहीं, कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा ने इसे न सिर्फ अनुचित बताया बल्कि समाज में यौन अपराधों को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्ति करार दिया.

         सबसे प्रखर आवाज गोवा के आर्चबिशप व भारतीय कैथोलिक बिशप सम्मेलन के अध्यक्ष फिलिप नेरी कार्डिनल फेराओ की ओर से आई.उन्होंने इसे ईसा मसीह के जन्मोत्सव को अश्लीलता से जोड़ने की “गंभीर चूक” बताया और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कदम कहा.उनकी प्रतिक्रिया, व्यापक कैथोलिक समाज की बेचैनी को अभिव्यक्त करती है.

    यह भी उल्लेखनीय है कि विरोध केवल धार्मिक संगठनों तक सीमित नहीं रहा. स्थानीय राजनीतिक इकाइयों और सामाजिक समूहों ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी. कांग्रेस की सांता क्रूज़ यूनिट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के आयोजन गोवा की सांस्कृतिक छवि को धूमिल करते हैं. पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस राज्य में संस्कृति और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है.ऐसे में किसी भी आयोजन का प्रचार यदि सामाजिक मानदंडों से टकराए, तो स्वाभाविक है कि विरोध तेज हो.

कार्यक्रम के पीछे ओशो से जुड़ा प्रचार ढांचा और ‘ध्यान’ तथा ‘वेलनेस’ के नाम पर विविध गतिविधियों का दावा था। लेकिन आयोजनकर्ताओं ने जिस तरह क्रिसमस को जोड़कर यह पैकेज तैयार किया, वह समाज को मंजूर नहीं हुआ। उनके मौन ने संदेह और बढ़ा दिया है.

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि त्योहारों का व्यवसायीकरण अभी तक स्वीकार्य है जब वह सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं के दायरे का सम्मान करें. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक पहचान और सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी की जाए. गोवा पुलिस का हस्तक्षेप इसलिए समयोचित माना जाना चाहिए क्योंकि इससे संभावित तनाव और सामाजिक असंतोष को बढ़ने से रोका गया.

अंततः, यह घटना गोवा और देश दोनों के लिए एक संदेश छोड़ती है—कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच किसी भी प्रकार की अवांछित संगति समाज में असंतोष पैदा कर सकती है. सांस्कृतिक संवेदना को समझे बिना आकर्षक शीर्षक गढ़ना रचनात्मकता नहीं, बल्कि लापरवाही है। त्योहार, आस्था और सामाजिक मूल्य—ये किसी भी मनोरंजन या व्यावसायिक महत्वाकांक्षा से कहीं ऊपर है.


आलोक कुमार

सोमवार, 24 नवंबर 2025

फादर किनले शेरिंग, भूटान के पहले और अब तक के एकमात्र मूल-निवासी कैथोलिक पादरी

 


भूटान .भूटान, जहाँ सदियों से बौद्ध धर्म सांस्कृतिक आत्मा की तरह समाज को संचालित करता आया है, वहाँ कैथोलिक समुदाय की उपस्थिति भले ही अल्पसंख्या में हो—लेकिन इसकी आध्यात्मिक गूंज अत्यंत गहरी है.रोम में पोप के आध्यात्मिक नेतृत्व से जुड़ा यह समुदाय दार्जिलिंग (भारत) के धर्मप्रांत के अधिकार क्षेत्र में आता है, और 2015 के अनुमान के अनुसार भूटान में कुल कैथोलिकों की संख्या मात्र 1,200 है. लेकिन इस छोटे से समुदाय की धड़कन एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ी है, जिसकी कहानी भूटान के धार्मिक-सामाजिक इतिहास में अपूर्व स्थान रखती है—फादर किनले शेरिंग, भूटान के पहले और अब तक के एकमात्र मूल-निवासी कैथोलिक पादरी.

     फादर शेरिंग की यात्रा एक साधारण धार्मिक कथा नहीं, बल्कि अंतरात्मा में उठी पुकार, सामाजिक दबावों से जूझते विश्वास, और आध्यात्मिक साहस की एक असाधारण दास्तान है। एक धर्मनिष्ठ बौद्ध परिवार में जन्मे और युवावस्था में उद्यमिता की राह पर बढ़ते हुए उन्होंने गुप्त रूप से ईसा मसीह की शिक्षाओं का अध्ययन शुरू किया—वह अध्ययन जो धीरे-धीरे उनके भीतर एक बेचैनी, एक अज्ञात खिंचाव और अंततः एक गहरी प्रतिबद्धता में बदल गया.

    स्वयं फादर शेरिंग बताते है-“मुझे अपने भीतर एक अथाह बेचैनी महसूस होती थी. लगता था कि कोई मुझे पुकार रहा है—कि मेरा जीवन एक पुरोहित के रूप में ईसा मसीह को समर्पित होना चाहिए.लेकिन पारिवारिक और व्यावसायिक दबावों के बीच अंतिम निर्णय लेना आसान नहीं था.”

     उनके जीवन का निर्णायक मोड़ 1986 में आया—और वह भी किसी धार्मिक सम्मेलन, किसी चर्च या किसी तीर्थ स्थल पर नहीं, बल्कि एक हवाई जहाज में. वहाँ उनकी मुलाकात हुई मदर टेरेसा से.वह क्षण केवल संयोग नहीं, बल्कि नियति की तरह था.मदर टेरेसा ने उन्हें देखा, सुना—और एक वाक्य में उनके भीतर की दबी पुकार को शब्द दे दिए:

“तुम्हारा एक आह्वान है.ईश्वभूटान, जहाँ सदियों से बौद्ध धर्म सांस्कृतिक आत्मा की तरह समाज को संचालित करता आया है, वहाँ कैथोलिक समुदाय की उपस्थिति भले ही अल्पसंख्या में हो—लेकिन इसकी आध्यात्मिक गूंज अत्यंत गहरी है. रोम में पोप के आध्यात्मिक नेतृत्व से जुड़ा यह समुदाय दार्जिलिंग (भारत) के धर्मप्रांत के अधिकार क्षेत्र में आता है, और 2015 के अनुमान के अनुसार भूटान में कुल कैथोलिकों की संख्या मात्र 1,200 है. लेकिन इस छोटे से समुदाय की धड़कन एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ी है, जिसकी कहानी भूटान के धार्मिक-सामाजिक इतिहास में अपूर्व स्थान रखती है—फादर किनले शेरिंग, भूटान के पहले और अब तक के एकमात्र मूल-निवासी कैथोलिक पादरी.

फादर शेरिंग की यात्रा एक साधारण धार्मिक कथा नहीं, बल्कि अंतरात्मा में उठी पुकार, सामाजिक दबावों से जूझते विश्वास, और आध्यात्मिक साहस की एक असाधारण दास्तान है. एक धर्मनिष्ठ बौद्ध परिवार में जन्मे और युवावस्था में उद्यमिता की राह पर बढ़ते हुए उन्होंने गुप्त रूप से ईसा मसीह की शिक्षाओं का अध्ययन शुरू किया—वह अध्ययन जो धीरे-धीरे उनके भीतर एक बेचैनी, एक अज्ञात खिंचाव और अंततः एक गहरी प्रतिबद्धता में बदल गया.

स्वयं फादर शेरिंग बताते हैं—“मुझे अपने भीतर एक अथाह बेचैनी महसूस होती थी. लगता था कि कोई मुझे पुकार रहा है—कि मेरा जीवन एक पुरोहित के रूप में ईसा मसीह को समर्पित होना चाहिए. लेकिन पारिवारिक और व्यावसायिक दबावों के बीच अंतिम निर्णय लेना आसान नहीं था.”

उनके जीवन का निर्णायक मोड़ 1986 में आया—और वह भी किसी धार्मिक सम्मेलन, किसी चर्च या किसी तीर्थ स्थल पर नहीं, बल्कि एक हवाई जहाज में. वहाँ उनकी मुलाकात हुई मदर टेरेसा से. क्षण केवल संयोग नहीं, बल्कि नियति की तरह था. मदर टेरेसा ने उन्हें देखा, सुना—और एक वाक्य में उनके भीतर की दबी पुकार को शब्द दे दिए:

“तुम्हारा एक आह्वान है. ईश्वर के प्रति उदार बनो—वह तुम्हारे प्रति उदार होगा.”

यही वह क्षण था जिसने किनले शेरिंग को अंतिम निर्णय लेने का संबल दिया.

1995 में वे जेसुइट पादरी के रूप में अभिषिक्त हुए. वर्षों बाद वे दार्जिलिंग जेसुइट प्रांत के प्रांतीय सुपीरियर भी बने—ऐसा पद जिसे संभालना भूटान जैसे धार्मिक रूप से परंपरावादी देश के एक नव-धर्मांतरित व्यक्ति के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि ही नहीं, बल्कि साहस का प्रमाण भी है.

भूटान के लिए यह क्षण महज धार्मिक इतिहास की एक पंक्ति नहीं, बल्कि बहुलता, सहिष्णुता और व्यक्तिगत आस्था की स्वतंत्रता के सम्मान का प्रतीक है. एक बौद्ध राष्ट्र में एक कैथोलिक पादरी—वह भी मूल निवासी—का स्वागत एक नए सौहार्दपूर्ण अध्याय की शुरुआत था.

फादर किनले शेरिंग की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि आस्था की हर यात्रा व्यक्तिगत होती है, जोखिमों से भरी होती है, लेकिन जब कोई सत्य हृदय से पुकारता है—तो उसकी प्रतिध्वनि दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकतों से भी गहरी होती है.

भूटान की शांत घाटियों में, हिमालय की ऊंचाइयों के बीच, कैथोलिक समुदाय भले ही छोटा हो—लेकिन उसे दिशा देने वाला उसका पुरोहित असाधारण रूप से विराट है.


आलोक कुमार


रविवार, 23 नवंबर 2025

बिहार का राजनीतिक तापमान कितना उबलने वाला है

 

पटना.बिहार की सियासी जमीन पर इन दिनों जो हलचल है, वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन की नहीं, शासन-तरीकों की दिशा बदलने की चेतावनी भी है.भाकपा-माले की हाजीपुर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने जिस स्पष्टता और कड़वाहट से बातें रखीं, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि आने वाले समय में बिहार का राजनीतिक तापमान कितना उबलने वाला है.

    चुनाव के ठीक पहले 70 लाख नाम मतदाता सूची से गायब होना और 20–25 लाख नए नाम जोड़े जाना खुद में लोकतांत्रिक ढांचे की गंभीर विसंगति को उजागर करता है. दीपंकर का आरोप है कि यह सब एक संगठित साजिश की तरह हुआ—हर बूथ का संतुलन बदला गया, और इसके बाद जनता पर रुपये बिखेरकर चुनावी हवा को मोड़ा गया. यह आरोप चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल के साथ-साथ लोकतांत्रिक विश्वास को भी चोट पहुंचाता है.

   सबसे बड़ा संकेत यह है कि बिहार अब “नीतीश मॉडल” नहीं, बल्कि “यूपी मॉडल” के रास्ते पर धकेला जा रहा है. मुख्यमंत्री तो नीतीश हैं, पर गृह मंत्रालय किसी और के पास है—और उसके पीछे बुलडोजर की छाया स्पष्ट दिखती है.जिस तरह उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कानून का प्रतीक बन गया, उसी की छाया बिहार पर डालने की चेतावनी दी जा रही है.सवाल यह है कि क्या यह बुलडोजर अपराधियों पर चलेगा, या फिर वही पुराना पैटर्न दोहराया जाएगा—जहां दलित, पिछड़े, और अल्पसंख्यक ही सबसे आसान निशाना बनते हैं?

    दुलारचंद यादव की हत्या और उपमुख्यमंत्री का “छाती पर बुलडोजर” वाला बयान यह संकेत देता है कि राजनीति फिर से भय और दमन की भाषा अपनाने की ओर लौट रही है। चुनावी मंचों पर किसानों से लेकर बेरोजगारों तक को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए—उद्योग खोलने से लेकर बाढ़ समाधान तक—अब जनता हिसाब मांग रही है.

    मोदी के ‘गंगा’ वाले बयान पर दीपंकर का तंज भी राजनीतिक संदेश से भरा है। उन्होंने कहा—यह गंगा आस्था की नहीं, सत्ता की गंगा है, जिसे बंगाल की राजनीति में मोड़ने की तैयारी है. इसके समानांतर, श्रम कानूनों में बड़े बदलाव मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला माने जा रहे हैं. आठ घंटे की जगह 12 घंटे काम, हड़ताल लगभग असंभव, नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं—और इसे ‘सुधार’ के नाम पर परोसा जा रहा है.

     हिडमा की हत्या का मुद्दा भी सभा में राजनीतिक रंग से भरा.दीपंकर के अनुसार यह केवल माओवादी नेता की मौत नहीं, बल्कि आदिवासी इलाकों में कॉर्पोरेट विस्तार—खासकर अडानी समूह—को रास्ता साफ करने की प्रक्रिया का हिस्सा है.उनकी बूढ़ी मां का इस्तेमाल कर ‘सरेंडर’ का दबाव बनाने का आरोप और फिर हत्या—ये बातें बस्तर की वेदना और अविश्वास को और गहरा करती हैं.

   साथ ही, गैर-भाजपा राज्यों के साथ केंद्र का टकराव, तमिलनाडु में बिलों को रोके रखने की प्रवृत्ति, और सुप्रीम कोर्ट के बदलते रुख को दीपंकर लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला बताते हैं। उनका स्वर साफ था—जब अंग्रेजों को भगाया जा सकता है, तो आज की किसी भी तरह की तानाशाही का मुकाबला भी संभव है.

चुनाव में महिलाओं के इस्तेमाल का आरोप, दलित-पिछड़ों पर बढ़ते अत्याचारों की चेतावनी, और बुलडोजर-राज के उभार को रोकने का आह्वान इस सभा का मूल संदेश बनकर सामने आया। कामरेड विशेश्वर प्रसाद यादव को दी गई श्रद्धांजलि सिर्फ भावनात्मक क्षण नहीं थी—वह आने वाले संघर्षों की प्रस्तावना भी थी.

   बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है.अब सवाल यह नहीं कि सरकार किसकी है—सवाल यह है कि शासन कैसा होगा: कानून का, या बुलडोजर का? और इस सवाल का उत्तर आने वाले दिनों की राजनीति तय करेगी.


आलोक कुमार

शनिवार, 22 नवंबर 2025

महाबलीपुरम से चंपारण की ऐतिहासिक यात्रा शुरू

 

विश्व का सबसे विशाल शिवलिंग—महाबलीपुरम से चंपारण की ऐतिहासिक यात्रा शुरू

यह शिवलिंग तमिलनाडु के महाबलीपुरम स्थित पट्टिकाडू गांव में पिछले 10 वर्षों में तैयार किया गया है. इसे शनिवार को 96 पहियों वाले विशेष ट्रक पर कड़ी सुरक्षा के बीच सड़क मार्ग से रवाना किया गया है। रास्ते में कई राज्यों और प्रमुख शहरों में श्रद्धालु इस शिवलिंग के दर्शन भी कर सकेंगे.

चंपारण . तमिलनाडु के समुद्री तट पर बसे महाबलीपुरम से जब 33 फीट ऊँचा और 210 मीट्रिक टन वजनी शिवलिंग 96-चक्का ट्रेलर पर धीरे-धीरे आगे बढ़ा, तो यह सिर्फ पत्थर का कोई ढांचा नहीं था—यह भारतीय आस्था, शिल्पकला और धैर्य का विराट प्रतीक था. दस वर्षों की सतत साधना, अनगिनत हथौड़ों की गूंज और शिल्पकार लोकनाथ की टीम की अनथक मेहनत आखिरकार उस क्षण में फलित हुई, जब पूजा-अर्चना के बाद शिवलिंग को पूर्वी चंपारण के लिए रवाना किया गया.यह सिर्फ एक शिवलिंग नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक यात्रा है—भारत की मिट्टी, मार्ग, लोग और विश्वास, सब इसमें सम्मिलित हैं.

  बन रहा है दुनिया का सबसे बड़ा रामायण मंदिर — और अब पहुँच रहा है उसका ‘हृदय’.पूर्वी चंपारण के चकिया (जानकीनगर) में निर्माणाधीन विराट रामायण मंदिर अपने आप में एक अद्भुत संरचना बनकर उभर रहा है.1080 फीट लंबा, 540 फीट चौड़ा परिसर,18 शिखर, जिनमें मुख्य शिखर की ऊँचाई 270 फीट,कुल 22 मंदिरों का समुच्चय,चार विशाल आश्रम और अब — दुनिया का सबसे विशाल 33 फीट का शिवलिंग.

          महावीर मंदिर न्यास समिति के इस प्रोजेक्ट का सपना आचार्य किशोर कुणाल ने देखा था। आज उनके पुत्र सायण कुणाल उसी स्वप्न को जमीन दे रहे हैं, और इस परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए दिन-रात पेचीदा तकनीकी और प्रशासनिक कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं.33 फीट शिवलिंग—भारतीय शिल्प का अद्भुत प्रतिमान,एक ही विशाल ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित,वजन 210 मीट्रिक टन,निर्माण समय 10 वर्ष,लागत लगभग 3 करोड़ रुपये.

   निर्माण स्थल: महाबलीपुरम के पट्टीकाडु गाँव.शिवलिंग को भक्तों और गांव वालों की उपस्थिति में परंपरागत पूजन के बाद रवाना किया गया। यह यात्रा महज भौगोलिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक है—जिन राज्यों से शिवलिंग गुजरेगा, वहाँ स्वागत-पूजन की विशेष व्यवस्थाएँ होंगी।

अंदेशा है कि 25 दिनों में यह शिवलिंग चंपारण पहुँचेगा.शिवलिंग यात्रा—दक्षिण से उत्तर की आध्यात्मिक सेतु यात्रा मार्ग:

विशाल शिवलिंग को एक विशेष 96 चक्के वाले ट्रक पर लादकर महाबलीपुरम से बिहार के लिए रवाना किया गया. ये ट्रक कई राज्यों से होकर गुजरेगा. इस दौरान, श्रद्धालु कई शहरों में शिवलिंग के दर्शन कर सकेंगे. शिवलिंग का यात्रा मार्ग भी पहले से तया किया गया है. होसुर, होसाकोट, देवनाहाली, कुरनूल, हैदराबाद, निजामाबाद, अदिलाबाद, नागपुर, सीवनी, जबलपुर, मैहर, सतना, रीवा, मिर्जापुर, आरा, छपरा, मसरख, मोहम्मदपुर, केसरिया होते हुए ये अंत में चकिया स्थित विराट रामायण मंदिर परिसर पहुंचेगा।यह मार्ग एक तरह से भारत की सांस्कृतिक रेखा-चित्र जैसा है—दक्षिण की द्रविड़ शिल्प परंपरा से लेकर उत्तर भारत की श्री राम और शिव भक्ति तक.

   नए वर्ष में स्थापना—बिहार के लिए ऐतिहासिक क्षण.मंदिर प्रशासन के अनुसार, जनवरी–फरवरी 2026 में इस शिवलिंग की स्थापना हो सकती है। भारी उत्साह और राज्यव्यापी प्रतीक्षा पहले ही दिखने लगी है.यह सिर्फ बिहार का गर्व नहीं होगा, यह भारत का विश्व-मंच पर सांस्कृतिक परिचय बनेगा। जब कोई पूछेगा कि दुनिया का सबसे.विशाल मंदिर कौन-सा है—तो उत्तर होगा बिहार का विराट रामायण मंदिर.

    जब देश में मंदिर निर्माण और आध्यात्मिकता की चर्चा होती है, तो अक्सर उत्तर भारत ही विमर्श का केंद्र रहता रहा है। लेकिन इस शिवलिंग की यात्रा एक गहरा संदेश देती है—भारत की असली आत्मा उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम का भेद नहीं करती.यह शिवलिंग दक्षिण की शिल्प परंपरा और उत्तर की आस्था को जोड़ता हुआ एक सांस्कृतिक पुल है. और जब यह चकिया पहुँचेगा, तो संभव है कि यह केवल एक धार्मिक प्रतीक न रह जाए—यह बिहार के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधारस्तंभ बन जाए.


आलोक कुमार

The Configure Featured Post option in Blogger allows you to highlight a selected post prominently on

चिंगारी प्राइम न्यूज़

 About Us | चिंगारी प्राइम न्यूज़ Chingari Prime News एक स्वतंत्र हिंदी डिजिटल न्यूज़ और विचार मंच है, जिसका उद्देश्य सच्ची, तथ्यपरक और ज़मी...

How to Configure Popular Posts in Blogger The Popular Posts widget highlights your most viewed post