दीघा मुसहरी: राजधानी के साये में मौत, बीमारी और उपेक्षा का सच
पटना को बिहार के विकास का चेहरा कहा जाता है। चौड़ी सड़कें, आधुनिक अस्पताल, सरकारी कार्यालय और तेजी से फैलता शहरी विस्तार राजधानी की नई पहचान बन चुके हैं। लेकिन इसी राजधानी की चमक से कुछ ही किलोमीटर दूर एक ऐसी बस्ती भी है, जहां आज भी गरीबी, बीमारी और उपेक्षा लोगों की नियति बनी हुई है। यह है **दीघा मुसहरी**, जहां टीबी, कुपोषण, अशिक्षा और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था वर्षों से लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रही है। सरकारी योजनाओं और विकास के दावों के बीच यह बस्ती आज भी उन सवालों का जवाब मांग रही है, जिनका संबंध सीधे जीवन और सम्मान से है।
खबर बनी बदलाव की वजह
दीघा मुसहरी की त्रासदी कोई नई कहानी नहीं है। वर्षों पहले इस बस्ती में टीबी से लगातार हो रही मौतों और गंभीर स्वास्थ्य संकट को प्रमुखता से समाचार पत्रों में प्रकाशित किया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री और पटना के जिलाधिकारी को ई-मेल के माध्यम से पूरी स्थिति से अवगत कराया गया। खबर का असर हुआ। प्रशासन हरकत में आया और दीघा मुसहरी के लिए एक स्वास्थ्य केंद्र की स्वीकृति मिली।
यह पत्रकारिता की सकारात्मक भूमिका का उदाहरण था कि एक रिपोर्ट ने प्रशासन को कार्रवाई के लिए बाध्य किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल स्वास्थ्य केंद्र की स्वीकृति से समस्या समाप्त हो गई?
आज स्थिति यह है कि दीघा मुसहरी उप स्वास्थ्य केंद्र दीघा चौहट्टा में संचालित हो रहा है, क्योंकि मुसहरी के भीतर पर्याप्त सरकारी जमीन उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। यही हाल आंगनबाड़ी केंद्र और विद्यालय का भी है। योजनाएं दीघा मुसहरी के नाम पर बनीं, लेकिन उनका वास्तविक लाभ उन परिवारों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया, जिनके लिए उन्हें शुरू किया गया था।
टीबी: केवल बीमारी नहीं, सामाजिक त्रासदी
दीघा मुसहरी में टीबी ने कई परिवारों को हमेशा के लिए बदल दिया। स्थानीय लोगों के अनुसार वर्षों में दर्जनों लोगों की जान इस बीमारी ने ले ली। रामजी मांझी का परिवार इसका दर्दनाक उदाहरण है। उनकी बहन और जीजा दोनों टीबी की चपेट में आकर दुनिया छोड़ गए। ऐसी अनेक कहानियां इस बस्ती में आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं।
विक्रांत मांझी की कहानी और भी मार्मिक है। उन्हें ग्लैंड टीबी हुई थी। उन्होंने कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल में इलाज कराया और नियमित दवा लेने से पूरी तरह स्वस्थ भी हो गए। लेकिन कुछ समय बाद बीमारी दोबारा हुई तो उन्होंने अस्पताल जाना और दवा लेना बंद कर दिया। परिणाम यह हुआ कि बीमारी ने उनकी जान ले ली।
आज उनके परिवार की स्थिति बेहद दयनीय है। उनकी पत्नी की आंखों की रोशनी जा चुकी है और छोटे-छोटे बच्चों का भविष्य अनिश्चितता के अंधेरे में है। यह घटना स्पष्ट करती है कि टीबी का इलाज बीच में छोड़ देना केवल मरीज ही नहीं, पूरे परिवार को संकट में डाल देता है।
जब स्वास्थ्य सेवा घर-घर पहुंचती थी
बस्ती के बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय ऐसा भी था, जब कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल की टीम नियमित रूप से दीघा मुसहरी पहुंचती थी। स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर संभावित मरीजों की पहचान करते थे, लोगों को जांच कराने के लिए प्रेरित करते थे और नियमित दवा लेने की सलाह देते थे। टीकाकरण, स्वास्थ्य शिक्षा और पोषण संबंधी जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जाते थे।
इन प्रयासों का असर साफ दिखाई दिया था। टीबी के मामलों में कमी आई और लोगों में बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ी। आज भी अस्पताल में टीबी की जांच और दवा निःशुल्क उपलब्ध है, लेकिन समुदाय स्तर पर पहले जैसी सक्रिय पहुंच नहीं होने के कारण कई मरीज समय पर जांच और इलाज से वंचित रह जाते हैं।
प्रतिनिधित्व बढ़ा, लेकिन समस्याएं कायम
दीघा मुसहरी ने केवल संघर्ष ही नहीं देखा, बल्कि सामाजिक बदलाव का उदाहरण भी पेश किया। इसी बस्ती की बेटी **छठिया देवी** ने सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को पार करते हुए पटना नगर निगम के वार्ड संख्या-1 से लगातार दो बार वार्ड पार्षद का चुनाव जीतकर इतिहास रचा। यह पूरे महादलित समाज के लिए प्रेरणा का विषय है।
हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि अब उनका निवास मुसहरी में नहीं है। ऐसे में लोगों को महसूस होता है कि बस्ती की समस्याओं पर पहले जैसी प्रत्यक्ष निगरानी और संवाद नहीं हो पाता।
दूसरी ओर विकास मित्र **सुधीर मांझी** आज भी मुसहरी में रहकर लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। वे स्वास्थ्य, शिक्षा और सरकारी लाभों की जानकारी लोगों तक पहुंचाते हैं। लेकिन सीमित संसाधनों और प्रशासनिक सहयोग की कमी के कारण उनका प्रयास अकेले पर्याप्त साबित नहीं हो पा रहा।
गरीबी ही बीमारी की सबसे बड़ी वजह
दीघा मुसहरी की समस्या केवल टीबी तक सीमित नहीं है। यहां शिक्षा, पोषण, स्वच्छता, रोजगार और आवास की चुनौतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। अधिकांश परिवार दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। यदि परिवार का कमाने वाला सदस्य बीमार पड़ जाए तो आय तुरंत बंद हो जाती है और इलाज का खर्च उठाना कठिन हो जाता है।
बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट जाती है। कुपोषण, भीड़भाड़ वाले घर, साफ पानी और स्वच्छ वातावरण की कमी टीबी जैसी संक्रामक बीमारी के फैलाव को और आसान बना देती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ टीबी को केवल चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी मानते हैं।
योजनाओं को कागज से जमीन तक लाना होगा
दीघा मुसहरी की स्थिति बताती है कि केवल भवन निर्माण या योजनाओं की घोषणा से बदलाव नहीं आता। जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी और विद्यालय की स्थायी व्यवस्था मुसहरी के भीतर सुनिश्चित की जाए, ताकि लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए दूर न जाना पड़े।
इसके साथ ही नियमित टीबी स्क्रीनिंग, पोषण सहायता, दवा लेने वाले मरीजों की सतत निगरानी, घर-घर जागरूकता अभियान और उपचार पूरा कराने की प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। यदि इलाज बीच में छोड़ने वालों पर समय रहते निगरानी रखी जाए, तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।
स्थानीय समुदाय, जनप्रतिनिधियों, स्वयंसेवी संस्थाओं और स्वास्थ्य विभाग के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है। विकास तभी प्रभावी होगा, जब योजनाओं का केंद्र कागज नहीं, बल्कि जरूरतमंद नागरिक होंगे।
दीघा मुसहरी केवल एक महादलित बस्ती नहीं, बल्कि हमारे विकास मॉडल की वास्तविक परीक्षा है। यह सवाल उठाती है कि क्या राजधानी के निकट रहने वाले नागरिक भी बुनियादी स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन से वंचित रहेंगे? यह भी साबित करती है कि जब पत्रकारिता, सामाजिक संस्थाएं और प्रशासन मिलकर काम करते हैं तो परिवर्तन संभव है। स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना इसका प्रमाण है।
लेकिन यात्रा अभी अधूरी है। जब तक योजनाओं का वास्तविक लाभ उन्हीं लोगों तक नहीं पहुंचेगा जिनके नाम पर वे बनाई जाती हैं, तब तक विकास के दावे अधूरे रहेंगे।
दीघा मुसहरी आज भी इंतजार कर रही है—नई घोषणाओं का नहीं, बल्कि ऐसी संवेदनशील व्यवस्था का, जो हर नागरिक को समान अवसर, समान स्वास्थ्य और सम्मान के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित कर सके। राजधानी की रोशनी तभी सार्थक होगी, जब उसकी छाया में बसे आखिरी घर तक विकास की किरण पहुंचे।
आलोक कुमार
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