बिहार लोकतान्त्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान की कोर कमिटी की बैठक

 बिहार में वैकल्पिक राजनीतिक-सामाजिक विमर्श की तैयारी: कोर कमिटी की बैठक के निर्णय

बिहार लोकतान्त्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान की कोर कमिटी की बैठक कई मायनों में आगामी वैचारिक और संगठनात्मक गतिविधियों की दिशा तय करने वाली साबित हुई। बैठक में राज्य के विभिन्न हिस्सों से जुड़े सक्रिय साथियों की उपस्थिति ने इस पहल की व्यापकता और गंभीरता को रेखांकित किया। आरा, पटना, मुजफ्फरपुर, बोधगया से लेकर दिल्ली तक के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लेकर यह संकेत दिया कि यह अभियान अब स्थानीय दायरे से निकलकर व्यापक संवाद की ओर बढ़ रहा है।

बैठक में लिए गए निर्णयों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आगामी राज्य सम्मेलन की घोषणा है। यह सम्मेलन 5 जून 2026 को पटना स्थित माध्यमिक शिक्षक संघ भवन में आयोजित किया जाएगा। यह महज एक आयोजन नहीं, बल्कि राज्य के सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर एक साझा दृष्टिकोण विकसित करने का मंच होगा। सम्मेलन के मुद्दों को अंतिम रूप देने की जिम्मेदारी राज्य कोर कमिटी को सौंपी गई है, जो अगली बैठक में इस पर विस्तार से विचार करेगी। इससे यह स्पष्ट होता है कि संगठन किसी भी निर्णय को जल्दबाजी में नहीं, बल्कि व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही अंतिम रूप देना चाहता है।                                

आर्थिक भागीदारी के प्रश्न पर भी बैठक में स्पष्टता दिखाई दी। सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम 50 रुपये का पंजीकरण शुल्क निर्धारित किया गया है, जबकि कोर कमिटी के सदस्यों के लिए 1000 रुपये का योगदान तय किया गया है। यह निर्णय न केवल आयोजन की व्यावहारिक आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में है, बल्कि संगठन के भीतर आत्मनिर्भरता और साझा जिम्मेदारी की भावना को भी मजबूत करता है। सात साथियों द्वारा अगली बैठक में राशि लाने का आश्वासन इस दिशा में सकारात्मक संकेत है।

संगठनात्मक दृष्टि से अगली कोर कमिटी बैठक 9 मई को पटना के लोकनायक भवन (खादी ग्रामोद्योग मंडल) में आयोजित की जाएगी, जिसकी मेजबानी प्रभाकर जी करेंगे। यह बैठक आगामी सम्मेलन की रूपरेखा और मुद्दों को अंतिम रूप देने में निर्णायक होगी।

बैठक का दूसरा महत्वपूर्ण एजेंडा महाड़ सत्याग्रह से जुड़े कार्यक्रमों की समीक्षा रहा। विभिन्न जिलों में आयोजित कार्यक्रमों ने इस ऐतिहासिक आंदोलन की प्रासंगिकता को एक बार फिर सामने रखा है। मुजफ्फरपुर में आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन में गांधीवादी, लोहियावादी, जयप्रकाशवादी और आंबेडकरवादी धाराओं के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर विचारों के बहुलतावादी संवाद को मजबूत किया। पटना, भागलपुर, पश्चिम चंपारण और गया में भी हुए कार्यक्रमों में अच्छी भागीदारी रही, जो इस बात का संकेत है कि सामाजिक न्याय और समानता के मुद्दे आज भी जनचेतना के केंद्र में हैं।

हालांकि, समीक्षा के दौरान यह भी महसूस किया गया कि इन कार्यक्रमों से मिले अनुभवों को व्यवस्थित रूप से दस्तावेजित करना आवश्यक है। यह केवल अतीत को दर्ज करने का प्रयास नहीं होगा, बल्कि भविष्य की रणनीति तय करने में भी सहायक सिद्ध होगा। पटना में महाड़ सत्याग्रह पर राज्य स्तरीय एक दिवसीय सम्मेलन आयोजित करने का सुझाव सर्वसम्मति से सामने आया, जिस पर अंतिम निर्णय 9 मई की बैठक में लिया जाएगा। इसके अलावा, जिलेवार कार्यक्रमों के विस्तार पर भी गंभीर विचार-विमर्श हुआ।

संगठनात्मक मजबूती की दिशा में एक और महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए निर्मल जी को 5 जून के सम्मेलन की तैयारियों के लिए कार्यालय प्रभारी नियुक्त किया गया है। गांधी निधि को ही कार्यालय के रूप में उपयोग करने का निर्णय संगठन की संसाधन-संरक्षण और व्यावहारिकता की सोच को दर्शाता है।

कुल मिलाकर, यह बैठक केवल औपचारिक निर्णयों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने बिहार में वैकल्पिक सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को आगे बढ़ाने की ठोस रूपरेखा प्रस्तुत की। अब देखना यह होगा कि 9 मई की बैठक और 5 जून का सम्मेलन इन विचारों को किस हद तक जनांदोलन का रूप दे पाते हैं।


आलोक कुमार

पश्चिम चंपारण के क्रिकेट जगत की वर्तमान स्थिति एक गंभीर

सबसे बड़ा आरोप जिला क्रिकेट संघ के संचालन और पारदर्शिता को लेकर

पश्चिम चंपारण के क्रिकेट जगत की वर्तमान स्थिति एक गंभीर चिंतन का विषय बन चुकी है। स्थानीय स्तर पर उठ रही आवाज़ें अब केवल शिकायत नहीं रह गई हैं, बल्कि यह एक व्यापक असंतोष और व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला आंदोलन बनता जा रहा है। फैजल शाह जैसे लोगों ने जिस साहस के साथ इस मुद्दे को सामने रखा है, वह बताता है कि अंदर ही अंदर खिलाड़ी, कोच, और खेल प्रेमी लंबे समय से एक बेहतर व्यवस्था की उम्मीद में चुप थे, लेकिन अब उनकी सहनशीलता जवाब दे रही है।

सबसे बड़ा आरोप जिला क्रिकेट संघ के संचालन और पारदर्शिता को लेकर है। कहा जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट लीग के नाम पर प्रत्येक टीम से ₹12,500 की फीस ली जाती है और कुल 20 टीमों के हिसाब से लगभग ₹2,50,000 की राशि इकट्ठा होती है। सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी राशि के बावजूद खिलाड़ियों को बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं मिलतीं? मैचों के दौरान क्वालिटी गेंद तक उपलब्ध नहीं कराई जाती, जो किसी भी स्तर के क्रिकेट के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि खेल के स्तर को गिराने वाली प्रवृत्ति है।

मैदान की स्थिति भी बेहद खराब बताई जा रही है। एक अच्छे खेल के लिए उचित पिच, आउटफील्ड और बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य होती हैं, लेकिन यहां खिलाड़ियों को इनसे वंचित रहना पड़ रहा है। यही नहीं, अंपायरिंग को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि निष्पक्ष अंपायरिंग के बजाय सचिव के निजी अकादमी से जुड़े जूनियर खिलाड़ियों को अंपायर बना दिया जाता है, जिससे मैच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। यह स्थिति न केवल खिलाड़ियों के मनोबल को गिराती है, बल्कि पूरे प्रतियोगिता की विश्वसनीयता को भी खत्म करती है।

टीम चयन प्रक्रिया पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि चयन में पारदर्शिता नहीं होगी और केवल कुछ खास खिलाड़ियों को प्राथमिकता दी जाएगी, तो प्रतिभाशाली खिलाड़ी हतोत्साहित होंगे। आरोप यह है कि जिला टीम का चयन केवल एक सीमित दायरे में सिमट गया है, जिससे जिले के अन्य योग्य खिलाड़ियों को मौका नहीं मिल पाता। यह किसी भी खेल के विकास के लिए सबसे बड़ी बाधा है।

यह भी चिंता का विषय है कि पिछले 6–7 वर्षों में जिले की टीम कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर पाई है। हाल ही में अंडर-16 टीम का हारकर बाहर हो जाना इसी कुप्रबंधन का परिणाम माना जा रहा है। यदि जमीनी स्तर पर ही तैयारी और चयन में खामियां होंगी, तो ऊपरी स्तर पर सफलता की उम्मीद करना व्यर्थ है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि खिलाड़ियों के समग्र विकास पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। क्रिकेट के नाम पर बच्चों का भविष्य दांव पर लग रहा है। वे न तो खेल में सही मार्गदर्शन पा रहे हैं और न ही पढ़ाई में ध्यान दे पा रहे हैं। इस तरह उनका दोहरा नुकसान हो रहा है—न वे अच्छे खिलाड़ी बन पा रहे हैं और न ही अपनी शिक्षा को सही दिशा दे पा रहे हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और समाज के लिए भी एक चेतावनी है।

इसके अलावा, छोटी-छोटी चीजों में बचत करने की मानसिकता भी खेल के स्तर को प्रभावित कर रही है। जैसे गेंद, पानी, मैदान की तैयारी आदि में कटौती करना यह दर्शाता है कि खेल को प्राथमिकता नहीं दी जा रही, बल्कि केवल औपचारिकता निभाई जा रही है। खिलाड़ियों को बैठने तक की उचित व्यवस्था नहीं मिलना इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्थापन में संवेदनशीलता की कमी है।

यदि पश्चिम चंपारण का क्रिकेट वास्तव में आगे बढ़ना चाहता है, तो सबसे पहले पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता को प्राथमिकता देनी होगी। जिला क्रिकेट संघ को यह समझना होगा कि वह केवल एक संस्था नहीं, बल्कि सैकड़ों खिलाड़ियों के सपनों का आधार है। यदि यही आधार कमजोर होगा, तो भविष्य भी कमजोर ही रहेगा।

आवश्यक है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, खिलाड़ियों की समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए और सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। स्थानीय प्रशासन और राज्य स्तर की संस्थाओं को भी इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि व्यवस्था में सुधार हो सके।

अंततः, यह केवल एक जिले का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का आईना है जिसमें खेल को सही दिशा देने के बजाय व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता दी जाती है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो न केवल पश्चिम चंपारण बल्कि पूरे क्षेत्र का क्रिकेट पीछे रह जाएगा। खिलाड़ियों के सपनों को टूटने से बचाने के लिए अब ठोस कदम उठाना अनिवार्य हो गया है।

आलोक कुमार

25 अप्रैल को विश्व स्तर पर विश्व मलेरिया दिवस

डीएनए की डबल हेलिक्स संरचना की खोज को प्रकाशित किया, जिसने जीवविज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी


25 अप्रैल का दिन इतिहास, विज्ञान, समाज और वैश्विक जागरूकता के कई महत्वपूर्ण पहलुओं से जुड़ा हुआ है। यह केवल एक साधारण तिथि नहीं, बल्कि कई ऐसी घटनाओं और अवसरों का प्रतीक है जिन्होंने दुनिया को नई दिशा दी। आइए विस्तार से समझते हैं कि 25 अप्रैल क्यों विशेष माना जाता है।

सबसे पहले, 25 अप्रैल को विश्व स्तर पर विश्व मलेरिया दिवस (World Malaria Day) मनाया जाता है। इसकी शुरुआत विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा की गई थी। इस दिन का उद्देश्य मलेरिया जैसी घातक बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करना और इसके रोकथाम व उपचार के लिए वैश्विक प्रयासों को मजबूत करना है। मलेरिया एक ऐसी बीमारी है जो मच्छरों के माध्यम से फैलती है और खासकर अफ्रीका और एशिया के कई देशों में लाखों लोगों को प्रभावित करती है। इस दिन विभिन्न देशों में जागरूकता अभियान, स्वास्थ्य शिविर और शोध गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है ताकि इस बीमारी को जड़ से समाप्त किया जा सके।

इतिहास के पन्नों में भी 25 अप्रैल की एक खास पहचान है। वर्ष 1953 में इसी दिन डीएनए की संरचना से जुड़ी एक ऐतिहासिक खोज सामने आई थी। James Watson और Francis Crick ने डीएनए की डबल हेलिक्स संरचना की खोज को प्रकाशित किया, जिसने जीवविज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी। इस खोज के कारण आज हम आनुवंशिकी, चिकित्सा और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में इतनी प्रगति कर पाए हैं।

इसके अलावा, 25 अप्रैल को ANZAC Day के रूप में भी मनाया जाता है, जो विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दिन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गैलीपोली अभियान में शहीद हुए सैनिकों की स्मृति में मनाया जाता है। यह दिन उन वीर सैनिकों के बलिदान को सम्मान देने का प्रतीक है जिन्होंने अपने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए।

भारत के संदर्भ में भी 25 अप्रैल कई कारणों से महत्वपूर्ण रहा है। अलग-अलग वर्षों में इस दिन कई सामाजिक और राजनीतिक घटनाएं हुई हैं, जिन्होंने देश की दिशा और दशा को प्रभावित किया। हालांकि यह दिन भारत में किसी बड़े राष्ट्रीय पर्व के रूप में नहीं मनाया जाता, फिर भी विभिन्न क्षेत्रों में इसका अपना महत्व है।

समाज और संस्कृति के स्तर पर भी यह दिन खास है क्योंकि यह हमें स्वास्थ्य, विज्ञान और बलिदान जैसे मूल्यों की याद दिलाता है। एक ओर जहां यह दिन हमें मलेरिया जैसी बीमारी से लड़ने के लिए प्रेरित करता है, वहीं दूसरी ओर यह वैज्ञानिक उपलब्धियों और सैनिकों के त्याग को भी सम्मानित करता है।

आज के दौर में, जब दुनिया कई चुनौतियों का सामना कर रही है—जैसे नई बीमारियां, पर्यावरण संकट और सामाजिक असमानताएं—25 अप्रैल जैसे दिन हमें जागरूक होने और मिलकर काम करने की प्रेरणा देते हैं। यह दिन हमें यह सिखाता है कि यदि हम एकजुट होकर प्रयास करें, तो किसी भी समस्या का समाधान संभव है।

अंततः, 25 अप्रैल केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह जागरूकता, ज्ञान और सम्मान का प्रतीक है। यह दिन हमें अतीत की उपलब्धियों को याद करने, वर्तमान की चुनौतियों को समझने और भविष्य के लिए बेहतर रास्ता बनाने की प्रेरणा देता है।


आलोक कुमार

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