“हसुआ की शादी में खुरफी की गीत” — परंपरा, प्रतीक और वास्तविकता का प्रश्न
“हसुआ की शादी में खुरफी की गीत” — यह लोकोक्ति उस स्थिति को दर्शाती है, जब किसी गंभीर या पवित्र अवसर पर विषय से भटककर कुछ असंगत या औपचारिक बातें अधिक प्रमुख हो जाती हैं। आज यह कहावत कई बार धार्मिक अनुष्ठानों और उनके व्यवहारिक पक्ष पर भी लागू होती नजर आती है।
पुण्य बृहस्पतिवार (Maundy Thursday) के अवसर पर चर्चों में पुरोहितों द्वारा 12 लोगों के पैर धोने की परंपरा निभाई जाती है। यह परंपरा प्रभु यीशु मसीह द्वारा अपने शिष्यों के पैर धोने की उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति है, जिसमें उन्होंने विनम्रता, सेवा और प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया था। यह संदेश देता है कि जो सबसे बड़ा है, उसे सबसे छोटा बनकर सेवा करनी चाहिए।
पहले इस अनुष्ठान में केवल पुरुषों के पैर धोए जाते थे, लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया और महिलाओं को भी शामिल किया जाने लगा। यह परिवर्तन समानता और समावेशिता की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना गया। हालांकि, यह पूरी तरह सभी क्षेत्रों में स्वीकार नहीं हुआ है। खासकर उत्तर बिहार के कई चर्चों में इसे लेकर मतभेद और विरोध भी देखने को मिलता है। यह दर्शाता है कि परंपरा और परिवर्तन के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल कार्य है।
पुरोहितों का कहना है कि यह अनुष्ठान केवल एक रस्म नहीं, बल्कि प्रभु यीशु की विनम्र सेवा को याद करने का माध्यम है। इसके जरिए वे समाज के प्रति अपनी एकजुटता, प्रेम और निकटता व्यक्त करते हैं। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि वे भी इंसान हैं—चाहे वे पोप हों, कार्डिनल, आर्चबिशप, बिशप या सिस्टर्स—सभी से गलतियाँ हो सकती हैं, और इसके लिए लोगों से प्रार्थना करने की अपील की जाती है।
लेकिन इस पवित्र संदेश और व्यवहारिक वास्तविकता के बीच एक बड़ा अंतर भी महसूस किया जाता है। सवाल उठता है कि जो विनम्रता और सेवा का संदेश साल में एक दिन इस अनुष्ठान के जरिए दिया जाता है, क्या वह बाकी 365 दिनों में भी उतनी ही सच्चाई से जीवित रहता है?
कई लोगों का अनुभव इसके विपरीत है। उनका कहना है कि जहां एक ओर पुण्य बृहस्पतिवार को पुरोहित अत्यंत विनम्र और सहृदय नजर आते हैं, वहीं बाकी दिनों में उनका व्यवहार कठोर हो जाता है। छोटी-छोटी गलतियों पर कर्मचारियों को नौकरी से निकाल देना, या आम लोगों से संवाद तक न करना—ये बातें उस मूल भावना के खिलाफ प्रतीत होती हैं, जिसका संदेश यीशु मसीह ने दिया था।
एक व्यक्ति की पीड़ा भरी टिप्पणी इस अंतर को उजागर करती है—“बात भी नहीं करते हैं।” यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि उस दूरी और असंवेदनशीलता का प्रतीक है, जो धार्मिक संस्थानों और आम लोगों के बीच कभी-कभी बन जाती है।
इसलिए आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। क्या हम केवल परंपराओं को निभाने तक सीमित रह गए हैं, या उनके मूल संदेश को भी अपने जीवन में उतार रहे हैं? यदि प्रभु यीशु की सच्ची शिक्षाओं का पालन करना है, तो विनम्रता, प्रेम और सेवा केवल एक दिन की रस्म नहीं, बल्कि हर दिन का व्यवहार बनना चाहिए।
आलोक कुमार

