अगली किस्त कब आएगी?

 अगली किस्त कब आएगी?अब सभी किसान 14वीं या 15वीं किस्त का इंतजार कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना देश के करोड़ों किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक सहायता योजना है। इस योजना के तहत किसानों को सालाना ₹6000 की सहायता तीन किस्तों में दी जाती है। अब सभी किसान 14वीं या 15वीं किस्त का इंतजार कर रहे हैं।

सरकार की ओर से अभी तक आधिकारिक तारीख की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि अगली किस्त मई या जून 2026 में जारी की जा सकती है।

इस योजना का लाभ पाने के लिए किसानों को कुछ जरूरी शर्तें पूरी करनी होती हैं, जैसे कि ई-केवाईसी (e-KYC) और आधार लिंकिंग। जिन किसानों ने अभी तक ये प्रक्रिया पूरी नहीं की है, उनकी किस्त अटक सकती है।

किसान अपने भुगतान की स्थिति ऑनलाइन भी चेक कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर अपना रजिस्ट्रेशन नंबर या मोबाइल नंबर दर्ज करना होता है।


यह योजना छोटे और सीमांत किसानों के लिए काफी लाभकारी साबित हो रही है, क्योंकि इससे उन्हें खेती से जुड़े खर्चों को पूरा करने में मदद मिलती है।

आलोक कुमार

पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक बार फिर चर्चा में

 पेट्रोल-डीजल कीमत अपडेट: 4 मई 2026 का ताजा रेट

पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक बार फिर चर्चा में हैं। 4 मई 2026 को देश के कई शहरों में ईंधन की कीमतों में मामूली बदलाव देखा गया है, जबकि कुछ स्थानों पर कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। तेल कंपनियों द्वारा रोजाना सुबह 6 बजे नई कीमतें जारी की जाती हैं, जिसके अनुसार आज भी कुछ शहरों में पेट्रोल और डीजल के दामों में हलचल देखने को मिली है।

दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में कीमतें लगभग स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई शहरों में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बिहार के कुछ जिलों में पेट्रोल ₹107 प्रति लीटर के आसपास और डीजल ₹94 के करीब बिक रहा है।

ईंधन की कीमतों में यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और रुपये-डॉलर के विनिमय दर पर निर्भर करता है। पिछले कुछ दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, जिसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ रहा है।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों का असर सिर्फ वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे आर्थिक ढांचे को प्रभावित करता है। परिवहन लागत बढ़ने से सब्जी, फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं। इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ता है।

सरकार समय-समय पर टैक्स में बदलाव करके कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश करती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार पर उसका सीधा नियंत्रण नहीं होता। ऐसे में कीमतों में स्थिरता बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता है।


आने वाले दिनों में कीमतों में क्या बदलाव होगा, यह काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। फिलहाल उपभोक्ताओं को रोजाना कीमतों पर नजर बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।


आलोक कुमार

कमर्शियल LPG सिलेंडर महंगा: ढाबा और आम जनता पर असर

 इसका असर अब रोजमर्रा की जिंदगी में साफ दिखाई देने लगा है

कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी ने देशभर के छोटे और बड़े कारोबारियों के साथ-साथ आम लोगों की जेब पर सीधा असर डाला है। 1 मई 2026 से 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम में लगभग ₹993 की भारी वृद्धि दर्ज की गई है। राजधानी दिल्ली में इसकी कीमत ₹3,071.50 तक पहुंच गई है, जो बीते महीनों की तुलना में काफी ज्यादा है। यह बढ़ोतरी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर अब रोजमर्रा की जिंदगी में साफ दिखाई देने लगा है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कमर्शियल एलपीजी का उपयोग किन-किन क्षेत्रों में होता है। होटल, रेस्टोरेंट, ढाबा, चाय की दुकानें, फास्ट फूड स्टॉल और छोटे कैटरिंग व्यवसाय पूरी तरह इस गैस पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में कीमतों में अचानक हुई इस बढ़ोतरी ने उनकी लागत को सीधे बढ़ा दिया है। छोटे व्यवसायों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है क्योंकि उनके पास लागत को वहन करने की क्षमता सीमित होती है।

पिछले कुछ महीनों में लगातार कीमतों में वृद्धि ने कारोबारियों की कमर तोड़ दी है। पिछले तीन महीनों में कुल मिलाकर ₹1300 से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है। बड़े होटल और रेस्टोरेंट चेन किसी तरह इस बढ़ोतरी को झेल सकते हैं, लेकिन छोटे ढाबा संचालकों और सड़क किनारे दुकान लगाने वालों के लिए यह अस्तित्व का संकट बन चुका है।

इसका सबसे बड़ा असर अब उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। चाय, नाश्ता, खाना और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी शुरू हो गई है। जहां पहले चाय ₹10 में मिलती थी, अब वही ₹12-₹15 तक पहुंच रही है। इसी तरह थाली और अन्य खाने-पीने की चीजों के दाम में 5 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि देखने को मिल सकती है। यह बढ़ोतरी भले ही मामूली लगे, लेकिन रोज कमाने और खाने वाले लोगों के लिए यह एक बड़ा आर्थिक बोझ बन जाती है।

छोटे कारोबारियों ने इस बढ़ती लागत से निपटने के लिए कई तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं। कुछ ने मेन्यू छोटा कर दिया है, कुछ खाने की मात्रा कम कर रहे हैं, तो कुछ ने कम बिकने वाले आइटम हटा दिए हैं। यह स्थिति उपभोक्ताओं के लिए भी नुकसानदायक है क्योंकि उन्हें पहले जितनी कीमत में अब कम मात्रा में भोजन मिल रहा है।

सरकार के सामने यह एक बड़ा चुनौतीपूर्ण मुद्दा बन चुका है। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों पर पड़ता है। ऐसे में सरकार को छोटे कारोबारियों को राहत देने के लिए कुछ कदम उठाने की जरूरत है, जैसे टैक्स में छूट या सब्सिडी प्रदान करना।

इसके अलावा, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर भी ध्यान देना जरूरी है। पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG), इलेक्ट्रिक कुकिंग और सोलर ऊर्जा जैसे विकल्प भविष्य में इस समस्या का समाधान हो सकते हैं। हालांकि, इन विकल्पों को अपनाने के लिए समय और निवेश दोनों की आवश्यकता होती है।


अंततः, कमर्शियल एलपीजी की कीमतों में यह बढ़ोतरी सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और जीवन स्तर से जुड़ा हुआ मुद्दा बन चुका है। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर और भी व्यापक हो सकता है।

आलोक कुमार

4 मई को अंतरराष्ट्रीय अग्निशमन दिवस

                         यह दिन उन बहादुर अग्निशमन कर्मियों (फायरफाइटर्स) को समर्पित है

4 मई का दिन वर्ष के महत्वपूर्ण दिनों में गिना जाता है, क्योंकि यह दिन कई राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। इस दिन दुनिया भर में विभिन्न क्षेत्रों—मीडिया, संस्कृति, विज्ञान और इतिहास—से जुड़े कई अवसर मनाए जाते हैं, जो समाज को जागरूक करने और प्रेरित करने का कार्य करते हैं।

सबसे प्रमुख रूप से 4 मई को अंतरराष्ट्रीय अग्निशमन दिवस (International Firefighters’ Day) मनाया जाता है। यह दिन उन बहादुर अग्निशमन कर्मियों (फायरफाइटर्स) को समर्पित है, जो अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। इस दिवस की शुरुआत 1999 में ऑस्ट्रेलिया में एक दुखद घटना के बाद हुई थी, जब जंगल की आग बुझाते समय पाँच अग्निशमन कर्मियों की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद पूरी दुनिया में इन वीरों के सम्मान में इस दिन को मनाने की परंपरा शुरू हुई। इस अवसर पर लोग लाल और नीले रंग के रिबन पहनकर फायरफाइटर्स के साहस और सेवा को सम्मान देते हैं। यह दिन हमें यह भी सिखाता है कि आपदा के समय धैर्य, साहस और सेवा भावना कितनी महत्वपूर्ण होती है।

इसके अलावा 4 मई को स्टार वॉर्स डे (Star Wars Day) के रूप में भी मनाया जाता है। यह दिन लोकप्रिय फिल्म श्रृंखला Star Wars के प्रशंसकों के लिए खास होता है। “May the Fourth be with you” (May the Force be with you) वाक्य के शब्दों के खेल के कारण इस दिन को चुना गया। दुनिया भर के प्रशंसक इस दिन अपने पसंदीदा किरदारों जैसे Luke Skywalker और Darth Vader को याद करते हैं, फिल्में देखते हैं और विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। यह दिन मनोरंजन और पॉप संस्कृति के महत्व को दर्शाता है।

भारत के संदर्भ में भी 4 मई का दिन महत्वपूर्ण है। इतिहास के पन्नों में देखें तो इसी दिन 1799 में मैसूर के शासक टीपू सुल्तान की मृत्यु हुई थी। वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाले प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। टीपू सुल्तान को “मैसूर का शेर” कहा जाता है और उनका बलिदान भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता की प्रेरणा के रूप में याद किया जाता है।

इसी दिन कई महान व्यक्तित्वों का जन्म और निधन भी हुआ है, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह दिन हमें उन व्यक्तित्वों को याद करने और उनके आदर्शों से प्रेरणा लेने का अवसर प्रदान करता है। इतिहास हमें सिखाता है कि संघर्ष, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा से ही समाज का निर्माण होता है।

4 मई का महत्व केवल घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिन हमें सामाजिक जिम्मेदारियों का एहसास भी कराता है। अग्निशमन दिवस के माध्यम से हमें यह समझ में आता है कि आपातकालीन सेवाओं का हमारे जीवन में कितना बड़ा महत्व है। अक्सर हम इन सेवाओं को सामान्य मान लेते हैं, लेकिन जब संकट आता है, तब इनकी वास्तविक अहमियत सामने आती है। इसलिए इस दिन हमें इन कर्मियों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करना चाहिए।

साथ ही, स्टार वॉर्स डे जैसे आयोजन यह दिखाते हैं कि आधुनिक युग में मनोरंजन भी लोगों को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बन चुका है। यह दिन युवा पीढ़ी को रचनात्मकता, कल्पना और तकनीक के प्रति प्रेरित करता है। फिल्में और कहानियाँ समाज में सकारात्मक सोच और नवाचार को बढ़ावा देती हैं।

यदि हम व्यापक दृष्टिकोण से देखें, तो 4 मई का दिन हमें अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों के बीच संतुलन बनाने का संदेश देता है। एक ओर यह हमें इतिहास के महान योद्धाओं की याद दिलाता है, तो दूसरी ओर आधुनिक समाज की सांस्कृतिक और तकनीकी उपलब्धियों को भी उजागर करता है।

अंततः कहा जा सकता है कि 4 मई केवल एक साधारण तिथि नहीं है, बल्कि यह दिन साहस, बलिदान, रचनात्मकता और प्रेरणा का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी से करना चाहिए, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए और उन लोगों के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए, जो हमारी सुरक्षा और खुशहाली के लिए निरंतर कार्य करते हैं।

आलोक कुमार

एक समर्पित, शांत और सेवाभावी व्यक्ति थे जोसेफ फ्रांसिस

युवावस्था से ही जोसेफ फ्रांसिस सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रहे

पटना के सामाजिक और धार्मिक जीवन में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जो किसी पद, पहचान या नाम के मोहताज नहीं होते। ऐसे ही एक समर्पित, शांत और सेवाभावी व्यक्ति थे जोसेफ फ्रांसिस। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि सच्ची सेवा और निष्ठा के लिए किसी विशेष मंच या प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने अपने कर्म, व्यवहार और त्याग से जो पहचान बनाई, वह उन्हें एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

युवावस्था से ही जोसेफ फ्रांसिस सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। वे संत मेरी स्कूल में क्रिसमस मिलन समारोह का आयोजन करते थे। यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समुदाय को जोड़ने और आपसी प्रेम व भाईचारे को बढ़ाने का माध्यम होता था। उनके नेतृत्व में ये कार्यक्रम अनुशासन, सादगी और समर्पण का उदाहरण बनते थे।

पटना के बांकीपुर क्षेत्र में ईसाई समुदाय के लिए बनी पैरिश थ्रिफ्ट एवं क्रेडिट सोसाइटी में उन्होंने पदेन सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई। यह संस्था आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की सहायता के लिए कार्य करती थी। जोसेफ फ्रांसिस ने यहां भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ सेवा दी। उनका उद्देश्य केवल प्रशासनिक कार्य करना नहीं था, बल्कि जरूरतमंदों की मदद करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था।

उनका जुड़ाव संत विंसेंट डी पौल सोसाइटी से भी रहा। जब यह सोसाइटी कोलकाता से पटना आई, तब उन्होंने कुर्जी कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व किया। इसके बाद वे पटना पार्टिकुलर काउंसिल और पटना सेंट्रल काउंसिल के अध्यक्ष बने। उनकी कार्यशैली इतनी प्रभावशाली थी कि उन्हें नेशनल काउंसिल का सदस्य भी बनाया गया। यह उनकी योग्यता, नेतृत्व क्षमता और सेवा भावना का प्रमाण है।

जोसेफ फ्रांसिस कैथोलिक रिलीफ सर्विसेज (सीआरएस) पटना में भी कार्यरत थे। यह संस्था गरीबों और जरूरतमंदों के लिए राहत कार्य करती है। यहां उन्होंने पूरी निष्ठा से काम किया, लेकिन परिस्थितियों ने एक कठिन मोड़ ले लिया। जेसुइट फादर रॉबर्ट डानहु के निधन के बाद, जब ब्रदर बर्नड सिंह अध्यक्ष बने, तो उनके कार्यकाल में सीआरएस को बंद कर दिया गया।

इस दौरान जोसेफ फ्रांसिस एक कठिन परिस्थिति में आ गए। वे अपनी नौकरी छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन उन पर घरेलू जांच की प्रक्रिया चलाने की बात कही गई। अपनी बेदाग छवि को बनाए रखने के लिए उन्होंने इस्तीफा देना ही उचित समझा। यह निर्णय उनके आत्मसम्मान और नैतिकता को दर्शाता है। आर्थिक संकट के बावजूद उन्होंने कभी भी कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने हर परिस्थिति को धैर्य और विश्वास के साथ स्वीकार किया।

उनका पारिवारिक जीवन भी धार्मिक और सेवाभाव से प्रेरित था। उनके एक पुत्र नेपाल में जेसुइट ब्रदर हैं और एक संतान सिस्टर के रूप में सेवा कर रही हैं। उनकी एक बेटी संत जेवियर हाई स्कूल में शिक्षिका थीं। हालांकि, उनके परिवार को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जब उनकी बेटी को एक साजिश के तहत गिरफ्तार करा दिया गया। यह घटना किसी भी परिवार को तोड़ सकती थी, लेकिन जोसेफ फ्रांसिस ने इसे भी धैर्य और विश्वास के साथ सहन किया।

उन्होंने अपने जीवन की हर पीड़ा और संघर्ष को प्रभु येसु ख्रीस्त को समर्पित कर दिया। उन्होंने कभी किसी के प्रति शिकायत या आरोप नहीं लगाया। उनका यह विश्वास और धैर्य उन्हें एक आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करता है।

जीवन के अंतिम दिनों में वे बीमार पड़े, लेकिन एक बार स्वस्थ भी हुए। अंततः लंबी बीमारी के बाद शनिवार को उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे समुदाय में शोक की लहर दौड़ गई। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था के समान थे, जिनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।

उनकी अंतिम विदाई की तैयारियां भी पूरे सम्मान के साथ की जा रही हैं। राजन क्लेमेंट साह ने जानकारी दी कि 4 मई को दोपहर 3 बजे प्रेरितों की रानी ईश मंदिर में पवित्र मिस्सा अर्पित किया जाएगा। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार कुर्जी कब्रिस्तान में किया जाएगा। फिलहाल उनका पार्थिव शरीर कुर्जी मोहल्ला में दर्शनार्थ रखा गया है, जहां लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंच रहे हैं।

जोसेफ फ्रांसिस का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता पद या प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और विश्वास में होती है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि कठिन परिस्थितियों में भी संयम और आस्था बनाए रखना ही सबसे बड़ी शक्ति है। वे भले ही इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनके आदर्श और उनके कार्य सदैव लोगों के दिलों में जीवित रहेंगे।

आलोक कुमार

टीम अनुभव और युवा प्रतिभा का संतुलित मिश्रण है

 सबसे बड़ी चर्चा युवा खिलाड़ी नंदिनी शर्मा के पहली बार टीम में चयन को लेकर है

Board of Control for Cricket in India ने इंग्लैंड में 12 जून 2026 से शुरू होने वाले ICC Women's T20 World Cup 2026 के लिए 15 सदस्यीय भारतीय महिला टीम की घोषणा कर दी है। इस टीम की कमान अनुभवी ऑलराउंडर Harmanpreet Kaur के हाथों में होगी, जबकि स्टार बल्लेबाज़ Smriti Mandhana को उप-कप्तान बनाया गया है। यह टीम अनुभव और युवा प्रतिभा का संतुलित मिश्रण है, जिससे भारत को इस बार खिताब जीतने की प्रबल दावेदार माना जा रहा है।

घोषित टीम में Shafali Verma, Jemimah Rodrigues, भारती फुलमाली, Deepti Sharma, Richa Ghosh (विकेटकीपर), श्री चरणी, Yastika Bhatia (विकेटकीपर), नंदिनी शर्मा, Arundhati Reddy, Renuka Singh Thakur, क्रांति गौड़, Shreyanka Patil और Radha Yadav शामिल हैं। इस टीम में हर विभाग में गहराई दिखाई देती है, जो इंग्लैंड की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।


इस चयन की सबसे बड़ी चर्चा युवा खिलाड़ी नंदिनी शर्मा के पहली बार टीम में चयन को लेकर है। उन्होंने Women's Premier League 2026 में Delhi Capitals के लिए शानदार प्रदर्शन कर चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। उनकी बल्लेबाज़ी और फील्डिंग दोनों ही प्रभावशाली रही हैं, जिससे उन्हें इस बड़े मंच पर मौका मिला है। यह चयन भारतीय टीम में नई ऊर्जा और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा।

दूसरी ओर, Yastika Bhatia और Radha Yadav की वापसी भी चर्चा का विषय है। यस्तिका अपनी तकनीकी रूप से मजबूत बल्लेबाज़ी के लिए जानी जाती हैं, जबकि राधा यादव एक उपयोगी ऑलराउंडर के रूप में टीम को संतुलन देती हैं। राधा की वापसी विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि वह पिछले कुछ समय से T20 अंतरराष्ट्रीय टीम से बाहर थीं, लेकिन घरेलू और फ्रैंचाइज़ी क्रिकेट में उनके लगातार अच्छे प्रदर्शन ने उन्हें फिर से टीम में जगह दिलाई।

राधा यादव का इंग्लैंड में पिछला रिकॉर्ड भी उनके चयन के पक्ष में जाता है। उन्होंने इंग्लैंड दौरे के दौरान भारत की T20I सीरीज़ जीत में अहम भूमिका निभाई थी और छह विकेट लेकर टीम की सफलता में योगदान दिया था। इसके अलावा, Royal Challengers Bangalore के लिए WPL 2026 में उनके प्रदर्शन ने भी उनकी उपयोगिता साबित की। उन्होंने न केवल गेंद से बल्कि बल्ले से भी टीम के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे उनकी बहुमुखी प्रतिभा सामने आई।


हालांकि, टीम चयन में कुछ बड़े नामों की गैरमौजूदगी ने भी सवाल खड़े किए हैं। Harleen Deol, Amanjot Kaur और Sneh Rana को टीम में शामिल नहीं किया गया है, जबकि काश्वी गौतम चोट के कारण बाहर हैं। इन खिलाड़ियों का हालिया प्रदर्शन अच्छा रहा है, ऐसे में उनका चयन न होना चयनकर्ताओं की रणनीति पर बहस को जन्म देता है। यह साफ है कि टीम मैनेजमेंट ने वर्तमान फॉर्म, फिटनेस और टीम संयोजन को प्राथमिकता दी है।

भारतीय टीम की ताकत उसकी बल्लेबाज़ी और ऑलराउंडरों की गहराई में नज़र आती है। Smriti Mandhana और Shafali Verma की ओपनिंग जोड़ी तेज शुरुआत देने में सक्षम है, जबकि मध्यक्रम में Harmanpreet Kaur और Jemimah Rodrigues जैसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ मौजूद हैं। विकेटकीपिंग में Richa Ghosh और Yastika Bhatia का विकल्प टीम को अतिरिक्त मजबूती देता है।

गेंदबाज़ी विभाग में Renuka Singh Thakur और Arundhati Reddy जैसी तेज गेंदबाज़ों के साथ स्पिन में Radha Yadav और Shreyanka Patil की मौजूदगी टीम को संतुलित बनाती है। इंग्लैंड की पिचों पर स्विंग और सीम मूवमेंट का फायदा उठाने के लिए यह आक्रमण काफी प्रभावी हो सकता है।

कुल मिलाकर, भारतीय महिला टीम इस बार संतुलित, प्रतिस्पर्धी और आत्मविश्वास से भरी हुई नजर आती है। ICC Women's T20 World Cup में भारत का अब तक का प्रदर्शन अच्छा रहा है, लेकिन खिताब जीतने का सपना अभी अधूरा है। इस बार टीम के पास अनुभव, युवा जोश और सही संयोजन है, जिससे यह उम्मीद की जा सकती है कि भारत इतिहास रचने में सफल हो सकता है।


आलोक कुमार

स्वर्ग-नरक का डर: आस्था या शोषण?

 धरती पर रहने वाला मनुष्य हमेशा से वर्गों में बंटा रहा है—उच्च, मध्यम और निम्न

धरती पर रहने वाला मनुष्य हमेशा से वर्गों में बंटा रहा है—उच्च, मध्यम और निम्न। यह विभाजन केवल आर्थिक या सामाजिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और धार्मिक स्तर पर भी दिखाई देता है। जिस तरह जीवन में भेदभाव है, उसी तरह मृत्यु के बाद की दुनिया—जिसे हम “परलोक” कहते हैं—उसे भी तीन भागों में बाँट दिया गया है: स्वर्गलोक, शोधक अग्निलोक (पर्गेटरी) और नरकलोक। कहा जाता है कि यह सब मनुष्य के कर्मों के आधार पर तय होता है।

लेकिन सवाल यह है—क्या सच में ऐसा है? या फिर यह एक ऐसी अवधारणा है जिसे समाज में डर और नियंत्रण बनाए रखने के लिए गढ़ा गया है?

धर्मग्रंथों, पुरोहितों, मौलवियों और पादरियों के माध्यम से हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि यदि हम अच्छे कर्म करेंगे तो स्वर्ग मिलेगा, और यदि बुरे कर्म करेंगे तो नरक की यातना झेलनी पड़ेगी। यह विचार सुनने में सरल और नैतिक लगता है, लेकिन जब यही विचार डर का रूप ले लेता है, तब यह खतरनाक हो जाता है।

आज के वैज्ञानिक युग में, जब मनुष्य चाँद तक पहुँच चुका है, अंतरिक्ष की गहराइयों को नाप रहा है, तब भी स्वर्ग और नरक का कोई भौतिक प्रमाण नहीं मिला है। चंद्रमा पर कदम रखने वाले अंतरिक्ष यात्रियों ने भी “स्वर्ग का द्वार” या “नरक की अग्नि” नहीं देखी। इसका अर्थ यह नहीं कि आस्था गलत है, बल्कि यह दर्शाता है कि ये अवधारणाएँ वैज्ञानिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक हैं।

समस्या तब पैदा होती है जब इन प्रतीकों का उपयोग लोगों को डराने और उनसे लाभ कमाने के लिए किया जाता है।

एक छोटे से गाँव की कल्पना कीजिए। वहाँ एक गरीब परिवार रहता है। परिवार का मुखिया—पिता—कड़ी मेहनत करता है, लेकिन जीवनभर गरीबी से नहीं निकल पाता। एक दिन उसकी मृत्यु हो जाती है। घर में शोक का माहौल है, और उसका बेटा अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए चिंतित है।

यहीं से शुरू होता है “धार्मिक मार्गदर्शन” के नाम पर शोषण।

गाँव का एक पंडित आता है और कहता है, “अगर तुमने सही विधि से कर्मकांड नहीं किया, तो तुम्हारे पिता की आत्मा भटकती रहेगी, और उन्हें स्वर्ग नहीं मिलेगा।”

बेटा डर जाता है। वह पहले ही दुख में है, अब उसे यह डर भी सता रहा है कि कहीं उसके पिता को नरक में यातना न झेलनी पड़े।

पंडित उसे तरह-तरह के अनुष्ठान बताता है—दान, पूजा, हवन, ब्राह्मण भोज—और हर चीज के साथ जुड़ी होती है एक “दक्षिणा”।

गरीब बेटा अपनी क्षमता से अधिक खर्च करता है, कर्ज लेता है, लेकिन सब कुछ करता है—सिर्फ इस उम्मीद में कि उसके पिता को स्वर्ग मिल जाए।

यही कहानी किसी दूसरे रूप में अन्य धर्मों में भी दिखाई देती है। ईसाई समुदाय में भी मृत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना, मिस्सा (Mass) और दान की परंपरा है। कुछ जगहों पर यह धारणा बनाई जाती है कि विशेष प्रार्थना या चढ़ावे के माध्यम से आत्मा को “शोधक अग्नि” से निकालकर स्वर्ग में पहुँचाया जा सकता है।

यहाँ समस्या प्रार्थना या आस्था में नहीं है। समस्या तब है जब इसे एक “लेन-देन” बना दिया जाता है—जैसे स्वर्ग का टिकट पैसे से खरीदा जा सकता हो।

धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को सही रास्ता दिखाना था—सत्य, प्रेम, करुणा और न्याय की ओर ले जाना। लेकिन जब धर्म का उपयोग भय पैदा करने और आर्थिक लाभ कमाने के लिए होने लगे, तब वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है।

यह कहना गलत होगा कि सभी धार्मिक गुरु या पादरी ऐसे होते हैं। बहुत से लोग ईमानदारी से समाज की सेवा करते हैं, लोगों को सही मार्ग दिखाते हैं। लेकिन कुछ लोग, जो धर्म की आड़ में पाखंड फैलाते हैं, पूरे धार्मिक तंत्र को बदनाम कर देते हैं।

आज जरूरत है जागरूकता की।

जरूरत है यह समझने की कि—

क्या हम जो कर रहे हैं, वह हमारी आस्था से प्रेरित है या हमारे डर से?

अगर कोई कहता है कि “पैसा दो, तभी स्वर्ग मिलेगा”, तो यह सवाल उठाना जरूरी है।

अगर कोई गरीब व्यक्ति अपने परिवार की जरूरतों को छोड़कर केवल डर के कारण धार्मिक कर्मकांड पर खर्च कर रहा है, तो यह सोचने की बात है।

सच्ची श्रद्धा वह होती है जिसमें दिखावा नहीं होता, और न ही कोई लेन-देन।

सच्चा धर्म वह है जो इंसान को इंसानियत सिखाए, न कि डर के माध्यम से उसे कमजोर बनाए।

अंत में, स्वर्ग और नरक कहीं दूर आकाश या धरती के नीचे नहीं हैं।

वे हमारे कर्मों और हमारे समाज में ही मौजूद हैं।

जब हम किसी की मदद करते हैं, न्याय करते हैं, प्रेम और करुणा दिखाते हैं—वहीं स्वर्ग है।

और जब हम किसी का शोषण करते हैं, डर फैलाते हैं, या अन्याय करते हैं—वहीं नरक है।

इसलिए जरूरी है कि हम आस्था रखें, लेकिन आंख बंद करके नहीं—बल्कि समझ और विवेक के साथ।

आलोक कुमार

India : अब नाराज फूफा का शगूफा छोड़ा गया

  अब नाराज फूफा का शगूफा छोड़ा गया है, बेरोजगारी, लाचारी और महंगाई ताक पर रख दी गई पटना। चुनावी मौसम आते ही राजनीति का माहौल बदलने लगता है।...