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सोसाइटी ऑफ पिलार आज गहरे शोक में डूबी

                                       Father Filipe Neri Mendes: एक दूरदर्शी शिक्षक और संगीत साधक

                                                                                                                     आलोक कुमार

सोसाइटी
ऑफ पिलार आज गहरे शोक में डूबी हुई है। रेवरेन्ड फादर फिलिपे नेरी मेंडेस के निधन से न केवल एक समर्पित पादरी का, बल्कि एक ऐसे दूरदर्शी शिक्षक और संगीत साधक का भी अवसान हुआ है, जिन्होंने अपने पुरोहित जीवन का अधिकांश समय सेमिनारियों के हृदय और मस्तिष्क को गढ़ने में समर्पित कर दिया। उनका जाना एक युग का अंत है, किंतु उनकी विरासत उन असंख्य जीवनों में जीवित है, जिन्हें उन्होंने अनुशासन, दृष्टि और प्रेम के साथ संवारा।

फादर नेरी, जैसा कि उन्हें स्नेहपूर्वक पुकारा जाता था, सोसाइटी ऑफ पिलार के माइनर सेमिनरी के रेक्टर के रूप में कार्यरत रहे। इस भूमिका में वे युवा सेमिनारियों के जीवन में एक निर्णायक और प्रभावशाली उपस्थिति बन गए। वे अनुशासन के प्रति अत्यंत कठोर थे और प्रशिक्षण के मामलों में किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं करते थे। किंतु उनकी इस कठोरता के पीछे एक गहरी आस्था निहित थी—यह विश्वास कि प्रत्येक युवक अपने भीतर एक अनूठी प्रतिभा लेकर आता है, जिसे पहचानना और निखारना आवश्यक है।

फादर नेरी में प्रतिभा को पहचानने की विलक्षण क्षमता थी, विशेषकर संगीत के क्षेत्र में। जहां अन्य लोग किसी प्रतिभा को देर से पहचानते, वहां वे उसकी झलक प्रारंभ में ही देख लेते थे। वे धैर्यपूर्वक उस प्रतिभा को तराशते और उसे सही दिशा प्रदान करते। उनके मार्गदर्शन में सेमिनारियों के लिए मनोरंजन का समय भी सीखने और अभ्यास का अवसर बन जाता था। विशेष रूप से वायलिन उनके प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण माध्यम था। वे केवल वाद्य यंत्र बजाना नहीं सिखाते थे, बल्कि इसके माध्यम से धैर्य, एकाग्रता और अनुशासन जैसे जीवन-मूल्यों का विकास भी करते थे।

वे केवल एक कुशल शिक्षक ही नहीं, बल्कि बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। फुटबॉल के मैदान में, अपनी छोटी कद-काठी के बावजूद, वे एक चपल और प्रभावशाली खिलाड़ी के रूप में जाने जाते थे। उनकी फुर्ती और कौशल इतने प्रभावशाली थे कि वे सहजता से सेमिनारियों को छकाते हुए गेंद को गोलपोस्ट तक पहुंचा देते थे। उनके सटीक शॉट्स अक्सर सभी को आश्चर्यचकित कर देते थे। उनका कद कभी उनकी सीमा नहीं बना, बल्कि कई बार यह उनके लिए अप्रत्याशित लाभ सिद्ध हुआ।

अनुशासन बनाए रखने का उनका तरीका भी अनोखा और स्मरणीय था। कई लोग आज भी उन क्षणों को याद करते हैं, जब बिजली कटने के दौरान अंधेरे का लाभ उठाकर कुछ शरारतें की जाती थीं। ऐसे समय में फादर नेरी बिना किसी आहट के सेमिनारियों के बीच पहुंच जाते और शरारती विद्यार्थियों को रंगे हाथ पकड़ लेते। एक घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है—अंधेरे में शरारत कर रहे एक सेमिनारी को अचानक फादर नेरी की प्रसिद्ध फ्रेंच दाढ़ी का स्पर्श महसूस हुआ। वह घबरा गया और भागने की कोशिश करने लगा, किंतु फादर नेरी ने उसका हाथ दृढ़ता से थामे रखा, जब तक कि रोशनी वापस नहीं आ गई। उस क्षण में न केवल दोषी सामने आया, बल्कि फादर नेरी का शांत किंतु प्रभावशाली अधिकार भी स्पष्ट हो गया।

मेरे अपने जीवन में भी फादर नेरी का प्रभाव अत्यंत गहरा और व्यक्तिगत रहा है। जब मैं पहली बार सेमिनरी में आया, तो मेरी प्रबल इच्छा गिटार सीखने की थी। किंतु फादर नेरी ने मुझमें कुछ अलग देखा और मुझे वायलिन सीखने के लिए प्रेरित किया। उस समय यह निर्णय मुझे अपनी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसा लगा। बाद में ज्ञात हुआ कि उन्होंने मेरे पिता से बात कर यह सुनिश्चित किया था कि मेरे पास गिटार नहीं, बल्कि वायलिन पहुंचे। जो प्रारंभ में एक बाध्यता प्रतीत हो रही थी, वही धीरे-धीरे मेरे जीवन का एक अनमोल उपहार बन गई।

समय के साथ, जब मुझे फ्र. एग्नेल स्कूल ऑफ म्यूजिक एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स का प्रथम निदेशक नियुक्त किया गया और ग्रामीण क्षेत्रों में संगीत को बढ़ावा देने के लिए प्रतिष्ठित ‘डालगाडो पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया, तब फादर नेरी ने शांत स्वर में कहा—“देखा, वे सारे मनोरंजन के क्षण काम आ गए।” उस क्षण में, उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए मेरे पास केवल एक शब्द था—“धन्यवाद, फादर।”

बाद के वर्षों में भी दूरी हमारे संबंध को कम नहीं कर सकी। जब भी मैं अपने घर लौटता, पिलार मठ में जाकर उनसे मिलना मेरी प्राथमिकता होती थी। यह मेरे जीवन पर उनके स्थायी प्रभाव का एक शांत किंतु गहरा प्रमाण था।

आज सोसाइटी ऑफ पिलार ने एक अनमोल रत्न खो दिया है—एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसने अपना संपूर्ण जीवन प्रशिक्षण और चर्च में संगीत के विकास के लिए समर्पित कर दिया। यदि आज सोसाइटी ऑफ पिलार में अनेक प्रतिभाशाली संगीतज्ञ पादरी हैं, तो उसमें फादर नेरी की दूरदर्शिता, समर्पण और अथक परिश्रम का अमूल्य योगदान है।

ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और उनकी प्रेरणादायक विरासत आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहे।


पूर्व और वर्तमान सरकार की कार्यशैली में वास्तविक अंतर

                             कर्ज, कल्याण और कसौटी—पूर्व व वर्तमान सरकार के फर्क की पड़ताल

                                                                                                                — आलोक कुमार


राज्य की मौजूदा आर्थिक स्थिति ने एक बार फिर यह बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि पूर्व और वर्तमान
सरकार की कार्यशैली में वास्तविक अंतर क्या है। जैसे-जैसे वित्तीय दबाव सतह पर आ रहा है, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पिछली नीतियों के प्रभाव और वर्तमान फैसलों की दिशा—दोनों मिलकर राज्य की अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर रहे हैं।

आज हालात ऐसे हैं कि सरकार को अपने नियमित दायित्वों के निर्वहन के लिए भी ऋण पर निर्भर होना पड़ रहा है। जून तक 12 हजार करोड़ रुपये के कर्ज की मांग और उसमें से 4 हजार करोड़ रुपये की तत्काल अपेक्षा इस वित्तीय दबाव का संकेत है। यह केवल प्रबंधन का हिस्सा नहीं, बल्कि एक मजबूरी की स्थिति को भी दर्शाता है।                

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सामाजिक सुरक्षा पेंशन, जो सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है, पिछले दो महीनों से लंबित है। सरकार अब मई में एक करोड़ से अधिक लाभार्थियों—बुजुर्गों, दिव्यांगों और विधवाओं—को एकमुश्त भुगतान करने की योजना बना रही है। यह कदम तात्कालिक राहत जरूर देगा, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य के वित्तीय प्रवाह में गंभीर बाधाएं हैं।

दरअसल, चुनाव से पहले पेंशन राशि को 400 रुपये से बढ़ाकर 1100 रुपये करना एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक फैसला था। इससे समाज के कमजोर वर्गों को राहत मिली, लेकिन इसके साथ ही हर महीने करीब 1150 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ भी जुड़ गया। इसी तरह महिला रोजगार योजना पर लगभग 15 हजार करोड़ रुपये का व्यय राज्य के खजाने पर अतिरिक्त दबाव डालता है। सवाल यह उठता है कि क्या इन योजनाओं की घोषणा के समय संसाधनों की दीर्घकालिक व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी, या फिर ये फैसले तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए लिए गए?

राज्य की कुल देनदारी अब 3.70 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुकी है और वर्ष के अंत तक इसके 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने की संभावना है। हर वर्ष लगभग 40 हजार करोड़ रुपये केवल ब्याज भुगतान में खर्च हो रहे हैं—यानी प्रतिदिन 100 करोड़ रुपये से अधिक। ऐसे में विकास योजनाओं के लिए संसाधन जुटाना स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाता है।

वर्तमान सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए राजस्व बढ़ाने की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। संपत्ति कर वसूली को तेज करने और परिवहन कर संग्रह में सुधार के निर्देश दिए गए हैं। कई विभागों पर राजस्व वृद्धि का दबाव बनाना यह संकेत देता है कि सरकार अब केवल कर्ज पर निर्भर रहने के बजाय अपनी आय बढ़ाने का प्रयास कर रही है। हालांकि, इन प्रयासों के परिणाम सामने आने में समय लगेगा।

इसके बावजूद जमीनी हकीकत वित्तीय प्रबंधन की कमजोरियों को उजागर करती है। वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही वेतन भुगतान में देरी, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना का अटकना और विकास कार्यों का ठप पड़ना यह दर्शाता है कि बजट प्रबंधन में गंभीर खामियां मौजूद हैं। यह स्थिति इस बात का भी संकेत है कि लोकलुभावन योजनाओं ने विकास के लिए निर्धारित संसाधनों पर असर डाला है।

पूर्व सरकार पर यह आरोप लगाना आसान है कि उसने बिना दीर्घकालिक रणनीति के खर्च बढ़ाया, जिससे आज की सरकार को संकट का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन वर्तमान सरकार के लिए असली चुनौती आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर ठोस और टिकाऊ समाधान प्रस्तुत करना है। केवल कर्ज लेकर योजनाओं को चलाना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता।

यह समझना जरूरी है कि कर्ज लेना अपने आप में गलत नहीं है—यदि उसका उपयोग उत्पादक क्षेत्रों में निवेश के लिए किया जाए। लेकिन जब कर्ज का उपयोग मुख्यतः राजस्व व्यय, जैसे पेंशन और सब्सिडी, में होता है, तो यह भविष्य में और बड़े वित्तीय संकट को जन्म दे सकता है। इसलिए आवश्यक है कि कर्ज का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी ढांचे, शिक्षा और रोजगार सृजन जैसे क्षेत्रों में लगाया जाए, जिससे राज्य की आय क्षमता बढ़े और कर्ज का बोझ कम हो।

अंततः, पूर्व और वर्तमान सरकार के बीच का अंतर आरोपों से नहीं, बल्कि नीतियों के ठोस परिणामों से तय होगा। जनता अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि पारदर्शी और प्रभावी शासन देखना चाहती है। बढ़ता कर्ज एक स्पष्ट चेतावनी है—यदि समय रहते संतुलित और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

सरकार के लिए यह केवल एक आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि भरोसे की भी कसौटी है—जहां उसे विकास और कल्याण के बीच संतुलन साधते हुए राज्य की आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करनी होगी।


महान स्वतंत्रता सेनानी वीर कुंवर सिंह की वीरता और अदम्य साहस के प्रतीक थे

            वीर कुंवर सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान योद्धाओं में शामिल

23 अप्रैल का दिन इतिहास, आस्था और राष्ट्रभक्ति के अद्भुत संगम के रूप में हमारे सामने उपस्थित होता है। यह तिथि केवल एक सामान्य दिन नहीं, बल्कि प्रेरणा, साहस और त्याग की अमर गाथाओं को अपने भीतर समेटे हुए है। एक ओर जहां विश्वभर में सेंट जॉर्ज दिवस मनाया जाता है, वहीं भारत के इतिहास में यह दिन महान स्वतंत्रता सेनानी वीर कुंवर सिंह की वीरता और अदम्य साहस के कारण स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।

वीर कुंवर सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान योद्धाओं में शामिल है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी कभी हार नहीं मानी। उनका जन्म बिहार के जगदीशपुर में एक प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में हुआ था। यद्यपि वे सामाजिक रूप से समृद्ध थे, लेकिन उनके भीतर देशभक्ति और आत्मसम्मान की भावना कहीं अधिक प्रबल थी। यही कारण था कि जब 1857 में 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हुआ, तब उन्होंने बिना किसी संकोच के अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल फूंक दिया।

यह उल्लेखनीय है कि उस समय उनकी आयु लगभग 80 वर्ष थी। सामान्यतः इस उम्र में व्यक्ति विश्राम का जीवन बिताता है, लेकिन वीर कुंवर सिंह ने अपने साहस और नेतृत्व क्षमता से यह सिद्ध कर दिया कि सच्चे योद्धा की पहचान उसकी उम्र से नहीं, बल्कि उसके संकल्प से होती है। उन्होंने न केवल स्वयं युद्ध किया, बल्कि अनेक लोगों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित भी किया।

23 अप्रैल 1858 का दिन उनके जीवन का सबसे गौरवपूर्ण अध्याय है। इसी दिन उन्होंने जगदीशपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध निर्णायक विजय प्राप्त की और अपने किले पर पुनः अधिकार स्थापित किया। यह विजय केवल एक सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि यह भारतीयों के आत्मसम्मान, साहस और स्वतंत्रता की अटूट भावना का प्रतीक बन गई। इस ऐतिहासिक घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि विदेशी सत्ता के सामने भारतीय कभी झुकने वाले नहीं हैं।

उनकी वीरता की सबसे प्रसिद्ध और प्रेरणादायक घटना उस समय की है जब वे गंगा नदी पार कर रहे थे। युद्ध के दौरान उनके हाथ में गोली लग गई थी और संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया था। ऐसी कठिन परिस्थिति में भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया और अपने घायल हाथ को स्वयं काटकर गंगा नदी को समर्पित कर दिया। यह घटना न केवल उनके अद्वितीय साहस का प्रमाण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि वे अपने जीवन से अधिक देश की स्वतंत्रता को महत्व देते थे। उनका यह त्याग भारतीय इतिहास में अद्वितीय उदाहरण के रूप में सदैव याद किया जाएगा।

दूसरी ओर, 23 अप्रैल को ही मनाया जाने वाला सेंट जॉर्ज दिवस भी साहस और आस्था का प्रतीक है। संत जॉर्ज की कथा, जिसमें वे एक भयंकर ड्रैगन का वध करते हैं, केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह दिवस हमें यह सिखाता है कि अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध खड़े होना ही सच्ची आस्था का परिचायक है।

यदि हम इन दोनों महान व्यक्तित्वों—वीर कुंवर सिंह और संत जॉर्ज—के जीवन का गहन अध्ययन करें, तो हमें एक समान संदेश प्राप्त होता है। दोनों ने अपने-अपने समय में साहस, त्याग और सत्य के लिए संघर्ष किया। एक ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाई, तो दूसरे ने धर्म और आस्था की रक्षा के लिए अद्भुत साहस का परिचय दिया।

आज के आधुनिक युग में, जब हम अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, ऐसे महान व्यक्तित्वों की स्मृति हमें मार्गदर्शन प्रदान करती है। वीर कुंवर सिंह का जीवन हमें यह सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और साहस नहीं खोना चाहिए। वहीं संत जॉर्ज की कथा हमें यह प्रेरणा देती है कि हमें हमेशा सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।

23 अप्रैल का यह दिन हमें आत्ममंथन का अवसर भी प्रदान करता है। यह हमें सोचने पर विवश करता है कि हम अपने समाज, अपने राष्ट्र और मानवता के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। क्या हम भी उन मूल्यों को अपने जीवन में उतार सकते हैं, जिनके लिए इन महान व्यक्तित्वों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया? यदि हम ऐसा कर पाते हैं, तो यह उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

अतः 23 अप्रैल का ऐतिहासिक महत्व बहुआयामी है। यह दिन न केवल इतिहास की स्मृतियों को संजोए हुए है, बल्कि यह हमें वर्तमान में सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है। यह साहस, आस्था, त्याग और देशभक्ति का संगम है, जो हमें एक बेहतर इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देता है।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि 23 अप्रैल दो महान प्रेरणाओं का संगम है—एक ओर संत जॉर्ज की अटूट आस्था और साहस, तो दूसरी ओर वीर कुंवर सिंह की अदम्य वीरता और देशभक्ति। यह दिन हमें यह संदेश देता है कि जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, यदि हमारे भीतर साहस, सत्य और समर्पण की भावना है, तो हम किसी भी चुनौती को पार कर सकते हैं और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।


आलोक कुमार

Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

  बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस...