ईसाई समुदाय से पत्रकार निर्दोष मोजेस हैं
ईसाई समुदाय से पत्रकार निर्दोष मोजेस हैं.इनके द्वारा खोजी पत्रकारिता की जाती है.प्रोटेस्टेट मिशन के पास काफी जमीन है.इन जमीनों को व्यवस्थित रखने की व्यवस्था सीएनआई के पास नहीं है.नतीजा जिसको हाथ लगता है वह जमीन बेचकर मालामाल हो जा रहा है.
नवीनतम खोज निर्दोष मोजेस का है.वे बताते है कि ये हैं गोरखपुर का ईसाई कब्रिस्तान जिसको गोरखपुर के प्रॉपर्टी ऑफिसर मॉरिस क्लाइमेंट ने बेच खाया,,आरोप है कि सीएनआई के इस भूमाफिया ने मुर्दों को भी नहीं छोड़ा और लगभग डेढ़ करोड़ रुपया एडवांस ले लिया है ऐसा आरोप इन पर है,,अरे भाई जिंदा लोगों को तो परेशान करते ही रहते हो मुर्दों को तो चैन से सोने दो,.
हाल के दिनों में चर्च संपत्तियों, मिशनरी संस्थाओं की जमीनों और कब्रिस्तानों को लेकर कई तरह के विवाद सामने आते रहे हैं। विशेष रूप से उत्तर भारत के कई शहरों में ईसाई संस्थाओं की जमीनों पर कब्जा, बिक्री, फर्जी दस्तावेज और प्रशासनिक लापरवाही जैसे आरोप लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं। इसी क्रम में ईसाई समुदाय से जुड़े खोजी पत्रकार निर्दोष मोजेस ने एक गंभीर मामला उठाया है, जिसमें गोरखपुर स्थित ईसाई कब्रिस्तान की जमीन को लेकर बड़े आरोप लगाए गए हैं।निर्दोष मोजेस लंबे समय से चर्च, मिशन और ईसाई संस्थाओं से जुड़े मामलों पर खोजी पत्रकारिता करते रहे हैं। उनका कहना है कि प्रोटेस्टेंट मिशन और चर्च से जुड़ी संस्थाओं के पास देशभर में बड़ी मात्रा में जमीनें हैं, लेकिन इन संपत्तियों को व्यवस्थित ढंग से सुरक्षित रखने की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं है। विशेष रूप से सीएनआई यानी Church of North India पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि उसकी कई संपत्तियां उचित निगरानी के अभाव में विवादों में फंस गई हैं।
निर्दोष मोजेस के अनुसार, कई स्थानों पर चर्च की जमीनों का रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है। कहीं पुरानी फाइलें गायब हैं, तो कहीं सीमांकन नहीं हुआ है। इसका फायदा भूमाफिया, दलाल और कुछ प्रभावशाली लोग उठा रहे हैं। आरोप यह भी लगाया जाता है कि चर्च संपत्तियों की रक्षा करने वाले कुछ अधिकारी ही निजी लाभ के लिए जमीनों के सौदों में शामिल हो जाते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर चर्च की जमीनों की बिक्री और कब्जे के मामले सामने आते रहते हैं।
गोरखपुर का ताजा मामला भी इसी तरह के आरोपों से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। निर्दोष मोजेस ने दावा किया है कि गोरखपुर स्थित ईसाई कब्रिस्तान की जमीन को बेचने की कोशिश की गई। आरोपों के केंद्र में मॉरिस क्लाइमेंट नामक व्यक्ति हैं, जिन्हें प्रॉपर्टी ऑफिसर बताया जा रहा है। मोजेस का आरोप है कि कब्रिस्तान जैसी पवित्र और संवेदनशील जगह को भी नहीं छोड़ा गया और वहां की जमीन का सौदा करने का प्रयास हुआ।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि इस कथित सौदे में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये एडवांस लिए जाने की बात सामने आई है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि न्यायालय या प्रशासनिक जांच से होना अभी बाकी है, लेकिन मामला सामने आने के बाद ईसाई समुदाय के बीच चिंता और आक्रोश दोनों दिखाई दे रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि कब्रिस्तान जैसी जगहों की सुरक्षा नहीं हो पाएगी, तो भविष्य में धार्मिक और सामाजिक तनाव भी पैदा हो सकता है।
ईसाई समुदाय में कब्रिस्तान केवल जमीन का टुकड़ा नहीं माना जाता, बल्कि वह श्रद्धा और स्मृति का स्थान होता है। वहां समुदाय के दिवंगत लोगों को दफनाया जाता है और परिवार वर्षों तक उनकी याद में प्रार्थना करने जाते हैं। ऐसे में यदि किसी कब्रिस्तान की जमीन की खरीद-बिक्री या अतिक्रमण की खबर आती है, तो यह लोगों की धार्मिक भावनाओं को गहराई से प्रभावित करती है। यही कारण है कि निर्दोष मोजेस ने अपनी टिप्पणी में कहा कि “जिंदा लोगों को तो परेशान करते ही रहते हो, मुर्दों को तो चैन से सोने दो।” यह कथन केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि चर्च संपत्तियों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न भी खड़ा करता है।
दरअसल, भारत में कई चर्च और मिशनरी संस्थाओं के पास अंग्रेजों के समय से मिली बड़ी-बड़ी जमीनें हैं। समय बीतने के साथ इन जमीनों का मूल्य बहुत बढ़ गया है। शहरों के विस्तार और रियल एस्टेट कारोबार के बढ़ने के कारण इन संपत्तियों पर भूमाफियाओं की नजर रहती है। यदि रिकॉर्ड मजबूत न हो, तो विवाद पैदा होना आसान हो जाता है। कई मामलों में फर्जी कागजात बनाकर या अधिकारियों से सांठगांठ कर जमीनों को बेचने की कोशिशें की जाती रही हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि चर्च संस्थाओं को अपनी संपत्तियों का डिजिटलीकरण करना चाहिए। जमीनों का सही सीमांकन, अद्यतन रिकॉर्ड, कानूनी निगरानी और पारदर्शी प्रशासन आवश्यक है। केवल धार्मिक भावना के भरोसे संपत्तियों की रक्षा संभव नहीं है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में और भी विवाद सामने आ सकते हैं।
इस मामले का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति पर लगे आरोप तब तक अंतिम सत्य नहीं माने जा सकते, जब तक निष्पक्ष जांच पूरी न हो जाए। इसलिए आवश्यक है कि प्रशासन, चर्च प्रबंधन और संबंधित एजेंसियां मिलकर मामले की जांच करें। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार हों, तो सच्चाई भी सामने आनी चाहिए।
निर्दोष मोजेस की खोजी रिपोर्ट ने एक बार फिर चर्च संपत्तियों की सुरक्षा और पारदर्शिता का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है। यह केवल गोरखपुर के कब्रिस्तान का मामला नहीं, बल्कि उन तमाम धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लिए चेतावनी है जिनकी संपत्तियां लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण खतरे में पड़ सकती हैं। धार्मिक स्थलों और कब्रिस्तानों की गरिमा बनाए रखना समाज और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है।
आलोक कुमार
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