बुधवार, 14 जनवरी 2026

मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह दुर्लभ उत्सव

 

मकर संक्रांति: जब सूर्य उत्तरायण होता है और जीवन में उजास उतरता है

सर्द हवाओं के बीच जब आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है, तिल-गुड़ की मिठास हर रिश्ते में घुलने लगती है और सूर्य देव उत्तरायण की यात्रा शुरू करते हैं—तब आता है मकर संक्रांति, एक ऐसा पर्व जो केवल त्योहार नहीं, बल्कि परिवर्तन, सकारात्मकता और नई शुरुआत का प्रतीक है.

मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह दुर्लभ उत्सव है, जो धर्म, विज्ञान और प्रकृति—तीनों को एक सूत्र में पिरोता है. इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह समय दिन के बड़े होने और रातों के छोटे होने का संकेत है, जबकि सांस्कृतिक रूप से यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है.

तिल-गुड़ क्यों कहते हैं ‘मीठा बोलो’?

मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है. तिल शरीर को गर्मी देता है और गुड़ ऊर्जा. लेकिन इन दोनों से जुड़ा संदेश केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं—यह सामाजिक सौहार्द का प्रतीक भी है। “तिल-गुड़ खाओ, मीठा बोलो” का अर्थ है कि पुराने गिले-शिकवे भूलकर रिश्तों में मिठास घोलो.

पतंगों में उड़ते सपने

छतों पर उड़ती पतंगें सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि उम्मीदों और सपनों की उड़ान हैं. हर पतंग जैसे कहती है—हौसला बुलंद रखो, डोर थामे रखो और आसमान छूने की कोशिश करते रहो.

कृषि और श्रम का उत्सव

यह पर्व किसानों के लिए भी खास है.नई फसल के आगमन के साथ यह मेहनत के फल और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है. इसलिए देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पोंगल, खिचड़ी, उत्तरायण और बिहू जैसे नामों से मनाया जाता है.

संदेश जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है

मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि जीवन में परिवर्तन स्थायी है. जैसे सूर्य अपनी दिशा बदलता है, वैसे ही हमें भी नकारात्मकता छोड़कर सकारात्मक राह चुननी चाहिए.

 इस मकर संक्रांति पर संकल्प लें—

बीती कड़वाहट को पीछे छोड़ें,

रिश्तों में मिठास भरें,

और अपने सपनों को पतंग की तरह खुली उड़ान दें


मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!


आलोक कुमार

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

बुर्का–नकाब पर ‘नो एंट्री’ का आह्वान और संविधान के सामने खड़े सवाल

 जब सुरक्षा के नाम पर पहचान कटघरे में खड़ी हो जाए

बुर्का–नकाब पर ‘नो एंट्री’ का आह्वान और संविधान के सामने खड़े सवाल


जब सुरक्षा के नाम पर किसी की पहचान पर पहरा लगाया जाने लगे, तब सवाल केवल अपराध का नहीं रहता—वह सीधे संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ जाता है. बिहार की ज्वेलरी दुकानों में बुर्का या नकाब पहनकर आने वाली महिलाओं के लिए “No Entry” का आह्वान इसी चिंता को जन्म देता है. यह महज़ एक व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और संवैधानिक अधिकारों पर पड़ने वाला गहरा असर है.

ऑल इंडिया ज्वेलर्स एवं गोल्ड फेडरेशन (AIJGF) की बिहार इकाई के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा दिया गया यह वक्तव्य राज्य के उस सामाजिक ताने-बाने पर अनावश्यक दबाव डालता है, जो पहले से ही संवेदनशील दौर से गुजर रहा है.

सुरक्षा बनाम संदेह: रेखा कहां खिंचनी चाहिए?                                                                                            सुरक्षा की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता. अपराध रोकना राज्य और समाज—दोनों की साझा जिम्मेदारी है. लेकिन सुरक्षा के नाम पर किसी विशेष समुदाय की महिलाओं को संदेह की श्रेणी में खड़ा कर देना न तो तार्किक है और न ही न्यायसंगत.यदि कुछ आपराधिक घटनाओं में नकाब या बुर्का का दुरुपयोग हुआ है, तो क्या इसका समाधान यह है कि पूरे पहनावे को ही अपराध का प्रतीक बना दिया जाए? सवाल यह भी है कि क्या अपराध रोकने का सबसे आसान रास्ता हमेशा कमज़ोर पहचान पर प्रतिबंध ही होता है?

तर्क की कसौटी पर ‘नो एंट्री’ की सोच                                                                                                          यदि यही तर्क व्यापक रूप से लागू किया जाए, तो फिर हेलमेट पहनकर अपराध करने वालों के उदाहरण देकर क्या दोपहिया चालकों के लिए हेलमेट पर ही प्रतिबंध लगा देना उचित होगा? जवाब साफ है—नहीं.अपराध से निपटने के लिए जरूरत होती है कानून के भय, तकनीकी निगरानी, प्रशिक्षित सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस की सक्रियता की, न कि सामाजिक भेदभाव की. पहचान को अपराध से जोड़ देना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि एक नई समस्या को जन्म देता है.

संविधान क्या कहता है?                                                                                                                                भारत का संविधान नागरिकों को न केवल अधिकार देता है, बल्कि गरिमा की गारंटी भी देता है.अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है.अनुच्छेद 21 गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित करता है.किसी महिला के पहनावे को संदेह की दृष्टि से देखना इन दोनों अधिकारों पर सीधा प्रहार है. यह सोच केवल मुस्लिम महिलाओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की जमीन नहीं तैयार करती, बल्कि समाज में धार्मिक वैमनस्य और आपसी अविश्वास को भी बढ़ावा देती है.

खामोश असर, दूरगामी खतरे                                                                                                                     सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसे बयानों से आम नागरिकों के बीच यह संदेश जाता है कि संदेह करना स्वाभाविक है और भेदभाव स्वीकार्य.यही मानसिकता आगे चलकर तानों, सामाजिक बहिष्कार और अंततः कानून-व्यवस्था की चुनौती में बदल जाती है.

संतुलन की ज़रूरत                                                                                                                                  बिहार की पहचान हमेशा से साझी संस्कृति और सामाजिक समरसता रही है। सुरक्षा और सौहार्द के बीच संतुलन बनाए रखना राज्य, समाज और व्यापारिक संगठनों—तीनों की जिम्मेदारी है.जरूरत इस बात की है कि अपराध के खिलाफ कठोर, निष्पक्ष और समान कार्रवाई हो, न कि किसी समुदाय की महिलाओं के पहनावे को कटघरे में खड़ा किया जाए.क्योंकि इतिहास गवाह है—जब पहचान को अपराध से जोड़ दिया जाता है, तब लोकतंत्र शोर नहीं मचाता, लेकिन भीतर ही भीतर घायल हो जाता है.

आलोक कुमार


सोमवार, 12 जनवरी 2026

यात्राओं का मुख्यमंत्री: 21 साल में 15 यात्राएं

 सत्ता, संघर्ष और सड़कें: फिर यात्रा पर निकल रहे हैं नीतीश कुमार

10 बार मुख्यमंत्री, 21 साल की सियासत और अब ‘समृद्धि यात्रा’ का नया अध्याय


बिहार की राजनीति में अगर कोई चेहरा लगातार दो दशकों से केंद्र में रहा है, तो वह हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. सत्ता बदली, गठबंधन बदले, राजनीति के मौसम बदले—लेकिन नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद पर बने रहना अपने आप में एक राजनीतिक रिकॉर्ड है. अब एक बार फिर वे जनता के बीच जाने की तैयारी में हैं.17 जनवरी से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ‘समृद्धि यात्रा’ पर निकल रहे हैं, जो 22 मार्च तक चलेगी.

10 बार मुख्यमंत्री, सबसे लंबा कार्यकाल                                                                                                         नीतीश कुमार ने अब तक 10 बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है और वे राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता हैं.उनका पहला कार्यकाल मार्च 2000 में सिर्फ 7 दिनों का रहा. इसके बाद नवंबर 2005 में सत्ता में लौटे और फिर यह सिलसिला लगातार चलता रहा—नवंबर 2005 ,नवंबर 2010, फरवरी 2015,नवंबर 2015,जुलाई 2017,नवंबर 2020,अगस्त 2022,जनवरी 2024नवंबर 2025 (वर्तमान कार्यकाल).इस दौरान उन्होंने एनडीए और महागठबंधन, दोनों के साथ सरकार चलाई—जो बिहार की राजनीति को अलग पहचान देता है।

समृद्धि यात्रा: क्या है मकसद?                                                                                                               मुख्यमंत्री की समृद्धि यात्रा सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं है। इस यात्रा के दौरान नीतीश कुमार—राज्य की समृद्धि योजनाओं की समीक्षा करेंगे,जीविका दीदियों से मुलाकात करेंगे,₹10,000 सहायता के बाद रोजगार की प्रगति जानेंगे,सत्ता में भागीदारी और सहयोग के लिए जनता का धन्यवाद करेंगे.सरकार का दावा है कि यह यात्रा विकास, रोजगार और भागीदारी की ज़मीनी हकीकत को परखने का प्रयास है.

यात्राओं का मुख्यमंत्री: 21 साल में 15 यात्राएं                                                                                                  नीतीश कुमार को यूं ही “यात्राओं का मुख्यमंत्री” नहीं कहा जाता। अपने लगभग 21 साल के राजनीतिक कार्यकाल में उन्होंने 15 बड़ी यात्राएं की हैं.प्रमुख यात्राएं एक नज़र में:                                                                                न्याय यात्रा (12 जुलाई 2005) – सत्ता में आने से पहले                                                                                          विकास यात्रा (9 जनवरी 2009) – विकास कार्यों का लेखा-जोखा                                                                          धन्यवाद यात्रा (17 जून 2009) – लोकसभा जीत के बाद                                                                                      प्रवास यात्रा (25 दिसंबर 2009) – जिलों में रुककर समस्याएं सुनीं                                                                        विश्वास यात्रा (28 अप्रैल 2010) – जनता का भरोसा मजबूत करने के लिए                                                            सेवा यात्रा (9 नवंबर 2011) – पुनः सरकार बनने के बाद                                                                                      अधिकार यात्रा (19 सितंबर 2012) – विशेष राज्य के दर्जे की मांग                                                                        संकल्प यात्रा (5 मार्च 2014) – लोकसभा चुनाव से पहले                                                                                      सम्पर्क यात्रा: 13 नवंबर 2015-भेदभावपूर्ण बर्ताव को जनता के समक्ष उठाएंगे                                                  निश्चय यात्रा (9 नवंबर 2016) – सात निश्चय योजनाओं की समीक्षा                                                                        समीक्षा यात्रा (7 दिसंबर 2017) – विकास कार्यों का जमीनी जायजा                                                                      जल-जीवन-हरियाली यात्रा (3 दिसंबर 2019) – पर्यावरण और चुनावी संदेश                                                          समाज सुधार यात्रा (22 दिसंबर 2021) -  शराबबंदी की जमीनी स्थिति की समीक्षा करेंगे                                        समाधान यात्रा (5  जनवरी 2023)- सरकारी योजनाओं के बारे में उनकी राय जानना था                                        प्रगति यात्रा (23 दिसंबर 2024 – 30 जनवरी 2025)-लोगों के बीच संवाद करने जा रहे हैं                                        और अब—समृद्धि यात्रा (16 जनवर 2026)-

राजनीति या प्रशासन? दोनों का मिश्रण                                                                                                              आलोचक कहते हैं कि ये यात्राएं चुनावी रणनीति होती हैं, जबकि समर्थकों का मानना है कि नीतीश कुमार की सियासत की सबसे बड़ी ताकत जनता से सीधा संवाद है। सच चाहे जो हो, लेकिन यह तय है कि बिहार की राजनीति में कोई भी यात्रा सिर्फ यात्रा नहीं होती—वह संदेश होती है.

निष्कर्ष: यात्रा जारी है                                                                                                                                        नीतीश कुमार की यह नई समृद्धि यात्रा केवल विकास की समीक्षा नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में उनकी निरंतर मौजूदगी का संकेत भी है। सवाल यही है— क्या यह यात्रा बिहार की समृद्धि का नया रास्ता खोलेगी,या आने वाले चुनावों की जमीन तैयार करेगी? जवाब सड़क पर मिलेगा—जहां नीतीश कुमार फिर जनता के बीच होंगे.

आलोक कुमार

रविवार, 11 जनवरी 2026

आज़ादी की कहानी फिर बहस के कटघरे में

 “आज़ादी की कहानी फिर बहस के कटघरे में”

एनएसए अजीत डोभाल के बयान ने छेड़ा आज़ादी के इतिहास पर नया विमर्श


क्या भारत की आज़ादी की कहानी वह है, जो दशकों से हमें पढ़ाई और राजनीति में सुनाई जाती रही है—या फिर इसके कुछ अध्याय अब भी अधूरे हैं? राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के हालिया बयान ने इसी सवाल को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है.

डोभाल का कहना है कि भारत को आज़ादी महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों से नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) के दबाव के कारण मिली.यह बयान केवल एक ऐतिहासिक व्याख्या नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की प्राथमिकताओं को लेकर चली आ रही बहस को नए संदर्भ और नई धार देता है.

INA बनाम अहिंसा: पुराना विवाद, नया संदर्भ                                                                                            अजीत डोभाल के तर्क के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर चले मुकदमे, 1946 का नौसेना विद्रोह और ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर पनपता असंतोष अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए खतरे की घंटी बन गया था.ब्रिटिश सत्ता को यह साफ़ संकेत मिल गया था कि अब भारत पर शासन बनाए रखना न तो सैन्य रूप से संभव है और न ही नैतिक रूप से.                                                                                                                        इसके उलट, इतिहास का एक बड़ा वर्ग मानता है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन ने देश की जनता को अभूतपूर्व रूप से एकजुट किया. अहिंसा की इस सामूहिक शक्ति ने ब्रिटिश शासन की नैतिक वैधता को भीतर से खोखला कर दिया.

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और वैचारिक टकराव                                                                                                    डोभाल के बयान के बाद सियासी गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. समर्थकों का कहना है कि यह बयान नेताजी सुभाष चंद्र बोस और INA के योगदान को उसका वास्तविक सम्मान दिलाने की कोशिश है, जिसे लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया.वहीं आलोचकों का आरोप है कि इस तरह के बयान महात्मा गांधी के ऐतिहासिक योगदान को कमतर आंकने की कोशिश करते हैं और आज़ादी के संघर्ष को एक वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर ले जाते हैं.

इतिहास: एक व्यक्ति नहीं, एक समग्र संघर्ष                                                                                            हकीकत शायद इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं है. भारत की आज़ादी न तो केवल अहिंसा की देन थी, न ही सिर्फ़ सशस्त्र संघर्ष की। यह एक बहुआयामी आंदोलन था—

गांधी की नैतिक शक्ति,

नेताजी का सैन्य दबाव,

क्रांतिकारियों का बलिदान

और करोड़ों भारतीयों की सामूहिक आकांक्षा—

इन सबका सम्मिलित परिणाम.

निष्कर्ष: सवाल असहज हैं, लेकिन ज़रूरी                                                                                                 अजीत डोभाल का बयान भले ही विवादास्पद हो, लेकिन उसने एक ज़रूरी सवाल फिर सामने रख दिया है—क्या हमने आज़ादी के इतिहास को एक ही चश्मे से देखा है?और क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम उसे बहुआयामी दृष्टि से समझें?इतिहास सिर्फ़ अतीत की कहानी नहीं होता, वह वर्तमान की सोच और भविष्य की दिशा भी तय करता है. शायद इसी कारण यह बहस आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी आज़ादी के समय थी.

आलोक कुमार

शनिवार, 10 जनवरी 2026

दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग गोपालगंज से पूर्वी चंपारण पहुंचा

 दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग गोपालगंज से पूर्वी चंपारण पहुंचा

नारायणी नदी पार कर विराट रामायण मंदिर केसरिया की ओर ऐतिहासिक यात्रा


दु
निया का सबसे बड़ा शिवलिंग अब गोपालगंज से नारायणी नदी पार कर पूर्वी चंपारण पहुंच चुका है. करीब 210 टन वजनी इस विशाल शिवलिंग को डुमरिया घाट सेतु के रास्ते प्रशासन की निगरानी में सुरक्षित तरीके से नदी के उस पार ले जाया गया.इस ऐतिहासिक और चुनौतीपूर्ण अभियान के सफल होने के बाद श्रद्धालुओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है. शिवलिंग को पूर्वी चंपारण के केसरिया स्थित विराट रामायण मंदिर में स्थापित किया जाना है.

प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती, लेकिन सफल अभियान                                                                                   


इतने भारी-भरकम 210 टन शिवलिंग बिहार को पुल से सुरक्षित पार कराना जिला प्रशासन के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था.जरा-सी चूक बड़ा हादसा बन सकती थी। इसे देखते हुए डीएम पवन कुमार सिन्हा और एसपी के नेतृत्व में इंजीनियरों व तकनीकी विशेषज्ञों की विशेष टीम तैनात की गई थी.डीएम पवन कुमार सिन्हा ने बताया कि 210 टन वजनी दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग को पुल से सुरक्षित पार कराना आसान नहीं था, लेकिन सभी विभागों के आपसी समन्वय और विशेषज्ञों की सलाह से यह कार्य पूरी सावधानी और सफलता के साथ पूरा किया गया.उन्होंने कहा कि अब शिवलिंग को निर्धारित मार्ग से विराट रामायण मंदिर केसरिया तक पहुंचाया जाएगा.

श्रद्धालुओं में उत्साह, रास्ते भर उमड़ी भीड़                                                                                                    दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग के बिहार में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिला. गोपालगंज से पूर्वी चंपारण धार्मिक समाचार के लिहाज़ से यह एक ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है. रास्ते भर श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते नजर आए। प्रशासन की इस सफलता को एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है.

तमिलनाडु से बिहार तक World’s Largest Shivling की यात्रा                                                                        यह World’s Largest Shivling Bihar तमिलनाडु के महाबलीपुरम में तैयार किया गया है. विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद इसे गोपालगंज लाया गया और अब यह अपने अंतिम गंतव्य, पूर्वी चंपारण के केसरिया स्थित विराट रामायण मंदिर की ओर अग्रसर है.इस अवसर पर बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी ने शिवलिंग का विधिवत स्वागत किया और पूजा-अर्चना की.मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि यह दिवंगत किशोर कुणाल का सपना था कि पूर्वी चंपारण में दुनिया का सबसे भव्य विराट रामायण मंदिर बने. इसी उद्देश्य के साथ पिछले 10 वर्षों से इस विशाल शिवलिंग का निर्माण कार्य चल रहा था.

जानिए दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग की विशेषता                                                                                              मंत्री अशोक चौधरी ने बताया कि दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें 1008 शिवलिंग समाहित हैं. यानी कोई भी श्रद्धालु जब इस शिवलिंग पर जलाभिषेक करता है, तो उसे 1008 शिवलिंग के पूजन के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है.उन्होंने कहा कि अयोध्या के बाद यह दुनिया का सबसे विराट मंदिर होगा. 2030 तक विराट रामायण मंदिर के निर्माण को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.

17 जनवरी को होगी शिवलिंग की स्थापना                                                                                                महावीर मंदिर, पटना के सचिव और बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद के सदस्य सायन कुणाल ने बताया कि 17 जनवरी, माघ कृष्ण चतुर्दशी के पावन अवसर पर दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंग की स्थापना पूर्वी चंपारण स्थित विराट रामायण मंदिर में की जाएगी. इसी दिन अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की भी स्थापना होगी.उन्होंने बताया कि 12 से 13 जनवरी के बीच शिवलिंग को मंदिर परिसर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है.

आलोक कुमार

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

संत पेत्रुस महागिरजाघर का पवित्र द्वार बंद

 संत पेत्रुस महागिरजाघर का पवित्र द्वार बंद

जयंती वर्ष का समापन, पर ईश्वर की दया अब भी खुली


रोम से उठी एक ऐतिहासिक गूंज— 
                                                                       6 जनवरी 2026 को, प्रभु प्रकाश महापर्व के पावन अवसर पर, संत पेत्रुस महागिरजाघर का पवित्र द्वार औपचारिक रूप से बंद कर दिया गया. इसके साथ ही 24 दिसंबर 2024 से आरंभ हुए पवित्र जयंती वर्ष का भी विधिवत समापन हो गया.यह विशेष धर्मविधि संत पापा लियो चौदहवें (Pope Leo XIV) के नेतृत्व में सम्पन्न हुई.संत पेत्रुस महागिरजाघर का यह पवित्र द्वार रोम के चार प्रमुख पोप महागिरजाघरों में अंतिम था, जो अब तक खुला हुआ था. लाखों तीर्थयात्रियों के लिए यह द्वार केवल एक प्रवेश मार्ग नहीं, बल्कि आशा, पश्चाताप और नवीकरण का प्रतीक रहा.

पवित्र द्वार बंद, लेकिन दया का द्वार नहीं                                                                                                          इस धर्मविधि की सबसे मार्मिक पंक्ति वही रही, जिसने पूरे जयंती वर्ष की आत्मा को शब्द दिए—“यह पवित्र द्वार बंद हो गया है, लेकिन आपकी दया का द्वार कभी बंद नहीं होता.”पोप लियो XIV ने पवित्र वर्ष के लिए धन्यवाद अर्पित करते हुए प्रार्थना की कि ईश्वर की कृपा के “खजाने” सदा खुले रहें, ताकि विश्वासियों को जीवन-यात्रा में आशा और अंत में प्रभु के घर तक पहुंचने का भरोसा मिले.

परंपरा और प्रतीक का अद्भुत संगम                                                                                                        परंपरा के अनुसार इस बार पवित्र द्वार को सार्वजनिक रूप से दीवार से सील नहीं किया गया. केवल उसके कांस्य पल्लों को बंद किया गया. दीवार से सील करने की प्रक्रिया आने वाले दिनों में निजी रूप से पूरी की जाएगी.धर्मविधि के दौरान “ओ क्लेविस डेविड” भजन का गायन हुआ. इसके बाद पोप पवित्र द्वार के समक्ष घुटनों के बल झुके, कुछ क्षण मौन प्रार्थना की और फिर द्वार बंद किया. यह क्षण केवल समापन का नहीं था, बल्कि यह याद दिलाने वाला था कि ईश्वर की करुणा किसी भौतिक द्वार पर निर्भर नहीं होती.

प्रभु प्रकाश महापर्व और ख्रीस्तयाग                                                                                                                  पवित्र द्वार बंद करने के बाद पोप लियो XIV ने संत पेत्रुस महागिरजाघर में प्रभु प्रकाश महापर्व का समारोही ख्रीस्तयाग अर्पित किया. अपने संदेश में उन्होंने फिर दोहराया कि जयंती वर्ष का सार केवल एक समय-सीमा नहीं, बल्कि एक आत्मिक यात्रा है—जो दया, आशा और विश्वास से आगे बढ़ती है.

पवित्र द्वार अब कैसे सुरक्षित किया जाएगा?                                                                                                        अब संत पेत्रुस फैक्ट्री (समपीयेत्रीनी) के तकनीशियन महागिरजाघर के भीतर पवित्र द्वार को ईंटों की दीवार से सील करेंगे। इस दीवार के भीतर एक धातु कैप्सूल (कैप्सिस) रखा जाएगा, जिसमें पवित्र द्वार बंद करने का आधिकारिक दस्तावेज़,जयंती वर्ष के स्मारक सिक्के और पवित्र द्वार की चाबियाँ सुरक्षित रखी जाएँगी.यह परंपरा इतिहास और वर्तमान को जोड़ने वाला सेतु है.

पोप लियो XIV : इतिहास में एक नया अध्याय                                                                                                पोप लियो XIV, जिनका मूल नाम रॉबर्ट फ्रांसिस प्रेवोस्ट है, का चुनाव 8 मई 2025 को हुआ. वे रोमन कैथोलिक चर्च के 267वें पोप हैं और संयुक्त राज्य अमेरिका से आने वाले प्रमुख पोपों में से एक हैं. उन्होंने अपने पूर्ववर्ती पोप फ्रांसिस का स्थान ग्रहण किया, जिनका निधन 21 अप्रैल 2025 को हुआ था.

अंत में…                                                                                                                                                      संत पेत्रुस महागिरजाघर का पवित्र द्वार भले ही अब बंद हो गया हो, लेकिन जयंती वर्ष का संदेश आज भी उतना ही जीवंत है—ईश्वर की दया, आशा और प्रेम के द्वार कभी बंद नहीं होते.यही इस पवित्र वर्ष की सबसे बड़ी सीख है, जो दीवारों से नहीं, बल्कि हमारे हृदयों से जुड़ी है.


आलोक कुमार

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