सबसे बड़ा आरोप जिला क्रिकेट संघ के संचालन और पारदर्शिता को लेकर है। कहा जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट लीग के नाम पर प्रत्येक टीम से ₹12,500 की फीस ली जाती है और कुल 20 टीमों के हिसाब से लगभग ₹2,50,000 की राशि इकट्ठा होती है। सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी राशि के बावजूद खिलाड़ियों को बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं मिलतीं? मैचों के दौरान क्वालिटी गेंद तक उपलब्ध नहीं कराई जाती, जो किसी भी स्तर के क्रिकेट के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि खेल के स्तर को गिराने वाली प्रवृत्ति है।
मैदान की स्थिति भी बेहद खराब बताई जा रही है। एक अच्छे खेल के लिए उचित पिच, आउटफील्ड और बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य होती हैं, लेकिन यहां खिलाड़ियों को इनसे वंचित रहना पड़ रहा है। यही नहीं, अंपायरिंग को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि निष्पक्ष अंपायरिंग के बजाय सचिव के निजी अकादमी से जुड़े जूनियर खिलाड़ियों को अंपायर बना दिया जाता है, जिससे मैच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। यह स्थिति न केवल खिलाड़ियों के मनोबल को गिराती है, बल्कि पूरे प्रतियोगिता की विश्वसनीयता को भी खत्म करती है।
टीम चयन प्रक्रिया पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि चयन में पारदर्शिता नहीं होगी और केवल कुछ खास खिलाड़ियों को प्राथमिकता दी जाएगी, तो प्रतिभाशाली खिलाड़ी हतोत्साहित होंगे। आरोप यह है कि जिला टीम का चयन केवल एक सीमित दायरे में सिमट गया है, जिससे जिले के अन्य योग्य खिलाड़ियों को मौका नहीं मिल पाता। यह किसी भी खेल के विकास के लिए सबसे बड़ी बाधा है।
यह भी चिंता का विषय है कि पिछले 6–7 वर्षों में जिले की टीम कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर पाई है। हाल ही में अंडर-16 टीम का हारकर बाहर हो जाना इसी कुप्रबंधन का परिणाम माना जा रहा है। यदि जमीनी स्तर पर ही तैयारी और चयन में खामियां होंगी, तो ऊपरी स्तर पर सफलता की उम्मीद करना व्यर्थ है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि खिलाड़ियों के समग्र विकास पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। क्रिकेट के नाम पर बच्चों का भविष्य दांव पर लग रहा है। वे न तो खेल में सही मार्गदर्शन पा रहे हैं और न ही पढ़ाई में ध्यान दे पा रहे हैं। इस तरह उनका दोहरा नुकसान हो रहा है—न वे अच्छे खिलाड़ी बन पा रहे हैं और न ही अपनी शिक्षा को सही दिशा दे पा रहे हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और समाज के लिए भी एक चेतावनी है।
इसके अलावा, छोटी-छोटी चीजों में बचत करने की मानसिकता भी खेल के स्तर को प्रभावित कर रही है। जैसे गेंद, पानी, मैदान की तैयारी आदि में कटौती करना यह दर्शाता है कि खेल को प्राथमिकता नहीं दी जा रही, बल्कि केवल औपचारिकता निभाई जा रही है। खिलाड़ियों को बैठने तक की उचित व्यवस्था नहीं मिलना इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्थापन में संवेदनशीलता की कमी है।
यदि पश्चिम चंपारण का क्रिकेट वास्तव में आगे बढ़ना चाहता है, तो सबसे पहले पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता को प्राथमिकता देनी होगी। जिला क्रिकेट संघ को यह समझना होगा कि वह केवल एक संस्था नहीं, बल्कि सैकड़ों खिलाड़ियों के सपनों का आधार है। यदि यही आधार कमजोर होगा, तो भविष्य भी कमजोर ही रहेगा।
आवश्यक है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, खिलाड़ियों की समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए और सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। स्थानीय प्रशासन और राज्य स्तर की संस्थाओं को भी इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि व्यवस्था में सुधार हो सके।
अंततः, यह केवल एक जिले का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का आईना है जिसमें खेल को सही दिशा देने के बजाय व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता दी जाती है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो न केवल पश्चिम चंपारण बल्कि पूरे क्षेत्र का क्रिकेट पीछे रह जाएगा। खिलाड़ियों के सपनों को टूटने से बचाने के लिए अब ठोस कदम उठाना अनिवार्य हो गया है।
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