World: 12 मई : इतिहास, मानवता और प्रेरणा का महत्वपूर्ण दिवस

          मानवता की सेवा, कर्तव्यनिष्ठा, साहस और सामाजिक जागरूकता का संदेश देता है

12 मई का दिन विश्व इतिहास, समाज, राजनीति, विज्ञान और मानव सेवा के क्षेत्र में विशेष महत्व रखता है। यह दिन केवल कैलेंडर की एक साधारण तारीख नहीं, बल्कि अनेक ऐतिहासिक घटनाओं, महान व्यक्तित्वों की स्मृतियों और प्रेरणादायक संदेशों से जुड़ा हुआ है। भारत सहित पूरी दुनिया में 12 मई को अलग-अलग कारणों से याद किया जाता है। यह दिन हमें मानवता की सेवा, कर्तव्यनिष्ठा, साहस और सामाजिक जागरूकता का संदेश देता है।

सबसे पहले यदि 12 मई की बात करें तो यह दिन अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस (International Nurses Day) के रूप में मनाया जाता है। आधुनिक नर्सिंग की जनक कही जाने वाली Florence Nightingale का जन्म 12 मई 1820 को हुआ था। उनके सम्मान में पूरी दुनिया में यह दिवस मनाया जाता है। फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने केवल रोगियों की सेवा ही नहीं की, बल्कि यह साबित किया कि सेवा और समर्पण किसी भी समाज को नई दिशा दे सकते हैं। क्रीमियन युद्ध के दौरान उन्होंने घायल सैनिकों की जिस प्रकार सेवा की, उससे उन्हें “लेडी विद द लैंप” कहा जाने लगा। आज जब दुनिया स्वास्थ्य संकटों से गुजरती है, तब नर्सों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

कोरोना महामारी के दौरान पूरी दुनिया ने देखा कि डॉक्टरों के साथ-साथ नर्सों ने किस प्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर मानवता की सेवा की। इसलिए 12 मई केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि उन लाखों स्वास्थ्यकर्मियों को सम्मान देने का अवसर है जो दिन-रात लोगों की सेवा में लगे रहते हैं। यह दिन हमें यह भी सिखाता है कि सेवा का कार्य सबसे बड़ा धर्म है।

12 मई का संबंध भारत के इतिहास से भी जुड़ा हुआ है। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक घटनाएं और आंदोलन ऐसे हुए जिन्होंने देशवासियों में राष्ट्रभक्ति की भावना जगाई। मई का महीना सामान्य रूप से भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों के लिए सक्रियता का समय रहा है। इस महीने में कई राष्ट्रीय निर्णय और जनांदोलन इतिहास का हिस्सा बने।

यदि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में देखें तो 12 मई को कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज हुई हैं। आधुनिक चिकित्सा, संचार और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े कई प्रयोग और घोषणाएं इस समयावधि में हुईं, जिन्होंने दुनिया को नई दिशा दी। विज्ञान मानव जीवन को आसान बनाता है, लेकिन उसका सही उपयोग तभी संभव है जब उसमें मानवीय संवेदनाएं भी जुड़ी हों। यही संदेश 12 मई हमें देता है कि तकनीकी विकास के साथ-साथ मानवीय मूल्यों का संरक्षण भी आवश्यक है।

12 मई सामाजिक चेतना का भी दिन माना जा सकता है। आज के दौर में समाज कई चुनौतियों से जूझ रहा है—बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट, पर्यावरण प्रदूषण, हिंसा और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएं हर देश के सामने हैं। ऐसे समय में यह दिन हमें मानवता, सहयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व की याद दिलाता है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों की सोच, सेवा भावना और नैतिक मूल्यों से होती है।

राजनीतिक दृष्टि से भी मई का महीना कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। लोकतंत्र में जनता की भागीदारी, चुनावी प्रक्रिया और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा इसी प्रकार के दिनों में लोगों को जागरूक बनाती है। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में जनता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए ऐसे विशेष दिवस नागरिकों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करने का कार्य करते हैं।

12 मई हमें शिक्षा के महत्व की भी याद दिलाता है। शिक्षित समाज ही जागरूक समाज बन सकता है। जब लोग इतिहास, विज्ञान और समाज के बारे में जानकारी रखते हैं, तभी वे सही निर्णय लेने में सक्षम होते हैं। आज डिजिटल युग में जानकारी का विस्तार तेजी से हो रहा है, लेकिन सही और गलत के बीच अंतर समझना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए यह दिन ज्ञान, विवेक और सामाजिक समझ को मजबूत करने का संदेश देता है।

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी सेवा और करुणा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है। चाहे किसी भी धर्म की बात करें, हर जगह मानव सेवा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बीमारों, गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करना ही सच्ची पूजा कही गई है। नर्स दिवस के माध्यम से यही संदेश पूरी दुनिया को दिया जाता है कि इंसानियत सबसे ऊपर है।

आज के समय में जब लोग भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में व्यस्त हो रहे हैं, तब ऐसे दिवस हमें रुककर सोचने का अवसर देते हैं। समाज केवल धन और शक्ति से महान नहीं बनता, बल्कि संवेदनशीलता और सेवा भावना से मजबूत होता है। 12 मई हमें यही प्रेरणा देता है कि हम अपने आसपास के लोगों की मदद करें, समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाएं और मानवता को सर्वोपरि रखें।

अंततः कहा जा सकता है कि 12 मई अनेक कारणों से महत्वपूर्ण दिवस है। यह दिन हमें इतिहास की याद दिलाता है, स्वास्थ्यकर्मियों के योगदान को सम्मानित करता है, विज्ञान और समाज के प्रति जागरूक बनाता है तथा मानवता की सेवा का संदेश देता है। यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि प्रेरणा, सेवा, समर्पण और सामाजिक चेतना का प्रतीक है। यदि हम इस दिन के संदेश को अपने जीवन में अपनाएं, तो समाज और राष्ट्र दोनों अधिक मजबूत और मानवीय बन सकते हैं।


आलोक कुमार

India: एक नैतिक और आध्यात्मिक दायित्व भी

सभी लोग सत्ता और प्राधिकरण के प्रति आज्ञा पालन करने के लिए बाध्य

हम सभी लोग सत्ता और प्राधिकरण के प्रति आज्ञा पालन करने के लिए बाध्य हैं। यह केवल एक सामाजिक या प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक दायित्व भी है, जो समाज को अनुशासन, शांति और सुव्यवस्था की ओर ले जाता है। जब कोई भी राष्ट्र, राज्य या समाज सुव्यवस्थित रूप से कार्य करता है, तो उसके पीछे कहीं न कहीं उस व्यवस्था में विश्वास, सहयोग और पारस्परिक सम्मान की भावना होती है।

हम ईसाई समुदाय के लोग हमेशा एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण आधार है, जिसके माध्यम से हम न केवल ईश्वर से जुड़ते हैं, बल्कि समाज, परिवार और पूरे विश्व के कल्याण की कामना भी करते हैं। ईसाई धर्म हमें यह सिखाता है कि हम अपने पड़ोसी के लिए, अपने शासकों के लिए और समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए शुभकामनाएँ और प्रार्थना करें, ताकि शांति और सद्भावना का वातावरण बना रहे।

इसी भाव के साथ हम यह भी व्यक्त करना चाहते हैं कि डुआर्स डायोसिस, चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया के लोग पश्चिम बंगाल राज्य की जनता के लिए, वहाँ की सरकार और प्रशासन के लिए निरंतर प्रार्थना करते रहते हैं। हमारा विश्वास है कि जब शासन व्यवस्था ईमानदारी, निष्ठा और जनकल्याण की भावना से संचालित होती है, तो वह समाज के हर वर्ग के लिए लाभकारी सिद्ध होती है। हम यह प्रार्थना करते हैं कि पश्चिम बंगाल की जनता को उत्तम शासन, न्यायपूर्ण व्यवस्था और विकास के नए अवसर प्राप्त होते रहें।

डुआर्स क्षेत्र में रहने वाला ईसाई समुदाय हमेशा से समाज सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवता की सेवा में अग्रणी रहा है। हमारा उद्देश्य केवल अपने समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि हम सम्पूर्ण समाज के उत्थान के लिए कार्य करना अपना कर्तव्य समझते हैं। इसी भावना के तहत हम यह भी प्रार्थना करते हैं कि राज्य के सभी प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ करें, जिससे जनता का विश्वास शासन व्यवस्था पर बना रहे।

हम यह भी स्वीकार करते हैं कि किसी भी राज्य के विकास में नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। नेतृत्व केवल प्रशासन चलाने का नाम नहीं है, बल्कि यह जनता की आशाओं, अपेक्षाओं और समस्याओं को समझकर उन्हें समाधान की दिशा में आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। एक सशक्त और संवेदनशील नेतृत्व समाज को स्थिरता, प्रगति और समृद्धि की ओर ले जाता है।

इसी संदर्भ में हम पश्चिम बंगाल के माननीय मुख्यमंत्री श्री सुभेंदु अधिकारी के प्रति अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ प्रकट करते हैं। हम उनके सफल नेतृत्व, स्वस्थ जीवन और जनकल्याणकारी कार्यों के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। हमारा विश्वास है कि यदि कोई नेतृत्वकर्ता जनसेवा की भावना से कार्य करता है, तो वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है और विकास की नई दिशा निर्धारित कर सकता है।

हम यह भी प्रार्थना करते हैं कि राज्य में शांति, एकता और भाईचारे का वातावरण हमेशा बना रहे। किसी भी प्रकार के मतभेद या असहमति के बावजूद संवाद और समझदारी के माध्यम से समाधान निकाला जाए। समाज में विविधता होते हुए भी एकता बनी रहे, यही एक सशक्त लोकतंत्र की पहचान है।

डुआर्स डायोसिस, चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया का यह भी विश्वास है कि सेवा, प्रेम और करुणा ही मानव जीवन के सबसे बड़े मूल्य हैं। जब हम इन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो समाज स्वतः ही एक बेहतर दिशा की ओर अग्रसर होता है। हम यह भी चाहते हैं कि शासन और जनता के बीच विश्वास और सहयोग का संबंध और अधिक मजबूत हो।

अंत में, हम पुनः यह दोहराते हैं कि हम पूरे हृदय से पश्चिम बंगाल राज्य की समृद्धि, शांति और प्रगति के लिए प्रार्थना करते हैं। हम माननीय मुख्यमंत्री श्री सुभेंदु अधिकारी के लिए भी अपनी शुभकामनाएँ व्यक्त करते हैं कि वे अपने दायित्वों का निर्वहन सफलता, ईमानदारी और जनकल्याण की भावना के साथ करते रहें।

ईश्वर सभी पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखे, और समाज में प्रेम, शांति एवं सद्भावना का वातावरण निरंतर स्थापित रहे।

आलोक कुमार

India : उपदेश पर अमल कौन करेगा?

 सोना न खरीदने, विदेशी यात्राएं टालने, पेट्रोल-डीजल का सीमित उपयोग करने, वर्क फ्रॉम होम (WFH) और वर्चुअल मीटिंग्स को बढ़ावा देने तथा खाद्य तेल के उपयोग में कटौती करने जैसी बातें


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में हैदराबाद/सिकंदराबाद की एक जनसभा में देशवासियों से कुछ अहम अपीलें कीं—सोना न खरीदने, विदेशी यात्राएं टालने, पेट्रोल-डीजल का सीमित उपयोग करने, वर्क फ्रॉम होम (WFH) और वर्चुअल मीटिंग्स को बढ़ावा देने तथा खाद्य तेल के उपयोग में कटौती करने जैसी बातें। इन अपीलों का उद्देश्य स्पष्ट रूप से वैश्विक आर्थिक दबाव, पश्चिम एशिया में चल रहे Iran-Israel संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव को कम करना बताया जा रहा है।

लेकिन सबसे बड़ा और व्यावहारिक सवाल यही उठता है—उपदेश पर अमल कौन करेगा?

भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में जहां आर्थिक स्थिति, सामाजिक परंपराएं और जीवनशैली अलग-अलग हैं, वहां इस तरह की अपीलों का पालन कितना संभव है, यह गंभीर विचार का विषय है।

आर्थिक देशभक्ति बनाम वास्तविक जीवन

सरकारी पक्ष और समर्थक वर्ग इसे “आर्थिक देशभक्ति” के रूप में देख रहा है। उनका तर्क है कि यदि नागरिक थोड़ी-सी भी सावधानी बरतें तो देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रह सकता है और अंतरराष्ट्रीय दबाव से अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है। यह विचार सिद्धांत रूप में सही लगता है, लेकिन व्यवहार में इसकी सीमा है।

भारत में हर वर्ष करोड़ों शादियाँ होती हैं, और उनमें सोना सिर्फ आभूषण नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपरा का प्रतीक है। ऐसे में “एक साल तक सोना न खरीदने” की अपील आम जनता के लिए आसान नहीं है। यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं बल्कि सांस्कृतिक भावनाओं से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।

विपक्ष की आलोचना और राजनीतिक दृष्टिकोण

विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस अपील पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि यह सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता का संकेत है। उनका सवाल है कि यदि देश को बचत की जरूरत है, तो क्या सरकार खुद अपने खर्चों, रैलियों और प्रचार पर नियंत्रण करेगी?

राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह मुद्दा केवल आर्थिक नहीं बल्कि नैरेटिव का भी हिस्सा बन गया है। एक तरफ सरकार इसे “राष्ट्रहित में अनुशासन” बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे “आर्थिक दबाव का बोझ जनता पर डालना” कह रहा है।

आम जनता की वास्तविकता

भारत की आम जनता के लिए सबसे बड़ा प्रश्न व्यवहारिक है। क्या हर व्यक्ति विदेश यात्रा टाल सकता है? क्या हर परिवार तेल और गैस की खपत अचानक कम कर सकता है? क्या वर्क फ्रॉम होम हर सेक्टर में संभव है?

शहरी मध्यम वर्ग कुछ हद तक इन सुझावों का पालन कर सकता है, लेकिन ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के लिए यह कई बार अप्रासंगिक हो जाता है। उदाहरण के लिए, किसान के लिए डीजल केवल खर्च नहीं बल्कि उत्पादन का आधार है। वहीं छोटे व्यापारियों के लिए यात्रा और परिवहन व्यवसाय का हिस्सा है।

बाजार और आर्थिक प्रभाव

इन घोषणाओं का असर बाजारों पर भी देखा गया है। सोने और ज्वेलरी सेक्टर के शेयरों में अस्थिरता आई है, क्योंकि निवेशकों ने मांग में संभावित कमी का अनुमान लगाया है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश की नीतिगत अपीलों पर नजर रखी जाती है।

लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव तभी संभव है जब यह स्वैच्छिक व्यवहार में बदले, न कि केवल घोषणाओं तक सीमित रहे।

सांस्कृतिक बनाम आर्थिक संतुलन

भारत में सोना केवल निवेश नहीं है, यह सुरक्षा और सामाजिक परंपरा का प्रतीक भी है। इसी तरह विदेशी यात्रा आज शिक्षा, रोजगार और वैश्विक संपर्क का माध्यम बन चुकी है। ऐसे में इन पर पूर्ण रोक लगाना व्यवहारिक समाधान नहीं कहा जा सकता।

आर्थिक नीति विशेषज्ञों का मानना है कि उपदेश से अधिक जरूरी संरचनात्मक सुधार होते हैं—जैसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता, घरेलू उत्पादन बढ़ाना और वैकल्पिक ईंधन स्रोतों का विकास।

असली समाधान क्या हो सकता है?

यदि लक्ष्य विदेशी मुद्रा बचाना है, तो केवल जनता से अपील पर्याप्त नहीं होगी। सरकार को ऊर्जा उत्पादन, नवीकरणीय स्रोतों और घरेलू उद्योगों पर अधिक निवेश करना होगा। साथ ही सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाना होगा ताकि निजी वाहनों पर निर्भरता घटे।

वर्क फ्रॉम होम को प्रोत्साहन देना अच्छा कदम है, लेकिन इसके लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार मॉडल दोनों को मजबूत करना जरूरी है।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री की अपीलें निस्संदेह एक आर्थिक चेतावनी के रूप में देखी जा सकती हैं, लेकिन सवाल वही है—उपदेश पर अमल कौन करेगा?

जब तक यह समझ केवल भाषणों और अपीलों तक सीमित रहेगी, तब तक इसका प्रभाव सीमित रहेगा। वास्तविक बदलाव तभी आएगा जब सरकार और जनता दोनों मिलकर व्यवहारिक समाधान अपनाएं। आर्थिक अनुशासन केवल जनता से अपेक्षित नहीं होना चाहिए, बल्कि नीति और व्यवस्था के स्तर पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए।

भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में कोई भी अपील तभी सफल होती है जब वह जनता की जीवनशैली, संस्कृति और आर्थिक क्षमता के साथ तालमेल बैठा सके। अन्यथा उपदेश तो बहुत होंगे, लेकिन अमल करने वाला हर बार यही पूछेगा—हम क्यों और कैसे करें?

आलोक कुमार

India : कभी राष्ट्रवाद और देशभक्ति के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाने लगा

                                    देशवासियों से अगले एक वर्ष तक सोना (Gold) न खरीदने की अपील की है, जिसे उन्होंने “आर्थिक देशभक्ति” का नाम दिया

हर बातों में देश और धर्म को जोड़ने की प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। हाल के वर्षों में आर्थिक मुद्दों को भी कभी-कभी राष्ट्रवाद और देशभक्ति के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाने लगा है। इसी क्रम में 10 मई 2026 को हैदराबाद में आयोजित एक जनसभा में प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा की गई एक अपील ने नई बहस को जन्म दे दिया है। उन्होंने देशवासियों से अगले एक वर्ष तक सोना (Gold) न खरीदने की अपील की है, जिसे उन्होंने “आर्थिक देशभक्ति” का नाम दिया।

प्रधानमंत्री का तर्क है कि वर्तमान समय में मध्य पूर्व (Middle East) में चल रहे तनाव, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की अनिश्चितता और आयात पर बढ़ती निर्भरता के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) पर दबाव बढ़ सकता है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयात करने वाले देशों में शामिल है, और हर साल अरबों डॉलर का सोना आयात किया जाता है। इस आयात का सीधा असर देश के व्यापार घाटे और चालू खाते के संतुलन पर पड़ता है।

सरकार की इस अपील के पीछे मूल सोच यह बताई जा रही है कि यदि देशवासी एक साल तक सोना खरीदने से परहेज करें, तो विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत हो सकती है। इस बचत का उपयोग अन्य विकासात्मक कार्यों, जैसे बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और ऊर्जा क्षेत्र में किया जा सकता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि सोने की खपत कम होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग घटेगी और कीमतों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि इस अपील के बाद जमीनी स्तर पर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि शादी-विवाह, त्योहारों और सांस्कृतिक परंपराओं में गहरे तक जुड़े सोने के व्यापार का क्या होगा? भारत में सोना केवल एक निवेश नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपरा का भी प्रतीक माना जाता है। ऐसे में एक साल तक इसकी खरीद पर रोक की अपील आम जनता के लिए व्यवहारिक रूप से कितनी संभव है, यह एक बड़ा प्रश्न है।

इस निर्णय का सबसे सीधा असर आभूषण (Jewellery) उद्योग पर पड़ सकता है। भारत में लाखों छोटे-बड़े सर्राफा व्यापारी और कारीगर इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। यदि मांग में अचानक गिरावट आती है, तो उनकी आय प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से छोटे सुनार, ग्रामीण इलाकों के ज्वेलरी शॉप और असंगठित क्षेत्र के कारीगरों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। रोजगार पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

दूसरी ओर, सरकार समर्थक तर्क यह भी दे रहे हैं कि यह कदम दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक हो सकता है। यदि देश कुछ समय के लिए गैर-जरूरी आयात को नियंत्रित करता है, तो इससे विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हो सकता है और रुपये की स्थिति भी बेहतर हो सकती है। इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि सोने की बजाय लोगों को वित्तीय निवेश जैसे म्यूचुअल फंड, बैंक डिपॉजिट और डिजिटल एसेट्स की ओर बढ़ना चाहिए।

लेकिन आलोचकों का मानना है कि ऐसे फैसले केवल आर्थिक नीति नहीं होते, बल्कि सामाजिक व्यवहार और बाजार की स्वतंत्रता को भी प्रभावित करते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में उपभोग के फैसलों को पूरी तरह नियंत्रित करना कठिन होता है। लोग अपनी परंपराओं और व्यक्तिगत इच्छाओं के आधार पर खरीदारी करते हैं। ऐसे में एक साल की अपील व्यावहारिक रूप से कितना प्रभाव डाल पाएगी, यह समय ही बताएगा।

इसके अलावा, सोने की कीमतों पर भी इस घोषणा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव देखा जा सकता है। यदि शुरुआती महीनों में मांग घटती है, तो घरेलू बाजार में अस्थिरता आ सकती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें वैश्विक मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती हैं, इसलिए इसका प्रभाव सीमित भी हो सकता है।

व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में सोने के आयात को नियंत्रित करना चाहती है, तो उसे वैकल्पिक निवेश साधनों को मजबूत करना होगा। साथ ही सोने के पुनर्चक्रण (Gold Recycling), डिजिटल गोल्ड और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसी योजनाओं को और आकर्षक बनाना होगा।

कुल मिलाकर यह अपील केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बहस का भी विषय बन गई है। एक तरफ इसे “आर्थिक देशभक्ति” के रूप में देखा जा रहा है, तो दूसरी तरफ इसे आम उपभोक्ता की स्वतंत्रता और बाजार व्यवस्था में हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा रहा है।

अंततः यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जनता इस अपील को कितनी गंभीरता से लेती है और क्या यह वास्तव में उपभोग व्यवहार में बड़ा बदलाव ला पाती है या नहीं। सोना भारत की अर्थव्यवस्था और संस्कृति दोनों में गहराई से जुड़ा हुआ है, इसलिए किसी भी प्रकार का बदलाव केवल नीति से नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता से भी तय होगा।

आलोक कुमार

World : कैथोलिक कलीसिया में परमप्रसाद की परंपरा आरंभ


कैथोलिक कलीसिया में मिस्सा पूजा (Holy Mass) का केंद्रबिंदु परमप्रसाद (Holy Eucharist) है, जिसे ईसाई विश्वास में सबसे पवित्र संस्कारों में से एक माना जाता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि येसु ख्रीस्त के बलिदान, प्रेम और पुनरुत्थान का जीवंत स्मरण है। विशेष रूप से पुण्य वृहस्पतिवार (Holy Thursday) का दिन इस रहस्य की स्थापना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दिन प्रभु येसु ने अपने शिष्यों के साथ अंतिम भोज (Last Supper) किया था और यहीं से परमप्रसाद की परंपरा आरंभ हुई।

पुण्य वृहस्पतिवार की रात को येसु ने अपने बारह शिष्यों के साथ एक अंतिम भोजन साझा किया। यह भोजन सामान्य भोजन नहीं था, बल्कि यह आने वाले उनके बलिदान की पूर्व घोषणा थी। इसी अवसर पर उन्होंने रोटी और दाखरस लेकर विशेष प्रार्थना की और कहा कि “यह मेरा शरीर है” और “यह मेरा रक्त है।” ईसाई धर्मशास्त्र के अनुसार, यह वही क्षण है जब यूख्रीस्तीय अनुष्ठान (Eucharistic Rite) की स्थापना हुई। यह घटना आज भी कैथोलिक विश्वास का आधार स्तंभ है।

कैथोलिक मिस्सा पूजा में इसी अंतिम भोज की पुनरावृत्ति होती है। जब पुरोहित (Priest) वेदी पर खड़े होकर प्रार्थना करते हैं, तो वे केवल प्रतीकात्मक रूप से कार्य नहीं करते, बल्कि चर्च की मान्यता के अनुसार वे येसु के स्थान पर कार्य करते हैं। इस प्रक्रिया को “क्रिस्तुस के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करना” कहा जाता है। मिस्सा के दौरान जब रोटी और दाखरस पर पवित्र आत्मा का आह्वान किया जाता है, तो उन्हें येसु के शब्दों के माध्यम से पवित्र किया जाता है।

कैथोलिक धर्मशास्त्र में इस प्रक्रिया को “रूपांतरण” (Transubstantiation) कहा जाता है। इसका अर्थ है कि रोटी और दाखरस का बाहरी रूप (रंग, स्वाद, गंध) तो वैसा ही रहता है, लेकिन उनका आंतरिक सार बदल जाता है। विश्वास के अनुसार, रोटी वास्तव में येसु का शरीर बन जाती है और दाखरस उनका रक्त। यह परिवर्तन भौतिक रूप से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और दैवीय रहस्य के रूप में होता है, जिसे मानव बुद्धि पूरी तरह समझ नहीं सकती, लेकिन विश्वास के माध्यम से स्वीकार किया जाता है।

मिस्सा पूजा के दौरान जब परमप्रसाद वितरण किया जाता है, तो यह क्षण अत्यंत पवित्र माना जाता है। पुरोहित और अधिकृत सिस्टरगण (Extraordinary Ministers of Holy Communion) इस पवित्र कार्य में भाग लेते हैं। वे वेदी से पवित्र रोटी अर्थात् परमप्रसाद लेकर श्रद्धालुओं को वितरित करते हैं। जब वे कहते हैं “यह ख्रीस्त का शरीर है,” तो विश्वासियों द्वारा “आमेन” कहकर इसे स्वीकार किया जाता है। इसी प्रकार दाखरस भी “ख्रीस्त का रक्त” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

यह प्रक्रिया केवल धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह विश्वासियों के लिए आत्मिक पोषण का माध्यम है। कैथोलिक मान्यता के अनुसार, परमप्रसाद ग्रहण करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति मिलती है, पापों से मुक्ति का मार्ग खुलता है और ईश्वर के साथ गहरा संबंध स्थापित होता है। इसे “आत्मिक भोजन” कहा जाता है, जो आत्मा को मजबूत करता है।

पुण्य वृहस्पतिवार का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इसी दिन येसु ने अपने शिष्यों के पैर धोकर विनम्रता और सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया। यह दर्शाता है कि परमप्रसाद केवल बलिदान का स्मरण नहीं, बल्कि सेवा और प्रेम का जीवन जीने की प्रेरणा भी है। इस दिन से त्रिदिवसीय पवित्र पर्व (Easter Triduum) की शुरुआत होती है, जो गुड फ्राइडे और ईस्टर रविवार तक चलता है।

कैथोलिक परंपरा में परमप्रसाद को “ईश्वर की वास्तविक उपस्थिति” माना जाता है। यह विश्वास इस बात पर आधारित है कि येसु केवल स्मृति में नहीं, बल्कि वास्तव में आत्मिक रूप से उपस्थित होते हैं। इसलिए जब विश्वासी परमप्रसाद ग्रहण करते हैं, तो वे येसु के साथ एक गहरा आत्मिक मिलन अनुभव करते हैं।

आज भी विश्वभर के कैथोलिक चर्चों में यह परंपरा श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाई जाती है। मिस्सा पूजा के हर चरण में अंतिम भोज की याद जीवित रहती है। रोटी और दाखरस का परिवर्तन, पुरोहितों की प्रार्थना, और परमप्रसाद का वितरण—ये सभी मिलकर ईसाई विश्वास की आत्मा को व्यक्त करते हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि परमप्रसाद केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि येसु ख्रीस्त के प्रेम, बलिदान और उपस्थिति का जीवंत अनुभव है। यह विश्वासियों को यह सिखाता है कि ईश्वर केवल दूर नहीं, बल्कि उनके बीच उपस्थित हैं और हर मिस्सा पूजा में वे अपने भक्तों को आत्मिक रूप से पोषित करते हैं।


आलोक कुमार

India : आज राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस है

                            हर दिन अपने आप में कुछ न कुछ विशेष महत्व रखता है

हर दिन अपने आप में कुछ न कुछ विशेष महत्व रखता है, लेकिन कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं जो इतिहास, विज्ञान, राजनीति और समाज के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती हैं। 11 मई भी ऐसी ही एक तिथि है, जो भारत के लिए विशेष रूप से गौरवपूर्ण मानी जाती है। यह दिन न केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों की याद दिलाता है, बल्कि देश की आत्मनिर्भरता, तकनीकी प्रगति और सामरिक शक्ति का प्रतीक भी है।

11 मई: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस (National Technology Day)

भारत में 11 मई को हर वर्ष राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन भारत के वैज्ञानिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, क्योंकि 11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में भारत ने सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण (Pokhran-II nuclear tests) किए थे। यह घटना भारत की वैज्ञानिक क्षमता और रक्षा शक्ति का मजबूत प्रमाण बनी।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद भारत ने यह संदेश दिया कि वह अब तकनीकी और रक्षा के क्षेत्र में किसी भी देश से पीछे नहीं है। इसी उपलब्धि की स्मृति में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस घोषित किया।

पोखरण परीक्षण का ऐतिहासिक महत्व

11 मई 1998 को भारत ने एक के बाद एक तीन परमाणु परीक्षण किए थे। इसके बाद 13 मई को दो और परीक्षण किए गए। इन परीक्षणों ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के मामले में किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगा।

इस सफलता के पीछे भारतीय वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत थी, विशेष रूप से डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने इस मिशन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई, जिसके कारण उन्हें “मिसाइल मैन ऑफ इंडिया” भी कहा जाता है।

तकनीकी विकास और आत्मनिर्भर भारत

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना की याद नहीं है, बल्कि यह भारत के तकनीकी विकास और आत्मनिर्भरता की यात्रा का प्रतीक भी है। आज भारत सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान, रक्षा तकनीक, डिजिटल भुगतान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

इस दिन देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जैसे—



विज्ञान प्रदर्शनी



तकनीकी सेमिनार



नवाचार प्रतियोगिताएँ



वैज्ञानिक उपलब्धियों का सम्मान



इन कार्यक्रमों का उद्देश्य युवाओं को विज्ञान और तकनीक के प्रति प्रेरित करना है।

11 मई का वैश्विक महत्व

हालाँकि भारत में यह दिन विशेष रूप से तकनीकी दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी 11 मई से जुड़े कई ऐतिहासिक घटनाक्रम हैं।



1812 – ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्पेंसर पर्सिवल की हत्या

इस दिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की संसद भवन में हत्या कर दी गई थी, जो ब्रिटिश इतिहास की एक बड़ी घटना थी।



1960 – इजराइल द्वारा नाजी अपराधी एडॉल्फ आइखमैन की गिरफ्तारी

यह घटना न्याय और मानवाधिकार इतिहास में महत्वपूर्ण मानी जाती है।



1997 – IBM का Deep Blue द्वारा गैरी कास्परोव को हराना

यह घटना कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के इतिहास में मील का पत्थर थी, जिसने मानव और मशीन की क्षमता की तुलना को एक नया आयाम दिया।



विज्ञान और युवा पीढ़ी

11 मई का दिन विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह दिन बताता है कि विज्ञान और तकनीक केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह समाज के हर क्षेत्र में परिवर्तन ला सकती हैं।

आज भारत के युवा स्टार्टअप्स, रोबोटिक्स, स्पेस टेक्नोलॉजी और डिजिटल इनोवेशन में विश्व स्तर पर पहचान बना रहे हैं। यह सब उस वैज्ञानिक सोच का परिणाम है जिसे राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस बढ़ावा देता है।

भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ

11 मई की प्रेरणा से भारत ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं, जैसे—



चंद्रयान और मंगलयान मिशन



इसरो के सफल अंतरिक्ष प्रयोग



डिजिटल इंडिया अभियान



मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान



इन सभी पहलुओं ने भारत को एक उभरती हुई वैश्विक तकनीकी शक्ति बना दिया है।

समाज पर प्रभाव

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस केवल वैज्ञानिकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणादायक दिन है। यह हमें यह सिखाता है कि ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के बिना कोई भी राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता।

यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि तकनीक का उपयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए, न कि विनाश के लिए। विज्ञान का सही उपयोग ही समाज को आगे ले जा सकता है।

निष्कर्ष

11 मई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के आत्मसम्मान, वैज्ञानिक शक्ति और तकनीकी विकास का प्रतीक है। यह दिन हमें यह प्रेरणा देता है कि यदि हमारे पास संकल्प, ज्ञान और मेहनत हो, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस हमें अतीत की उपलब्धियों से सीख लेकर भविष्य को और बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह दिन भारत के हर नागरिक, विशेषकर युवाओं के लिए एक संदेश है कि विज्ञान और तकनीक ही आने वाले समय की सबसे बड़ी शक्ति है।

इस प्रकार 11 मई का दिन भारत के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में सदैव याद किया जाएगा।

आलोक कुमार

Bihar: बिहार की राजनीति में स्वास्थ्य विभाग हमेशा से सबसे चुनौतीपूर्ण

जब भी किसी नए नेता को स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मिलती है, जनता की अपेक्षाएं स्वतः बढ़ जाती हैं

बिहार की राजनीति में स्वास्थ्य विभाग हमेशा से सबसे चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील विभाग माना जाता रहा है। यह ऐसा विभाग है, जहां जनता सीधे सरकार का चेहरा देखती है। सड़क, पुल और भवन का असर धीरे-धीरे दिखाई देता है, लेकिन अस्पताल की व्यवस्था, दवा की उपलब्धता, डॉक्टरों की मौजूदगी और इलाज की गुणवत्ता हर दिन लोगों के जीवन को प्रभावित करती है। यही कारण है कि जब भी किसी नए नेता को स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मिलती है, जनता की अपेक्षाएं स्वतः बढ़ जाती हैं।


बिहार के लोगों ने अलग-अलग दौर में बीजेपी के मंगल पांडेय और राजद के तेज प्रताप यादव को स्वास्थ्य मंत्री के रूप में देखा। अब चर्चा इस बात की है कि जदयू के शांत स्वभाव वाले निशांत कुमार यदि स्वास्थ्य विभाग की कमान संभालते हैं तो उनकी कार्यशैली कैसी होगी। राजनीतिक गलियारों में उनके एक कथन की भी चर्चा हो रही है कि “मुझे स्वस्थ विभाग मिला है।” इसके बाद सवाल उठने लगे कि उन्हें “स्वस्थ विभाग” मिला है या “स्वास्थ्य विभाग”? यह केवल शब्दों का अंतर नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन की वास्तविक चुनौती का प्रतीक बन गया है।

दरअसल बिहार का स्वास्थ्य विभाग लंबे समय से अनेक समस्याओं से जूझता रहा है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, उपकरणों का अभाव, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर स्थिति, एम्बुलेंस व्यवस्था की अनियमितता और मरीजों की लंबी कतारें आम बात रही हैं। ऐसे में किसी भी नए मंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रहती है कि वह विभाग को कागजों से निकालकर जमीन पर परिणाम देने वाला बनाए।

बीजेपी नेता मंगल पांडेय के कार्यकाल को देखें तो उन्होंने स्वास्थ्य ढांचे को विस्तार देने का प्रयास किया। मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने, अस्पतालों में बेड बढ़ाने और कोरोना काल में स्वास्थ्य सेवाओं को संभालने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर रही। हालांकि विपक्ष ने उन पर यह आरोप भी लगाया कि स्वास्थ्य व्यवस्था का वास्तविक सुधार गांवों तक नहीं पहुंच पाया। कोरोना महामारी के दौरान बिहार की स्वास्थ्य प्रणाली की सीमाएं भी सामने आईं। ऑक्सीजन, बेड और डॉक्टरों की कमी को लेकर काफी आलोचना हुई।

इसके बाद तेज प्रताप यादव स्वास्थ्य मंत्री बने। उनका कार्यकाल राजनीतिक बयानों और अलग शैली के कारण अधिक चर्चा में रहा। उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के कई दावे किए, लेकिन विपक्ष ने उन पर प्रशासनिक अनुभव की कमी का आरोप लगाया। हालांकि यह भी सच है कि बिहार जैसे बड़े और गरीब राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारना किसी एक व्यक्ति या एक कार्यकाल का काम नहीं है। यहां दशकों से जमा समस्याएं हैं, जिन्हें दूर करने के लिए लगातार प्रयास चाहिए।

अब यदि जदयू के निशांत कुमार की बात करें तो उनकी छवि अपेक्षाकृत शांत और संयमित नेता की मानी जाती है। बिहार की राजनीति में अक्सर आक्रामक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलता है, ऐसे में शांत स्वभाव को एक सकारात्मक गुण माना जा सकता है। लेकिन केवल शांत होना पर्याप्त नहीं है। स्वास्थ्य विभाग ऐसा क्षेत्र है जहां निर्णय क्षमता, प्रशासनिक पकड़ और निरंतर निगरानी अत्यंत आवश्यक होती है।

यही कारण है कि लोगों ने उनके “स्वस्थ विभाग” वाले कथन को गंभीरता से लिया। यदि इसे प्रतीकात्मक रूप में समझें तो इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि विभाग बाहर से व्यवस्थित दिखाई देता है, लेकिन अंदर अनेक बीमारियां छिपी हुई हैं। सरकारी फाइलों में योजनाएं सफल दिखाई देती हैं, मगर गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की वास्तविक स्थिति अलग होती है। कई अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, कई जगह मशीनें खराब पड़ी हैं, तो कहीं दवाइयां उपलब्ध नहीं रहतीं।

निशांत कुमार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही होगा कि क्या वे विभाग को वास्तव में “स्वस्थ” बना पाएंगे? क्योंकि स्वास्थ्य विभाग केवल भवन निर्माण का नाम नहीं है। इसका संबंध मानव संसाधन, पारदर्शिता और संवेदनशीलता से भी है। बिहार में आज भी हजारों लोग बेहतर इलाज के लिए पटना, दिल्ली या दूसरे राज्यों की ओर पलायन करते हैं। यदि राज्य का स्वास्थ्य ढांचा मजबूत हो जाए तो गरीब परिवारों का आर्थिक बोझ भी कम होगा।

स्वास्थ्य मंत्री के रूप में सफलता का असली पैमाना यह नहीं होगा कि कितनी घोषणाएं हुईं, बल्कि यह होगा कि कितने सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर समय पर पहुंचे, कितने मरीजों को मुफ्त दवा मिली और कितने लोगों को इलाज के लिए राज्य से बाहर नहीं जाना पड़ा।

इसके अलावा बिहार में मातृ मृत्यु दर, कुपोषण और बच्चों के स्वास्थ्य जैसी समस्याएं भी गंभीर हैं। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य जागरूकता की कमी आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग को केवल इलाज तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि रोकथाम और जनजागरूकता पर भी ध्यान देना होगा।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह विभाग काफी महत्वपूर्ण है। चुनावों में जनता सड़क और बिजली के साथ-साथ अस्पतालों की स्थिति को भी याद रखती है। यदि स्वास्थ्य सेवाएं सुधरती हैं तो सरकार की छवि मजबूत होती है, और यदि अस्पतालों की बदहाली बनी रहती है तो विपक्ष को बड़ा मुद्दा मिल जाता है।

इसलिए निशांत कुमार के लिए यह समय केवल राजनीतिक अवसर नहीं, बल्कि परीक्षा का समय होगा। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल “स्वस्थ विभाग” बोलने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि “स्वास्थ्य विभाग” को वास्तव में स्वस्थ बनाने की क्षमता रखते हैं। बिहार की जनता अब भाषण से अधिक परिणाम देखना चाहती है। जनता यह देखना चाहती है कि सरकारी अस्पताल में गरीब को सम्मानपूर्वक इलाज मिलता है या नहीं।

अंततः कहा जा सकता है कि बिहार का स्वास्थ्य विभाग किसी भी मंत्री के लिए सबसे कठिन जिम्मेदारी है। मंगल पांडेय और तेज प्रताप यादव अपने-अपने तरीके से इस पद पर रहे। अब यदि निशांत कुमार को यह जिम्मेदारी मिलती है तो उन्हें शब्दों से आगे बढ़कर व्यवस्था में वास्तविक सुधार दिखाना होगा। क्योंकि स्वास्थ्य विभाग तभी “स्वस्थ विभाग” कहलाएगा, जब बिहार का आम आदमी सरकारी अस्पताल में भरोसे के साथ इलाज करा सके।

आलोक कुमार

India : अब नाराज फूफा का शगूफा छोड़ा गया

  अब नाराज फूफा का शगूफा छोड़ा गया है, बेरोजगारी, लाचारी और महंगाई ताक पर रख दी गई पटना। चुनावी मौसम आते ही राजनीति का माहौल बदलने लगता है।...