West Bengal: “29 वर्षों बाद भाजपा सत्ता में”



पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले तीन दशकों में जिस तरह बदली है, उसमें ममता बनर्जी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। 1990 के दशक के अंत में जब उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाने का फैसला लिया, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह कदम राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल देगा। 1997 में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना ममता बनर्जी ने मुकुल रॉय के साथ मिलकर की। उस समय पश्चिम बंगाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा मजबूत स्थिति में था और लगातार चुनाव जीत रहा था।

टीएमसी के गठन का उद्देश्य

टीएमसी के गठन के पीछे मुख्य उद्देश्य था वामपंथी दलों—खासतौर पर CPM—की लंबे समय से चली आ रही सत्ता को चुनौती देना। साथ ही कांग्रेस, जो कभी राज्य की प्रमुख पार्टी हुआ करती थी, वह भी कमजोर हो चुकी थी। ममता बनर्जी ने खुद को एक आक्रामक और जनसंवादी नेता के रूप में प्रस्तुत किया, जो आम जनता के मुद्दों को सीधे उठाती थीं।

भाजपा के साथ शुरुआती संबंध                                                      

टीएमसी के शुरुआती वर्षों में भारतीय जनता पार्टी के साथ उसका गठबंधन बना। 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में टीएमसी ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। उस समय भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर उभरती हुई ताकत थी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बना चुकी थी। ममता बनर्जी ने इस गठबंधन के जरिए न केवल केंद्र में अपनी उपस्थिति मजबूत की, बल्कि पश्चिम बंगाल में वाम दलों के खिलाफ एक मजबूत विपक्ष खड़ा करने की कोशिश भी की।

यह कहना कि ममता बनर्जी ने “भाजपा की एंट्री कराई” पूरी तरह सटीक नहीं है, क्योंकि भाजपा पहले से ही राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय थी और बंगाल में भी उसकी सीमित उपस्थिति थी। हालांकि, यह जरूर कहा जा सकता है कि टीएमसी-भाजपा गठबंधन ने बंगाल में भाजपा को एक राजनीतिक स्पेस दिया और उसे धीरे-धीरे पहचान बनाने का मौका मिला।

वामपंथ के खिलाफ संघर्ष

1990 और 2000 के दशक में ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे के खिलाफ कई आंदोलन किए। खासकर नंदीग्राम और सिंगूर के मुद्दों पर उनका आंदोलन निर्णायक साबित हुआ। इन आंदोलनों ने उन्हें किसानों और आम जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया। इसका परिणाम 2011 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला, जब टीएमसी ने वाम मोर्चे को सत्ता से बेदखल कर दिया और ममता बनर्जी पहली बार मुख्यमंत्री बनीं।

भाजपा का उभार

2011 के बाद पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला धीरे-धीरे टीएमसी और भाजपा के बीच होने लगा। कांग्रेस और वाम दल कमजोर होते गए। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने बंगाल में अपनी ताकत बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने संगठन को मजबूत किया और जमीनी स्तर पर काम बढ़ाया।

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया। इसके बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी और टीएमसी को कड़ी चुनौती दी। हालांकि, ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी ने एक बार फिर जीत हासिल की और सत्ता में बनी रही।

“29 वर्षों बाद भाजपा सत्ता में” – तथ्यात्मक स्थिति

यह दावा कि “29 वर्षों बाद पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्तारूढ़ हो पाई” सही नहीं है। 2026 तक भाजपा पश्चिम बंगाल में सत्ता में नहीं आई है। वह राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी जरूर बन चुकी है, लेकिन सरकार टीएमसी के पास ही है।

राजनीतिक समीकरणों का बदलाव

पश्चिम बंगाल की राजनीति अब पूरी तरह द्विध्रुवीय हो चुकी है—एक तरफ टीएमसी और दूसरी तरफ भाजपा। वाम दल और कांग्रेस हाशिए पर चले गए हैं। यह बदलाव काफी हद तक ममता बनर्जी की रणनीति और भाजपा के आक्रामक विस्तार दोनों का परिणाम है।

निष्कर्ष

ममता बनर्जी का 1997 में कांग्रेस से अलग होना एक ऐतिहासिक मोड़ था। इससे न केवल एक नई क्षेत्रीय पार्टी का उदय हुआ, बल्कि राज्य की राजनीति में नई प्रतिस्पर्धा भी शुरू हुई। भाजपा के साथ शुरुआती गठबंधन ने उसे बंगाल में कुछ आधार जरूर दिया, लेकिन उसका वर्तमान उभार कई वर्षों की रणनीति, संगठन विस्तार और राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रयासों का नतीजा है।

इस तरह, यह कहना ज्यादा संतुलित होगा कि ममता बनर्जी के राजनीतिक कदमों ने अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को अवसर दिया, लेकिन आज की स्थिति तक पहुंचने में कई अन्य कारकों की भी अहम भूमिका रही है।


आलोक कुमार

Kurji: मौसम की कठोरता को भी मानवीय भावनाओं के सामने छोटा कर दिया।

                           ईसाई समुदाय में शोक की लहर दौड़ गई

राजधानी पटना में 4 मई का दिन एक ओर मौसम की उथल-पुथल और दूसरी ओर गहरे मानवीय संवेदनाओं का साक्षी बना। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने पहले ही दिन में तेज आंधी, बारिश और बिजली गिरने की आशंका जताते हुए अलर्ट जारी कर दिया था। लोगों को घरों में सुरक्षित रहने, अनावश्यक यात्रा से बचने और खुले स्थानों से दूर रहने की सलाह दी गई थी। लेकिन इसी चेतावनी के बीच शहर में एक ऐसी घटना घटी, जिसने मौसम की कठोरता को भी मानवीय भावनाओं के सामने छोटा कर दिया।

संत विंसेंट डी पॉल समाज से जुड़े कुर्जी कॉन्फ्रेंस के सक्रिय अध्यक्ष और पटना सेंट्रल काउंसिल के अध्यक्ष रहे भाई जोसेफ फ्रांसिस का निधन हो गया था। उनके निधन की खबर से ईसाई समुदाय में शोक की लहर दौड़ गई। समाजसेवा और धार्मिक जीवन के प्रति उनकी निष्ठा ने उन्हें एक सम्मानित व्यक्तित्व बना दिया था। उनके अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़े, जिन्होंने मौसम की चेतावनियों के बावजूद अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

भाई जोसेफ फ्रांसिस का पार्थिव शरीर कुर्जी पल्ली में लाया गया, जहां ईसाई रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार की तैयारी की गई। पटना महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष सेबेस्टियन कल्लूपुरा के नेतृत्व में “प्रेरितों की रानी ईश मंदिर” में पवित्र मिस्सा अर्पित किया गया। यह प्रार्थना सभा अत्यंत भावुक और श्रद्धापूर्ण वातावरण में संपन्न हुई। इस दौरान विलियम डिसूजा और विमल किशोर भी उपस्थित रहे, जिन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

मिस्सा के दौरान उपस्थित लोगों की आंखें नम थीं। हर कोई भाई जोसेफ फ्रांसिस के जीवन और उनके योगदान को याद कर रहा था। उन्होंने अपने जीवन में जरूरतमंदों की सेवा को प्राथमिकता दी और समाज में प्रेम, करुणा और सहयोग की भावना को बढ़ावा दिया। उनके व्यक्तित्व की यही विशेषताएं उन्हें एक सच्चे समाजसेवी के रूप में स्थापित करती हैं।

जैसे ही अंतिम प्रार्थना समाप्त हुई और पार्थिव शरीर को कुर्जी कब्रिस्तान ले जाने की तैयारी शुरू हुई, तभी मौसम ने अचानक अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया। तेज आंधी चलने लगी, आसमान में कड़कती बिजली चमकने लगी और कुछ ही पलों में मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। यह दृश्य अत्यंत मार्मिक था—एक ओर लोगों की आंखों से आंसू बह रहे थे और दूसरी ओर आसमान से बारिश की बूंदें गिर रही थीं।

कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार के दौरान जब पार्थिव शरीर को कफन बॉक्स में बंद कर मिट्टी के हवाले किया जा रहा था, तब परिजनों और शुभचिंतकों का विलाप वातावरण को और भी भावुक बना रहा था। भारी बारिश के बावजूद किसी ने वहां से हटना उचित नहीं समझा। लोग भीगते हुए भी अंतिम विदाई देने के लिए डटे रहे। हर व्यक्ति अपने हाथों से मिट्टी डालकर श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहता था।

इस पूरे घटनाक्रम को कई लोगों ने धार्मिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से देखा। उनका मानना था कि जिस प्रकार लोग अपने प्रियजन के निधन पर आंसू बहाते हैं, उसी प्रकार प्रकृति भी इस क्षण में शोक व्यक्त कर रही थी। आकाश से गिरती बारिश को उन्होंने प्रकृति के आंसुओं के रूप में देखा। यह आस्था और संवेदना का ऐसा संगम था, जिसने वहां उपस्थित हर व्यक्ति के मन को गहराई से छू लिया।

दूसरी ओर, मौसम विभाग की चेतावनी भी सही साबित होती दिखी। बिहार के कई जिलों—जैसे गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और दरभंगा—में तेज हवा और बारिश दर्ज की गई। कई स्थानों पर बिजली गिरने की भी खबरें सामने आईं। यह मौसम का अचानक बदलाव लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुआ, लेकिन साथ ही इसने प्रकृति की अनिश्चितता का भी एहसास कराया।

इस घटना ने यह भी दर्शाया कि विपरीत परिस्थितियों में भी मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक एकजुटता कितनी मजबूत होती हैं। लोग अपने प्रियजन के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए हर बाधा को पार कर जाते हैं। भाई जोसेफ फ्रांसिस के अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ और उनकी विदाई के समय की भावनाएं इस बात का प्रमाण हैं।

अंततः, यह दिन केवल एक व्यक्ति के निधन का दिन नहीं था, बल्कि यह मानवता, आस्था और प्रकृति के अद्भुत संगम का प्रतीक बन गया। भाई जोसेफ फ्रांसिस भले ही इस दुनिया से विदा हो गए हों, लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्य, उनकी सेवा भावना और उनका विनम्र व्यक्तित्व लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगा। उनका जीवन समाज के लिए एक प्रेरणा बना रहेगा, और उनकी यादें आने वाली पीढ़ियों को भी सेवा और करुणा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती रहेंगी।

आलोक कुमार

Bihar: साल 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़

           ऐसे माहौल में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी (एनडीए गठबंधन) ने चुनावी मैदान में कदम रखा और एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत की

साल 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया। यह वही दौर था जब लंबे समय से चल रही राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों से जनता परेशान हो चुकी थी। ऐसे माहौल में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी (एनडीए गठबंधन) ने चुनावी मैदान में कदम रखा और एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत की।

फरवरी 2005 में हुए पहले चरण के चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका। राष्ट्रीय जनता दल, जिसका नेतृत्व लालू प्रसाद यादव कर रहे थे, वह भी बहुमत से दूर रह गई। परिणामस्वरूप बिहार में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बनी रही और सरकार गठन संभव नहीं हो पाया। इस स्थिति ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की नौबत ला दी। जनता के बीच यह स्पष्ट हो गया कि एक मजबूत और स्थिर सरकार की आवश्यकता है, जो राज्य को विकास के रास्ते पर ले जा सके।

इसी पृष्ठभूमि में अक्टूबर-नवंबर 2005 में दोबारा विधानसभा चुनाव कराए गए। इस बार मतदाताओं ने पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट जनादेश दिया। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बहुमत प्राप्त हुआ और यह जीत बिहार की राजनीति में परिवर्तन का संकेत बनी। एनडीए की इस जीत में नीतीश कुमार की साफ-सुथरी छवि, विकास का वादा और सुशासन का एजेंडा प्रमुख कारण रहा।

24 नवंबर 2005 को नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ सुशील कुमार मोदी को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। यह बिहार में एनडीए की पहली स्थिर सरकार थी, जिसने लंबे समय बाद राज्य को एक मजबूत नेतृत्व प्रदान किया। इस सरकार के गठन के साथ ही जनता की अपेक्षाएं भी काफी बढ़ गई थीं।

नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी इस सरकार ने बिहार में सुशासन की नींव रखी। उन्होंने कानून-व्यवस्था को सुधारने के लिए कई सख्त कदम उठाए। अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की गई और पुलिस प्रशासन को मजबूत किया गया। इसका असर यह हुआ कि धीरे-धीरे बिहार की छवि एक अपराध-प्रवण राज्य से बदलकर विकासशील राज्य की ओर बढ़ने लगी।

इसके अलावा, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए। स्कूलों में छात्राओं की उपस्थिति बढ़ाने के लिए साइकिल योजना शुरू की गई, जिससे लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा मिला। सड़कों और पुलों का निर्माण तेजी से किया गया, जिससे राज्य के विभिन्न हिस्सों के बीच संपर्क बेहतर हुआ। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए भी कई योजनाएं लागू की गईं।

हालांकि, इस राजनीतिक परिवर्तन की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। बिहार की राजनीति में 2005 के बाद भी कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले। लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि 2005 में बनी एनडीए सरकार ने राज्य को एक नई दिशा दी और विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने की नींव रखी।

आपके द्वारा उल्लेखित यह कथन कि “21 वर्षों के इंतजार के बाद बीजेपी का मुख्यमंत्री बना”, इसमें थोड़ी स्पष्टता आवश्यक है। दरअसल, 2005 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (जेडीयू) बने थे, जो एनडीए गठबंधन का हिस्सा थे, जबकि बीजेपी उस समय जूनियर पार्टनर की भूमिका में थी और सुशील कुमार मोदी उपमुख्यमंत्री बने थे। इसलिए 2005 में सीधे तौर पर बीजेपी का मुख्यमंत्री नहीं बना था, बल्कि एनडीए गठबंधन की सरकार बनी थी।

यदि “21 वर्षों के इंतजार” की बात करें, तो यह संदर्भ बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों से जुड़ता है। बिहार में बीजेपी को अपने दम पर मुख्यमंत्री पद पाने का अवसर बहुत लंबे समय बाद मिला, जब राजनीतिक समीकरणों में बदलाव आया। 2005 में यह शुरुआत जरूर हुई थी, जिसने भविष्य में बीजेपी की भूमिका को मजबूत करने का रास्ता तैयार किया।

अंततः, 2005 का चुनाव बिहार के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इसने न केवल सत्ता परिवर्तन किया, बल्कि शासन की शैली और प्राथमिकताओं में भी बड़ा बदलाव लाया। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी सरकार ने यह दिखाया कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो किसी भी राज्य को विकास के पथ पर आगे बढ़ाया जा सकता है।

इस प्रकार, 2005 का बिहार विधानसभा चुनाव केवल एक चुनाव नहीं था, बल्कि यह एक नई शुरुआत थी—एक ऐसे बिहार की, जो पिछड़ेपन और अव्यवस्था से निकलकर विकास, सुशासन और स्थिरता की ओर बढ़ने लगा।

आलोक कुमार

Iindia: 5 मई को अंतरराष्ट्रीय दाई दिवस मनाया जाता

            हमें यह भी याद दिलाता है कि सुरक्षित मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की कितनी आवश्यकता है


5 मई
का दिन इतिहास, समाज और वैश्विक जागरूकता के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन दुनिया भर में कई महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी हैं, साथ ही कुछ विशेष दिवस भी मनाए जाते हैं, जिनका उद्देश्य समाज में जागरूकता फैलाना और मानव जीवन को बेहतर बनाना है। आइए 5 मई के दिन के महत्व पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

सबसे पहले, 5 मई को हर साल International Midwives Day यानी अंतरराष्ट्रीय दाई दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य दाइयों (मिडवाइफ) के योगदान को सम्मान देना है, जो गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की देखभाल में अहम भूमिका निभाती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में दाइयों का योगदान विशेष रूप से ग्रामीण और विकासशील क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण होता है, जहां डॉक्टरों की कमी होती है। यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि सुरक्षित मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की कितनी आवश्यकता है।

इसके अलावा, कई वर्षों में 5 मई के आसपास या इसी दिन World Asthma Day भी मनाया जाता है (हालांकि यह मई के पहले मंगलवार को पड़ता है)। इस दिन का उद्देश्य अस्थमा जैसी गंभीर बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। दुनियाभर में लाखों लोग अस्थमा से पीड़ित हैं, और समय पर इलाज तथा सही जानकारी से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। इस अवसर पर स्वास्थ्य संस्थान लोगों को श्वसन संबंधी समस्याओं के प्रति सतर्क रहने की सलाह देते हैं।

इतिहास के पन्नों में भी 5 मई का दिन कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। वर्ष 1818 में Karl Marx का जन्म हुआ था। कार्ल मार्क्स एक प्रसिद्ध दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री थे, जिनके विचारों ने दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। उनकी रचनाएँ जैसे “दास कैपिटल” और “कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” आज भी अध्ययन का विषय हैं। उनके विचारों ने श्रमिक वर्ग के अधिकारों और सामाजिक समानता की दिशा में नई सोच को जन्म दिया।

भारत के संदर्भ में भी 5 मई का दिन कुछ घटनाओं के कारण महत्वपूर्ण रहा है। यह दिन हमें देश के सामाजिक और राजनीतिक विकास की विभिन्न घटनाओं की याद दिलाता है। समय-समय पर इस दिन विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धियाँ हासिल की गई हैं, जिनसे देश की प्रगति को बल मिला है।

सांस्कृतिक दृष्टि से भी 5 मई का महत्व कम नहीं है। यह दिन हमें समाज में सेवा, स्वास्थ्य और मानवता के मूल्यों को समझने का अवसर देता है। दाइयों के सम्मान से लेकर अस्थमा जागरूकता तक, यह दिन हमें यह सिखाता है कि समाज में हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी इस दिन का महत्व है। स्कूलों और कॉलेजों में इस दिन स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम, सेमिनार और चर्चाएँ आयोजित की जाती हैं। इससे विद्यार्थियों को न केवल इतिहास की जानकारी मिलती है, बल्कि वे सामाजिक जिम्मेदारियों को भी समझते हैं। इस तरह के आयोजन युवाओं को जागरूक नागरिक बनने के लिए प्रेरित करते हैं।

5 मई का दिन हमें यह भी सिखाता है कि इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह हमारे वर्तमान और भविष्य को दिशा देने का माध्यम है। इस दिन घटी घटनाओं और मनाए जाने वाले दिवसों से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हम समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें और उन्हें निभाने का प्रयास करें।

अंततः, 5 मई का महत्व केवल ऐतिहासिक या औपचारिक नहीं है, बल्कि यह दिन मानवता, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि समाज की प्रगति में हर व्यक्ति का योगदान आवश्यक है और हमें मिलकर एक बेहतर दुनिया बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए।

आलोक कुमार

India: सोना-चांदी के दाम: 4 मई 2026 का ताजा भाव

                       निवेशकों के रुझान के चलते कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है

सोना और चांदी भारतीय बाजार में हमेशा से निवेश और परंपरा का मजबूत आधार रहे हैं। 4 मई 2026 को इन दोनों की कीमतों में एक बार फिर हलचल देखने को मिली है। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, डॉलर की मजबूती, और निवेशकों के रुझान के चलते कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है। ऐसे में अगर आप निवेश करने या खरीदारी की योजना बना रहे हैं, तो ताजा भाव जानना बेहद जरूरी है।

आज का ताजा भाव (4 मई 2026)

राजधानी दिल्ली में आज सोने की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

24 कैरेट सोना: लगभग ₹72,000 प्रति 10 ग्राम

22 कैरेट सोना: लगभग ₹66,000 प्रति 10 ग्राम

वहीं, चांदी की कीमत में भी बदलाव देखने को मिला है:

चांदी (Silver): लगभग ₹85,000 प्रति किलोग्राम

मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे बड़े शहरों में भी कीमतें लगभग इसी स्तर पर बनी हुई हैं, हालांकि स्थानीय टैक्स और मांग के कारण मामूली अंतर हो सकता है।

कीमतों में उतार-चढ़ाव की वजह

सोना और चांदी के दाम कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारणों से प्रभावित होते हैं।

1. अंतरराष्ट्रीय बाजार का असर

भारत में सोने-चांदी की कीमतें सीधे तौर पर वैश्विक बाजार से जुड़ी होती हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत बढ़ती है, तो इसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ता है। अमेरिका और यूरोप की आर्थिक नीतियां इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।

2. डॉलर और रुपये का संबंध

जब अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, तो सोना महंगा हो जाता है। भारत सोना आयात करता है, इसलिए रुपये के कमजोर होने पर कीमतें और बढ़ जाती हैं।

3. ब्याज दरें और महंगाई

कम ब्याज दरों के दौरान निवेशक सोने की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं। वहीं, बढ़ती महंगाई भी सोने को सुरक्षित निवेश (Safe Haven) बनाती है।

4. त्योहार और शादी का सीजन

भारत में सोने की मांग त्योहारों और शादी के मौसम में बढ़ जाती है। खासकर दिवाली, अक्षय तृतीया और विवाह सीजन में कीमतों में उछाल देखने को मिलता है।

निवेश के नजरिए से सोना-चांदी

सोना और चांदी दोनों को सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन दोनों की प्रकृति अलग है।

सोना (Gold Investment)

सोना लंबे समय के निवेश के लिए बेहतर माना जाता है। यह आर्थिक संकट के समय स्थिरता प्रदान करता है और मुद्रास्फीति से बचाव करता है।

चांदी (Silver Investment)

चांदी का उपयोग उद्योगों में भी बड़े पैमाने पर होता है, जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल आदि। इसलिए इसकी कीमतें अधिक उतार-चढ़ाव वाली होती हैं, लेकिन इसमें तेजी की संभावना भी ज्यादा रहती है।

क्या अभी खरीदना सही समय है?

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में सोने की कीमतें स्थिर लेकिन ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। अगर आप लंबी अवधि के निवेशक हैं, तो थोड़ा-थोड़ा करके निवेश करना बेहतर रणनीति हो सकती है।

चांदी के मामले में, इसकी औद्योगिक मांग बढ़ने की संभावना है, जिससे आने वाले समय में कीमतों में तेजी आ सकती है।

निवेश के विकल्प

आज के समय में सोना-चांदी में निवेश के कई विकल्प मौजूद हैं:

फिजिकल गोल्ड (ज्वेलरी, सिक्के, बार)

डिजिटल गोल्ड

गोल्ड ETF

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB)

सिल्वर ETF

इन विकल्पों के जरिए आप अपनी सुविधा और बजट के अनुसार निवेश कर सकते हैं।

सावधानियां

सोना या चांदी खरीदते समय कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए:

हमेशा हॉलमार्क वाला सोना ही खरीदें

विश्वसनीय ज्वेलर से ही खरीदारी करें

मेकिंग चार्ज और टैक्स की जानकारी जरूर लें

निवेश के उद्देश्य से खरीद रहे हैं तो डिजिटल या ETF विकल्प बेहतर हो सकते हैं

आगे का अनुमान

विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले महीनों में सोने की कीमतों में हल्की तेजी जारी रह सकती है। वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई के चलते सोना सुरक्षित निवेश बना रहेगा।

वहीं, चांदी की कीमतों में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है, लेकिन लंबी अवधि में इसमें भी अच्छा रिटर्न मिलने की संभावना है।

निष्कर्ष

4 मई 2026 को सोना और चांदी दोनों ही ऊंचे स्तर पर कारोबार कर रहे हैं। जहां सोना स्थिर और सुरक्षित निवेश का विकल्प बना हुआ है, वहीं चांदी में तेजी की संभावना निवेशकों को आकर्षित कर रही है।

अगर आप निवेश करना चाहते हैं, तो बाजार की चाल को समझते हुए और विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही निर्णय लें। सही समय पर किया गया निवेश भविष्य में अच्छा लाभ दे सकता है।


आलोक कुमार

Bihar: तेज आंधी और बारिश की संभावना

चेतावनी के बाद प्रशासन भी सतर्क हो गया 

बिहार
में एक बार फिर मौसम ने अचानक करवट ले ली है, जिससे आम जनजीवन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 4 और 5 मई के लिए राज्य के कई जिलों में तेज आंधी, बारिश और वज्रपात (बिजली गिरने) का अलर्ट जारी किया है। इस चेतावनी के बाद प्रशासन भी सतर्क हो गया है और लोगों से सावधानी बरतने की अपील की जा रही है।

मौसम विभाग के अनुसार, पटना, गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और दरभंगा समेत कई जिलों में तेज हवा के साथ मध्यम से भारी बारिश हो सकती है। कुछ स्थानों पर 40 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलने की संभावना है, जो पेड़ों और कमजोर संरचनाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसके अलावा, आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएं भी हो सकती हैं, जो ग्रामीण और खुले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं।

इस मौसम परिवर्तन का मुख्य कारण बंगाल की खाड़ी से आ रही नमी और पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव माना जा रहा है। इन दोनों कारकों के मिलन से वातावरण में अस्थिरता बढ़ गई है, जिससे आंधी और बारिश की स्थिति बन रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का मौसम बदलाव गर्मी के मौसम में सामान्य है, लेकिन इसकी तीव्रता कभी-कभी ज्यादा हो जाती है, जिससे जनजीवन प्रभावित होता है।

किसानों के लिए यह मौसम विशेष रूप से चिंता का विषय है। इस समय कई जगहों पर गेहूं की कटाई पूरी हो चुकी है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में अभी भी फसल खेतों में है। इसके अलावा, सब्जियों और फलों की फसल भी इस मौसम से प्रभावित हो सकती है। तेज हवा और बारिश के कारण फसल गिर सकती है या खराब हो सकती है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। खासकर आम और लीची जैसे फलों पर इसका असर देखने को मिल सकता है, क्योंकि यह उनका संवेदनशील समय होता है।

ग्रामीण इलाकों में बिजली गिरने की घटनाएं हर साल कई लोगों की जान ले लेती हैं। इसलिए मौसम विभाग ने विशेष रूप से किसानों और मजदूरों को चेतावनी दी है कि खराब मौसम के दौरान खेतों में काम करने से बचें और सुरक्षित स्थानों पर रहें। पेड़ों के नीचे खड़े होने से भी बचने की सलाह दी गई है, क्योंकि बिजली अक्सर ऊंचे और अलग-थलग खड़े पेड़ों पर गिरती है।

शहरी क्षेत्रों में भी इस मौसम का असर देखने को मिल सकता है। पटना जैसे बड़े शहरों में हल्की से मध्यम बारिश भी जलजमाव की समस्या पैदा कर देती है। कई इलाकों में नालियों की सफाई ठीक से नहीं होने के कारण पानी सड़कों पर जमा हो जाता है, जिससे ट्रैफिक जाम की स्थिति बन जाती है। ऑफिस जाने वाले लोगों और छात्रों को इससे काफी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, तेज हवा के कारण बिजली आपूर्ति भी बाधित हो सकती है। कई बार बिजली के खंभे या तार क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिससे लंबे समय तक बिजली कटौती की समस्या हो जाती है। ऐसे में लोगों को पहले से ही तैयारी करके रखनी चाहिए, जैसे मोबाइल चार्ज रखना, टॉर्च या आपातकालीन लाइट की व्यवस्था करना आदि।

प्रशासन ने भी इस अलर्ट को गंभीरता से लिया है। जिला प्रशासन को सतर्क रहने और आपदा प्रबंधन टीमों को तैयार रखने के निर्देश दिए गए हैं। जरूरत पड़ने पर राहत और बचाव कार्य तुरंत शुरू किए जा सकें, इसके लिए आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था की जा रही है। साथ ही, स्वास्थ्य विभाग को भी अलर्ट पर रखा गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

लोगों के लिए सबसे जरूरी है कि वे मौसम विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें। खराब मौसम के दौरान घर से बाहर निकलने से बचें, खासकर जब तेज आंधी या बिजली गिरने की संभावना हो। यदि बाहर निकलना जरूरी हो, तो सुरक्षित स्थानों पर रहें और खुले मैदान, पेड़ या बिजली के खंभों के पास खड़े न हों। वाहन चलाते समय भी सावधानी बरतें, क्योंकि तेज हवा और बारिश से दृश्यता कम हो सकती है।

स्कूलों और संस्थानों को भी सलाह दी गई है कि वे मौसम की स्थिति को देखते हुए आवश्यक कदम उठाएं। यदि मौसम बहुत खराब हो, तो छुट्टी देने या समय में बदलाव करने जैसे निर्णय लिए जा सकते हैं, ताकि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

कुल मिलाकर, बिहार में 4 और 5 मई को मौसम का यह बदलाव लोगों के लिए सतर्क रहने का संकेत है। हालांकि बारिश से गर्मी से राहत मिल सकती है, लेकिन इसके साथ आने वाली आंधी और बिजली खतरा भी पैदा कर सकती है। ऐसे में जागरूकता और सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है। यदि लोग समय रहते सतर्क हो जाएं और निर्देशों का पालन करें, तो किसी भी बड़ी दुर्घटना से बचा जा सकता है।

आलोक कुमार

Nepal: कई घरों और इमारतों के साथ एक चर्च को भी गिरा दिया

                                       सख्त प्रशासनिक शैली और अतिक्रमण के खिलाफ तेज कार्रवाई

नेपाल की राजनीति में हाल के दिनों में जिस नाम ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं, वह हैं बालेन शाह। अपनी सख्त प्रशासनिक शैली और अतिक्रमण के खिलाफ तेज कार्रवाई के कारण वे पहले ही चर्चा में थे, लेकिन अब एक नए विवाद ने उनकी छवि और सरकार दोनों को कठिन स्थिति में ला खड़ा किया है। यह विवाद भक्तपुर क्षेत्र की मनोहरा बस्ती में चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान से जुड़ा है, जहां कई घरों और इमारतों के साथ एक चर्च को भी गिरा दिया गया।

अतिक्रमण हटाओ अभियान और विवाद की शुरुआत

नेपाल सरकार द्वारा हाल ही में अवैध निर्माण के खिलाफ अभियान चलाया गया। इस अभियान का उद्देश्य सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराना था। इसी क्रम में मनोहरा बस्ती में प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए कई संरचनाओं को अवैध घोषित कर ध्वस्त कर दिया। प्रशासन का दावा है कि ये सभी निर्माण बिना कानूनी अनुमति के किए गए थे और सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनाए गए थे।

हालांकि, इस कार्रवाई ने उस समय गंभीर रूप ले लिया जब एक चर्च को भी तोड़ दिया गया। यह घटना रविवार के दिन हुई, जब चर्च में आमतौर पर प्रार्थना और धार्मिक गतिविधियां होती हैं। चर्च गिराए जाने की खबर सामने आते ही ईसाई समुदाय में गहरा आक्रोश फैल गया।

ईसाई समुदाय की प्रतिक्रिया

चर्च गिराने की घटना के बाद विभिन्न ईसाई संगठनों और कार्यकर्ताओं ने कड़ा विरोध जताया। उनका कहना है कि भले ही जमीन का स्वामित्व चर्च के पास न हो, लेकिन यह एक धार्मिक स्थल था, जिसे इस तरह अचानक और बिना संवेदनशीलता के तोड़ा जाना उचित नहीं था।

ईसाई नेताओं का तर्क है कि सरकार को पहले वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी। उनका कहना है कि धार्मिक स्थलों के साथ विशेष संवेदनशीलता बरती जानी चाहिए, क्योंकि वे केवल भवन नहीं होते, बल्कि लोगों की आस्था और पहचान से जुड़े होते हैं।

कुछ कार्यकर्ताओं ने यह भी चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस मामले में उचित कदम नहीं उठाया, तो इसका परिणाम राजनीतिक और सामाजिक रूप से गंभीर हो सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि चर्च के लिए दूसरी जगह उपलब्ध नहीं कराई गई, तो वे बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन करेंगे।

कानूनी बनाम धार्मिक संवेदनशीलता

यह पूरा विवाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है—क्या कानून का पालन धार्मिक भावनाओं से ऊपर है, या दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है?

सरकार का पक्ष साफ है कि यदि कोई निर्माण अवैध है, तो उसे हटाना प्रशासनिक कर्तव्य है। कानून सभी के लिए समान होना चाहिए, चाहे वह घर हो, दुकान हो या धार्मिक स्थल।

वहीं दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि धार्मिक स्थलों के मामले में सरकार को अधिक संवेदनशील और संवादात्मक रवैया अपनाना चाहिए था। यदि चर्च अवैध भूमि पर बना था, तो भी उसे हटाने से पहले समुदाय से बातचीत, वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था और पर्याप्त समय देना जरूरी था।

बालेन शाह की छवि पर असर

बालेन शाह को अब तक एक सख्त और ईमानदार प्रशासक के रूप में देखा जाता रहा है। उन्होंने भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के खिलाफ कई कड़े कदम उठाए हैं। लेकिन इस घटना ने उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कुछ लोग उनकी कार्रवाई को कानून के प्रति प्रतिबद्धता मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे असंवेदनशील और जल्दबाजी में लिया गया फैसला बता रहे हैं। यह विवाद उनके राजनीतिक करियर पर भी असर डाल सकता है, खासकर तब जब नेपाल जैसे बहुधार्मिक समाज में धार्मिक संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव

नेपाल एक बहु-सांस्कृतिक और बहु-धार्मिक देश है, जहां विभिन्न समुदायों के बीच सामंजस्य बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में किसी धार्मिक स्थल को गिराने जैसी घटना सामाजिक तनाव को बढ़ा सकती है।

यदि इस मुद्दे को समय रहते सुलझाया नहीं गया, तो यह व्यापक विरोध और असंतोष का कारण बन सकता है। विपक्षी दल भी इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे सरकार की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

समाधान की जरूरत

इस पूरे विवाद का समाधान संवाद और संतुलन में ही निहित है। सरकार को चाहिए कि वह ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों से बातचीत करे और उनकी चिंताओं को समझे। यदि संभव हो, तो चर्च के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाए या पुनर्निर्माण में सहायता दी जाए।

साथ ही, भविष्य में इस तरह की कार्रवाई करते समय सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा, ताकि कानून का पालन भी हो और लोगों की आस्था को भी ठेस न पहुंचे।

निष्कर्ष

मनोहरा बस्ती में चर्च गिराने की घटना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दा बन चुकी है। बालेन शाह के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है, जिसमें उन्हें कानून और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना होगा।

यदि इस मामले को समझदारी से नहीं संभाला गया, तो यह न केवल उनकी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, बल्कि नेपाल के सामाजिक ताने-बाने पर भी असर डाल सकता है। वहीं, यदि सरकार संवाद और सहमति के रास्ते पर चलती है, तो यह संकट एक सकारात्मक समाधान में भी बदल सकता है।


आलोक कुमार

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